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परवेज मुशर्रफ को फांसी की सजा की पूरी कहानी

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और मिलिट्री शासक परवेज़ मुशर्रफ़. 17 दिसंबर को इस्लामाबाद की एक स्पेशल कोर्ट ने इन्हें सज़ा-ए-मौत सुनाई है. मुशर्रफ़ को देशद्रोह के मामले में दोषी पाया गया है. पाकिस्तान में शासकों को सज़ा सुनाए जाने का अतीत रहा है. ज़ुल्फिकार अली भुट्टो को तो फांसी भी चढ़ा दिया गया था. मगर ये पहला मौका है, जब किसी सैन्य प्रमुख को ‘हाई ट्रीज़न’ का दोषी पाया गया हो. इसके लिए पाकिस्तानी क़ानून में है- हाई ट्रीज़न (पनिशमेंट) ऐक्ट, 1973. इस अपराध में मौत या उम्रकैद दिए जाने का प्रावधान है. मुशर्रफ़ के आगे अभी सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का विकल्प है. अगर वहां भी ये सज़ा बरकरार रखी गई, तो मुशर्रफ राष्ट्रपति के आगे दया याचिका दायर कर सकते हैं. अगर वहां से भी सज़ा ख़ारिज़ नहीं होती, तब भी फिलहाल मुशर्रफ़ का कुछ नहीं बिगड़ेगा. क्योंकि वो अपने वतन से काफी दूर दुबई में हैं.

सज़ा सुनाने वाली बेंच
मुशर्रफ को सज़ा सुनाने वाली खंडपीठ में तीन जज थे. इसे लीड कर रहे थे पेशावर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस वक़ाक अहमद सेठ. उनके साथ बेंच में थे सिंध हाई कोर्ट के जस्टिस नज़र अकबर और लाहौर हाई कोर्ट के जस्टिस शाहिद करीम. फ़ैसला 2-1 के बहुमत से आया. जजमेंट की डिटेल्ड कॉपी फैसला सुनाए जाने के 48 घंटों में जारी होगी.

ये ‘हाई ट्रीज़न’ का केस 2007 के एक एपिसोड पर है
उस साल 3 नवंबर को मुशर्रफ ने पाकिस्तान में इमरजेंसी लगा दी थी. उनके ऊपर ये मामला दर्ज़ हुआ दिसंबर 2013 में, जब नवाज़ शरीफ़ सत्ता में थे. वही नवाज़, जिनसे सत्ता छीनकर मुशर्रफ पावर में आए थे. कोर्ट में मामला लंबा चला. और इस बीच मार्च 2016 में मुशर्रफ इलाज़ करवाने की बात कहकर देश से बाहर चले गए. इस वायदे के साथ कि वो वतन लौटकर आएंगे. पाकिस्तान छोड़ने के पहले मुशर्रफ ने मीडिया से कहा था-

मैं कमांडो हूं और अपने वतन से मुहब्बत करता हूं. कुछ हफ़्तों या महीनों में मैं लौटकर आ जाऊंगा.

मगर मुशर्रफ झूठे निकले. वापस नहीं लौटे अपने मुल्क.

मुस्लिमों को लेकर गई आख़िरी ट्रेन से पाकिस्तान पहुंचा परिवार
मुशर्रफ के उस क़िस्से पर, जो अपराध माना गया, उसपर लौटेंगे. मगर उससे पहले थोड़ी बात उनके बैकग्राउंड की. मुशर्रफ़ की पैदाइश दिल्ली की है. 11 अगस्त, 1943 को पुरानी दिल्ली की एक हवेली में पैदा हुए. मिडिल क्लास, पढ़ा-लिखा परिवार. पिता सैयद मुशर्रफुद्दीन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रॉडक्ट थे. विदेश विभाग के दफ़्तर में नौकरी करते थे. मां ज़रीन भी पढ़ी-लिखी थीं. उस जमाने में लखनऊ यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी लिटरेचर में MA थीं. मुशर्रफ़ ने कभी ख़ुद बताया था कि बंटवारे के बखत यहां के मुसलमानों को लेकर जो आख़िरी ट्रेन पाकिस्तान पहुंची, उसमें उनका परिवार भी था.

गिलगित में क्या किया?
पाकिस्तानी सेना में मुशर्रफ की एंट्री हुई साल 1961 में. 1965 के भारत-पाकिस्तान जंग में सेकेंड लेफ्टिनेंट की रैंक थी उनकी. जंग में बहादुरी दिखाने के लिए उन्हें मेडल भी मिला था. 1971 के युद्ध में वो कमांडो बटैलियन में कंपनी कमांडर थे. मई 1988 की बात है. मुशर्रफ स्पेशल सर्विसेज़ ग्रुप (SPG) में थे. तब पाकिस्तान में हुकूमत थी ज़िया-उल-हक़ की. गिलगित में विद्रोह छिड़ा. इसे संभालने की जिम्मेदारी मिली मुशर्रफ को. तब गिलगित में शिया बहुमत में थे. मुशर्रफ़ और उनके साथियों ने शियाओं का बहुमत ख़त्म करने के लिए डेमोग्रफी से खिलवाड़ किया. रणनीति के तहत पंजाबियों और पख़्तूनों को गिलगित-बाल्टिस्तान में बसाना शुरू किया गया. ऐसी ही रणनीति पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में अपनाई.

नवाज़ ने सोचा कुछ और हुआ कुछ
नवाज ने अक्टूबर 1998 में काफी कैलकुलेशन करके मुशर्रफ को सेना प्रमुख बनाया. मगर इन्हीं मुशर्रफ ने नवाज को मूर्ख बनाकर, उन्हें श्रीनगर में झंडा फहराने के सब्ज़बाग दिखाकर कारगिल की लड़ाई में कुदा दिया. कारगिल में फज़ीहत करवाने के बाद नवाज की स्थिति काफी ख़राब हो गई. उन्हें मुशर्रफ़ से ख़तरा महसूस होने लगा था. कहते हैं, नवाज़ सही मौका देखकर मुशर्रफ को हटाने वाले थे. मगर इससे पहले मुशर्रफ ने ही उन्हें हटा दिया. वो तारीख़ थी- 12 अक्टूबर, 1999. देर रात मुशर्रफ देश को संबोधित करने टीवी पर प्रकट हुए. सेना की वर्दी. आंखों पर रिम वाला उनका सिग्नेचर स्टाइल चश्मा. मुशर्रफ ने पाकिस्तान को बताया कि अब नवाज़ उनके प्रधानमंत्री नहीं रहे. नवाज़ को जेल में डाल दिया गया. उनके ऊपर भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के केस शुरू किए जाने की बात हुई. मगर नवाज़ के अच्छे रिश्ते थे सऊदी से. कहते हैं, सऊदी और अमेरिका के दबाव में मुशर्रफ़ ने नवाज़ को रिहा किया.

9/11 से बहुत फ़ायदा कमाया मुशर्रफ़ ने
मुशर्रफ़ की सत्ता को जीवन मिला सितंबर 2001 में अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले से. जिसके जवाब में अमेरिका ने अफगानिस्तान पर धावा बोल दिया. अफगानिस्तान में पार पाने को पाकिस्तान की मदद चाहिए थी. ये बड़े फ़ायदे की बात साबित हुई मुशर्रफ़ के लिए. इकॉनमी की हालत बेहतर हुई. आबादी का सपोर्ट भी मिलने लगा. ख़ुद को लोकतंत्रीय वैधता देने के लिए 2002 में चुनाव भी करवाए मुशर्रफ़ ने. मगर बिना विपक्ष के. कुछ समय तक चीजें ठीक रहने के बाद हालात बिगड़ने लगे. 2007 के मार्च महीने की बात है. मुशर्रफ़ ने पाकिस्तान के चीफ जस्टिस इफ़्तिकार चौधरी को बर्ख़ास्त कर दिया. इफ़्तिकार की बर्ख़ास्तगी के विरोध में वकीलों ने मूवमेंट चलाया. विरोध उग्र होता गया. दोनों पक्षों के बीच ज़ोर आज़माइश शुरू हो गई. विपक्ष ने भी मौका देखा और इफ़्तिकार को सपोर्ट दे दिया. कराची में ख़ूब हिंसा हुई. फिर लाल मस्जिद पर सेना ने हमला कर दिया. इसका बदला लेने के लिए आतंकवादी और कट्टरपंथी संगठनों ने हमले करवाए.

वो एपिसोड, जिसपर अब सज़ा सुनाई गई है
मुशर्रफ़ की ज़मीन हिल गई. बहुत प्रेशर में आकर उन्हें ‘नैशनल रिकॉन्सिलिएशन ऑर्डिनेंस’ पर दस्तख़त किए. ये बेनजीर और नवाज जैसे लोगों के लिए जीवनदान था. इसमें मुशर्रफ़ ने आश्वासन दिया कि अगर ये लोग पाकिस्तान लौटते हैं, तो उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा. इसी के सहारे फिर बेनज़ीर और नवाज पाकिस्तान लौटे. मुशर्रफ़ से निपटने के लिए दोनों ने हाथ मिला लिया. मुशर्रफ़ को ऐलान करना पड़ा कि फरवरी 2008 में चुनाव करवाए जाएंगे. तब इमरान ख़ान की पार्टी ‘तहरीक़-ए-इंसाफ़’ भी थी रेस में. इमरान बहिष्कार कर रहे थे चुनाव का. ये कहकर कि मुशर्रफ़ के रहते निष्पक्ष इलेक्शन नहीं हो सकेंगे. मगर बेनज़ीर कह रही थीं कि चुनावों के बहिष्कार से मुशर्रफ़ को फ़ायदा हो जाएगा. वो डटी हुई थीं. मुशर्रफ़ बहुत ख़राब स्थिति में आ गए थे. उनके ऊपर आर्मी चीफ की कुर्सी खाली करने का भी दबाव था. इस दबाव और विपक्ष से निटपने के लिए नवंबर 2007 में मुशर्रफ़ ने इमरजेंसी लगा दी. इसी इमरजेंसी का मामला है, जिसमें मुशर्रफ़ ट्रीज़न के दोषी पाए गए हैं.

दिसंबर 2007 में बेनज़ीर की हत्या के बाद स्थितियां और ख़राब हो गईं. उंगलियां मुशर्रफ़ पर उठीं. इतना प्रेशर था कि मुशर्रफ़ को सेना प्रमुख का पद छोड़ना पड़ा. उन्होंने अपने इंटेलिजेंस चीफ जनरल अशफाक़ परवेज़ कयानी को आर्मी चीफ बनाया. 2008 के चुनाव में बेनज़ीर की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (PPP) जीती. उनकी जगह ली बेनज़ीर के पति आसिफ़ अली ज़रदारी.

2016 में पाकिस्तानी आर्मी ने विदेश जाने में मदद की!
सत्ता चले जाने के बाद अप्रैल 2009 में मुशर्रफ़ पाकिस्तान से निकल गए. पहले लंदन में रहे. फिर दुबई शिफ्ट हो गए. मार्च 2013 में वो पाकिस्तान लौटे थे. उन्हें नज़रबंद कर दिया गया. नवाज़ शरीफ़ भूले नहीं थे अपने साथ हुआ सलूक. उन्होंने मुशर्रफ़ पर मुकदमा चलाने में देर नहीं की. मुशर्रफ़ को चुनाव लड़ने से डिस्क्वॉलिफाई कर दिया गया. उनके ऊपर दर्ज़न भर से ऊपर मामलों में ट्रायल चल रहा था. ऐसा लगा, नवाज़ उनसे अपना बदला सूद समेत वसूल लेंगे. मगर फिर मुशर्रफ़ ने आर्मी के साथ अपने लिंक इस्तेमाल किए. ड्रामा हुआ एक. मुशर्रफ़ का काफिला केस में सुनवाई के अदालत जा रहा था. मगर रूट डायवर्ट करके पहुंच गया मिलिटरी हॉस्पिटल. वहां मुशर्रफ़ का समझौता हुआ. सेना और खुफ़िया विभाग ने उन्हें सारे मामलों में जमानत दिलवा दी. 2016 में बीमारी के इलाज़ की बात पर पाकिस्तान से बाहर जाने की इजाज़त भी मिल गई. मुशर्रफ़ ने बाद में बताया था कि उस समय आर्मी चीफ रहे रहिल शरीफ़ ने उन्हें पाकिस्तान से बाहर आने में मदद दी थी.

ओवरकॉन्फि़ेंस
2018 के इलेक्शन से पहले भी ख़बरें आईं. कि मुशर्रफ़ ख़ुद भले न हों मौजूद पाकिस्तान में, मगर उनके पोस्टर दिख रहे हैं. ऐसे नारों के साथ कि मर्द कभी बूढ़ा नहीं होता. मुशर्रफ़ ने ख़ुद भी एक इंटरव्यू में कहा कि अगर वो अब सत्ता में लौटते हैं, तो उनके पास पहले के मुकाबले ज़्यादा स्वीकार्यता होगी. ऐसा कहते हुए मुशर्रफ़ ने कहा कि पहले कुछ लोगों ने ग़लतफ़हमी में उन्हें तानाशाह समझ लिया था. 2018 के चुनाव में भी मुशर्रफ़ ने कुछ करने की कोशिश की. 23 पार्टियों के एक गठबंधन का ऐलान करके कहा कि वो इसके अध्यक्ष हैं. इस कोलेशन में कई ऐसी पार्टियां थीं, जिनका नाम भी लोगों ने नहीं सुना था. और कुछ पार्टियां ऐसी थीं कि उन्होंने ऐलान करके सफ़ाई दी कि उनका मुशर्रफ़ और उनके गठबंधन से कोई लेना-देना नहीं है.

न्यू यॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में पढ़ा. कि जब मुशर्रफ़ सत्ता में थे, उस दौर में इस्लामाबाद के अंदर एक चुटकुला चला करता था. कि मुशर्रफ़ और अल्लाह में क्या फर्क़ है. ये सवाल पूछने के बाद जोक सुनाने वाला कहता-

अल्लाह को नहीं लगता कि वो मुशर्रफ़ है.

इस चुटकुले में मुशर्रफ के ओवरकॉन्फिडेंस का ताना है. लोग कहते हैं, यही ओवरकॉन्फिडेंस उन्हें भारी पड़ा. वैसे पाकिस्तान में जो-जो शासक बेज़ार हुआ, अधिकतर के केस में ये ओवरकॉन्फिडेंस वाली बात कॉमन थी. वैसे मुशर्रफ़ फिलहाल सेफ हैं. दुबई में उनका घर है. सेंट्रल लंदन में एक फ्लैट है उनके पास. वहीं पर रहकर वक़्त-वक़्त पर पाकिस्तान के लिए टिप्पणियां और समीक्षाएं जारी करते रहते हैं. अपनी सज़ा पाने पाकिस्तान लौटें, इतने नादान तो वो नहीं हैं.


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