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आपके बाप का राज है क्या? कभी मां का राज चलता था. मालूम!

बीच सड़क में गाड़ी खड़ी कर दो, तो लोग आपसे आकर पूछेंगे, सड़क तुम्हारे बाप की है क्या?

मनमानी करो तो पूछेंगे, तुम्हारे बाप का राज है क्या?

लेकिन कभी मां का राज चलता था. मालूम!

पप्पा के राज वाली सोच यानी पितृसत्ता के कारण दुनिया भर में माथे फूट रहे हैं, बच्चियां मर रही हैं. रेप हो रहे हैं. बहुएं जल रही हैं. जानते हैं ये राज कब से आया और मम्मा का राज कब हुआ करता था.

अस्पतालों में परचे चिपकाए जाते हैं, ‘लिंग/भ्रूण जांच करना अपराध है!’ ताकि कोई जन्म से पहले पता न लगा ले कि बेटी पैदा होने वाली है कि बेटा. बेटी का पता चल जाए तो मारने की सहूलियत रहती है. फिर दहेज नहीं देना पड़ता. कल को रेप या छेड़छाड़ जैसी सामाजिक बेइज्जती से भी पिंड छूट जाता है.

इंस्टाग्राम पर free the nipple अभियान चल रहा है. फेसबुक पर भी ऐसा ही चल रहा है. कि भई, गांव-देहात में निपल से बच्चे को सबके बीच दूध पिलाती मां उत्तेजक नहीं लगती.तो सोशल मीडिया पर क्यों बैन किया हुआ है? कन्याएं ऑफेंस ले रही हैं.

सलमान बाबू ने बोल दिया छह-सात घंटे रेस्लर की उठा-पटक से हालत रेप की हुई औरत जैसी हो जाती है. काटजू साहब कह रहे हैं तीन बार तलाक कहने वाले जाहिल हैं और किसी औरत को भी तीन बार तलाक का हक होना चाहिए. कि इस दौर में ऐसी रूढ़ि हमें मंजूर नहीं.

पार्कों में वैलेंटाइंस डे को बच्चियां अपने दोस्तों के साथ बैठी होती हैं तो संस्कारों के इन अभावों में पीट दी जाती हैं. गली से गुजरती हैं तो बैठे लड़कों द्वारा सीटी स्कैन कर ली जाती हैं. ये 2016 है और अब भी लड़की दोयम दर्जे की है. लड़का प्रथम दर्जे का है. क्यों?

विद्वान कहते हैं इसलिए क्योंकि बाप का राज चल रहा है. यानी पितृसत्ता. बोले तो patriarchy. जिस पर तितली नाम की बहुत जाबड़ फिल्म भी बनी थी. लगे हाथ तो देखिएगा.

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आखिर पप्पा का राज कब से आया? और क्या कभी मम्मा का राज भी होता था? 

मिडिल ईस्ट में जब लोग घर बसाना शुरू कर रहे थे, उसी समय के आसपास खेती की भी शुरुआत हुई. एक ही जगह पर ज़्यादा समय तक टिके रहने वाली ये ज़िन्दगी उनके लिए नई थी. इससे पहले लोग पानी और खाने की तलाश में भटकते रहते थे.

जब काफ़ी सारे लोग एक ही इलाके में, एक साथ रहने लगें, तो क्या होगा? उनके लिए अपने घर, ज़मीन, और खेत को अलग करने और उस पर अधिकार बनाए रखने की ज़रूरत सामने आ जाएगी. कुछ ऐसा ही हुआ था इन लोगों के साथ. ‘परिवार’ का कॉन्सेप्ट भी इसी ज़रूरत से निकल के आया था. इस इकॉनोमिक फैक्टर से और भी कई सामाजिक बदलाव आए. ये ऐसे बदलाव थे जिनसे हमारी आज तक की ज़िन्दगी की दिशा और दशा तय होती है.

इनमें से सबसे बड़ा बदलाव था जेंडर रिलेशन में. अब ‘अपनी’ ज़मीन और ‘अपने’ परिवार की भावना लोगों में आ रही थी. ऐसे में हर पुरुष के लिए ये जानना ज़रूरी हो गया था कि कौन सा बच्चा उसका है? जिससे ज़मीन-जायदाद उसके बच्चों के हाथ में ही जाएं. इसी के साथ फीमेल सेक्सुअलिटी को कंट्रोल करने की ज़रूरत आई. और धीरे-धीरे वक़्त के साथ ये मर्दों के स्वाभिमान से जुड़ गई. जहां से फिर मां और बहन की गालियां भी बनती गईं.

अब आप पूछ सकते हैं कि ज़मीन-जायदाद पुरुष सदस्यों के हाथ में ही होनी चाहिए, ये कब और क्यों शुरू हुआ? इसके लिए थोड़ा और पीछे जाना पड़ेगा.

बहुत पहले लोग खाना खोजने के लिए जंगलों में भटकते थे. या तो ख़ुद छोटे जानवरों को मार कर खाते थे, या दूसरे जानवरों के शिकार किए हुए जानवरों को खाते थे. उस समय से ही मेल शिकार करने जाते थे. और फीमेल अक्सर घर पर ही रह जातीं थीं.

इसमें ये बायोलॉजिकल फैक्टर कि मेल शारीरिक रूप से ज़्यादा मजबूत होते हैं, कितना सही है, कहा नहीं जा सकता. हां, इतना ज़रूर पक्का है कि फीमेल के शिकार करने न जाने की एक बड़ी वजह दूसरे बायोलॉजिकल फैक्टर से जुड़ी है. वो वजह थी फीमेल का हर कुछ समय बाद प्रेग्नेंट होना. और इसीलिए शुरू से ही औज़ार बनाने, शिकार करने और ज़मीन जैसी चीज़ों पर अधिकार जमाने की ज़िम्मेदारी मेल के हिस्से रही. बायोलॉजिकल सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए जो नियम बने, आगे जा कर वो शक्ति प्रदर्शन और कंट्रोल करने की ज़िद से जुड़ गए.

ये भी माना जा सकता है कि मेल का शिकार करना ही धीरे-धीरे समय के साथ उसे शारीरिक रूप से ज़्यादा सक्षम बना रहा था. बजाय इसके कि शारीरिक रूप से अधिक सक्षम होने के कारण मेल शिकार करता था, और फीमेल घर के काम.

आने वाले समय के साथ ये जेंडर रोल्स हमारे दिमाग में घर कर गए, और हम इन्हें स्वीकार भी करते चले गए. जहां से पितृसत्ता और फीमेल सेक्सुअलिटी पर कंट्रोल करने की शुरुआत हुई आज वो पूरी स्थिति बदल चुकी है. लेकिन पितृसत्ता अब बेतुके तरीके से भी हावी हो चुकी है.

वैसे हर जगह और हर समय ऐसा नहीं था. पितृसत्ता स्थापित होने और सर्व शक्तिशाली पुरुषों भगवानों के लॉन्च होने से पहले फीमेल गॉडेस की पूजा का कॉन्सेप्ट था. शिकार करने और खाना खोजकर पेट भरने के ज़माने में ज़्यादा से ज़्यादा सदस्यों का होना फायदेमंद था. जितने अधिक लोग, उतने अधिक औज़ार और उतना ही अधिक खाना. बच्चे पैदा करने का काम फीमेल ही कर सकती थी.

फीमेल की अहमियत और ज़्यादा बढ़ गई जब हमारे पूर्वजों ने खेती-बाड़ी शुरू की. इसकी दो वजहें थीं. एक तो ये कि औरतें खेतों में काफ़ी काम करती थीं. आज तक खेतों में निराई और अनाज ओसाने (अनाज को छिलके से अलग करने) का काम औरतें ही करती हैं.

दूसरी वजह थी कि अब मिट्टी की फर्टिलिटी पर ही पूरा खाना-पीना निर्भर हो चुका था, जिसे फीमेल फर्टिलिटी से जोड़ा जा रहा था. सिंचाई का बंदोबस्त न होने के कारण मिट्टी की फर्टिलिटी की अहमियत भी ज़्यादा थी. इसी वजह से फीमेल गॉडेस के कल्ट का कॉन्सेप्ट आया. हड़प्पा-मोहनजोदड़ो में भी फीमेल गॉडेस जैसी एक मूर्ति मिली है, जिसकी नाभि से एक पौधा निकलता है.

ये तो बहुत पुरानी बात थी. काफ़ी बाद तक कुछ matrilineal यानी मातृ सत्तात्मक वंश मिलते हैं. जैसे भारत के सातवाहन वंश में गौतमीपुत्र श्री सत्करनी जैसे नाम मिलते, जिससे इनके मातृसत्तात्मक वंश के होने का अंदाज़ा लगाया जाता है.

जाने अनजाने मेनस्ट्रीम भगवानों के बीच आज भी शक्ति कल्ट और दुर्गा-काली जैसी चीज़ें बची हैं, जिन्हें फीमेल गॉडेस से जोड़ कर देखा जा सकता है.

आज के समय में मेघालय की मातृसत्ता वंश वाली सोसाइटी में प्रॉपर्टी खानदान की सबसे छोटी बेटी को ही मिलती है. हालांकि मां-बाप चाहें तो अपनी ज़मीन जायदाद सभी बच्चों को बराबर बांट सकते हैं. यहां बच्चों की पहचान उनकी मां के नाम से होती है. इसी वजह से यहां दहेज या लड़कियों को मारने की घटनाएं कभी सुनाई नहीं देतीं.

लेकिन इसकी वजह से सोसाइटी के मेल सदस्यों को कई बार आर्थिक परेशानियां झेलनी पड़ती हैं. patriarchy एक तरफ की हद है, तो matriarchy दूसरी तरफ की हद है. दोनों में ही बराबरी नहीं है. दोनों से ऊपर उठना इस समय एक आदर्शवादी सोच है. लेकिन सोसाइटी की संतुलनकारी बात यही है कि ये कभी रुकती नहीं. जब तक कोई समूह नाखुश रहता है, तब तक वो चीज़ों को बदलने की कोशिश करेगा.

और हमारी खुशकिस्मती है कि सोसाइटी कभी आइडियल/ आदर्श स्टेज पर नहीं पहुंचेगी, ये हमेशा उस तरफ बढ़ना चाहेगी.

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ये स्टोरी हमारे साथ इंटर्नशिप कर रही पारुल ने लिखी है.

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