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मुंबई के वो किस्से, जिनमें यही आदमी बाघ की तरह बैठ सकता था

बम्बई पर लिखी सबसे अच्छी किताबों में से एक ‘मैक्सिमम सिटी’ में सुकेतु मेहता लिखते हैं:

बम्बई में पहले हिन्दू, मुसलमान या क्रिश्चियन होना एक हेयरस्टाइल जैसा था. कोई कुछ भी फॉलो करता था.

(बाल ठाकरे के आने के बाद सबकी हेयर स्टाइल बदल गई.सब बदल गया.)

शिव सेना बन चुकी थी. बाल ठाकरे बम्बई में अपनी पहुंच बढ़ाने लगे थे. आरएसएस की तरह शिव सेना ने हर मोहल्ले में शाखाएं खोलनी शुरू कर दीं. फिर शुरू हुई गली की राजनीति, गली के आंदोलन, इनफॉर्मल तरीके से नेटवर्किंग, गली-मोहल्ले की पंचायती, भाषणों में बम्बईया बोली. पानी-बिजली की लड़ाई, किरायेदार-मकान मालिक के झंझट , बाबुओं का करप्शन, घर-परिवार की लड़ाइयां सब कुछ निपटाए जाने लगे.

मतलब अपने एरिया में दलाली, पंचायती, जज-मुजरिम का खेल, डॉक्टरी सब करने लगे शिवसैनिक. दबा के हिन्दू फेस्टिवल्स मनाए जाने लगे. छोटे बिजनेसमैन, दलाल, लोकल भाई, नवा नवा नेता सब जॉइन कर लिए शिव सेना. तुरंत ही एक फ़ौज खड़ी हो गई. अपने सेनापति के इशारे पर कुछ भी करने को तैयार. बाल ठाकरे ने एक बार कहा था: शिव सैनिक होने का मतलब कोई पोस्ट लेना नहीं है. ये एक स्टेट ऑफ़ माइंड है. मारपीट उनकी नज़रों में मारपीट नहीं बल्कि नेचुरल जस्टिस है. वी एस नायपाल, जूलिया एकर्ट जैसे लेखकों ने शिवसेना की आसानी से लोगों में घुल-मिलकर नेतागिरी करने की काबिलियत को कहानियों का हिस्सा बना दिया.

छा गया था बाल ठाकरे का बिना देखे भाषण देना. आम जनों की भाषा में. फिल्मों के डायलॉग यूज करके. बात कहीं से कहीं ले के चले जाना. सबको एक सुर से गाली देना. बम्बई की नौकरी खोजती जनता को अपना तारणहार दिखने लगा था ठाकरे में.

शिवसेना की राजनीति 1966-74

‘मद्रासी’

19 जून, 1966 को शिवसेना बनी थी. कांग्रेस की पॉलिसी के चलते जन्मी बेरोजगारी मुद्दा नहीं थी. मुद्दे में आईं ‘मद्रासी’ लोगों की नौकरियां. बाल ठाकरे के लिए मद्रासी अब पुराना शब्द था. वो उनको ‘युंडू-गुंडू’ कहते थे. वीकली कार्टून ‘मार्मिक’ में इस चीज को खूब दबा के छापा जाता था. एक अजीब बात थी कि एक समय ‘मार्मिक’ के उद्घाटन में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने वाले कांग्रेसी नेता यशवंतराव चव्हाण थे! शायद इसीलिए शिवसेना की गुंडई पर कांग्रेस ने कभी सांस भी नहीं ली.

‘गुजराती’

गुजरातियों से नफरत तो पहले से ही थी. जब महाराष्ट्र के लिए लड़ाई हो रही थी, उस समय बम्बई स्टेट के चीफ मिनिस्टर मोरार जी देसाई ने पुलिस एक्शन लिया था जिसमें 105 लोग मरे थे. चर्चगेट के फाउंटेन एरिया का हुतात्मा चौक उन्हीं लोगों के नाम पर है.

‘आरक्षण’

ये डिमांड भी रखी गई कि सरकारी नौकरी में मराठी लोगों का 80% आरक्षण रहे. और राज्य सरकार के हाउसिंग बोर्ड के घरों में भी 80% आरक्षण मिले. RBI, SBI, Insurance, Air India, Railways सबमें धमकी दी गई. चारों तरफ ये अफवाह फैलाई गई कि इनमें काम करने वाले साउथ इंडियन मराठी लोगों का एप्लीकेशन भी फाड़ के फेंक देते हैं. कूड़ेदानों में कागज़ खोजे जाते थे.

ठाकरे की गिरफ्तारी 

1967 में ठाकरे ने अखबार ‘नवकाल’ से कहा: इंडिया में हिटलर की जरूरत है.

इससे संतोष नहीं हुआ तो 1969 में शिवसेना ने दबे हुए महाराष्ट्र-कर्नाटक बॉर्डर को मुद्दा उठा लिया. महाराष्ट्र की राज्य सरकार ने पहली और आखिरी बार ठाकरे को गिरफ्तार कर लिया. पहले से प्लान था. गिरफ्तार होते ही दंगे हो गए.

69 मरे. 250 घायल हुए. 151 पुलिस वाले मरे.

सबसे भयानक हुआ कि राज्य सरकार ने जेल में बंद ठाकरे से गुजारिश की कि अपने लोगों को रोको. एक सप्ताह तक चले दंगों के बाद ठाकरे ने अपने लोगों को रोका. ये आखिरी बार था जब ठाकरे के लोगों ने बॉर्डर को लेकर दंगे किए.

कम्युनिस्ट

30 अक्टूबर, 1966 को दशहरा था. ऑफिशियल रूप से शिवसेना की पहली रैली हुई. इसमें ठाकरे ने कम्युनिस्ट लोगों के खिलाफ जम के जहर उगला.

बिजनेसमैन शिवसेना को बुलाने लगे अपनी फैक्ट्री में स्ट्राइक रोकने के लिए. लार्सेन एंड टुब्रो, पार्ले बॉटलिंग प्लांट, मानेकलाल में शिवसेना ने कामगारों को तोड़ लिया. इस हद तक ये आगे बढ़े कि 1974 में जॉर्ज फर्नान्डीज़ की रेलवे स्ट्राइक को भी नकार दिया. जॉर्ज फर्नान्डीज़ ठाकरे के पारिवारिक मित्र हुआ करते थे!

परेल की दलवी बिल्डिंग में कम्युनिस्ट पार्टी का हेडक्वार्टर था. शिवसेना ने दिसम्बर 1967 में बिल्डिंग पर हमला कर भयानक तोड़-फोड़ मचा दी. कार्यकर्ताओं को बुरी तरह पीटा गया. ठाकरे ने कहा कि कुछ मित्रों के ऑफिस थे उसमें, नहीं तो इरादा बिल्डिंग को जलाने का था. बाद में कम्युनिस्ट पार्टी से विधायक कृष्णा देसाई की हत्या कर दी गई. आज़ादी के बाद मुंबई में ये पहली राजनीतिक हत्या थी. इस घटना ने सबको सन्न कर दिया. कांग्रेस को छोड़कर. मुख्यमंत्री चिल मारकर बैठे रहे.

हिन्दू-मुस्लिम

सुकेतु मेहता कहते हैं:

मेरे अंकल ने दंगों के दिनों में मुसलमानों की बहुत मदद की थी. अपने घर में भी रखा था. जान के रिस्क पर मुसलमानों की बस्ती में खाना लेकर जाते थे. अंकल ने बाद में कहा: मुसलमानों को सबक सिखाना जरूरी था. उनसे लड़ने के लिए शिवसेना जरूरी है.

 शिवसेना का तर्क था: बम्बई के गुजराती और मारवाड़ी, मुसलमानों के हाथों क़त्ल हो जाते अगर शिवसेना न होती. मारवाड़ी सिर्फ पैसा बनाना जानते हैं. लड़ना नहीं.

Huffington Post
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ठाकरे ने फिर हिन्दू-मुस्लिम मुद्दों में हाथ डालना शुरू किया. थोड़ा-थोड़ा. कल्याण और महाद में दुर्गादी और महिकावती मंदिरों में जगह को लेकर हिन्दू-मुस्लिम विवाद था. ठाकरे बीवी के साथ पूजा करने गए. ऐलान कर दिया कि जिसको जो करना है कर ले. पता था अभी कोई कुछ नहीं करेगा. शिवसेना के साथ और लोग जुड़ गए.

मई 1970 में ठाकरे ने असली रंग दिखाया. भिवंडी में शिव जयंती की यात्रा निकली थी. रस्ते को लेकर बवाल हुआ. दंगा हो गया. भिवंडी, जलगांव, महाद और कल्याण हर जगह दंगे हुए.

जो लोग हिन्दू सेंटीमेंट से ग्रसित थे, ठाकरे ने उनको भी नहीं छोड़ा. बम्बई में दलितों की पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया अपना अस्तित्व खो रही थी. 1972 में दलित पैंथर्स नाम से नई पार्टी बनी. इसने भी वादा किया कि सोशल जस्टिस मिलेगा. नौकरियां मिलेंगी. जाति-प्रथा ख़त्म होगी. शिव सेना के साथ भयानक संघर्ष हुआ. दलित नेताओं के मूर्ति पूजा पर बयान को लेकर शिवसेना ने सपोर्ट जुटाया. दलित पैंथर के नेता भगवत जाधव का क़त्ल कर दिया गया.

पॉलिटिक्स में एंट्री

गुंडई को सिर्फ डर से नहीं चले जा सकता. इसके लिए पॉलिटिक्स में आना जरूरी है. पर ठाकरे पॉलिटिक्स को शुरू से गाली देते थे. कहते थे मैं तो कार्टूनिस्ट हूं. नेताओं का शगल मुझे पसंद नहीं आता.

1967 में लोकसभा के चुनाव हुए. शिवसेना खुद नहीं लड़ी. पर मुंबई की सीटों पर लोगों को हराने का काम जरूर किया. ठाकरे की नज़र में पूर्व रक्षा मंत्री वी के कृष्ण मेनन बाहरी थे. डांगे कम्युनिस्ट थे. मित्र जॉर्ज फर्नान्डीज़ सोशलिस्ट थे. दो लोग जीत गए पर मेनन हार गए. फर्नान्डीज़ को हाराने के लिए शिवसेना ने एस के पाटिल को सपोर्ट किया. पिछले सात साल से ठाकरे रोज पाटिल को अपने अखबार में गरियाते थे. हालांकि टाटा के घर के नवल टाटा को सपोर्ट करने में नहीं चूके. पैसा था, तो ना तो वो बाहरी थे न ही दूसरे धर्म के. ठाकरे की एक अदा ये भी थी. डेलीओ के मुताबिक, जी आर खैरनार, जो बम्बई के म्युनिसिपल कमिश्नर रह चुके थे, ऑन रिकॉर्ड बोले कि एक बार दाऊद इब्राहिम की बेनामी प्रॉपर्टी डेमोलिश की जा रही थी. ठाकरे ने रुकवा दिया. कहा कि दाऊद ने शिवसेना को डोनेट किया  है और इस नाते वो शिवसैनिक है.

अब राजनीति का चस्का लग गया. 1967 में ठाणे म्युनिसिपल चुनाव हुए और शिवसेना ने 40 में से 17 सीटें जीत लीं. 1968 में बॉम्बे म्युनिसिपल कॉरपोरशन के चुनाव हुए. यहां पर शिवसेना ने जॉर्ज फर्नान्डीज़ की पार्टी से गठजोड़ कर लिया! 140 में से 42 सीटें जीतीं शिवसेना ने.

1970 में कृष्णा देसाई के मर्डर के बाद उनकी सीट के लिए चुनाव हुए. यहां शिवसेना के कैंडिडेट ने कृष्णा की बीवी को हराकर शिवसेना का असेंबली में खाता खोल दिया.

1973 में BMC के चुनाव फिर हुए. इस बार शिवसेना ने अपनी दुश्मन रही रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया से गठजोड़ कर लिया! अभी दुनिया को झटका देना बाकी था. अपने कैंडिडेट को BMC का मेयर बनाने के लिए शिवसेना ने मुस्लिम लीग और कांग्रेस से भी टांका भिड़ा लिया!

बम्बई पर कब्ज़ा कैसे हुआ?

फिर शुरू हुआ बम्बई पर कब्जे का खेल. बम्बई में  थे बिजनेसमैन, बॉलीवुड और BMC.

बिजनेसमैन

बिजनेसमैन को जीतने के लिए ठाकरे ने एंटी-कम्युनिस्ट नीति लगाई. एक ट्रेन हादसे का जिक्र कर उनके बारे में कहा कि ये लोग ट्रेन हादसे में जख्मी औरतों के गहने भी लूटकर भाग जाते हैं. कम्युनिस्ट फैक्ट्रियों में हड़ताल करते थे. टाटा-अम्बानी जैसे लोगों के लिए शिवसेना का होना बहुत जरूरी था. बहुत जल्द उनका विश्वास जीत लिया ठाकरे ने. इसी चीज से बॉलीवुड अछूता नहीं रहा था. फिल्म ‘दीवार’ इसी चीज को दिखाती है. पर्दे पर अमिताभ अपना यूनियनबाजी का बैकग्राउंड छोड़कर गुंडे बन जाते हैं. बॉलीवुड का ठाकरे के साथ आना संयोग नहीं था.

बॉलीवुड

साउथ इंडिया के बहुत से डायरेक्टर बॉलीवुड में फ़िल्में बनाते थे. तमिलनाडु में उसी समय एंटी-हिंदी एजिटेशन चल रहा था. वहां पर लोगों ने एक हिंदी फिल्म की स्क्रीनिंग रुकवा दी. बस ठाकरे को मौका मिल गया. ‘मद्रासियों’ के खिलाफ मोर्चा था ही. उन्होंने बम्बई में साउथ के डायरेक्टर्स की फिल्मों की शूटिंग भी रुकवा दी. बम्बई के कुछ डायरेक्टर और प्रोड्यूसर ठाकरे की इस अदा पर फ़िदा हो गए. उन्हें लगा कि ठाकरे के साथ आ जाने से उनकी अपनी फिल्मों का कारोबार बढ़ेगा. ये रिश्ता गहराता गया. दिलीप कुमार से जो दोस्ती हुई ठाकरे की कि दोनों साथ में बियर पीते थे रोज. दोस्ती टूटी 1998 में जब दिलीप ने पाकिस्तान का सर्वोच्च सम्मान ‘निशान-ए-इम्तियाज’ स्वीकार कर लिया. ठाकरे की अमिताभ के साथ भी दोस्ती रही. तो अभिषेक बच्चन भी आशीर्वाद लेने जाते थे. राजकपूर ठाकरे के घर आते थे. तो कपूर खानदान की चौथी पीढ़ी के रणबीर कपूर से भी ‘सांवरिया’ के बारे में ठाकरे बात करते थे. फिल्म ‘सरकार’ बनने के बाद बाल ठाकरे के लिए स्पेशल स्क्रीनिंग हुई और परमिशन के बाद रिलीज की गई.

ठाकरे के मरने के बाद सितारों के ट्वीट देख लीजिये:

अजय देवगन: बाला साहब ठाकरे दूरदर्शी आदमी थे.
राम गोपाल वर्मा: ताकत की सच्ची प्रतिमूर्ति
अमिताभ बच्चन: बाला साहब की हिम्मत की तारीफ करता हूं.
लता मंगेशकर: मैं तो अनाथ हो गई.
रजनीकांत: बाला साहब ठाकरे एक महान नेता थे. मेरे जैसे लोगों के लिए बाप समान थे.
आशा भोंसले: मराठी मानुस के गर्व थे बाला साहब ठाकरे.

सचिन से भी ठाकरे का प्यार भरा रिश्ता रहा. गावस्कर और विश्नाथ से तो बहुत पहले से था. सचिन से थोड़ा झटके तब, जब सचिन ने कह दिया था कि मुंबई सबके लिए है. तब ठाकरे ने अपनी उम्र और सचिन के कद का भी ख्याल नहीं किया. कहा, ‘सचिन चीकी सिंगल ना ही लें तो बेहतर रहेगा.’

BMC

1968 में बॉम्बे म्युनिसिपल कॉरपोरशन के चुनाव हुए. 140 में से 42 सीटें जीतीं शिवसेना ने.

BMC में शिवसेना का आना क्यों जरूरी था?

आइए जानते हैं:

बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कारपोरेशन(BMC)

BMC साउथ मुंबई तक का है. मतलब चर्चगेट से दादर तक का. थाने, मीरा-भायंदर, नवी मुंबई, कल्याण-डोम्बिवली, वसई-विरार तो अलग हैं.

दुनिया की सबसे धनी म्युनिसिपल कार्पोरेशंस में से एक BMC अगर कंपनी होती तो एसेट्स और रेवेन्यू के हिसाब से इंडिया की टॉप 30 कंपनियों में होती. इसका बजट भारत सरकार के बजट का लगभग 2.5% है. 2016-17 का बजट:  37052 करोड़ रुपये. मतलब भारत के कई छोटे राज्यों के बजट से ज्यादा.

BMC 1888 में बना था. इसका मेयर मुंबई का फर्स्ट सिटीजन माना जाता है. ठीक वैसे ही जैसे राष्ट्रपति इंडिया के फर्स्ट सिटीजन माने जाते हैं.

BMC Building, Mumbai
BMC Building, Mumbai

मुंबई में पहला म्युनिसिपल कॉरपोरेशन 1865 में आया था. स्वतंत्रता के बाद मुंबई की राजनीति बहुत ही संगीन रही. ये तय नहीं हो पा रहा था कि इसे महाराष्ट्र में रखा जाये या गुजरात में. या फिर इसे केंद्र-शासित प्रदेश बनाकर छोड़ दिया जाए.

BMC बिल्डिंग के एंट्रेंस पर सर फिरोजशाह मेहता की मूर्ति लगी है. सर मेहता ने बॉम्बे म्युनिसिपल एक्ट 1872 ड्राफ्ट किया था. 1888 में नाम बदलकर बम्बई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन एक्ट कर दिया गया. स्वतंत्रता संग्राम के कई नेता BMC से ही निकले हैं. जैसे फिरोजशाह मेहता और दादा भाई नौरोजी. बम्बई बहुत पहले ही देश का फाइनेंशियल कैपिटल बन चुकी थी. 1977 में कांग्रेस की हार के बाद लोगों को भरोसा हुआ कि कांग्रेस को हराया जा सकता है. उसके बाद BMC में पॉलिटिक्स शुरू हो गई और डेवलपमेंट डिक्की में चला गया. 2011 में बम्बई हाई कोर्ट ने BMC को सबसे भ्रष्ट संस्थाओं में से एक बताया.

तो BMC पर कब्जा मुंबई पर कब्ज़ा है. मुंबई देश की फाइनेंशियल राजधानी. बॉलीवुड वहां है. लाखों लोग रोज काम पर जाते हैं. 2 करोड़ लोग रहते हैं. म्युनिसिपल कॉरपोरेशन का काम सीधा लोगों के रोजाना जिन्दगी को एफेक्ट करता है. मुख्यमंत्री और प्रधानमन्त्री तो बाद में आते हैं.

अब बम्बई का मतलब शिवसेना और बाल ठाकरे हो गए थे. पर राजनीति इतनी भी स्थायी नहीं होती. आगे बहुत कुछ हुआ. इमरजेंसी लगी. देश बदला. जारी रहेगा…..


ये स्टोरी ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए ऋषभ ने की थी.


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