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पाकिस्तानी सेना अपने PM को मूर्ख बना रही थी और PM श्रीनगर में झंडा फहराने के ख्वाब देख रहे थे

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25 जुलाई, 2018 को पाकिस्तान में चुनाव हुए. पाकिस्तान में लोकतंत्र का पस्त रेकॉर्ड रहा है. ऐसे में यहां कोई सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर ले, तो बड़ी बात है. ये पहली बार हुआ कि पाकिस्तान में बैक-टू-बैक दो सरकारों ने अपना कार्यकाल पूरा किया. ये जो हुआ है, वो ऐतिहासिक है. इस खास मौके पर द लल्लनटॉप पाकिस्तान की राजनीति पर एक सीरीज़ लाया है. शुरुआत से लेकर अब तक. पढ़िए, इस सीरीज़ की 15वीं किस्त.


ये उन दिनों की बात है, जब नवाज शरीफ पहली बार प्रधानमंत्री बने थे. 1991 का साल था. आसिफ नवाज जानुजा आर्मी चीफ थे. आर्मी के सपोर्ट की वजह से नवाज यहां तक पहुंच पाए थे. मगर फिर PM बनकर नवाज को लगने लगा कि उन्हें सेना की जरूरत नहीं. कि अब वो अपनी बदौलत भीड़ को खींचने का माद्दा रखते हैं. ये सोचना था कि नवाज खुद की राह चलने में जुट गए. मगर नवाज सेना से सीधे-सीधे बिगाड़ना नहीं चाहते थे. जीतने के कई तरीके होते हैं. या तो किसी को हरा दो. या उसे खरीद लो. तो नवाज ने अपना सिग्ननेचर दांव आजमाया.

एक दिन की बात है. मरी में एक मीटिंग थी. आर्मी चीफ जानुजा भी आए थे. मीटिंग के बाद जानुजा जाने लगे. नवाज उन्हें छोड़ने साथ आए. फिर एकाएक उन्होंने आर्मी चीफ से पूछा- आपके पास कौन सी कार है? जानुजा ने कहा- टॉयटा क्राउन. इस पर शरीफ ने बड़ी खुशामद के अंदाज में जवाब दिया- ये कार आपके लायक नहीं है. फिर उन्होंने साथ के एक आदमी की तरफ इशारा किया. वो आदमी दौड़ा गया एक ओर. आया, तो उसके साथ एक ब्रैंड न्यू चमचमाती बीएमडब्ल्यू थी. नवाज ने उस कार की चाभी जानुजा को थमाई. फिर बोले, आप पर तो यही कार जंचेगी. जानुजा को काटो तो खून नहीं. वो सोच रहे थे. नवाज की इतनी हिम्मत की इतनी ढीठाई से सबके सामने रिश्वत ऑफर करें! खरीदने की कोशिश करें! मगर जानुजा ने खुद पर काबू रखा. चाभी लौटाते हुए बोले- बहुत शुक्रिया आपका. लेकिन मेरे पास जो है, मैं उसी में खुश हूं.

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विरोधी हों कि पत्रकार, या कि विधायक-नेता, सबको सेटल करने के लिए नवाज का एक बड़ा कारगर फॉर्म्युला था. पैसे लुटाओ, महंगे तोहफे दो. ये नवाज का अंदाज था. कहते हैं, जैसे वो खुद पैसों की भाषा समझते थे. वैसे ही वो दूसरों को भी पैसों की भाषा से ही समझाने की कोशिश करते थे. जैसे धूप के साथ पसीना, प्रेमी के साथ प्रेमिका और कोयले के साथ धुआं जुड़ता है. कहते हैं कि नवाज और करप्शन के बीच भी बिल्कुल वैसा ही रिश्ता है. नवाज कोई नजूमी होते, तो तौबा करते. क्योंकि उन्हें चल जाता कि भ्रष्ट होने का ये रेपुटेशन आगे चलकर उन्हें बर्बाद करने वाला है.

नवाज शरीफ
विरोधी कहते हैं कि नवाज की पॉलिटिक्स ‘खाने और खिलाने’ पर टिकी थी. खाने से मतलब खुद का फायदा. खिलाने का मतलब, पैसा-जमीन या तोहफे देकर दूसरों को चुप करवाना. इसी से जुड़ा एक टर्म है लिफाफा जर्नलिज्म. कहते हैं नवाज पत्रकारों को रिश्वत देते थे. ताकि वो उनके करप्शन के मामले रिपोर्ट न करें (फोटो: Getty)

पहली बार जैसा न हो, ये सोचकर नवाज ने कई गलतियां की
बतौर PM नवाज के पहले कार्यकाल में ही उनके और सेना के बीच फासले आ गए थे. इस वजह से नवाज में शुरू से एक किस्म की असुरक्षा थी. वो सेना और ISI की दखलंदाजी पर, उनके कंट्रोल करने की आदत पर काबू पाना चाहते थे. पहले मिर्जा असलम बेग. फिर जनरल जानुजा. नवाज की इन दोनों सेना प्रमुखों से नहीं पटी. फिर जानुजा की मौत हो गई. 1993 में नवाज वहीद काकर को आर्मी चीफ बनाकर ले आए. मगर जब नवाज का राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान ने साथ पंगा हुआ, तो उन्हें आर्मी चीफ से कोई सपोर्ट नहीं मिला. बल्कि सुप्रीम कोर्ट से अपने हक में फैसला लेकर नवाज को फिर आर्मी ने ही बाहर का रास्ता दिखा दिया. 1997 में जब नवाज दूसरी बार प्रधानमंत्री बने, तब ये सारा अतीत उनके दिमाग में था. उन्होंने बहुत सोच-समझकर परवेज मुशर्रफ को सेना प्रमुख बनाया. नवाज को लगा था कि परवेज वफादार निकलेंगे. अपने से पहले वालों की तरह नवाज ने भी गलती की थी. मुशर्रफ ने न केवल उन्हें कारगिल दिया, बल्कि उनकी गद्दी भी छीन ली. मगर उस सब तक पहुंचने से पहले कुछ बातें, जो नवाज के इस दूसरे कार्यकाल का हाई पॉइंट साबित हुईं.

तालिबान सरकार को मान्यता
1996 में तालिबान ने अफगानिस्तान में अपनी सरकार बना ली. उनसे पहले वहां मुजाहिदीन सरकार थी. राष्ट्रपति थे, बुरहानुद्दीन रब्बानी. रब्बानी 1992 से 1996 तक अफगानिस्तान के राष्ट्रपति रहे थे. सितंबर 1996 में उन्हें हटाकर तालिबान ने वहां ‘इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान’ बनाया. फरवरी 1997 में नवाज PM बने. और मई 1997 में पाकिस्तान ने तालिबान सरकार को मान्यता दे दी.

2010 में फार्रुक लेघारी गुजर गए. लेघारी PPP की नींव रखने वाले लोगों में शामिल थे. 1993 से 1997 तक पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे. बेनजीर ने यही सोचकर उन्हें राष्ट्रपति बनाया था कि वो वफादार रहेंगे. मगर लेघारी ने उन्हें बर्खास्त कर दिया. कहते हैं कि उस समय लेघारी और नवाज के बीच एक समझौता हुआ था. दोनों ने एक-दूसरी की मदद करने का वादा किया. बाद में नवाज के साथ उनके मतभेद हुए और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा (फोटो: रॉयटर्स)
2010 में फार्रुक लेघारी गुजर गए. लेघारी PPP की नींव रखने वाले लोगों में शामिल थे. 1993 से 1997 तक पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे. बेनजीर ने यही सोचकर उन्हें राष्ट्रपति बनाया था कि वो वफादार रहेंगे. मगर लेघारी ने उन्हें बर्खास्त कर दिया. कहते हैं कि उस समय लेघारी और नवाज के बीच एक समझौता हुआ था. दोनों ने एक-दूसरी की मदद करने का वादा किया. बाद में नवाज के साथ उनके मतभेद हुए और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा (फोटो: रॉयटर्स)

संविधान का आठवां संशोधन खत्म किया
राष्ट्रपति फार्रुख लेघारी ने बेनजीर भुट्टो की सरकार को बर्खास्त किया था. कहते हैं कि बेनजीर को हटाने के बाद राष्ट्रपति लेघारी की नवाज शरीफ से डील हुई. तब एक नियम था कि लोन डिफॉल्टर्स चुनाव नहीं लड़ सकते. इस हिसाब से नवाज और शाहबाज, दोनों चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य थे. मगर लेघारी ने इस नियम में संशोधन कर शरीफ भाइयों की मदद की. बदले में उनके एक रिश्तेदार को सेनेट का एक टिकट मिला. और भी कुछ चीजें मिलीं लेघारी को. लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल में नवाज कोई जोखिम नहीं लेना चाहते थे. इसीलिए उन्होंने सबसे पहले संविधान के आठवें संशोधन को खत्म कर दिया. ये 8वां संशोधन राष्ट्रपति को नैशनल असेंबली और चुनी हुई सरकार भंग करने का अधिकार देता था. ये खत्म करके नवाज ने एक तरह से राष्ट्रपति की सारी ताकत ही खत्म कर दी. फिर चीफ जस्टिस सज्जाद अली शाह और नवाज के झगड़े में लेघारी ने चीफ जस्टिस की मदद करने की कोशिश की. इससे उनका और नवाज का और बिगड़ गया. दिसंबर 1997 में लेघारी को इस्तीफा देना पड़ा. इस्तीफा देते हुए लेघारी ने कहा. कि वो वजीर-ए-आजम के साथ लगातार हो रह कलह से थक गए हैं. करीब 50 मिनट तक पत्रकारों से बात करते रहे वो. बताया-

मेरे कुछ उसूल हैं. मैं अपने फायदे से ज्यादा अहमियत मुल्क के संविधान को देता हूं. इसीलिए मैंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने का फैसला कर लिया है. 

सज्जाद अली शाह जून 1994 से दिसंबर 1997 तक पाकिस्तान के चीफ जस्टिस रहे. उन्हें बेनजीर भुट्टो ने चीफ जस्टिस बनाया था. 1993 में जब नवाज शरीफ खुद की बर्खास्तगी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए थे, तब 11 जजों की बेंच में अकेले सज्जाद ही थे जिन्होंने राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान के नवाज को बर्खास्त किए जाने के फैसले को सही बताया था. इसीलिए जब नवाज दोबारा प्रधानमंत्री बनकर आए, तब वो किसी भी कीमत पर सज्जाद को चीफ जस्टिस के पद से हटाना चाहते थे (फोटो: द नेशन)
सज्जाद अली शाह जून 1994 से दिसंबर 1997 तक पाकिस्तान के चीफ जस्टिस रहे. 1993 में जब नवाज शरीफ खुद की बर्खास्तगी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए थे, तब 11 जजों की बेंच में अकेले सज्जाद ही थे जिन्होंने राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान के नवाज को बर्खास्त किए जाने के फैसले को सही बताया था. इसीलिए जब नवाज दोबारा प्रधानमंत्री बनकर आए, तब वो किसी भी कीमत पर सज्जाद को चीफ जस्टिस के पद से हटाना चाहते थे (फोटो: द नेशन)

चीफ जस्टिस के साथ बिगाड़
नवाज जब दूसरी बार सत्ता में आए, उस समय चीफ जस्टिस थे सज्जाद अली शाह. सज्जाद और नवाज का एक कड़वा अतीत था. नवाज को लगता था कि चीफ जस्टिस की कुर्सी पर बैठे सज्जाद उनके लिए खतरा हो सकते हैं. इसीलिए वो किसी भी कीमत पर सज्जाद को हटाना चाहते थे. फिर एक छोटी सी बात पर ये फसाद बढ़ा. सज्जाद ने पांच जजों की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति को लेकर नवाज सरकार के पास अपना रेकमेंडेशन भेजा. 1996 में सुप्रीम कोर्ट के ही दिए एक फैसले के मुताबिक, सरकार को चीफ जस्टिस की रेकमेंडेशन माननी ही पड़ती. जब कोर्ट ने ये फैसला दिया था, तब नवाज विपक्ष में थे. तब उन्होंने अदालत के इस फैसले पर बड़ी तालियां बजाई थीं. लेकिन अब वो मुश्किल में थे. उन्हें लगा, सुप्रीम कोर्ट के अंदर सज्जाद का गुट मजबूत हो जाएगा. जरूरत पड़ने पर ये बात उनके खिलाफ जा सकती है.

और भी कई चीजें हुईं दोनों के बीच. जैसे- नवाज शरीफ ने कुछ नौकरशाहों को गिरफ्तार करवाया था. सज्जाद ने उन्हें आजाद करवा दिया. फिर नवाज ने स्पेशल ट्रायल कोर्ट्स बनवाए. सज्जाद इसके लिए राजी नहीं थे. उन्हीं दिनों नवाज सरकार ने संविधान में कुछ संशोधन किए थे. इनमें से एक था 13वां संशोधन. इस संशोधन से आर्टिकल 58 (2)-बी खत्म हो गया. यानी अब राष्ट्रपति के पास नैशनल असेंबली को भंग करने का अधिकार नहीं रहा. सज्जाद की अध्यक्षता में एक खंडपीठ ने नवाज के फैसले पर रोक लगा दी. मगर इस वक्त तक नवाज सुप्रीम कोर्ट में दो फाड़ करवा चुके थे. इसी वजह से कुछ ही देर बाद नवाज के पक्ष वाले सुप्रीम कोर्ट के जजों के दूसरे गुट ने सज्जाद वाली बेंच का फैसला खारिज कर दिया. फिर सुप्रीम कोर्ट के सामने नवाज के किए 14वें संशोधन के खिलाफ अपील आई. 14वें संशोधन की वजह से ये हुआ कि अगर किसी पार्टी का सांसद या विधायक असेंबली के अंदर अपनी पार्टी के खिलाफ कुछ बोले या पार्टी के फैसले के खिलाफ वोट करे, तो पार्टी प्रमुख असेंबली की उसकी सदस्यता खारिज कर सकता था. एक और चीज हुई. सज्जाद अली शाह ने नवाज की सबसे कमजोर नस को दबा दिया. वो नवाज के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई शुरू करने का मन बना चुके थे. ऐसा होता, तो नवाज कहां बचते. वो भ्रष्टाचारी हैं, ये बात तो पूरा पाकिस्तान जानता था.

नवाज चिढ़ गए. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ बयान दिया. चीफ जस्टिस ने उनके ऊपर कोर्ट अवमानना का इल्जाम लगाया. इसके जवाब में नवाज के लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में खूब हंगामा मचाया. तोड़-फोड़ की. फसाद किया. चीफ जस्टिस ने मदद मांगी. राष्ट्रपति लेघारी ने उनकी मदद करने की कोशिश की, लेकिन नाकामयाब रहे. आर्मी चीफ जहांगीर करामात इस पचड़े में पड़े ही नहीं. नवाज ने सुप्रीम कोर्ट को सज्जाद के खिलाफ खड़ा कर दिया. दो सदस्यों वाली एक खंडपीठ ने सज्जाद के चीफ जस्टिस पद पर नियुक्ति को ही अवैध बता दिया. नवाज के साथ चल रही इस लड़ाई में सज्जाद हार गए थे. या कहें कि वो हरवा दिए गए थे.

अमेरिका नहीं चाहता था कि पाकिस्तान न्यूक्लियर हथियार हासिल करे. अमेरिका ने लगातार पाकिस्तान को न्यूक्लियर प्रोग्राम करने से रोका. लेकिन जब भारत ने पोखरण परीक्षण किए, उसके बाद नवाज के ऊपर भी न्यूक्लियर टेस्ट करने का दबाव आ गया. ये वही जगह है, जहां पाकिस्तान ने 1998 में अपना न्यूक्लियर टेस्ट किया था (फोटो: AP)
अमेरिका नहीं चाहता था कि पाकिस्तान न्यूक्लियर हथियार हासिल करे. अमेरिका ने लगातार पाकिस्तान को न्यूक्लियर प्रोग्राम करने से रोका. लेकिन जब भारत ने पोखरण परीक्षण किए, उसके बाद नवाज के ऊपर भी न्यूक्लियर टेस्ट करने का दबाव आ गया. ये वही जगह है, जहां पाकिस्तान ने 1998 में अपना न्यूक्लियर टेस्ट किया था (फोटो: AP)

न्यूक्लियर टेस्ट
मई 1998. एक दिन एकाएक खबर आई कि भारत ने फिर से परमाणु परीक्षण कर लिया. अब नवाज के ऊपर दबाव आ गया. कहते हैं कि नवाज शुरुआत में परमाणु परीक्षण के लिए तैयार नहीं थे. उन्हें अमेरिका की नाराजगी मोल नहीं लेनी थी. दूसरा, न्यूक्लियर टेस्ट करने पर कई सारे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध भी लगा दिए जाते पाकिस्तान पर. नवाज को सबसे ज्यादा दिलचस्पी कारोबार में ही थी. वो नहीं चाहते थे कि अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचे. मगर जैसा कि पहले लिखा है, उनके ऊपर दबाव था. सो उन्होंने अपना मन पक्का किया. कहते हैं कि सऊदी ने भी पाकिस्तान की पीठ थपथपाई थी. नवाज को लगा कि अगर अमेरिका नाराज भी हो गया, तो सऊदी उनके साथ होगा. कई इस्लामिक देश होंगे, जो शायद तब उनकी मदद को आगे आएं. और इसी बैकग्राउंड में पाकिस्तान ने भी न्यूक्लियर टेस्ट कर लिए. ये तारीख थी- 28 मई, 1998. इस दिन पाकिस्तान ने पांच न्यूक्लियर टेस्ट किए. दो दिन बाद उसने फिर से एक छठा टेस्ट भी किया. बलूचिस्तान के चाघाई में जब पाकिस्तान ने न्यूक्लियर टेस्ट किया, तब नवाज भी वहां मौजूद थे. पाकिस्तानी जनता के बीच अपनी छवि मांजने का इससे अच्छा क्या मौका हो सकता था. नीचे एक विडियो है. ये पाकिस्तान के न्यूक्लियर टेस्ट के बाद का विडियो है. उसी जगह का, जहां पाकिस्तान ने ये परीक्षण किया था-

परवेज मुशर्रफ को आर्मी चीफ बनाया
अक्टूबर 1998 में नवाज ने आर्मी चीफ जहांगीर करामात से इस्तीफा मांगा. जहांगीर ने इस्तीफा दे भी दिया. इसके बाद नवाज ने परवेज मुशर्रफ को अपना सेना प्रमुख नियुक्त कर दिया. उन्हें लगा कि अब सारी चीजें उनके कंट्रोल में हैं. सारी चीजें मतलब- सेना, अदालत, राष्ट्रपति. सब के सब.

भारत से दोस्ती
उधर नवाज, इधर अटल बिहारी वाजपेयी. दोनों की मुलाकात न्यू यॉर्क में हुई. वाजपेयी पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारना चाहते थे. वो चाहते थे कि उनके कार्यकाल में कश्मीर समस्या का कोई ठोस समाधान निकले. इसके लिए पाकिस्तान के साथ दोस्ताना रिश्ते जरूरी थे. सो वाजपेयी ने नवाज के आगे प्रस्ताव रखा. कि भारत और पाकिस्तान के बीच एक बस सेवा शुरू की जाए. नवाज ने तुरंत हामी भर दी. उन्होंने इस बारे में सेना की राय लेना जरूरी नहीं समझा. खैर, तो ये हुआ कि 20 फरवरी, 1999 को वाजपेयी लाहौर पहुंचे. वो ऐतिहासिक बस यात्रा थी. भारत और पाकिस्तान ही नहीं, पूरी दुनिया की नजर थी उस पर. वाजपेयी ने कहा कि अब भारत सार्वजनिक तौर पर कश्मीर को अपना अभिन्न हिस्सा नहीं कहेगा. जवाब में नवाज ने कहा कि पाकिस्ताव UN के प्रस्ताव के मुताबिक कश्मीर समस्या का समाधान निकालने का जिक्र नहीं करेगा. मतलब भारत और पाकिस्तान, दोनों ही अपनी पारंपरिक लाइन से हटने को राजी थे. नवाज की सबसे बड़ी चूक ये थी कि सेना को भरोसे में लिए बिना वो आगे बढ़ते गए. कश्मीर और भारत पर पाकिस्तान के इस पॉलिसी चेंज से पाकिस्तानी सेना बहुत खफा थी. वो किसी कीमत पर ये समझौता नहीं होने देना चाहती थी. और इसी का नतीजा था कि कारगिल हो गया. नीचे एक विडियो है. अटल बिहारी वाजपेयी और नवाज शरीफ लाहौर समझौते पर दस्तखत कर रहे हैं.

ऑपरेशन कारगिल
कारगिल- ‘पाकिस्तान्स ड्रिफ्ट इनटू एक्सट्रिमिज्म: अल्लाह, द आर्मी ऐंड अमेरिकाज़ वॉर ऑन टेरर’ नाम की एक किताब है. इसे लिखा है हसन अब्बास ने. हसन का कहना है कि इधर नवाज लाहौर में वाजपेयी के साथ दोस्ती बढ़ा रहे थे, उन्हें गले लगा रहे थे, और दूसरी तरफ पाकिस्तानी सेना कारगिल युद्ध की तैयारी कर रही थी. नवाज को इसका रत्तीभर भी अंदाजा नहीं था. हसन अब्बास का कहना है कि पाकिस्तानी सेना इस जंग की प्लानिंग लंबे वक्त से कर रही थी. एक बार ज़िया-उल-हक के सामने भी ये प्रपोजल रखा गया था. मगर ज़िया ने इससे इनकार कर दिया. वो भारत के साथ कोई बड़ी जंग नहीं चाहते थे. ज़िया के मरने के बाद दोबारा ये बात उठी. मगर, फिर खारिज कर दी गई. कारगिल का तीसरा और निर्णायक प्लान लेकर आने का श्रेय जाता है लेफ्टिनेंट जनरल मुहम्मद अजीज खान को. अजीज उस समय चीफ ऑफ द जरनल स्टाफ थे. उनकी मदद की लेफ्टिनेंट जनरल महमूद अहमद और मेजर जनरल जावेद हसन ने. महमूद अहमद 10th कॉर्प्स के कमांडर थे. जावेद हसन उत्तरी इलाकों में तैनात ट्रूप्स के कमांडर थे. मतलब, कारगिल को अंजाम देने के लिए इन दोनों का शामिल होना बेहद जरूरी था. आप इन तीनों को कारगिल जंग का सूत्रधार कह सकते हैं. जब इस प्लानिंग के बारे में मुशर्रफ को बताया गया, तो वो बड़े प्रभावित हुए. कारगिल की प्लानिंग सेना में बहुत गिने-चुने लोगों के बीच थी. मगर नवाज को बताना तो जरूरी था. साजिश रचने वालों ने फैसला किया कि वो नवाज को पूरा सच नहीं बताएंगे.

नवाज के स्वभाव के बारे में बताते हैं कि उनका ध्यान बहुत देर तक एक जगह नहीं टिकता. दूसरा, वो सोच-समझकर फैसले नहीं लेते. बहुत जल्द मंसूबे बना लेते हैं. शायद यही सारी चीजें थीं कि नवाज ने कारगिल के ऊपर सेना के दिए गए प्रेजेंटेशन पर उतनी सतर्कता नहीं दिखाई, जितनी उनको दिखानी चाहिए थी. उन्हें लगा कि ये घुसपैठियों को भारत में घुसाने का कोई आम सा ऑपरेशन है (फोटो: Getty)
नवाज के स्वभाव के बारे में बताते हैं कि उनका ध्यान बहुत देर तक एक जगह नहीं टिकता. दूसरा, वो सोच-समझकर फैसले नहीं लेते. बहुत जल्द मंसूबे बना लेते हैं. शायद यही सारी चीजें थीं कि कारगिल के ऊपर सेना के दिए गए प्रेजेंटेशन में नवाज ने उतनी सतर्कता नहीं दिखाई, जितनी उनको दिखानी चाहिए थी. उन्हें लगा कि ये घुसपैठियों को भारत में घुसाने का कोई आम सा ऑपरेशन है (फोटो: Getty)

कारगिल से पहले की वो मीटिंग, जिसमें सेना ने नवाज को मूर्ख बनाया
पाकिस्तान की एक पत्रकार नसीम जेहरा ने हाल ही में एक किताब लिखी है. नाम है- फ्रॉम कारगिल टू द कू: इवेंट्स दैट शुक पाकिस्तान. इसके मुताबिक, ये 17 मई की बात है. उस दिन नवाज को एक ऑपरेशन के बारे में ब्रीफिंग दी गई. इस ऑपरेशन का नाम था- कोह पाइमा. इस्लामाबाद से कुछ मील की दूरी पर ISI के ओझरी कैंप ऑफिस में ये मीटिंग हुई. इसमें नवाज के अलावा पूरा कारगिल गैंग का कोर ग्रुप- मुशर्रफ, अजीज खान, महमूद अहमद, जावेद हसन सब मौजूद थे. ISI के डायरेक्टर जनरल जियाउद्दीन बट्ट भी वहीं थे. विदेश मंत्री सरताज अजीज, नॉदर्न एरियाज ऐंड कश्मीर अफेयर्स के मंत्री लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) माजिद मलिक, विदेश सचिव शमशाद अहमद को भी बुलाया गया था. इससे पहले भारत की मीडिया में खबरें आ रही थीं. कि पाकिस्तानी सैनिकों की देखरेख में कई मुजाहिदीन LoC पार करके भारत में घुस आए हैं. जब मीटिंग शुरू हुई, तो पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिटरी ऑपरेशन्स (DGMO) प्रेजेंटेशन देने के लिए खड़े हुए. ये पहली बार था, जब नवाज और उनकी कैबिनेट के सदस्यों को कारगिल ऑपरेशन की भनक मिली.

DGMO ज़िया ने नवाज से मुखातिब होते हुए कहा-

सर, कश्मीर में आजादी की लड़ाई को और तेज करने की आपकी इच्छा के मुताबिक हमने एक प्लान तैयार किया है. ये पांच चरणों का ऑपरेशन होगा. इसका पहला स्टेज पूरा हो चुका है.

सेना ने नवाज को ऐसा मैप दिखाया कि वो कुछ समझ ही नहीं पाए
फिर नवाज को एक नक्शा दिखाया गया. इसमें कुछ पॉइंट्स बने थे. नवाज को बताया गया कि ये जगहें हासिल की जा चुकी हैं. जो मैप दिखाया गया, वो टिपिकल सेना वाला था. यहां एक बिंदू, वहां एक निशान. एक शब्द नहीं लिखा था. ये आम आदमी के पल्ले नहीं पड़ सकता. इसमें LoC तक साफ-साफ नहीं दिखाया गया था. ऊपर से नवाज के बारे में मशहूर था. कि उनका ध्यान बड़ी जल्द भटक जाता है. जब नवाज को इसी मैप में भारत और पाकिस्तान की पॉजिशन्स दिखाई गईं, तो नवाज उनकी सही लोकशन समझ ही नहीं पाए. ब्रीफिंग में ये जिक्र भी नहीं किया गया कि पाकिस्तानी सेना LoC क्रॉस करेगी. जाहिर है, नवाज बस ये समझते रहे कि पाकिस्तान घुसपैठ करवाने तक ही सीमित रहेगा. नवाज को बताया गया कि पाकिस्तान ने सामरिक महत्व के कुछ ऊंचाई वाले इलाकों को अपने कब्जे में ले लिया है. लेकिन ये वो इलाके हैं, जो अनडिमार्केटेड जोन में आते हैं. मतलब, वो किसके इलाके में हैं, इसका कभी कोई फैसला हुआ ही नहीं. नवाज को समझाया गया कि भारतीय फौज के लिए इन इलाकों को वापस अपने कब्जे में लेना नामुमकिन है.

कागरिल में जो हुआ, उसकी जिम्मेदारी किसकी थी? जंग के बाद जब ये सवाल उठा, तो नवाज बोले उन्हें कुछ और बताया गया था. मुशर्रफ का कहना था कि जो भी हुआ, सरकार की मंजूरी से हुआ (फोटो: Getty)
कागरिल में जो हुआ, उसकी जिम्मेदारी किसकी थी? जंग के बाद जब ये सवाल उठा, तो नवाज बोले उन्हें कुछ और बताया गया था. मुशर्रफ का कहना था कि जो भी हुआ, सरकार की मंजूरी से हुआ (फोटो: Getty)

पाकिस्तानी सेना ने क्या प्लानिंग की थी?
जम्मू-कश्मीर के तीन हिस्से हैं. एक तो जम्मू, दूसरा कश्मीर घाटी और तीसरा लद्दाख. चूंकि कश्मीर का एक हिस्सा अभी पाकिस्तान के पास है, तो आप उसको चौथा हिस्सा मान सकते हैं. जम्मू की तरफ से कश्मीर घाटी में घुसने का रास्ता है बानिहाल दर्रा. लद्दाख की ओर से अगर आप घाटी में आए, तो आपको जोजिला दर्रा पार करना होगा. DGMO ने नवाज को बताया-

हम मुजाहिदीनों को लद्दाख में घुसाएंगे. वो वहां अपनी गतिविधियां शुरू करेंगे. दूसरी तरफ कई मुजाहिदीन जम्मू में घुसपैठ करेंगे. इनसे निपटने के लिए भारत अपनी फौज लद्दाख और जम्मू की तरफ भेजेगा. उस समय घाटी में भारतीय फौज नाम की ही बची रह जाएगी. यहीं पर शुरू होगा ऑपरेशन का चौथा स्टेज. मुजाहिदीनों के सहारे पाकिस्तान बानिहाल और जोजिला को ब्लॉक कर देगा. इस तरह कश्मीर घाटी को अलग-थलग करके पाकिस्तान उस पर कब्जा कर लेगा.

DGMO ने नवाज को लॉलीपॉप थमाया. कहा, घाटी से कट जाने की वजह से भारत की हालत खराब हो जाएगी. वो घुटनों पर आकर पाकिस्तान के सामने गिड़गिड़ाएगा. तब भारत के पास बातचीत के सिवा कोई और रास्ता नहीं बचेगा. ऐसे में पाकिस्तान उसे अपनी शर्तों पर बात करने को मजबूर कर सकेगा.

ऐसा नहीं कि कारगिल में पाकिस्तान से लड़ना भारतीय सेना के लिए बहुत आसान रहा हो. असल में पाकिस्तान के लोग ऊंचाई पर थे. उनके लिए नीचे भारतीय फौज पर निशाना लगाना आसान था. भारत के लिए उन तक पहुंचना मुश्किल था. तस्वीर में भारतीय सेना के कुछ जवान बोफोर्स तोप के साथ हैं. ये टैंक कारगिल में बहुत काम आए (फोटो: AP)
ऐसा नहीं कि कारगिल में पाकिस्तान से लड़ना भारतीय सेना के लिए बहुत आसान रहा हो. असल में पाकिस्तान के लोग ऊंचाई पर थे. उनके लिए नीचे भारतीय फौज पर निशाना लगाना आसान था. भारत के लिए उन तक पहुंचना मुश्किल था. तस्वीर में भारतीय सेना के कुछ जवान बोफोर्स तोप के साथ हैं. इन टैंकों की खरीद का सौदा चाहे जितना भी विवादित रहा हो, लेकिन कारगिल में ये बहुत काम आए (फोटो: AP)

नवाज इतिहास बनाने के ख्वाब देख रहे थे
सेना ने नवाज को बहकाया. नवाज बहक गए. उन्होंने सेना पर यकीन कर लिया. सेना ने नवाज को यकीन दिलाया कि ऑपरेशन का कामयाब होना बिल्कुल पक्की बात है. इसकी पांच वजह बताई गईं. पहला- हमारी जीती हुई पोस्ट्स अभेद्य होंगी. दूसरा- भारत में इतनी इच्छाशक्ति ही नहीं कि वो पाकिस्तान से लड़ सके. इसीलिए भारत ऊंचाई वाले अपने इलाकों को वापस कब्जे में लेने की कोशिश भी नहीं करेगा. तीसरा- कोई भी अंतरराष्ट्रीय शक्ति भारत के साथ खड़ी नहीं होगी. पाकिस्तान के ऊपर कोई विदेशी दबाव नहीं होगा. चौथा- पाकिस्तान की खराब माली हालत को ध्यान में रखते हुए सेना इस ऑपरेशन के लिए कोई अतिरिक्त फंड नहीं मांगेगी. जब DGMO बोल चुके, तो अजीज खान अपनी जगह पर खड़े होकर नवाज से बोले-

सर, जिन्ना और मुस्लिम लीग की कोशिशों से पाकिस्तान बना. पाकिस्तान बनाने वालों के तौर पर उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा. अब अल्लाह ने आपको ये मौका दिया है. भारत के पास कश्मीर का जो हिस्सा है, उसे वापस पाने का मौका मिला है आपको. पाकिस्तान के इतिहास में आपका नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज होगा. कश्मीर फतह का कारनामा आप पूरा करके दिखाएंगे.

नवाज को जीत का इतना भरोसा हो गया था कि उन्होंने अजीज खान से पलटकर सवाल पूछा-

आपने मुझे अब तक ये नहीं बताया है कि हम श्रीनगर में पाकिस्तान का झंडा कब फहराएंगे?

सरताज अजीज ने नवाज को लाहौर समझौते की याद दिलाई थी. लेकिन नवाज ने उनकी नसीहत को नजरंदाज कर दिया. उनकी कैबिनेट के कई सदस्यों ने कारगिल ऑपरेशन से असहमति जताई थी. लेकिन नवाज ने फिर भी जोखिम लिया. पाकिस्तान में हमेशा से एक कायदा रहा है. भारत के साथ जंग में हुई हार यहां किसी न किसी के सिर तो जाती है. चाहे वो अयूब हों, या फिर याहया खान. ऐसे ही कारगिल की जंग नवाज के सिर जाने वाली थी. ये तस्वीर लाहौर समझौते के समय की है (फोटो: AP)
सरताज अजीज ने नवाज को लाहौर समझौते की याद दिलाई थी. लेकिन नवाज ने उनकी नसीहत को नजरंदाज कर दिया. उनकी कैबिनेट के कई सदस्यों ने कारगिल ऑपरेशन से असहमति जताई थी. लेकिन नवाज ने फिर भी जोखिम लिया. पाकिस्तान में हमेशा से एक कायदा रहा है. भारत के साथ जंग में हुई हार यहां किसी न किसी के सिर तो जाती है. चाहे वो अयूब हों, या फिर याहया खान. ऐसे ही कारगिल की जंग नवाज के सिर जाने वाली थी. ये तस्वीर लाहौर समझौते के समय की है (फोटो: AP)

नवाज ने भारत को धोखा दिया
नवाज को यकीन दिलाया गया कि इस ऑपरेशन की बदौलत वो पाकिस्तान की शर्तों पर कश्मीर समस्या सुलझा लेंगे. पाकिस्तान का कोई भी लीडर जिसे हासिल नहीं कर पाया, उस कश्मीर को वो हासिल कर लेगें. साथ में, सेना ने उन्हें ऑपरेशन कामयाब रहने की गारंटी दी थी. अति-उत्साह में शायद नवाज इतिहास याद न कर पाए हों. वरना उन्हें 1965 की जंग जरूर याद आती. और अयूब खान का हश्र भी याद आता. नवाज ये भी समझ नहीं पाए कि सेना ने उनसे ऑपरेशन शुरू करने की इजाजत नहीं ली है. बल्कि उन्हें बताए बिना ऑपरेशन शुरू कर चुकी है.

इस ऑपरेशन के लिए हामी भरते वक्त नवाज शायद ‘लाहौर समझौता’ भूल गए थे. मगर सरताज अजीज ने उन्हें इसकी याद दिलाई थी. सरताज ने नवाज से कहा था- आपको नहीं लगता कि ये ऑपरेशन लाहौर समझौते के खिलाफ है. इसके जवाब में नवाज बोले-

सरताज अजीज साहब, क्या हम कागज-पत्तर के सहारे कभी कश्मीर हासिल कर सकते हैं? हमें यहां कश्मीर को झटकने का मौका मिल रहा है.

सरताज के अलावा नवाज की कैबिनेट के कुछ और लोग भी इस प्लानिंग के खिलाफ थे. उन्होंने जिरह भी की. सेना को तो उनकी बात नहीं ही सुननी थी. मगर जिन नवाज को उनकी बातों और आपत्तियों पर ध्यान देना चाहिए था, उन्होंने भी उसे खारिज कर दिया.

नवाज ने मुशर्रफ को रास्ते से हटाने के मन बना लिया था. लेकिन वो सही वक्त का इंतजार कर रहे थे. वो मुशर्रफ के साथ ऐसे पेश आते रहे, मानो उनके बीच सब कुछ बिल्कुल ठीक हो (फोटो: Getty)
बाद के दिनों में अक्सर ये सवाल उठता रहा. कि क्या कारगिल की प्लानिंग में नवाज भी शामिल थे. बाद में जो चीजें सामने आईं, उससे  यही मालूम होता है कि सेना ने नवाज से बिना पूछे ही ऑपरेशन की प्लानिंग कर ली थी.  पाकिस्तान में ऐसा पहले भी हो चुका था. 1965 में कश्मीर हासिल करने के नाम पर जब जंग की प्लानिंग की गई, तब अयूब  खान को  काफी बाद में सब बताया गया  था. अयबू तो सेना के ही थे, नवाज तो फिर भी सिविलियन थे (फोटो: Getty)

नवाज की समझ में क्या आया?
मीटिंग के आखिर में अजीज खान ने कहा. कि हम सबको इस ऑपरेशन की कामयाबी के लिए साथ मिलकर दुआ करनी चाहिए. सबने दुआ की. और इस तरह मीटिंग खत्म हो गई. नवाज जब उस मीटिंग से बाहर निकल रहे थे, तो उनके दिमाग में मोटामोटी ये आइडिया था-

इस ऑपरेशन की वजह से कश्मीर के अंदर जिहाद बढ़ेगा.
सारा ऑपरेशन मुजाहिदीन कर रहे हैं.
पाकिस्तानी सेना बस उनकी मदद कर रही है.
मुजाहिदीनों ने जिन चोटियों पर कब्जा किया है, उन्हें वापस जीत पाना भारत के लिए नामुमकिन है.
भारत पहले थोड़ा शोर मचाएगा. फिर शायद वो अपनी सेना का इस्तेमाल करेगा. मगर जो भी लड़ाई होगी, वो बस ऑपरेशन के इलाके तक सीमित होगी.

ये कारगिल युद्ध के समय की तस्वीर है. पाकिस्तान ने पहले ये साबित करने की कोशिश की कि कारगिल में जो लड़ रहे हैं, वो उसके लोग नहीं हैं. ये तस्वीर भारतीय सेना के एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की है. भारत ने कहा कि उसके पास सबूत है कि उन घुसपैठियों में पाकिस्तानी सेना के जवान और अधिकारी भी हैं. घुसपैठियों के पास जो हथियार मिले थे, वो पाकिस्तानी सेना के थे. तस्वीर में भारतीय सेना के अधिकारी पत्रकारों को यही दिखा रहे हैं (फोटो: AP)
पाकिस्तान ने पहले ये साबित करने की कोशिश की कि कारगिल में जो लड़ रहे हैं, वो उसके लोग नहीं हैं. ये तस्वीर भारतीय सेना के एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की है. भारत ने कहा कि उसके पास सबूत है कि उन घुसपैठियों में पाकिस्तानी सेना के जवान और अधिकारी भी हैं. घुसपैठियों के पास जो हथियार मिले थे, वो पाकिस्तानी सेना के थे. तस्वीर में भारतीय सेना के अधिकारी पत्रकारों को यही दिखा रहे हैं (फोटो: AP)

सब जानने के बाद भी नवाज ने हरी झंडी दिखाई
मीटिंग से निकलकर नवाज अपनी कार में बैठ गए. डिफेंस सेक्रटरी लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) इफ्तिकार अली खान ने अपनी कार में बैठकर उनका पीछा किया. ये रात के करीब नौ बजे की बात होगी. नवाज अपने घर की लिफ्ट में घुस रहे थे. कि उसी समय इफ्तिकार भागते-भागते उनके पास पहुंचे. इफ्तिकार ने कहा- सर, मुझे आपसे बात करनी है. बहुत जरूरी है ये. जवाब में नवाज ने कहा- आप कल सुबह बात करिएगा मुझसे. मगर इफ्तिकार ने जिद की. नवाज को उनकी बात सुनने के लिए राजी होना पड़ा. इफ्तिकार ने नवाज से पूछा- क्या सेना ने आपसे LoC पार करने की इजाजत ली है? इस सवाल पर नवाज चौंक गए. उन्होंने पूछा- क्या सेना ने LoC पार कर लिया है? तब इफ्तिकार ने उन्हें बताया. कि मुजाहिदीन नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सेना ने LoC पार करके भारत के हिस्से में अपनी कई सारी पोस्ट्स बना ली हैं. फिर इफ्तिकार का सवाल था- मियां साहेब, आप जानते हैं न कि LoC पार करने का अंजाम क्या होगा? और अब जाकर नवाज हैरान हुए. उन्होंने अगले दिन अपने घर पर एक कैबिनेट मीटिंग बुलाई. उन्हें सब कुछ बताया गया. यहां जाकर नवाज को समझ आया कि सेना और ISI ने बिना उनसे बात किए, बिना उनकी इजाजत लिए ही जंग छेड़ दी है. नवाज ने मुशर्रफ को तलब किया. करीब एक घंटे बाद मुशर्रफ नवाज के घर पहुंचे. उस मीटिंग में कुल तीन जन थे- नवाज, मुशर्रफ और डिफेंस सेक्रटरी इफ्तिकार.

नवाज ने सीधे-सीधे मुशर्रफ से पूछा- क्या आपने (मतलब पाकिस्तानी सेना ने) LoC लांघा है? मुशर्रफ तुरंत बोले- जी जनाब, हमने LoC पार किया है. नवाज ने पूछा- किसकी इजाजत से? मुशर्रफ बोले- मेरी अपनी जिम्मेदारी पर. अगर अब आप कहें, तो मैं सेना को वापस लौट आने का हुक्म दे दूंगा. और फिर नवाज ने जो कहा और किया, वो शायद एक किस्म की मानसिक विक्षिप्तता थी. इफ्तिकार की ओर देखकर नवाज बोले-

आपने देखा? इन्होंने अपनी जिम्मेदारी कबूली है. चूंकि सेना सरकार का ही हिस्सा है, सो आज से हम इस ऑपरेशन में सेना की मदद करेंगे.

क्या सोचा था, क्या हुआ
उसी दिन से नवाज और उनके लोग भारत के ऊपर अंतरराष्ट्रीय दबाव डलवाने की कोशिशों में जुट गए. नवाज ने कहा, पाकिस्तान भारत से बातचीत करने के लिए तैयार है. उनके मंत्री अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से अपील करने लगे. कि वो भारत पर कश्मीर समस्या सुलझाने का दबाव बनाएं. मगर आने वाले दिनों में पाकिस्तान को पता चलने वाला था कि हमेशा की तरह इस बार भी उसने जो सोचा, उसका बिल्कुल उलट हुआ. उनके सारे मंसूबे नाकामायब हो जाने वाले थे. अमेरिका पाकिस्तान से अपने सैनिक वापस बुलाने को कहने वाला था. भारत पूरा जोर लगाकर अपनी सारी चोटियां, अपना सारा इलाका वापस हासिल कर लेने वाला था. कारगिल में पाकिस्तान ने जैसे खुद ही अपने लोगों को मरवाया. पहले उसने अपने अफसरों और जवानों को मुश्किल चोटियों पर चढ़ाया. इतनी मुश्किल जगहों पर कि उनके पास सप्लाई पहुंचाना खुद पाकिस्तान के लिए मुमकिन नहीं हो पाया. उनके पास खाने तक को कुछ नहीं बचा. उनके पास गोलियां और गोला-बारूद तक खत्म हो चुका था. और इस सब में पाकिस्तान के कम से कम 300 अधिकारी और जवान मारे गए. पाकिस्तान के हिसाब से बस एक अच्छी बात हुई. भारत ने अपना आपा नहीं खोया. 1965 की तरह भारतीय सेना पाकिस्तान के अंदर नहीं घुसी. नीचे कारगिल युद्ध के समय का एक विडियो देखिए.

अमेरिका की मदद से सीजफायर करवाना नवाज के खिलाफ गया
मुंह की खाने के बाद बारी थी एक सिर तलाशने की. जिसके माथे पर कारगिल का ठीकरा फोड़ा जा सके. नवाज ने कहा कि उन्हें बस इतना पता था कि पाकिस्तान कारगिल में कुछ चोटियों पर कब्जा करने वाला है. आर्मी चीफ मुशर्रफ ने कहा कि नवाज सरकार ने पूरी प्लानिंग को ओके किया था. एक और चीज नवाज के खिलाफ गई. जब भारत कारगिल में अपनी एयर फोर्स लाया, तब पाकिस्तान के हाथ-पांव फूल गए. नवाज भागे-भागे अमेरिका पहुंचे. उन्होंने राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से गुजारिश की. कहा, वो भारत को संघर्षविराम के लिए तैयार करें. बदले में नवाज ने पाकिस्तानी फौज को वापस बुलाने के लिए हामी भर दी. पाकिस्तानियों को इसमें बड़ी बेइज्जती नजर आई. उन्हें तो शुरू से यही बताया गया था कि भारत हमेशा ही उनके हाथों जंग में मात खाता है. अपनी सेना के कारनामों की झूठी और फर्जी कहानियों पर पले-बढ़े पाकिस्तानी बड़े निराश हुए. उन्हें लगा कि नवाज ने फौज वापस बुलाकर गलती की. कश्मीर फतह करने का मौका पाकिस्तान के हाथ से छीन लिया. उधर पाकिस्तानी सेना ने भी नवाज की खूब छवि खराब की. कहा कि नवाज भरोसे के लायक नहीं हैं. नीचे वो विडियो है, जब नवाज शरीफ सीजफायर करवाने के लिए अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से मिलने पहुंचे थे-

इससे पहले कि नवाज मुशर्रफ को हटाते, मुशर्रफ ने उन्हें हटा दिया
नवाज काफी असुरक्षित महसूस करने लगे. उन्हें मुशर्रफ से खतरा महसूस होने लगा. कारगिल ने नवाज को नुकसान पहुंचाया था. उन्हें अब लग रहा था कि ये सब मुशर्रफ की कारस्तानी है. सितंबर के महीने की बात है. मुशर्रफ एक होटल की लॉबी में खड़े थे. उनके साथ थे सूचना मंत्री मुशाहिद हुसैन. मुशर्रफ ने एक नई इटैलियन पिस्तौल ली थी. वो अपनी पिस्तौल मुशाहिद को दिखा रहे थे. ठीक उसी वक्त नवाज लॉबी में घुसे. उन्होंने मुशर्रफ को देखा और उनसे पूछा- जनरल साहब, आपके निशाने पर कौन है? नवाज जब से अमेरिका होकर आए थे, तब से ही ऐसा लग रहा था कि वो मुशर्रफ को बर्खास्त कर सकते हैं. लेकिन नवाज इंतजार करते रहे. मुशर्रफ को उनके इरादों की भनक न हो, इसके लिए नवाज ने बड़ी सतर्कता बरती. ये जताते रहे कि उनकी तरफ से सब ठीक है. अगस्त 1999 में तो उन्होंने मुशर्रफ और उनकी पत्नी को अपने साथ मक्का चलने का भी न्योता दिया था. नवाज सोच रहे थे कि वो सही समय देखकर वार करेंगे.

नवाज को ये इंतजार महंगा पड़ा. नवाज ने मुशर्रफ को हटाकर ISI प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल जियाउद्दीन को आर्मी चीफ बनाने का फैसला किया. मगर तब तक देर हो चुकी थी. तब तक मुशर्रफ को तैयारी के लिए वक्त मिल गया था. उन्होंने सेना के अपने सहयोगियों का सपोर्ट हासिल कर लिया था. मुशर्रफ ने अपने सहयोगियों से कहा. कि नवाज ने जिस तरह जहांगीर करामात की बेइज्जती की, वैसे ही अगर उनकी (मुशर्रफ की) करते हैं, तो सेना की क्या वैल्यू रह जाएगी? मुशर्रफ तय कर चुके थे कि अगर नवाज उन्हें हटाने की कोशिश करते हैं, तो वो नवाज का ही तख्तापलट कर देंगे.

जब बंटवारा हुआ, तो हिंदुस्तान के हिस्से में आए लाखों मुसलमानों ने तय किया कि अब पाकिस्तान ही उनका मुल्क होगा. वो पाकिस्तान पहुंचे और वहां उन्हें एक नई पहचान मिली- मुहाजिर. मुशर्रफ भी मुहाजिर थे. मुहाजिरों को पाकिस्तान में नीची नजर से देखा जाता है. नवाज ने सोचा, अगर वो मुशर्रफ को आर्मी चीफ बनाते हैं तो मुहाजिर होने की वजह से मुशर्रफ कभी ज्यादा ताकतवर नहीं हो पाएंगे. नवाज का अंदाजा गलत निकला (फोटो: AP)
नवाज जब मुशर्रफ को हटाने के लिए सही वक्त का इंतजार कर रहे थे, उस दौरान मुशर्रफ अपने लिए सपोर्ट जमा कर रहे थे. मुशर्रफ का कहना था कि उन्होंने जवाबी तख्तापलट किया. वैसे ही, जैसे न्यूटन का नियम कहता है कि हर क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया होती है. हर बार की तरह इस तख्तापलट के बाद भी पाकिस्तानी जनता को यही बताया गया कि जो हुआ, उसी में मुल्क की बेहतरी थी (फोटो: AP)

एक और तख्तापलट
वो तारीख थी- 12 अक्टूबर, 1999. दोपहर का वक्त था. नवाज ने मुशर्रफ को बर्खास्त करने का फरमान निकाला. कुछ ही घंटे बीते कि सेना ने नवाज का घर घेर लिया. सारे बड़े एयरपोर्ट्स बंद कर दिए गए. सरकारी टेलिविजन और रेडियो चैनल्स बंद कर दिए गए. देर रात, तकरीबन 2.50 बजे परवेज मुशर्रफ देश को संबोधित करने टीवी पर प्रकट हुए. सेना की वर्दी. आंखों पर रिम वाला उनका सिग्नेचर स्टाइल वाला चश्मा. मुशर्रफ ने बताया, तब जाकर लोगों को पता चला. कि नवाज शरीफ अब प्रधानमंत्री नहीं रहे. मुल्क में फिर से मिलिटरी राज आ गया है. मुशर्रफ ने कहा-

मेरे लाख मना करने के बावजूद नवाज सेना के मामलों में दखलंदाजी करते रहे. पाकिस्तान की ये आखिरी बची ऐसी संस्था है, जिसके ऊपर पूरे मुल्क को नाज है. हमारे इस प्यारे मुल्क की स्थिरता, इसकी एकता और अखंडता सेना पर ही टिकी है.

नीचे एक विडियो है. नवाज शरीफ के तख्तापलट पर बेनजीर भुट्टो प्रतिक्रिया दे रही हैं-

क्या नवाज भी तानाशाह बनने की कोशिश कर रहे थे?
मुशर्रफ ने ये भी नहीं बताया कि वो चुनाव कब करवाएंगे. पिछले 11 सालों से पाकिस्तान में चुनी हुई सरकारें देश चला रही थीं. हालांकि परदे के पीछे असली ताकत सेना और राष्ट्रपति के पास ही थी. अपने दूसरे कार्यकाल में नवाज ने इस समीकरण को बदल दिया था. वो सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति, दोनों को अपने सामने झुका चुके थे. कुंद कर चुके थे. और अब वो सेना को भी मुट्ठी में करना चाहते थे. बस यहीं वो चूक गए. गौर से देखने पर पता लगता है कि असल में नवाज भी उस दौर में ‘ऐब्सल्यूट’ होना चाहते थे. मतलब, सुप्रीम पावर. उनसे ऊपर कोई न हो. वो सबसे ताकतवर हों. नवाज काफी हद तक कामयाब भी हुए थे. लेकिन फिर कारगिल हो गया. ये एक ब्लंडर साबित हुआ. फिर और भी चीजें थीं. जैसे- न्यूक्यिर टेस्ट के बाद लगे प्रतिबंधों की वजह से पस्त अर्थव्यवस्था. भारत के साथ दोस्ती करने की कोशिश. कश्मीर पर पाकिस्तान के पारंपरिक स्टैंड को बदलने की कोशिश. नवाज से नाराजगी की लंबी लिस्ट थी लोगों के पास. मुशर्रफ ने जब नवाज का तख्तापलट किया, तो पाकिस्तान में नवाज को कोई सहानुभूति नहीं मिली. बल्कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने नवाज की विदाई का जश्न मनाया. नीचे एक विडियो है. इसमें सेना के प्रवक्ता नवाज को हिरासत में रखे जाने की खबर मीडिया को दे रहे हैं. सेना ने कहा कि नवाज के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच होगी.

नवाज का क्या है? उनका तो आना-जाना लगा रहेगा
और नवाज? नवाज को गिरफ्तार कर लिया गया. जेल में डाल दिया गया. उनके ऊपर भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के केस शुरू किए जाने वाले थे. ऐसा लग रहा था कि नवाज पाकिस्तान के दूसरे जुल्फिकार अली भुट्टो साबित होंगे. मगर फिर मुशर्रफ पर उन्हें रिहा करने का दबाव बढ़ने लगा. नवाज के सऊदी के साथ अच्छे रिश्ते थे. कहते हैं कि सऊदी ने मुशर्रफ को संदेसा भिजवाया था. कि अगर पाकिस्तान सऊदी के साथ अच्छे रिश्ते चाहता है, तो उसे नवाज और उनके परिवार को रिहा करना होगा. फिर अमेरिका भी था. वो भी मुशर्रफ पर दबाव बना रहा था. आखिरकार मुशर्रफ को राजी होना पड़ा. मगर मुशर्रफ ने भी एक शर्त रखी. कहा, मैं नवाज और उनके परिवार को पाकिस्तान छोड़कर जाने दूंगा. लेकिन मेरी शर्त है कि उन्हें और उनके भाई शाहबाज को कुछ सालों तक राजनीति से दूर रहना होगा. शरीफ परिवार के पास इस डील को मानने के अलावा और चारा भी क्या था. नवाज अपना ताम-झाम लपेटकर पाकिस्तान से निकल लिए. ऐसा लगा कि नवाज खत्म हो गए हैं. कि इस चोट से वो नहीं उबर पाएंगे. लेकिन सीढ़ी का एक डिजाइन होता है. जो सीढ़ी नीचे से ऊपर जाती है, वही सीढ़ी ऊपर से नीचे भी लाती है. वो दिन भी आया, जब मुशर्रफ नीचे लाकर पटक दिए गए. फिर वो दिन भी आया, जब लोगों ने नवाज को दोबारा सिर पर बिठाकर फिर नीचे फेंक दिया. वो सब जानेंगे, ‘पाक पॉलिटिक्स’ की आखिरी किस्त में.

जाते-जाते
सऊदी के दबाव में मुशर्रफ उन्हें पाकिस्तान से जाने देने के लिए राजी हुए थे. तय हुआ कि बिना किसी दिखावे या शोर-शराबे के रात के अंधेरे में चुपचाप पूरा कुनबा पाकिस्तान से निकल ले. नवाज की बीवी कुलसुम अपने घर की सीढ़ियां उतर रही थीं कि नीचे उन्हें मीडिया वाले खड़े मिले. उन्होंने सवाल किया, तो कुलसुम बोलीं-

नहीं, हम रात के अंधेरे में फरार नहीं हो रहे हैं. हमें मुल्क से निकाला जा रहा है. हम जहां जा रहे हैं, वहां हमें अल्लाह ने बुलाया है. खुश रहना अहले वतन, अब हम तो सफर करते हैं. 

पाकिस्तान के नेताओं की ये आदत रही है. अपना वक्त आने पर दूसरों के साथ गलत करने में कोई कसर न छोड़ो. फिर जब खुद के सितारे गर्दिश में आएं, तो अपने आप को शहीद बताओ. आप विडियो देखिए. कुलसुम मुंह से चाहे जो कह रही हैं, उनका चेहरा देखकर लगता है जैसे वो चैन में हैं. मानो, सोच रही हैं. जान बची तो लाखों पाए-


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