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पहले बाप. फिर दोनों भाई. और फिर दो बार PM रह चुकी उस औरत को मार डाला गया

25 जुलाई, 2018 को पाकिस्तान में चुनाव हुए. पाकिस्तान में लोकतंत्र का पस्त रेकॉर्ड रहा है. ऐसे में यहां कोई सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर ले, तो बड़ी बात है. ये पहली बार हुआ कि पाकिस्तान में बैक-टू-बैक दो सरकारों ने अपना कार्यकाल पूरा किया. ये जो हुआ है, वो ऐतिहासिक है. इस खास मौके पर द लल्लनटॉप पाकिस्तान की राजनीति पर एक सीरीज़ लाया है. शुरुआत से लेकर अब तक. पढ़िए, इस सीरीज़ की 16वीं किस्त.


साल 2007. 26 और 27 दिसंबर की दरमियानी रात थी. घड़ी आधी रात का वक्त टाप चुकी थी. करीब डेढ़ बज रहे होंगे, जब ISI प्रमुख मेजर जनरल नदीम ताज बेनजीर से मिलने उनके घर पहुंचे. बेनजीर के सुरक्षा सलाहकार रहमान मलिक भी मौजूद थे वहां. ताज को खबर मिली थी. कि बेनजीर के ऊपर आतंकवादी हमला हो सकता है. उसी दिन बेनजीर की एक रैली होनी थी. रावलपिंडी के मशहूर लियाकत बाग में. ताज अकेले नहीं थे आगाह करने वाले. सऊदी और UAE, दोनों की तरफ से भी यही इनपुट आया था. ताज की सलाह थी कि बेनजीर को अपना प्रोग्राम कैंसल कर देना चाहिए. मगर बेनजीर नहीं मानीं. उन्हें लगा, ISI के बहाने परवेज मुशर्रफ उन्हें चुनाव प्रचार करने से रोकना चाहते हैं. हमले की बात करके डरा रहे हैं. बेनजीर भूल गईं कि 17 अक्टूबर को भी उन पर हमला हुआ था. उस दिन वो कराची आई थीं. उनके स्वागत में खूब लोग जमा हुए थे. एयरपोर्ट से निकलकर बेनजीर का काफिला शहर में बढ़ा. और फिर एकाएक बड़ा धमाका हुआ. एक फिदायीन हमलावर ने अपने साथ-साथ 180 से ज्यादा लोगों की जान ले ली. तब बेनजीर बाल-बाल बची थीं.

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मरने से कुछ मिनट पहले क्या बोल रही थीं बेनजीर?
27 दिसंबर, 2007. रावलपिंडी का लियाकत बाग. चुनावी रैली का मौका. यहां झंडे, वहां पोस्टर. 56 साल पहले यहीं पर एक चुनावी रैली के दौरान पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की हत्या हुई थी. उसी की याद में इस बाग को लियाकत का नाम मिला था. तो इसी लियाकत बाग में उस दिन सैकड़ों लोग जमा थे. वो बेनजीर को सुनने आए थे. बेनजीर मंच पर चढ़ीं. बड़ा भावुक सा भाषण दिया उन्होंने. वो बोल रही थीं-

मैं यहां पाकिस्तान बचाने आई हूं. मैं यहां जम्हूरियत बचाने आई हूं. मेरा यकीन है कि पाकिस्तान को टूटकर बिखरने से बस लोकतंत्र ही बचा सकता है. हम अपने इस महान मुल्क को चरमपंथियों के हाथ में सौंपने के लिए तैयार नहीं हैं.

ये बेनजीर की हत्या के चंद मिनट पहले ली गई तस्वीर है. मंच पर खड़े होकर बेनजीर ने कहा था. कि पाकिस्तान को चरमपंथियों के चंगुल में जाने से बस लोकतंत्र ही बचा सकता है. वो नहीं जानती थीं कि कुछ ही मिनट बाद वही चरमपंथ, वही आतंकवाद उनकी जान लेने वाला है (फोटो: AP)
ये बेनजीर की हत्या के चंद मिनट पहले ली गई तस्वीर है. मंच पर खड़े होकर बेनजीर ने कहा था. कि पाकिस्तान को चरमपंथियों के चंगुल में जाने से बस लोकतंत्र ही बचा सकता है. वो नहीं जानती थीं कि कुछ ही मिनट बाद वही चरमपंथ, वही आतंकवाद उनकी जान लेने वाला है (फोटो: AP)

नारों की गूंज में बेनजीर नसीहत भूल गईं
भाषण खत्म करने के बाद वो अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ीं. बुलेट प्रूफ गाड़ी. वो गाड़ी के अंदर बैठ चुकी थीं. पिछली रात जनरल नदीम ताज ने उन्हें हिदायत दी थी. कि अगर रैली में जाना ही हो, तो कम से कम भीड़ से दूरी रखिएगा. बेनजीर ने ऐसा करने का वादा भी किया था. फिर गाड़ी में बैठकर बेनजीर ने देखा. बाहर लोग उनका नाम ले रहे हैं. नारे लगा रहे हैं. किसी के हाथ में तख्ती. किसी के हाथ में बैनर. भीड़ जैसे बेनजीर पर मुहब्बत लुटा रही थी. भीड़ जैसे उन्हें कुछ और नजर देखना चाहती थी. बेनजीर अपनी सीट पर खड़ी हुईं. गाड़ी की छत से सिर बाहर निकाला. सफेद दुपट्टे से ढका उनका माथा. नीले रंग का सूट. गले में पड़ी मालाएं. उसमें पड़े सफेद और लाल फूल. वो मुस्कुरा रही थीं. लोगों की तरफ हाथ हिला रही थीं. लोग उनके नाम के नारे लगा रहे थे. अब बेनजीर के पास बुलेट प्रूफ गाड़ी का कवच नहीं था. अब बेनजीर और भीड़ के बीच कोई ओट नहीं थी.

महाभारत में कर्ण हत्या का प्रसंग है. सूरज का बेटा. कवच-कुंडलधारी. कर्ण का कवच अभेद्य था. किसकी मैया बाघ बियानी. संसार में कोई ऐसा तीर नहीं था, जो उस कवच को भेद सके. तो समझिए एक तरह से कर्ण अमर था. ऐसे कर्ण के होते कौरव कैसे हारते? कृष्ण ने जालसाजी करने की ठानी. दिनकर भगवान अपने बेटे को चेताने धरती पर आए. कहा, कुछ हो जाए अपना कवच-कुंडल किसी को मत देना. कर्ण ने पिता की बात सुनी. समझी भी. लेकिन जब अमल करने की बात आई, तो पिता की नसीहत लांघकर आगे बढ़ गए. नतीजा, कर्ण वध कर दिए गए. उस दिन बेनजीर ने भी कुछ ऐसा ही किया. नसीहत टापने की चूक कर दी.

ये बेनजीर अपनी गाड़ी की छत से धड़ निकालकर बाहर खड़ी हैं. इसके कुछ ही सेकेंड बाद इन्हों गोली मार दी गई थी. हत्या की साजिश रचने का इल्जाम आया पाकिस्तान तालिबान के ऊपर. मगर फिर मुशर्रफ भी इसके चपेटे में आए. कहा गया कि उन्होंने ही बेनजीर को मरवाया (फोटो: AP)
ये बेनजीर अपनी गाड़ी की छत से धड़ निकालकर बाहर खड़ी हैं. इसके कुछ ही सेकेंड बाद इन्हों गोली मार दी गई थी. हत्या की साजिश रचने का इल्जाम आया पाकिस्तान तालिबान के ऊपर. मगर फिर मुशर्रफ भी इसके चपेटे में आए. कहा गया कि उन्होंने ही बेनजीर को मरवाया (फोटो: AP)

बस 15 साल का था वो, जिसने बेनजीर को मारा
उस भीड़ में शामिल एक लड़का बड़ी देर से ऐसे ही मौके की ताक में था. 15 बरस की उम्र. नाम, बिलाल. जिस्म में बम बंधा हुआ था उसके. साथ में एक बंदूक भी थे. बिलाल ने बंदूक निकाली और बेनजीर पर चला दी. बेनजीर के जिस्म में भरा खून बाहर बहने लगा. तभी बिलाल ने अपने जिस्म पर बंधे बम का ट्रिगर खींच दिया. उसका शरीर चिथड़े-चिथड़े हो गया. धमाके की चपेट में आकर 24 लोग मारे गए. बेनजीर को फटाफट अस्पताल ले जाया गया. मगर उनके जिस्म से जान निकल गई थी. बेनजीर मर गई थीं. बेनजीर मारी गई थीं. नीचे उस हादसे का विडियो है. बम फटने से पहले की जिंदा बेनजीर. बम फटने के बाद का नजारा. आपको इस विडियो में दोनों दिखेंगे.

बेनजीर की हत्या के समय का एक और विडियो देखिए. हत्या से कुछ मिनट पहले के फुटेज के साथ-साथ इसमें हत्या के बाद की घटनाएं भी दर्ज हैं. बेनजीर के समर्थकों ने गुस्से और सदमे में आकर जो तोड़-फोड़ और आगजनी की, वो भी देख सकते हैं आप इसमें-

जुल्फी ने कहा था- पिंका, कहीं भी रहो मगर लौटकर यहीं आना. पिंकी ने अब्बू की बात मानी.
पहले पिता जुल्फिकार. फिर भाई शहनवाज. फिर एक और भाई मुर्तजा. फिर खुद बेनजीर. सब मारे गए. जुल्फी को तो सूली चढ़ाया गया. बाकी तीनों कत्ल किए गए. पीछे हमने बताया था. कि जब बेनजीर हावर्ड जा रही थीं, उससे पहले जुल्फिकार उन्हें गढ़ी खुदा बक्श के उस कब्रिस्तान में ले गए थे. वहां, जहां भुट्टो खानदार के पुरखे दफ्न थे. दादा-परदादा, सब. तब जुल्फी ने कहा था- पिंकी, एक बात याद रखना. तुम दुनिया में कहीं भी रहो, लेकिन तुम्हें लौटकर यहीं आना है. पिंकी बेनजीर के पुकारे जाने का नाम था. जिसको बंगाली ‘डाक नाम’ कहते हैं, वही. बेनजीर ने अब्बू की बात मानी. पहले जुल्फी उस कब्रिस्तान में पहुंचे. फिर शहनवाज. फिर मुर्तजा. और फिर उन सबकी तरह बेनजीर भी उसी कब्रिस्तान में लिटा दी गईं.

नीचे एक विडियो है. 2007 में जब बेनजीर पाकिस्तान लौटीं, तो अपने पिता की कब्र पर भी गईं. ये उसी मौके का विडियो है.

ख्वाब पूरा हुआ, मगर ये देखने के लिए बेनजीर जिंदा नहीं थीं
कितनी नाराजगी थी लोगों के मन में बेनजीर के लिए. उनका वो दूसरा कार्यकाल याद है. याद है, राष्ट्रपति फार्रुख लेघारी ने कैसे उन्हें बर्खास्त किया था. तब जैसे किसी को बेनजीर से सहानुभूति नहीं हुई थी. 1997 के चुनाव में पाकिस्तान ने कितनी बुरी तरह हराया था उनको. बेनजीर पर भ्रष्टाचार के इल्जाम लगे. उनके पति आसिफ अली जरदारी पर भी खूब नाराजगी थी लोगों की. वही पाकिस्तान अब बेनजीर के लिए रो रहा था. बेनजीर के समर्थक उन्माद में सड़कों पर फसाद कर रहे थे. इधर ये जलाया, उधर वो तोड़ा. इधर इसमें आग लगाई, उधर वो फूंक दिया. जैसे बेकाबू हो गए थे लोग. बेनजीर मरी नहीं थीं. वो शहीद हो गई थीं. इसी शहादत का असर था कि चुनाव में बेनजीर की पार्टी PPP को बहुमत मिला. उसकी सरकार भी बनी. सरकार ने अपना कार्यकाल भी पूरा किया. बेनजीर न सही, उनके पति आसिफ अली जरदारी राष्ट्रपति जरूर बने. जरदारी पर पहले से ही भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे. इस कार्यकाल में ये आरोप और ज्यादा बढ़ गए. लेकिन फिर भी, PPP सरकार ने पांच बरस की अपनी उम्र पूरी की. अफसोस कि बेनजीर ये दिन देखने के लिए जिंदा नहीं थीं. वो दो बार प्रधानमंत्री बनी थीं. और दोनों ही बार कार्यकाल पूरा किए बिना निकाल दी गईं.

बतौर प्रधानमंत्री बेनजीर के पहले कार्यकाल से ही उनके पति आसिफ अली जरदारी पर अंगुलिया उठने लगी थीं. जरदारी पर इल्जाम था कि वो अपनी बीवी के ओहदे का इस्तेमाल कर भ्रष्टाचार कर रहे हैं. बेनजीर पर इल्जाम था कि वो अपने पति की मदद कर रही हैं और उनके गुनाहों पर आंख मूंद रही हैं. लेकिन जब बेनजीर की हत्या हुई, तो लोगों ने जैसे जरदारी के गुनाह भी भुला दिए. ये जरदारी के करियर का प्राइम था. हालांकि ये सहानुभूति जल्द ही उनसे छिन भी गई. ये जरदारी की करप्ट छवि ही है कि 2018 के चुनाव में उनके बेटे बिलावल ने भी अपने पिता को चुनाव प्रचार से दूर ही रखा (फोटो: रॉयटर्स)
बतौर प्रधानमंत्री बेनजीर के पहले कार्यकाल से ही उनके पति आसिफ अली जरदारी पर अंगुलिया उठने लगी थीं. जरदारी पर इल्जाम था कि वो अपनी बीवी के ओहदे का इस्तेमाल कर भ्रष्टाचार कर रहे हैं. लेकिन जब बेनजीर की हत्या हुई, तो लोगों ने जैसे जरदारी के गुनाह भी भुला दिए. ये उनके करियर का प्राइम था. ये जरदारी की करप्ट छवि ही है कि 2018 के चुनाव में उनके बेटे बिलावल को भी अपने पिता को चुनाव प्रचार से दूर रखना फायदेमंद लगा (फोटो: रॉयटर्स)

बेनजीर की हत्या का शक आया पाकिस्तानी तालिबान पर. इल्जाम परवेज मुशर्रफ पर भी लगे. मुशर्रफ ने अपना बचाव किया. कहा, बेनजीर को पाकिस्तान लौटने से पहले ही बताया गया था. कि पाकिस्तान में उनकी जान पर खतरा हो सकता है. कि उनकी जान लेने की कोशिश की जा सकती है. मगर बेनजीर फिर भी आईं. मुशर्रफ के इस बचाव की काट थी. बेनजीर ने लगातार अपनी सुरक्षा बढ़ाए जाने की मांग की थी. मगर मुशर्रफ ने ध्यान नहीं दिया. बेनजीर ने अमेरिका की मदद से मुशर्रफ पर दबाव डालने की भी कोशिश की. मगर अमेरिका ने भी उनकी मदद नहीं की.

मगर बेनजीर पाकिस्तान लौटी क्यों थीं? क्या हो रहा था पाकिस्तान में? इस किस्त में यही जिक्र मिलेगा आपको.

उस जमाने में इतना पढ़ी-लिखी थीं मुशर्रफ की मां
हमने आपको बताया था. किस तरह मुशर्रफ ने नवाज का तख्तापलट किया. मुशर्रफ ने क्या कुछ किया, इससे पहले थोड़ी बात उनके बैकग्राउंड की. मुशर्रफ मुहाजिर थे. मुहाजिर माने ऐसे मुसलमान, जो बंटवारे के समय हिंदुस्तान से पाकिस्तान गए. उनकी पैदाइश का शहर था दिल्ली. 11 अगस्त, 1943 को पुरानी दिल्ली की एक हवेली में पैदा हुए मुशर्रफ. पढ़ा-लिखा, मिडिल क्लास परिवार. पिता सैयद मुशर्रफुद्दीन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रॉडक्ट थे. विदेश विभाग के दफ्तर में नौकरी करते थे. मां जरीन भी पढ़ी-लिखी थीं. उस जमाने में लखनऊ यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य में एमए थीं. मुशर्रफ ने कभी बताया था. कि बंटवारे के समय यहां के मुसलमानों को लेकर जो आखिरी ट्रेन पाकिस्तान पहुंची, उसमें उनका परिवार भी था.

जब बंटवारा हुआ, तो हिंदुस्तान के हिस्से में आए लाखों मुसलमानों ने तय किया कि अब पाकिस्तान ही उनका मुल्क होगा. वो पाकिस्तान पहुंचे और वहां उन्हें एक नई पहचान मिली- मुहाजिर. मुशर्रफ भी मुहाजिर थे. मुहाजिरों को पाकिस्तान में नीची नजर से देखा जाता है. नवाज ने सोचा, अगर वो मुशर्रफ को आर्मी चीफ बनाते हैं तो मुहाजिर होने की वजह से मुशर्रफ कभी ज्यादा ताकतवर नहीं हो पाएंगे. नवाज का अंदाजा गलत निकला (फोटो: AP)
जब बंटवारा हुआ, तो हिंदुस्तान के हिस्से में आए लाखों मुसलमानों ने तय किया कि अब पाकिस्तान ही उनका मुल्क होगा. वो पाकिस्तान पहुंचे और वहां उन्हें एक नई पहचान मिली- मुहाजिर. मुशर्रफ भी मुहाजिर थे. मुहाजिरों को पाकिस्तान में नीची नजर से देखा जाता है. नवाज ने सोचा, अगर वो मुशर्रफ को आर्मी चीफ बनाते हैं तो मुहाजिर होने की वजह से मुशर्रफ कभी ज्यादा ताकतवर नहीं हो पाएंगे. नवाज का अंदाजा गलत निकला (फोटो: AP)

65 की जंग भी लड़े, फिर 71 की लड़ाई भी लड़े
मुशर्रफ के पास अगर पाकिस्तान छोड़कर कहीं और का हो जाने का विकल्प होता, तो वो शायद तुर्की के हो गए होते. छुटपन के कुछ साल उन्होंने तुर्की में बिताए थे. उनके पिता की पोस्टिंग हुई थी अंकारा में. 1949 से 1956 तक. तब मुशर्रफ भी वहां रहे थे. पाकिस्तान आर्मी में मुशर्रफ की एंट्री हुई 1961 में. 1965 की भारत-पाकिस्तान जंग के समय सेकेंड लेफ्टिनेंट की रैंक थी उनकी. जंग में बहादुरी दिखाने के लिए उन्हें मेडल भी मिला था. 1971 की जंग के समय वो एक कमांडो बटैलियन में कंपनी कमांडर थे. मई 1988 में मुशर्रफ ने बलूचिस्तान में एक ऐसा काम किया, जो आज भी वहां फॉलो किया जा रहा है. ये गिलगित की बात है. वहां शिया बहुमत में थे. प्रशासन में सुन्नियों की मेजॉरिटी थी. शियाओं ने इसके खिलाफ बगावत कर दी. उस समय मुशर्रफ स्पेशल सर्विसेज ग्रुप (SSG) में थे. पाकिस्तान में ज़िया-उल-हक की हुकूमत थी. ज़िया ने गिलगित का ये विद्रोह दबाने की जिम्मेदारी सौंपी SSG को. प्रभारी बनाए गए मुशर्रफ. मुशर्रफ ने सोचा, क्यों न यहां की डेमोग्रेफी ही बदल दी जाए. इस तरह शियाओं की मेजॉरिटी भी खत्म हो जाएगी. उन्होंने पंजाबियों और पख्तूनों को लाकर गिलगित-बाल्टिस्तान में बसाना शुरू किया. फिर ऐसा हुआ कि शिया अल्पसंख्यक हो गए. पाकिस्तान ने यही रणनीति बलूचिस्तान में भी अपनाई. बलूचिस्तान का जिक्र आया है, तो बताते हैं. वहां से बलूचों के लापता होने की खबरें आती हैं. बताते हैं कि पाकिस्तानी सेना और ISI सैकड़ों बलूचों को गायब करवा चुकी है. वो या तो मार दिए जाते हैं, या फिर सीक्रेट जेलों में बंद कर दिए जाते हैं. ये रवायत मुशर्रफ की ही शुरू की हुई है.

मुशर्रफ ने बाद के दिनों में कई बार कहा. कि तख्तापलट का उनका अपना कोई इरादा नहीं था. बल्कि उन्होंने जो किया, वो जवाबी तख्तापलट था. चूंकि नवाज ने उन्हें हटाने और सेना को कमजोर करने की कोशिश की, इसीलिए उन्होंने नवाज की गद्दी छीन ली. बाकी सारे तानाशाहों की तरह मुशर्रफ ने भी कहा कि उन्होंने मुल्क बचाने के लिए तख्तापलट किया (फोटो: AP)
मुशर्रफ ने बाद के दिनों में कई बार कहा. कि तख्तापलट का उनका अपना कोई इरादा नहीं था. बल्कि उन्होंने जो किया, वो जवाबी तख्तापलट था. चूंकि नवाज ने उन्हें हटाने और सेना को कमजोर करने की कोशिश की, इसीलिए उन्होंने नवाज की गद्दी छीन ली. बाकी सारे तानाशाहों की तरह मुशर्रफ ने भी कहा कि उन्होंने मुल्क बचाने के लिए तख्तापलट किया (फोटो: AP)

इस मामले में बाकि सैनिक तानाशाहों से अलग थे मुशर्रफ
अप्रैल 1999 में वो चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बनाए गए. फिर अप्रैल 1999 में वो जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन बनाए गए. 12 अक्टूबर, 1999 को उन्होंने नवाज शरीफ का तख्तापलट कर दिया. अपने पहले आए सैनिक तानाशाहों से अलग, मुशर्रफ ने तख्तापलट करने के बाद तुरंत ही मार्शल लॉ नहीं लगाया. उन्होंने कहा, वो चीफ एक्जिक्यूटिव हैं. क्योंकि वो लोगों की खिदमत करना चाहते हैं, न कि उन पर राज करना चाहते हैं. जून 2001 में आकर मुशर्रफ ने खुद को पाकिस्तान का राष्ट्रपति बना दिया. नीचे मुशर्रफ के शपथग्रहण के वक्त का एक विडियो देखिए-

अफगानिस्तान में जंग शुरू हुई, मुशर्रफ की चांदी हो गई
मुशर्रफ के शुरुआती तीन साल उत्पाती थे. एक तो न्यूक्लियर टेस्ट के बाद लगा अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध. और इसका असर भुगतती अर्थव्यवस्था. फिर ये दाग कि सेना ने लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को हटाया. लेकिन फिर आया सितंबर 2001. जब अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हुआ. मॉडर्न दुनिया अगर एक लकीर के आर-पार बांटनी हो, तो शायद 11 सितंबर, 2001 की ये तारीख बॉर्डर का काम करेगी. इसके बाद जैसे दुनिया बदल गई. अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया. एक बार फिर उसे पाकिस्तान की जरूरत पड़ी. जैसे ज़िया की तानाशाही को अफगानिस्तान ने अमृत दिया था, वैसे ही मुशर्रफ की सत्ता को भी अफगानिस्तान से ही सांसें मिलीं. अमेरिका को पाकिस्तानी सेना की मदद चाहिए थी. सेना के आदमी का सत्ता में होना अमेरिका के फायदे में था. अब मुशर्रफ के पास न केवल अमेरिका का पैसा था. बल्कि टिके रहने का सपोर्ट भी था. नीचे एक विडियो है. इसमें जॉर्ज बुश और मुशर्रफ साथ नजर आ रहे हैं. बुश मुशर्रफ को अपना ‘दोस्त’ बता रहे हैं. अफगानिस्तान में साथ देने के लिए उन्हें शुक्रिया कह रहे हैं. बुश को मुर्शरफ के तख्तापलट से भी कोई शिकायत नहीं. उनके मुताबिक तो मुशर्रफ पाकिस्तान की आवाम के साथ न्याय कर रहे हैं-

अमेरिका चाहता था, मुशर्रफ बने रहें
अप्रैल 2002 में मुशर्रफ ने एक जनमत संग्रह करवाया. ताकि वो पब्लिक सपोर्ट दिखा सकें. ये रेफरेंडम भी ऐसा ही था, जैसे इस तरह के फर्जी रेफरेंडम्स होते हैं. आपको याद है न, ज़िया ने भी एक रेफरेंडम करवाया था. बताया गया कि पाकिस्तान के 95 फीसद लोग उन्हें सपोर्ट करते हैं. मुशर्रफ ज़िया से भी आगे निकले. उन्होंने कहा, उनको 97.5 फीसद लोगों का सपोर्ट मिला है. पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने शुरुआत में ही मुशर्रफ को तीन साल का वक्त दिया था. कहा था, ये टाइम पूरा होने से पहले चुनाव करवाना होगा. अगर अमेरिका ने अफगानिस्तान में जंग न शुरू की होती, तो शायद मुशर्रफ मुश्किल में फंस सकते थे. लेकिन अब, जब कि अफगानिस्तान में जंग जारी थी, अमेरिका कतई नहीं चाहता था कि पाकिस्तान में कोई नया प्रयोग हो. वो स्थिरता चाहता था. स्थिरता, यानी मुशर्रफ बने रहें. मुशर्रफ इस बात को बखूबी समझते थे. शायद इसीलिए वो चुनाव करवाने को तैयार हुए. नीचे एक विडियो है. ये 2002 में कराए गए रेफरेंडम के बाद का है-

कई सारे चुनाव सुधार किए
चुनाव की तैयारी के लिए मुशर्रफ ने सबसे पहले तो एक पार्टी बनाई. इसका नाम रखा- पाकिस्तान मुस्लिम लीग कायद-ए-आजम. शॉर्ट में, PML-Q. इसमें नवाज की पार्टी के कई लोगों को शामिल किया गया. चुनाव सुधार के नाम पर ऐसा इंतजाम किया कि नवाज और बेनजीर, दोनों में से कोई भी इस इलेक्शन में हिस्सा नहीं ले सकता था. और भी कई चीजें हुईं. जैसे- नैशनल असेंबली की सीटें 207 से बढ़ाकर 272 कर दी गईं. प्रांतीय असेंबलियों में भी सीटें बढ़ा दी गईं. इसकी वजह से निर्वाचन क्षेत्र दोबारा तय हुए. नई मतदाता सूचियां तैयार हुईं. वोटिंग की उम्र सीमा 21 से घटाकर 18 कर दी गई. इसके अलावा जॉइंट इलेक्टोरेट सिस्टम का पुराना ढर्रा वापस लागू कर दिया गया. 1985 के चुनाव में ज़िया ने सेपरेट इलेक्टोरेट सिस्टम लागू किया था. इसमें लोग बस अपने धर्म के लोगों के लिए ही वोट डाल सकते थे. इसकी वजह से गैर-मुस्लिमों का राजनैतिक प्रतिनिधत्व बिल्कुल खत्म हो गया था. मुशर्रफ जब जॉइंट इलेक्टोरेट सिस्टम लाए, तो गैर-मुस्लिम काफी खुश हुए. फिर मुशर्रफ ने नैशनल असेंबली में महिलाओं के लिए 60 सीटें आरक्षित कीं. 10 सीटें अल्पसंख्यकों के लिए रिजर्व की गईं. मुशर्रफ ने पोस्टरों, बैनरों और रैलियों पर लगा पुराना प्रतिबंध भी खत्म कर दिया. सुधार खूब हुए. मगर नवाज और बेनजीर की गैरमौजूदगी में कोई बड़ा विपक्ष का नेता था नहीं मैदान में. लोगों की दिलचस्पी भी नहीं रही उतनी इलेक्शन में. इस वजह से बहुत कम वोट पड़े.

ये मौलाना फजल-उर-रहमान है. जमात-ए-उलेमा का चीफ. ये 2002 की तस्वीर है. मौलाना बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में एक रैली को संबोधित कर रहा था. मौलाना जैसे कई कट्टरपंथी नेता अफगानिस्तान युद्ध में तालिबान के खिलाफ शुरू की गई जंग में अमेरिका का साथ दिए जाने के खिलाफ थे. इससे पहले जब पाकिस्तान अफगानिस्तान में मुजाहिदीनों का साथ दे रहा था, तब इन्हें कोई शिकायत नहीं थी (फोटो: रॉयटर्स)
ये मौलाना फजल-उर-रहमान है. जमात-ए-उलेमा का चीफ. ये 2002 की तस्वीर है. मौलाना बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में एक रैली को संबोधित कर रहा था. मौलाना जैसे कई कट्टरपंथी नेता अफगानिस्तान युद्ध में तालिबान के खिलाफ शुरू की गई जंग में अमेरिका का साथ दिए जाने के खिलाफ थे. इससे पहले जब पाकिस्तान अफगानिस्तान में मुजाहिदीनों का साथ दे रहा था, तब इन्हें कोई शिकायत नहीं थी (फोटो: रॉयटर्स)

अफगानिस्तान की जंग का एक नुकसान ये भी था
इस सबके बावजूद PML-Q को सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलीं. मुशर्रफ ने फिर नियम बदले. नतीजा आने के बाद निर्दलीय उम्मीदवारों को ये छूट दी कि वो चाहें, तो किसी पार्टी में घुस सकते हैं. ये सब इसलिए किया गया कि ताकि PML-Q को जरूरत भर सीटें मिल जाएं. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. फिर मुशर्रफ ने 14वें संशोधन का वो नियम खत्म कर दिया, जो कि असेंबली के सदस्यों को किसी और पार्टी के लिए वोट करने से रोकता था. इसके बाद तो तय था कि सांसद खरीदे जाएंगे. ऐसा हुआ भी. PML-Q को बहुमत मिल गया. मगर उसके पास एक वोट की लीड थी. नवाज और बेनजीर भले न लड़ पाए हों, लेकिन उनकी पार्टियां लड़ी थीं. PPP सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनी. चुनाव में कट्टरपंथी मजहबी पार्टियों ने भी हिस्सा लिया था. उन्हें वोट भी मिले. मुत्ताहिदा मजलिस-ए-अमल (MMA) ने नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस (जो अब खैबर-पख्तूनख्वा है) में सरकार भी बनाई. ये मजहबी पार्टियों का एक गठबंधन था. ये सब मुशर्रफ की अमेरिका-परस्ती के विरोधी थे.

पाकिस्तान में कट्टरपंथी पार्टियों का चुनावी रेकॉर्ड बहुत खराब रहा है. लोगों ने धर्मांधों को, कट्टरपंथियों को कभी ज्यादा सपोर्ट नहीं दिया. लेकिन इन चुनावों में MMA को जो कामयाबी मिली, इसके पीछे सबसे बड़ी वजह अफगानिस्तान युद्ध थी. कई मुसलमान इस हमले को इस्लाम पर हमला मान रहे थे. 9/11 के बाद मुसलमानों के साथ काफी गलत हुआ था. हर मुसलमान आतंकी समझ लिया जा रहा था. दुनिया में इस्लाम का दूसरा नाम आतंकवाद समझ लिया गया था. अमेरिका में जांच और शक के नाम पर मुसलमानों के साथ काफी ज्यादती हो रही थी. इस वजह से कई मुसलमानों के लिए अमेरिका अब विलेन था. MMA की कामयाबी के पीछे अमेरिका से लोगों की यही चिढ़ थी. वैसे, पाकिस्तान के एक प्रांत में कट्टरपंथियों की सरकार होना भी मुशर्रफ के लिए फायदेमंद था. इसके सहारे वो अमेरिका को डरा सकते थे. अमेरिका को एहसास दिला सकते थे कि पाकिस्तान में उनका (मुशर्रफ का) होना क्यों जरूरी है.

लोकतंत्र के लौटने की राह यूं बनी
जब मुशर्रफ ने नवाज का तख्तापलट किया, उस समय उन्हें न्यायपालिका से कोई चुनौती नहीं मिली थी. सब कुछ बड़ा सपोर्टिव था. मगर कोर्ट ने ये जरूर किया कि मुशर्रफ को तीन साल की समयसीमा दे दी. कहा, तीन साल के अंदर चुनाव करवाने होंगे. मतलब एक हद तक कोर्ट अपना काम कर रही थी. मुशर्रफ के ऊपर कम से कम इतना दबाव तो था. फिर चीजें बिगड़नी शुरू हुईं. ये 2007 के मार्च महीने की बात है. मुशर्रफ ने पाकिस्तान के चीफ जस्टिस इफ्तिकार चौधरी को बर्खास्त कर दिया. मुशर्रफ ने इफ्तिकार पर अपने पद का बेजा इस्तेमाल करने और भाई-भतीजावाद फैलाने का इल्जाम लगाया था. इफ्तिकार की बर्खास्तगी के विरोध में वकीलों ने आंदोलन शुरू कर दिया. धीरे-धीरे मुशर्रफ का विरोध बढ़ता गया. विरोध उग्र होता गया. दोनों पक्षों के बीच जोर आजमाईश शुरू हुई. PPP समेत कई विपक्षी पार्टियां उस समय चीफ जस्टिस को सपोर्ट कर रही थीं. ये मुशर्रफ बनाम अन्य की स्थिति बन गई थी.

कराची में लंबे समय से सांप्रदायिक तनाव था. हिंसा की घटनाएं भी हो ही रही थीं. कराची की दिक्कत असल में मुहाजिर बनाम पश्तून की है. मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट उर्दू बोलने वाले मुहाजिरों के साथ था. दूसरी तरफ थी आवामी नैशनल पार्टी, जो कि पश्तूनों के साथ थी. दोनों एक-दूसरे पर मारने-काटने का इल्जाम लगा रहे थे (फोटो: AP)
कराची में लंबे समय से सांप्रदायिक तनाव था. हिंसा की घटनाएं भी हो ही रही थीं. कराची की दिक्कत असल में मुहाजिर बनाम पश्तून की है. मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट उर्दू बोलने वाले मुहाजिरों के साथ था. दूसरी तरफ थी आवामी नैशनल पार्टी, जो कि पश्तूनों के साथ थी. दोनों एक-दूसरे पर मारने-काटने का इल्जाम लगा रहे थे (फोटो: AP)

…और कराची जल उठा
12 मई की बात है. इफ्तिकार चौधरी कराची पहुंचे. वो यहां सिंध बार असोसिएशन के वकीलों को संबोधित करने वाले थे. इफ्तिकार का विमान जैसे ही एयरपोर्ट पर उतरा, शहर में खलबली मच गई. हिंसा शुरू हो गई. पिछले कुछ दिनों से सरकार विपक्षी पार्टियों के कार्यकर्ताओं की धड़-पकड़ कर रही थी. कराची सिंध प्रांत में आता है. पिछले लंबे समय से सिंध का माहौल खराब था. उस समय यहां PML-Q और मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (MQM) की सरकार थी. MQM और विपक्ष के कार्यकर्ता सड़कों पर भिड़ गए. जमकर हिंसा हुई. इसी दिन शाम को मुशर्रफ इस्लामाबाद में भाषण देते नजर आए. कितना डर रहा होगा उन्हें कि वो बुलेटप्रूफ स्क्रीन के पीछे खड़े होकर बोल रहे थे. मुशर्रफ ने अपने विरोधियों को चेताते हुए कहा-

कराची में हुई हिंसा की फुटेज देखकर मेरा कलेजा फट रहा है. न्यायपालिका से जुड़े एक मुद्दे को बेवजह राजनैतिक तूल दिया जा रहा है. जो लोग इसकी आड़ में फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं, उनको मेरी चेतावनी है. हमें चुनौती मत दीजिए. हम आपकी तरह डरपोक नहीं हैं. हमारे पास जनता की ताकत है.

कराची हिंसा में 40 लोग मारे गए. दर्जनों लोग घायल हुए. कई दिनों तक हिंसा चलती रही. इसके बाद ही शुरू हुआ मुशर्रफ के खिलाफ वकीलों का आंदोलन. ये हुआ ही था कि लाल मस्जिद पर सेना ने हमला कर दिया. वहां कितने आतंकवादी, कितने चरमपंथी मारे गए, मालूम नहीं. इसका बदला लेने के लिए आतंकवादी और कट्टरपंथी संगठनों ने जमकर हमले करवाए. पाकिस्तान में आतंकवादी हमलों की बाढ़ सी आ गई. ये सारे पाकिस्तान की जमीन से जुड़े संगठन थे. जो अपने ही देश, अपने ही हमवतनों को निशाना बना रहे थे. नीचे कराची हिंसा के समय का एक विडियो देखिए-

बेनजीर और नवाज, दोनों का वनवास खत्म हुआ
मुशर्रफ की जमीन हिल चुकी थी. उनके ऊपर भयानक दबाव था. इसी दबाव में आकर मुशर्रफ ने अक्टूबर में नैशनल रिकॉन्सिलिएशन ऑर्डिनेंस (NRO) पर दस्तखत किए. समझिए कि ये बेनजीर और नवाज के लिए जीवनदान का वादा था. आश्वासन था कि अगर वो पाकिस्तान लौटते हैं, तो उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा. अक्टूबर में ही बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान लौट आईं. वो आठ साल बाद यहां लौटी थीं. पाकिस्तान लौटकर बेनजीर ने कहा-

मैं अपने मुल्क वापस लौटकर बहुत जज्बाती हो रही हूं. मैं कितने महीनों, कितने सालों से इस दिन का इंतजार किया है. इसका सपना देखा है. मैंने घंटे गिने हैं. घड़ियां जोड़ी हैं. अपने वतन, अपनी मिट्टी, यहां के आसमान, यहां की घास को देखने के लिए लंबा इंतजार किया है. मैं उम्मीद करती हूं कि यहां लोगों को मुझसे जो उम्मीदें हैं, मैं उन्हें पूरा कर पाऊं.

नवंबर में नवाज शरीफ भी पाकिस्तान लौट आए. मुशर्रफ के खिलाफ बेनजीर और नवाज ने हाथ मिला लिया था. अब मुशर्रफ को ऐलान करना पड़ा. कि 15 फरवरी, 2008 तक पाकिस्तान में चुनाव करवाए जाएंगे. नीचे एक विडियो है. ये 2007 में बेनजीर की वतन वापसी के वक्त का विडियो है-

बेनजीर की हत्या ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी
पाकिस्तान की कई पार्टियां 2008 के चुनाव का विरोध कर रही थीं. उनका कहना था कि मुशर्रफ के रहते चुनाव निष्पक्ष नहीं होंगे. पहले नवाज इसी गैंग में शामिल थे. उनके साथ इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) भी थी. लेकिन बेनजीर ने नवाज को समझाया. उन्हें आने वाले चुनाव में शरीक होने के लिए राजी किया. बेनजीर का कहना था कि अगर सारी पार्टियों ने चुनाव का बहिष्कार किया, तो इससे मुशर्रफ को ही फायदा होगा. नवाज को बेनजीर की बात समझ आई. नीचे लंदन के ट्रेफलगर स्क्वैयर का एक विडियो है. ये बेनजीर के पाकिस्तान लौटने से पहले का है. यहीं पर बेनजीर ने अपनी पार्टी के इलेक्शन कैंपेन की शुरुआत की थी-

मुशर्रफ के दिन पूरे हो चुके थे
इस वक्त तक मुशर्रफ की हालत बहुत खराब हो गई. ऊपर से उनके विरोधियों में एका भी हो गया था. चीजें उनके हाथ से निकल गई थीं जैसे. विपक्ष उनके ऊपर आर्मी चीफ की कुर्सी खाली करने का दबाव बना रहा था. मुशर्रफ ये तो कह रहे थे कि वो आर्मी चीफ का पद छोड़ देंगे. मगर कब, ये नहीं बता रहे थे. विपक्ष का दबाव बढ़ता जा रहा था. इस सबसे निपटने के लिए मुशर्रफ ने इमरजेंसी लगा दी. फिर दिसंबर में जब बेनजीर की हत्या हुई, तब को मुशर्रफ के लिए चेहरा बचाना बहुत ही मुश्किल हो गया. साफ था कि उनके दिन पूरे हो चुके हैं. नीचे एक विडियो है. बेनजीर की हत्या के केस में मुशर्रफ कोर्ट के सामने पेश होने जा रहे हैं.

पाकिस्तान की पहली लोकतांत्रिक सरकार, जिसने उम्र पूरी की
जिस लोकतंत्र को ठेंगा दिखाकर मुशर्रफ सत्ता में काबिज हुए, उसी लोकतंत्र ने उनसे सत्ता छीन ली. मुशर्रफ पाकिस्तान छोड़कर भाग गए. कभी दुबई रहे. कभी लंदन. उनके ऊपर पाकिस्तान में कई मामले दर्ज हुए. बेनजीर की हत्या. जजों की गैरकानूनी गिरफ्तारी. देशद्रोह. पाकिस्तानी अदालतों ने उन्हें भगोड़ा घोषित कर दिया. हालांकि 2013 में वो वापस पाकिस्तान लौटे. तीन साल तक उनके ऊपर पाकिस्तान से बाहर न जाने का बैन लगा. लेकिन फिर 2016 में वो दोबारा पाकिस्तान से निकल गए. माना गया कि ये सेना के सपोर्ट की वजह से हुआ है. खैर, ये सब बाद की बातें हैं. 2008 के चुनाव पर लौटते हैं. बेनजीर की सहानुभूति में उनकी पार्टी को बंपर वोट मिले. PPP की सरकार बनी. प्रधानमंत्री बने, युसूफ रजा गिलानी. राष्ट्रपति बने, आसिफ अली जरदारी.

इसी सरकार के कार्यकाल में अमेरिका ने पाकिस्तान में घुसकर ओसामा बिन लादेन को मारा. इन्हीं के कार्यकाल में नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस का नाम बदलकर खैबर पख्तूनख्वा रखा गया. भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बावजूद 2013 में इस सरकार ने अपना कार्यकाल खत्म किया. पाकिस्तान के इतिहास में ये पहली बार था, जब जनता के हाथों चुनकर आई सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया. नीचे एक विडियो है. बेनजीर की हत्या के बाद का. इसमें नवाज बेनजीर की कब्र पर जाकर फूल चढ़ा रहे हैं. कितनी दुश्मनी रही दोनों के बीच. एक-दूसरे को गिराने का कोई मौका नहीं छोड़ा दोनों ने. एक गिरता था, तो दूसरा चढ़ता था. करीब 20 साल तक चला ये बैर इस तरह खत्म हुआ.

एक और चुनाव
मई 2013. पाकिस्तान में फिर से चुनाव हुए. इसमें नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) जीती. नवाज प्रधानमंत्री बने. फिर पनामा पेपर्स में उनका और उनके परिवार का नाम आया. इमरान खान ने उनके खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया. नवाज और सेना के बीच खूब तनातनी हो गई. सुप्रीम कोर्ट ने पनामा पेपर्स केस में नवाज के खिलाफ फैसला सुनाया. उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी. उन्होंने शाहिद खाकन अब्बासी को अपनी जगह प्रधानमंत्री बनाया. PML-N की सरकार जैसे-तैसे अपना कार्यकाल पूरा कर पाई.

पाकिस्तान में जब भी चुनाव होते हैं, धांधली के इल्जाम लगते हैं. मगर 2018 के इन चुनावों में धांधली के आरोप भर नहीं लगे. पत्रकारों से लेकर जज तक, तकरीबन हर सेक्शन से ये शिकायत आई कि सेना और ISI चुनाव के नतीजे प्रभावित करने की हर मुमकिन कोशिश कर रही है (फोटो: रॉयटर्स)
पाकिस्तान में जब भी चुनाव होते हैं, धांधली के इल्जाम लगते हैं. मगर 2018 के इन चुनावों में पत्रकारों से लेकर जज तक, तकरीबन हर सेक्शन से ये शिकायत आई कि सेना और ISI चुनाव के नतीजे प्रभावित करने की हर मुमकिन कोशिश कर रही है. लोग कह रहे थे कि चुनाव  के नाम पर दिखावा हुआ. इमरान को जिताना है, ये बात चुनाव से पहले ही तय हो गई थी (फोटो: रॉयटर्स)

ये 2018 है, इमरान की सुबह हो चुकी है
25 जुलाई, 2018 को चुनाव हुए. न नवाज चुनाव लड़ सकते थे, न उनकी बेटी मरियम. जिसको कि नवाज अपना राजनैतिक वारिस बनाना चाह रहे थे. चुनाव से ठीक पहले कोर्ट ने नवाज और मरियम को 10 साल कैद की सजा सुनाई. दोनों लंदन में थे. वहां नवाज की पत्नी कुलसुम नवाज का इलाज चल रहा है. उन्हें छोड़कर नवाज और मरियम पाकिस्तान लौटे. उन्होंने गिरफ्तारी दी. छोटे भाई शाहबाज शरीफ की लीडरशिप में PML-N ने चुनाव लड़ा. मगर पहले से चर्चा थी कि सेना इमरान खान को प्रधानमंत्री बनवाने जा रही है. इमरान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. अभी का सीन ये है कि इमरान प्रधानमंत्री बन गए हैं और नवाज जेल में हैं. एक वक्त बेनजीर और नवाज में विरोध कम, दुश्मनी ज्यादा थी. अब बेनजीर नहीं हैं. उनके बेटे बिलावल भुट्टो PPP संभाल रहे हैं. लेकिन मेन खिलाड़ी बनने में अभी उन्हें वक्त लगेगा. तब तक इमरान और नवाज आमने-सामने हैं. ऐसे ही जैसे एक जमाने में नवाज और बेनजीर हुआ करते थे. जहां तक नवाज पर लगे प्रतिबंध और उन्हें हुई जेल का सवाल है, तो याद रखिए कि ये पाकिस्तान की बात हो रही है. वहां कभी भी कुछ भी हो सकता है. यहां सिविलियन सरकारों की सेना के साथ पटती नहीं है. इमरान से पहले का तो यही इतिहास रहा है. इमरान के साथ क्या होगा, ये भी देखेंगे.

पाकिस्तान अगर एक किताब है, तो मैंने इसे इस पार से उस पार तक पढ़ा है. बहुत सारी दिलचस्प बातें मालूम चलीं. मसलन- पाकिस्तान में एक ही जैसी चीजें बार-बार होती रहती हैं. फिर चाहे वो जंग शुरू करने और उनमें गलतियां करने का मामला हो. या तानाशाही के साथ इसके अनुभव. या सेना की मनमानी. या फिर यहां लोकतंत्र की सेहत. अयूब से लेकर याहया तक, सब एक जैसी गलतियां करते हैं. नवाज से लेकर बेनजीर तक, सब भ्रष्टाचार में गिरते हैं. इस्कंदर मिर्जा से लेकर नवाज शरीफ तक, सबका अपने आर्मी चीफ के साथ एक खास तरह का अनुभव रहता है. पाकिस्तान में जो एक बार होता है, वो बार-बार रिपीट होता रहता है. ऐसा कहीं और भी होता है क्या? पता नहीं. पाकिस्तान जैसा है, वैसा कोई और तो नजर नहीं आता. वो ‘क्यूरियस केस ऑफ बेंजामिन बटन’ जैसा एक अलग ही पीस है.

अलविदा नहीं कहेंगे, किस्सा सुनाएंगे

मुशर्रफ का जिक्र करें और आगरा सम्मेलन छूट जाए, ये तो नाइंसाफी है. आगरा सम्मेलन वो घड़ी थी, जब कश्मीर विवाद बस सुलझने की वाला था. बल्कि ये समझिए कि सुलझते-सुलझते छूट गया था. मुशर्रफ और वाजपेयी, दोनों ने मन बना लिया था. मगर ऐन वक्त पर आडवाणी खलनायक बन गए. उन्होंने ये समझौता होने नहीं दिया. नीचे एक विडियो है. उसी वक्त का. मुशर्रफ और उनकी पत्नी ताजमहल देख रहे हैं. ये देखिए पहले. फिर आगे किस्सा छानते हैं.

मुशर्रफ ने अपनी किताब ‘लाइन ऑफ फायर’ में भी आडवाणी को कोसा है. अद्भुत ये है कि खुद आडवाणी ने भी अपनी किताब ‘माय कंट्री, माय लाइफ’ में ये बात मानी है. मुशर्रफ के साथ मुलाकात के बारे में बताते हुए आडवाणी ने लिखा है-

हम दोनों की शुरुआती बातचीत इस बात पर हुई कि हम दोनों ने ही कराची के सेंट्र पैट्रिक हाई स्कूल से पढ़ाई की थी. मैंने मुशर्रफ से कहा- जनरल, आप भले ही दिल्ली में पैदा हुए हों, लेकिन अपनी जन्मभूमि को वापस देखने आने में आपको 53 साल लग गए. बॉर्डर के दोनों ओर अब भी लाखों ऐसे परिवार हैं, जिन्हें ये मौका भी नहीं मिला. वो अपनी पैदाइश की जगह देखने कभी नहीं आ पाए. आधी सदी गुजर जाने के बाद भी ऐसे हालात होना अजीब नहीं है? आपको नहीं लगता कि हमें इन दोनों मुल्कों और इनको लोगों को बांटने वाली चीजें दूर करने के लिए कोई ठोस समाधान निकालना चाहिए?

इसके जवाब में मुशर्रफ बोले- हां हां, बिल्कुल. आपका क्या सुझाव है?

आडवाणी का जवाब तैयार था-

सबसे जरूरी तो यही है कि हम एक-दूसरे का भरोसा जीतें. मैं आपको एक मिसाल देता हूं. मैं भी तुर्की के दौरे से लौटकर आया हूं. मुझे पता है कि आपको तुर्की से कुछ खास मुहब्बत है. आपने अपनी जिंदगी के शुरुआती साल वहीं गुजारे हैं. मैं भारत और तुर्की के बीच प्रत्यर्पण संधि पर मुहर लगाने वहां गया था. आप सोचिए. तुर्की और भारत के बीच ऐसी किसी संधि की कोई बड़ी जरूरत है क्या? असलियत में तो हमें भारत और पाकिस्तान के बीच प्रत्यर्पण संधि की जरूरत है. ताकि हमारे यहां अपराध करके भाग गए लोग जो आपके यहां जाकर पनाह लेते हैं, उन्हें कार्रवाई के लिए वापस भारत लाया जा सके.

मुशर्रफ ने आडवाणी की बात पर हामी भरी. इस पर आडवाणी बोले कि अगर आप राजी ही हैं, तो हमें दाऊद इब्राहिम सौंप दीजिए. वो तो वहीं कराची में रहता है न. आडवाणी का ये कहना था कि मुशर्रफ का चेहरा लाल. ऐसा लगा कमरे में यकायक लू चलने लगी है. मगर मुशर्रफ करते भी तो क्या करते. वो बस इतना ही कह पाए-

आडवाणी जी, मैं आपको बता रहा हूं कि दाऊद पाकिस्तान में नहीं रहता.

मुशर्रफ ने कतई नई बात नहीं कही थी. वही झूठ दोहराया था, जो पाकिस्तान सालों से दोहरा रहा था. ऐसे मौकों के लिए इंसान में विशेष प्रतिभा चाहिए होती है. जो सच दुनिया जानती हो, उसको झुठलाने के लिए खास टैलेंट तो चाहिए ही होता है.


‘पाक पॉलिटिक्स’ की बाकी किस्तें पढ़िए: 

अगर जिन्ना की ऐम्बुलेंस का पेट्रोल खत्म न हुआ होता, तो शायद पाकिस्तान इतना बर्बाद न होता
उस बाग का शाप, जहां पाकिस्तान के दो प्रधानमंत्री कत्ल कर दिए गए
जब पाकिस्तानी हुक्मरान स्तनों पर अफीम लगाकर बच्चे मारने वाली मां की तरह देश खत्म कर रहे थे
मीर जाफर ने हिंदुस्तान से गद्दारी की थी, उसके वंशज के साथ पाकिस्तान में गद्दारी हुई
पाकिस्तान के उस तानाशाह की कहानी, जो खुद को कुत्ता कहता था
पाकिस्तान की प्लानिंग: 28 जुलाई को भारत में घुसेंगे, 9 अगस्त को कश्मीर हमारा होगा
पाकिस्तान चीन से मदद मांगने गया, चीन ने कहा भारत के हाथों लाहौर हार जाओ
भारत के आर्मी चीफ ने गलत जानकारी न दी होती, तो उस साल भारत लाहौर जीत जाता!
पाकिस्तान के खिलाफ अपने दोस्त की मदद के लिए भारत ने अपना ही प्लेन हाइजैक करवा दिया!
वो जंग, जहां पाकिस्तान के एक पत्रकार ने अपने मुल्क के खिलाफ जाकर भारत की सबसे बड़ी मदद कर दी
भारत के जिस आर्मी अफसर ने पाकिस्तान को सबसे बड़ी शर्मिंदगी दी, वो जिंदगी भर कुवांरा रहा
वो PM जिसे फांसी देने के बाद नंगा करके तस्वीर ली गई, ताकि पता चले खतना हुआ था कि नहीं
वो तानाशाह, जो आग में झुलसकर ऐसी बुरी मौत मरा कि लाश भी पहचान नहीं आ रही थी
एक प्रधानमंत्री, जिसके आतंकवादी भाई ने प्लेन हाइजैक किया था
पाकिस्तानी सेना अपने PM को मूर्ख बना रही थी. और PM श्रीनगर में झंडा फहराने के सब्जबाग देख रहे थे


करगिल वॉर की अनोखी कहानियां। । दी लल्लनटॉप शो।

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