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पाकिस्तान चीन से मदद मांगने गया, चीन ने कहा भारत के हाथों लाहौर हार जाओ

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25 जुलाई, 2018 को पाकिस्तान में चुनाव होना है. पाकिस्तान में लोकतंत्र का पस्त रेकॉर्ड रहा है. ऐसे में यहां कोई सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर ले, तो बड़ी बात है. ये पहली बार हो रहा है कि पाकिस्तान में बैक-टू-बैक दो सरकारों ने अपना कार्यकाल पूरा किया है. ये जो हुआ है, वो ऐतिहासिक है. इस खास मौके पर द लल्लनटॉप पाकिस्तान की राजनीति पर एक सीरीज़ लाया है. शुरुआत से लेकर अब तक. पढ़िए, इस सीरीज़ की सातवीं किस्त.


1965 की जंग 22 दिनों तक चली. कम साधनों, पुराने हथियारों के दम पर भी भारतीय सेना पाकिस्तान से बीस साबित हुई. हम जीत से बस एक बित्ते की दूरी पर थे. मगर हम दूर ही रह गए. हमारे पैर पीछे खींच लिए गए. क्यों, कैसे, ये सब समझने से पहले हमें जंग की कहानी जाननी होगी. उस जंग की कहानी, जिसके ऊपर अक्सर ज्यादा बात नहीं होती. 1947-48 की लड़ाई और 1971 की जंग के बीच इसका जिक्र अक्सर फुटनोट की तरह आता है. ज्यादातर लोग नहीं जानते. कि 1962 में चीन के हाथों बुरी तरह हारने वाली भारतीय सेना ने 1965 में क्या बहादुरी दिखाई. उसने क्या हासिल किया. पिछली किस्त में आपने पढ़ा कि पाकिस्तान ने किस तरह और क्या सोचकर इस जंग की साजिश रची. इस किस्त में जंग का हाल पढ़िए.

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ऑपरेशन जिब्राल्टर शुरू होते ही खत्म हो गया
पाकिस्तान ने बहुत कम समय में जंग की तैयारी की. मगर उसकी तैयारी में सौ छेद थे. पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में पाकिस्तानी सेना ने गुरिल्लाओं को ट्रेनिंग दी. जैसी-तैसी कमजोर ट्रेनिंग पाए इन लोगों ने अंतरराष्ट्रीय सीमा लांघकर कश्मीर में घुसपैठ शुरू की. ये तारीख थी 28 जुलाई, 1965. घुसपैठ का सबसे अहम हिस्सा 5 अगस्त को अंजाम दिया गया. इन सारे घुसपैठियों को घाटी में पहुंचना था. वहां लोकल कश्मीरियों को अपने साथ मिलाकर बगावत छेड़नी थी और 9 अगस्त को श्रीनगर (मतलब कश्मीर) पर कब्जे का ऐलान कर देना था. मगर ऐसा हो नहीं पाया. एक तो प्लानिंग ठीक नहीं. ऊपर से तुक्केबाजी में तय की गई चीजें. घुसपैठिये कोई बगावत नहीं शुरू कर पाए. बल्कि पाकिस्तानी सेना के चार घुसपैठियों को भारतीय सेना ने पकड़ लिया. उनसे पूछताछ हुई, तो उन्होंने पूरी साजिश का कच्चा-चिट्ठा उगल दिया. भारत ने उन चारों के कबूलनामे को ऑल इंडिया रेडियो पर चलवा दिया. ये तारीख थी 8 अगस्त.

AIR पर ब्रॉडकास्ट करने का फायदा क्या हुआ?
AIR के होने का ये फायदा था. जहां पहुंचने में भारतीय सेना को वक्त लगता, वहां वो झट से पहुंच गया. पाकिस्तान की पूरी साजिश बेनकाब हो गई. सबको पता चला. कि किस तरह पाकिस्तान कश्मीर की 60 जगहों से घुसपैठ करने की तैयारी में था. पाकिस्तान का प्लान था. कश्मीर में सारे पुल उड़ा दो. दूरसंचार के सारे माध्यम बर्बाद कर दो. फिर भारत के पास कश्मीर तक अपनी बात पहुंचाने का कोई जरिया नहीं बचेगा. इसके बाद वो अपना एक नया रेडियो स्टेशन ‘वॉइस ऑफ कश्मीर’ लगाएंगे. वहां से प्रसारण करेंगे. ये ऐलान करेंगे कि कश्मीर के लोग भारत के खिलाफ बगावत में खड़े हो गए हैं.

जुल्फिकार अली भुट्टो ने न केवल अयूब को उल्टी पट्टी पढ़ाई, बल्कि उन्हें गुमराह भी किया. जंग के दौरान कई अहम चीजें अयूब से छुपाई गईं (फोटो: डॉन लाइब्रेरी)
जुल्फिकार अली भुट्टो ने न केवल अयूब को उल्टी पट्टी पढ़ाई, बल्कि उन्हें गुमराह भी किया. जंग के दौरान कई अहम चीजें अयूब से छुपाई गईं (फोटो: डॉन लाइब्रेरी)

भुट्टो की चालाकी या अयूब की बेवकूफी?
विदेश मंत्री भुट्टो और पाकिस्तानी सेना के कमांडर-इन-चीफ मूसा इस पूरे ऑपरेशन को मॉनिटर कर रहे थे. उनको मालूम चल चुका था. कि ऑपरेशन जिब्राल्टर की धज्जियां उड़ चुकी हैं. बावजूद इसके इन लोगों ने ऑपरेशन ग्रैंड स्लेम को लॉन्च करने का फैसला किया. राष्ट्रपति अयूब उस समय स्वात घाटी में थे. जीत का इतना भरोसा था उनको कि इतने नाजुक वक्त में हालात पर नजर रखने की जगह छुट्टियां मना रहे थे. शायद उन्हें ऑपरेशन जिब्राल्टर के नाकाम होने की भनक नहीं लगी थी. भुट्टो को पूरी खबर थी मगर. वो अयूब के पास पहुंचे और उनसे ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम शुरू करने की इजाजत मांगी. इस ‘ऑब्जेक्टिव ऑफ ऑपरेशन’ के कागजात खुद भुट्टो ने तैयार करवाए थे. भुट्टो को इस ऑपरेशन का हश्र पहले से ही मालूम था. उनकी असली प्लानिंग ये ऑपरेशन नहीं थी. वो तो बस अयूब को बर्बाद करके खुद आगे बढ़ने के लिए अयूब के माथे पर भारत से हारने का दाग लगवाना चाहते थे. इसीलिए हमले के कागजात पर भुट्टो ने इस तरह से चीजें लिखवाईं कि बाद में उनके माथे कोई जिम्मा न आए. इसमें लिखा था कि ऐसे मामलों में संघर्ष का दायरा बढ़ने का खतरा तो होता ही है. पाकिस्तान अपनी कार्रवाई कश्मीर तक सीमित रखेगा, लेकिन हो सकता है कि पाकिस्तानी कार्रवाई की प्रतिक्रिया में भारत जंग छेड़ दे. हो सकता है कि वो पाकिस्तानी इलाकों में आए. इन संभावनाओं के बाद भी हम ये जोखिम ले रहे हैं. मतलब अयूब ने सब जानते-बूझते हमले का आदेश दिया.

पाकिस्तानी सेना ने इंटरनैशनल बॉर्डर पार किया. ये गलती से नहीं हुआ. इसकी प्लानिंग थी. इसके बावजूद उसे उम्मीद थी कि लड़ाई बस कश्मीर तक सीमित रहेगी (फोटो: पाकिस्तान आर्मी आर्काइव्स)
पाकिस्तानी सेना ने इंटरनैशनल बॉर्डर पार किया. ये गलती से नहीं हुआ था. इसकी प्लानिंग थी. इसके बावजूद उसे उम्मीद थी कि लड़ाई बस कश्मीर तक सीमित रहेगी (फोटो: पाकिस्तान आर्मी आर्काइव्स)

पाकिस्तान ने सीमा रेखा पार की
सियालकोट पड़ता है पाकिस्तान के पंजाब में. इससे सटा हुआ है कश्मीर का वो अधूरा हिस्सा, जो फिलहाल भारत के पास है. बाकी हिस्से पर पाकिस्तान ने कब्जा किया हुआ है. भारत और पाकिस्तान के बीच दो तरह की सीमा रेखाएं है- LoC (लाइन ऑफ कंट्रोल) और IB (इंटरनैशनल बॉर्डर). वर्किंग बॉर्डर इनके अलावा है, जिसे बस पाकिस्तान मानता है, भारत नहीं. समझ में आए, इसलिए थोड़ा सा डिटेल बताते हैं:

– लाइन ऑफ कंट्रोल: PoK और जम्मू-कश्मीर के बीच की रेखा. 1947 की लड़ाई में हुए संघर्षविराम के समय ये रेखा बनी. 1971 में हुए शिमला समझौते के बाद भारत के कहने पर इसे ‘नियंत्रण रेखा’ का नाम दिया गया. ये अंतरिम है, स्थायी नहीं.
– इंटरनैशनल बाउंड्री: बंटवारे के समय भारत और पाकिस्तान के बीच जो लकीर खिंची थी, वो है इंटरनैशनल बॉर्डर.
– वर्किंग बॉर्डर: पाकिस्तान के सियालकोट और नरोवाल जिले और जम्मू-कश्मीर (जो अभी भारत के पास है) के बीच की रेखा. भारत इसे इंटरनैशनल बाउंड्री ही मानता है. जबकि पाकिस्तान इसे वर्किंग बॉर्डर कहता है. पाकिस्तान इसे वर्किंग बॉर्डर इसलिए कहता है कि इसके एक ओर तो पाकिस्तान का अविवादित हिस्सा (सियाकोट) पड़ता है, जबकि दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर है. जो कि पाकिस्तान के मुताबिक विवादित जमीन है.

ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम में अखनूर तर पहुंचने के लिए जरूरी था कि पाकिस्तान इस ‘वर्किंग बॉर्डर’ को लांघे. शायद पाकिस्तान ने सोचा होगा कि कश्मीर विवाद की वजह से उसका ये रेखा लांघना अंतरराष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन नहीं है. लेकिन भारत ने इसे इंटरनैशनल बॉर्डर का उल्लंघन माना. मानना ही था. चूंकि पाकिस्तान ने बॉर्डर पार किया था, सो अब भारत के पास भी जवाबी कार्रवाई के लिए सीमा पार करके पाकिस्तान में दाखिल होने का जस्टिफिकेशन था.

पाकिस्तानी
पाकिस्तानी सेना एक के बाद एक गलतियां करती रही. उसे शुरुआती कामयाबी मिली थी. लेकिन फिर एकाएक कमांडर बदल दिया गया. खुद याहया फ्रंट पर आ गए. यूं ऑपरेशन के बीच कमांड में बदलाव होना बहुत अजीब था. पाकिस्तान में हर कोई मंसूबे बनाने में व्यस्त था. लोग जीत के बाद की कल्पना करके ज्यादा से ज्यादा क्रेडिट बटोरने का इंतजाम कर रहे थे (फोटो: पाकिस्तान आर्मी आर्काइव्स)

ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम: गलती पर महागलती
24 अगस्त को पाकिस्तानी आर्मी के कमांडर मलिक ने ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम शुरू करने की इजाजत मांगी. उन्हें परमिशन मिली 1 सितंबर को. 2 सितंबर को छांब पर कब्जा कर लिया. पाकिस्तानी सेना तावी नदी के किनारे आ गई. अखनूर अब बस साढ़े नौ किलोमीटर दूर था. उनके और अखनूर के बीच अब बस जोरियान था. लेकिन इससे पहले कि पाकिस्तानी सेना आगे बढ़ती, उनका कमांडर बदल गया. याहया खान को कमांड सौंपा गया. याहया ने फैसला किया कि अखनूर की तरफ बढ़ने से पहले जोरियान पर कब्जा करेंगे. जोरियान पर पाकिस्तान ने कब्जा कर तो लिया, लेकिन उसके 36 कीमती घंटे खर्च हो गए. ये वक्त ताकत जुटाने के लिहाज से भारत के लिए बहुत कीमती साबित हुआ. अगर पाकिस्तान ने जोरियान के पीछे 36 घंटे गंवाए बिना अखनूर पर हमला बोला होता, तो भारत बहुत बड़ी मुसीबत में फंस जाता. कश्मीर को बाकी भारत से जोड़ने वाली कड़ी शायद हिंदुस्तान के हाथ से निकल ही जाती.

समय गंवाने के बावजूद पाकिस्तानी सेना फतवाल रिज तक पहुंच गई. यहां से अखनूर बस चार किलोमीटर दूर रह गया था. सोचिए, अगर वो और पहले आ जाती तो क्या गजब हो जाता. बीच ऑपरेशन में कमांड बदलने को लेकर पाकिस्तान में आज तक खूब बातें होती हैं. इसके पीछे दो ही लोगों का दिमाग था. या तो कमांडर-इन-चीफ मूसा खान. या जनरल याहया खान. दोनों ने ऐसा क्यों किया होगा? लोग कहते हैं कि ये साजिश थी. शुरुआती कामयाबियों की वजह से याहया को लगा कि जीत तय है. इसीलिए वो जीत का श्रेय लेने के लिए वहां कमांड में होना चाहते थे.

ये 1965 की तस्वीर है. भारत के जवान रहट से पीने का पानी निकाल रहे हैं. ये जगह डेरा बाबा नानक के पास की है (फोटो: Getty)
ये 1965 की तस्वीर है. भारत के जवान रहट से पीने का पानी निकाल रहे हैं. ये जगह डेरा बाबा नानक के पास की है (फोटो: Getty)

इतना कुछ हो जाने के बाद अयूब की नींद खुली
अयूब ने मूसा और भुट्टो को बुलाकर तफ्तीश की. अब जाकर उन्हें ऑपरेशन जिब्राल्टर की नाकामी के बारे में मालूम चला. ये भी पता चला कि शुरुआती कामयाबी के बाद ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम भी रुक गया है. उस फ्रंट पर भी कोई उम्मीद नहीं है. अयूब को मालूम था कि अब कुछ नहीं हो सकता. उन्होंने ऑपरेशन खत्म करने का आदेश दिया. अयूब को लगा था कि पाकिस्तान चुप हो गया, तो भारत भी चुप हो जाएगा. मतलब जब पाकिस्तान का मन करे, हमला कर दे. जब मन करे, खत्म कर दे. और ये भी सोचे कि सामने वाला देश प्रतिक्रिया नहीं करेगा. मगर अयूब को अब जाकर मालूम चलने वाला था. कि न केवल उनकी साजिश फटी-चिथड़ी थी. बल्कि उन्होंने भारत के बारे में जो-जो अंदाजा लगाया था, वो सब भी एकदम गलत था. भारत उन्हें दिखाने वाला था कि वो न तो कमजोर है और न ही कायर.

भारतीय सेना के जवान सियालकोट के पास महाराजके गांव में पाकिस्तानी औरतों और बच्चों को खाना देते हुए. इसी रास्ते से आकर पाकिस्तानी सेना ने भारत पर हमला बोला था(फोटो: Getty)
भारतीय सेना के जवान सियालकोट के पास महाराजके गांव में पाकिस्तानी औरतों और बच्चों को खाना देते हुए. इसी रास्ते से आकर पाकिस्तानी सेना ने भारत पर हमला बोला था (फोटो: Getty)

जब इंडियन आर्मी लाहौर के बाहर पहुंची, तब पाकिस्तानी सेना फुटबॉल खेल रही थी

5 और 6 सितंबर, 1965 के बीच की रात. भारतीय सेना बॉर्डर लांघ गई. सुबह के करीब साढ़े पांच बजे का वक्त. कोई कवि होता, तो लिखता. कि प्राची में अरुणिमा के आभास की घड़ी थी. मगर हम कहेंगे कि लाहौर पहुंचने के रास्ते में धूल उड़ रही थी. भारत की फौज लाहौर के बाहर तक पहुंच गई. कितनी दूर है ही लाहौर. अमृतसर में एक ग्लास भरकर पंजाबी लस्सी पी लो अगर, तो लाहौर पहुंचते-पहुंचते भी लस्सी पचेगी नहीं. पेट में डोलती रहेगी. हिंदुस्तानी फौज जब लाहौर के बाहर तक पहुंच गई, तब जाकर पाकिस्तानी फौज को इस हमले का पता चला. कहते हैं कि पाकिस्तानी सेना की जिस 10वीं डिविजन के जिम्मे लाहौर की हिफाजत का जिम्मा था, वो तब फुटबॉल खेलने में व्यस्त थी. अयूब और मूसा, दोनों हैरान रह गए. उन्हें इस हमले की कतई उम्मीद नहीं थी. बाद के दिनों में ये मालूम चला कि दिल्ली स्थित पाकिस्तानी दूतावास ने अपने यहां एक टेलिग्राम भिजवाया. भारत में पाकिस्तान के राजदूत थे मियां अरशद हुसैन. उन्होंने तुर्की दूतावास की मदद से कहलवाया कि 4 सितंबर को भारत में सेंट्रल कैबिनेट की इमरजेंसी बैठक हुई. जिसमें पाकिस्तान पर हमला करने की बात तय हुई. यहां तक कि उन्होंने हमले की तारीख भी बता दी थी. मगर भुट्टो और अजीज अहमद ने इसे अरशद हुसैन का बेवजह का डर समझकर नजरंदाज कर दिया. अयूब तक तो ये खबर पहुंची भी नहीं.

भारत के हमले के कुछ घंटों बाद अयूब ने देश के नाम अपना संदेश दिया. बोले-

हिंदुस्तानी हुक्मरानों ने आदतन अपनी कायरता और पाखंड दिखाते हुए अपनी सेना को पाकिस्तान की पाक सरजमीं पर हमला बोलने का आदेश दिया है. वो भी युद्ध की बिना किसी आधिकारिक घोषणा के. उन्हें मुंहतोड़ जवाब देने का वक्त आ गया है. ऐसा जवाब जो भारत के साम्राज्यवादी मंसूबों का खात्मा कर दे. भारतीयों को जल्द पता चल जाएगा कि उन्होंने किनसे पंगा लिया है.

ऐसा नहीं कि बस अयूब ने पाकिस्तानी जनता को झूठ बताकर उन्हें गुमराह किया हो. तमाम पाकिस्तानी हुक्मरानों की यही आदत रही है. ये पाकिस्तानी सेना की वेबसाइट से लिया गया स्क्रीनशॉट है. इसमें 65 की लड़ाई का ब्योरा है. आप पहली लाइन पढ़िए. लिखा है कि पहले भारत घुसा पाकिस्तान के इलाके में. ये सरासर झूठ है. मगर पाकिस्तानी सेना और सरकार ऐसे ही लगातार अपने लोगों को बेवकूफ बनाती आई है. अपने लोगों को भारत से डराकर रखने में उनका हित सधता है (फोटो: पाकिस्तानी आर्मी वेबसाइट)
ऐसा नहीं कि बस अयूब ने पाकिस्तानी जनता को झूठ बताकर उन्हें गुमराह किया हो. तमाम पाकिस्तानी हुक्मरानों की यही आदत रही है. ये पाकिस्तानी सेना की वेबसाइट से लिया गया स्क्रीनशॉट है. इसमें 65 की लड़ाई का ब्योरा है. आप पहली लाइन पढ़िए. लिखा है कि पहले भारत घुसा पाकिस्तान के इलाके में. पाकिस्तानी सेना और सरकार ऐसे ही लगातार अपने लोगों को बेवकूफ बनाती आई है  (फोटो: पाकिस्तानी आर्मी वेबसाइट)

अयूब ने पाकिस्तानी जनता से झूठ कहा
अयूब का ये भाषण कितना भ्रामक था. सारा दोष हिंदुस्तान के सिर, जबकि शुरुआत पाकिस्तान ने की थी. अयूब समेत पूरे पाकिस्तानी तंत्र ने अपनी जनता से कहा कि भारत का ये हमला पाकिस्तान को वापस हिंदुस्तान में मिलाने की साजिश है. कि भारत बंटवारे को खत्म करना चाहता है. कि भारत पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को छीनना चाहता है. जबकि असलियत ये थी कि भारत ने प्रतिक्रिया में कार्रवाई की थी. उसका मकसद पाकिस्तानी सेना को डिफेंसिव मोड में लाना था.

पाकिस्तानी सेना का एक टैंक बहारा सेक्टर में सड़क किनारे लावारिस पड़ा है. टैंक खराब हो गया, तो आर्मी इसे यहीं छोड़ गई. पाकिस्तान को कई तोपों का नुकसान हुआ था इस जंग में (फोटो: Getty)
पाकिस्तानी सेना का एक टैंक बहारा सेक्टर में सड़क किनारे लावारिस पड़ा है. टैंक खराब हो गया, तो आर्मी इसे यहीं छोड़ गई. पाकिस्तान को कई तोपों का नुकसान हुआ था इस जंग में (फोटो: Getty)

जिनको मदद के लिए बुलाया था, वो दुकान लूट रहे थे
हताश पाकिस्तान ने भारत को पीछे हटाने के लिए एक बार फिर नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रॉविंस के कबीलों की मदद ली. वैसे ही, जैसे 1947-48 में ली थी. पाकिस्तानी सेना ने ढेर सारे कबीले वालों को लाहौर की सीमा पर बुलाया. ये सोचकर कि भारत के खिलाफ उनका साथ मिलने से पाकिस्तान की स्थिति मजबूत होगी. उन कबीलेवालों ने उल्टा पाकिस्तान का ही नुकसान किया. लाहौर आते हुए जो भी दुकानों उन्हें रास्ते में दिखाई दीं, वहां उन्होंने जमकर लूटपाट की. पाकिस्तानी प्रशासन ने अपनी गरज में उनकी इन हरकतों को नजरंदाज किया. फिर जब ये कबीलेवाले लाहौर पहुंचे, तो और भी तमाशा हुआ. कहां वो पहाड़ी इलाकों के. और कहां ये पंजाब का मैदानी हिस्सा. ये इलाका उनके लड़ने के हिसाब से मुनासिब नहीं था. ऊपर से यहां खुले में लड़ाई हो रही थी. कबीलेवालों ने इस तरह लड़ने से इनकार कर दिया. अब तो पाकिस्तानी सेना और प्रशासन दोहरी मुसीबत में फंस गया. एक तरफ भारत से जंग चल रही है. दूसरी तरफ ये कबीलेवाले नाक में दम कर रहे हैं. बड़ी मशक्कत के बाद इन ट्राइब्समैन को वापस भेजा जा सका.

तस्वीर में दिख रहे सैनिक पाकिस्तान के हैं. उनके साथ जो विलिस जीप दिख रही है, वो भारतीय सेना की है. जीप पर एक तोप फिट है. इंडियन आर्मी लाहौर की तरफ बढ़ते हुए ये जीप छोड़ गई थी (फोटो: Getty)
तस्वीर में दिख रहे सैनिक पाकिस्तान के हैं. उनके साथ जो विलिस जीप दिख रही है, वो भारतीय सेना की है. जीप पर एक तोप फिट है. इंडियन आर्मी लाहौर की तरफ बढ़ते हुए ये जीप छोड़ गई थी (फोटो: Getty)

पाकिस्तान को पता चल गया, कि वो हार रहा है
7 सितंबर को पाकिस्तान ने अपनी कार्रवाई शुरू की. इसे नाम दिया- मेल्ड फिस्ट. ये शुरू हुआ खेम करन सेक्टर में. शुरुआत में पाकिस्तान को कामयाबी मिली. लेकिन फिर वो पिछड़ने लगा. इस इलाके में गन्ने के खेत बहुत थे. इस वजह से सेना दूर तक देख नहीं पाती थी. ये खेत हिंदुस्तान की ऐंटी-टैंक टीमों के लिए छुपने के काम आती थीं. पाकिस्तानी टैंकों को बहुत नुकसान पहुंचा. 11 सितंबर को पाकिस्तान ने अपना ये ‘मेल्ड फिस्ट’ वापस ले लिया. पाकिस्तान की पूरी मिलिटरी योजना जैसे धूल में लोट रही थी. वो जो करते, उसी में नाकाम होते. पाकिस्तान के सामने जब ये साफ हो गया कि वो हार रहा है, तो उसने विदेशी मदद हासिल करने पर फोकस करना शुरू किया.

उस समय झाऊ एनलाइ चीन के प्रीमियर थे. उन्होंने पाकिस्तान को हर मुमकिन मदद देने का वादा किया. मगर उनकी एक शर्त थी. कि पाकिस्तान अपना बहुत सारा हिस्सा गंवाकर भी लड़ाई जारी रखे. 1962 की लड़ाई के दौरान भी चीन चाहता था कि पाकिस्तान दूसरे फ्रंट से भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ दे. इस बार भी उसका यही इरादा था. वो इस जंग में कूदने को पूरी तरह से तैयार था (फोटो: Getty)
उस समय झाऊ एनलाइ चीन के प्रीमियर थे. उन्होंने पाकिस्तान को हर मुमकिन मदद देने का वादा किया. मगर उनकी एक शर्त थी. कि पाकिस्तान अपना बहुत सारा हिस्सा गंवाकर भी लड़ाई जारी रखे. 1962 की लड़ाई के दौरान भी चीन चाहता था कि पाकिस्तान दूसरे फ्रंट से भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ दे. इस बार भी उसका यही इरादा था. वो इस जंग में कूदने को पूरी तरह से तैयार था (फोटो: Getty)

बचाओ-बचाओ: पाकिस्तान भागा-भागा पहुंचा चीन के पास
युद्ध शुरू होने के चौथे दिन, यानी 10 सितंबर को अयूब खान ने चीन को एक चिट्ठी भिजवाई. उन्होंने चीन से मदद मांगी. उस समय चीन के राष्ट्रपति झाऊ एनलाई. अयूब चाहते थे कि चीन उन्हें लड़ाकू विमान मुहैया कराए. मगर अयूब को डर था कि अगर ये लड़ाकू विमान सीधे रास्ते चीन से पाकिस्तान आए, तो अमेरिका नाराज हो जाएगा. इसीलिए अयूब ने चीन से गुजारिश की. कहा कि इंडोनेशिया के रास्ते मदद भिजवाए. चीन ने जवाब दिया. कि अगर पाकिस्तान को फाइटर एयरक्राफ्ट्स चाहिए, तो चीन चौबीस घंटे के अंदर सीधे रास्ते से उन्हें पाकिस्तान तक पहुंचा सकता है. मगर पाकिस्तान नहीं माना. हारकर चीन ने इंडोनेशिया के रास्ते उस तक ये एयरक्राफ्ट्स पहुंचवाए. उधर इंडोनेशिया ने अलग ही काम किया. वो पाकिस्तान के साथ मिलकर अंडमान-निकोबार को भारत से छीनने की प्लानिंग करने लगा. ये सब चल ही रहा था कि अयूब खान भुट्टो को अपने साथ लेकर चुपके से चीन पहुंचे.

ये भी 65 के जंग के दौरान ली गई तस्वीर है. भारतीय सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी UN की तरफ से आए पर्यवेक्षकों से बात करके उन्हें बता रहे हैं कि किस तरह पाकिस्तान राजस्थान सेक्टर में भी संघर्षविराम उल्लंघन कर रहा है (फोटो: Getty)
ये भी 65 के जंग के दौरान ली गई तस्वीर है. भारतीय सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी UN की तरफ से आए पर्यवेक्षकों से बात करके उन्हें बता रहे हैं कि किस तरह पाकिस्तान राजस्थान सेक्टर में भी संघर्षविराम उल्लंघन कर रहा है (फोटो: Getty)

चीन चाहता था, पाकिस्तान हारकर भी लड़ता रहे
चीन के राष्ट्रपति ने अयूब से कहा कि पाकिस्तान को किसी भी कीमत पर लड़ाई जारी रखनी चाहिए. फिर भले ही उसका थोड़ा-बहुत नुकसान क्यों न हो जाए. चीन पाकिस्तान को अपना पूरा समर्थन देने के लिए तैयार था. मगर उसकी यही शर्त थी. कि भले ही लाहौर जैसे पाकिस्तान के कुछ शहरों पर भारत का कब्जा हो जाए, लेकिन पाकिस्तान लंबे समय तक जंग जारी रखे. असल में पाकिस्तान ने लड़ाई शुरू करने से पहले ही सोच लिया था. कि सुरक्षा परिषद हस्तक्षेप करेगा और संघर्षविराम करवा देगा. चीन की समझ में ये बात नहीं आ रही थी कि अगर संघर्षविराम का मकसद लेकर ही युद्ध लड़ना है, तो पाकिस्तान जंग लड़ ही क्यों रहा है. क्योंकि संघर्षविराम के बाद तो वैसे भी यथास्थिति हो जाती है. माने, तुम अपने यहां और हम अपने यहां. चीन चाहता था कि पाकिस्तान लंबी लड़ाई लड़े. अयूब को मालूम था कि वो ये नहीं कर सकते हैं. पाकिस्तानी सेना उनके ऊपर संघर्षविराम के रास्ते जाने का दबाव बना रही थी. पाकिस्तानी सेना के पास गोला-बारूद की कमी थी. वायु सेना और नौसेना को तो हमले से पहले भी भरोसे में नहीं लिया गया था. उन्हें तो बताया तक नहीं गया था. वो नाराज तो थे ही. साथ ही ये भी चाहते थे कि जंग जल्द से जल्द खत्म कर दी जाए.

जंग छिड़ने के बाद भारत को डर था कि पाकिस्तान दूसरे रास्तों से भी हमला कर सकता है. गुजरात और राजस्थान के सीमांत इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी गई थी. ये राजस्थान आर्म्ड कॉन्स्टेबलरी के कैमेल कॉर्प्स हैं. सीमा से जुड़े इलाकों में गश्ती कर रहे हैं (फोटो: Getty)
जंग छिड़ने के बाद भारत को डर था कि पाकिस्तान दूसरे रास्तों से भी हमला कर सकता है. गुजरात और राजस्थान के सीमांत इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी गई थी. ये राजस्थान आर्म्ड कॉन्स्टेबलरी के कैमेल कॉर्प्स हैं. सीमा से जुड़े इलाकों में गश्त कर रहे हैं (फोटो: Getty)

भारतीय सेना ने क्या सलाह दी?
20 सितंबर आते-आते तय हो गया था कि पाकिस्तान संघर्षविराम चाहता है. भारत के ऊपर भी सीजफायर का दबाव बढ़ने लगा. भारत को लगा कि जंग शुरू करने का उसका मकसद पूरा हो गया है. सेना प्रमुख ने PM शास्त्री से भी कहा कि भारतीय सेना भी अपना ज्यादातर गोला-बारूद खर्च कर चुकी है. भारत के कई टैंक भी बर्बाद हुए हैं. ऐसे में बेहतर यही होगा कि संघर्षविराम का प्रस्ताव मान लिया जाए. सेना की सलाह पर शास्त्री ने UN के दिए सीजफायर प्रपोजल पर हामी भर दी. मगर ये सच नहीं था. रेकॉर्ड्स बताते हैं कि इस समय तक भारत ने फ्रंटलाइन के लिए रिजर्व अपने गोला-बारूद का बस 14 फीसद हिस्सा ही खर्च किया था. जहां तक तोपों की बात है, तो पाकिस्तान के मुकाबले उसके पास दोगुने टैंक थे. पाकिस्तान बदतर हालत में था.

उधर पाकिस्तान में फुल नौटंकी चल रही थी. अयूब ने भुट्टो को UN भेजा. वहां भुट्टो पूरे तमाशाई अंदाज में बोले-

अगर जरूरत पड़ी, तो पाकिस्तान आने वाले हजार सालों तक ये जंग जारी रखेगा.

ये जुल्फिकार अली भुट्टो हैं. UN में बोल रहे हैं. भुट्टो ने उस दिन संयुक्त राष्ट्र में खूब तमाशा किया. वो जानते थे कि पाकिस्तान के सामने बस संघर्षविराम के अलावा कोई और चारा नहीं है. लेकिन अपने राजनैतिक करियर को चमकाने के लिए उन्होंने सीजफायर का सारा दोष अयूब के सिर मढ़ दिया (फोटो: Getty)
ये जुल्फिकार अली भुट्टो हैं. UN में बोल रहे हैं. भुट्टो ने उस दिन संयुक्त राष्ट्र में खूब तमाशा किया. वो जानते थे कि पाकिस्तान के सामने बस संघर्षविराम के अलावा कोई और चारा नहीं है. लेकिन अपने राजनैतिक करियर को चमकाने के लिए उन्होंने सीजफायर का सारा दोष अयूब के सिर मढ़ दिया (फोटो: Getty)

भुट्टो नौटंकी करने में बिजी थे
UN में ये भाषण देने के बाद भुट्टो ने एक और ड्रामा किया. उन्होंने अयूब खान को वहीं से फोन मिलाया. अयूब ने फोन पर कहा कि सीजफायर के लिए हां कह दो. इसके बाद जाकर भुट्टो ने हामी भरी. असल में भुट्टो ये दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि वो संघर्षविराम के पक्ष में नहीं हैं. कि पाकिस्तान को भारत से समझौता नहीं करना चाहिए. जबकि असलियत ये थी कि उस समय पाकिस्तान के सामने हथियार डालने के अलावा कोई और विकल्प बचा ही नहीं था. वो हथियार नहीं डालता, तो उसका और नुकसान होता. भुट्टो ये सब अच्छी तरह जानते थे. फिर उन्होंने ये तमाशा किया क्यों? क्योंकि वो इस जंग से राजनैतिक फायदा उठाने की फिराक में थे. तभी तो पाकिस्तान लौटते ही उन्होंने आंखों में आंसू भरकर ये ऐलान किया कि सीजफायर का आइडिया अयूब का था. और उनके ही कहने पर उन्होंने (यानी भुट्टो ने) UN में सीजफायर पर सहमति दी. भुट्टो बहुत चालाकी से इस सीजफायर (यानी अपमान) का सारा भार अयूब के कंधों पर डाल चुके थे. 22 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की देेख-रेख में भारत और पाकिस्तान ने संघर्षविराम का ऐलान कर दिया. तय हुआ कि 5 अगस्त तक दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के इलाके से निकल जाएंगी.

सीजफायर के वक्त तक भारत ने पाकिस्तानी जमीन के 1920 स्क्वैयर किलोमीटर इलाके को जीत लिया था. भारत की 550 स्क्वैयर जमीन पाकिस्तान के हाथ आई थी. भारत ने हाजी पीर दर्रा भी जीत लिया था. ये बड़ी जीत थी. ये पास पुंछ और उड़ी को जोड़ता है. पाकिस्तानी सेना इसी पास के रास्ते PoK से होते हुए कश्मीर घाटी तक पहुंचने की ताक में थी. भारत में आतंकियों की घुसपैठ के लिए पाकिस्तान इस पास का खूब इस्तेमाल करता है.

ये जून 1952 की तस्वीर है. अमेरिकी वायु सेना का एक पायलट एफ-86 एयरक्राफ्ट के आगे खड़ा विमान में ईंधन भरे जाने का इंतजार कर रहा है. अमेरिका ने पाकिस्तान को खूब सारे एफ-104 और एफ-86 विमान दिए थे. भारतीय वायुसेना के पास जो एयरक्राफ्ट्स थे, उनका मजाक उड़ाया था अमेरिका ने. जंग में पाकिस्तान इन्हीं अमेरिकी लड़ाकू विमानों के साथ उतरा. मगर भारत पर उसे कोई बढ़त नहीं मिली (फोटो: Getty)
ये जून 1952 की तस्वीर है. अमेरिकी वायु सेना का एक पायलट एफ-86 एयरक्राफ्ट के आगे खड़ा विमान में ईंधन भरे जाने का इंतजार कर रहा है. अमेरिका ने पाकिस्तान को खूब सारे एफ-104 और एफ-86 विमान दिए थे. भारतीय वायुसेना के पास जो एयरक्राफ्ट्स थे, उनका मजाक उड़ाया था अमेरिका ने. जंग में पाकिस्तान इन्हीं अमेरिकी लड़ाकू विमानों के साथ उतरा. मगर भारत पर उसे कोई बढ़त नहीं मिली (फोटो: Getty)

जाते-जाते
जंग शुरू होने से पहले की बात है. साल 1964. मई का महीना. भारत के रक्षा मंत्री थे यशवंतराव चव्हाण. वो पहुंचे पेंटागन, अमेरिकी रक्षा विभाग का मुख्यालय. उस समय अमेरिका के डिफेंस सेक्रटरी थे रॉबर्ट मैकनमारा. 62 की हार से सबक लेते हुए भारत कोशिश कर रहा था. कि अपनी सेनाओं को थोड़ा झाड़-पोंछ ले. उनके लिए मॉडर्न हथियार जुटाए. सो चव्हाण ने अमेरिका से कहा कि हमें एफ-104 स्टारफाइटर दे दो. ये उस दौर का सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान था. इससे पहले अमेरिका खूब सारे एफ-104 और एफ-86 फाइटर प्लेन्स पाकिस्तान को दे चुका था. समझिए कि कौड़ियों के भाव में. यहां तो भारत मोल लेने की बात कर रहा था. फिर भी अमेरिका ने बड़ा ठंडा बर्ताव किया.

महाराष्ट्र के पूर्व चीफ सेक्रटरी आर डी प्रधान की एक किताब है- 1965 वॉर: द इनसाइड स्टोरी. उसमें उन्होंने ये किस्सा कुछ यूं लिखा है-

मैकनमारा ने चव्हाण से कहा. मंत्री जी, आपकी वायु सेना किसी म्यूजियम की तरह है. मुझे नहीं लगता कि आपको अपनी एयरफोर्स में मौजूद एयरक्राफ्ट्स की वैरायटी का अंदाजा है. आप लोग अब भी हंटर, स्पिटफायर, वैम्पायर, लिब्रेटर जैसे दूसरे विश्व युद्ध के जमाने के लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल कर रहे हैं. ये सारे विंटेज हो चुके माल हैं. इनकी बस एक ही जगह है- म्यूजियम.

अमेरिका ने भारत के मुंह पर उसकी हंसी उड़ाई थी. वो भूल गया था कि हिंदुस्तान लंबी गुलामी के बाद आजाद हुआ है. नया देश है. अंग्रेज उसे लूटकर, खाली करके गए हैं. इसी अभाव में भारत को अपनी सारी चीजें पटरी पर लानी हैं. उसके सामने हथियारों से भी जरूरी जरूरत है- लोगों के पेट की भूख मिटाना. अमेरिकी रक्षा सचिव की बातों में घमंड भरा था. उन्होंने दो-टूक कहा. कि जब तक हिंदुस्तान अपने वो पुराने एयरक्राफ्ट्स नहीं हटाता, तब तक कोई आधुनिक एयरक्राफ्ट लेना उसके फायदे में नहीं. अब सुनिए इस किस्से का सबसे मजेदार हिस्सा. जिन एयरक्राफ्ट्स के बहाने अमेरिका ने भारत की हंसी उड़ाई थी, 1965 की जंग में वही लड़ाकू विमान भारत के खूब काम आए. पाकिस्तान अपने अमेरिकी एफ-86 लेकर जंग में कूदा. मगर जिन्हें अमेरिका ने कबाड़ कहा था, उन्हीं एयरक्राफ्ट्स ने एफ-86 का खूब मुकाबला किया. बल्कि उससे 20 ही साबित हुए. बल्कि तब भारत के पास एक गांट विमान हुआ करता था. छोटा सा. इस पिद्दी से एयरक्राफ्ट ने कई एफ-86 एयरक्राफ्ट्स को नीचे गिराया.


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जब पाकिस्तानी हुक्मरान स्तनों पर अफीम लगाकर बच्चे मारने वाली मां की तरह देश खत्म कर रहे थे
मीर जाफर ने हिंदुस्तान से गद्दारी की थी, उसके वंशज के साथ पाकिस्तान में गद्दारी हुई
पाकिस्तान के उस तानाशाह की कहानी, जो खुद को कुत्ता कहता था
पाकिस्तान की प्लानिंग: 28 जुलाई को भारत में घुसेंगे, 9 अगस्त को कश्मीर हमारा होगा


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