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कौन है ये आदमी, जिसकी वजह से पाकिस्तान में एकबार फिर इतना बवाल मचा हुआ है?

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जवानी के दशरथ ने बूढ़े और नेत्रहीन मां-बाप को तीर्थ कराने निकले श्रवण कुमार को भूल से तीर मार दिया था. बुढ़ापे में उन्हीं दशरथ की पुत्रवियोग में जान चली गई. घड़ी का कांटा घूमता है. वैसे ही, जैसे पाकिस्तान में एक चक्र घूम रहा है. इस बात को दो तस्वीरों से समझिए.

पहली तस्वीर-

साल 2014. इमरान ख़ान विपक्ष में थे. इमरान और उनकी पार्टी ‘तहरीक-ए-इंसाफ़’ ने उस समय वज़ीर रहे नवाज शरीफ के विरुद्ध एक जलसा निकाला. इसे नाम दिया- आज़ादी मार्च. इस ‘आज़ादी मार्च’ को आज़ादी चाहिए थी नवाज और उनकी सरकार से. इमरान का आरोप था, 2013 के चुनावों में नवाज ने गड़बड़ी की है. इमरान और उनके समर्थक लाहौर से इस्लामाबाद पहुंचे. ख़ूब हंगामा हुआ. हिंसा भी हुई. इस्लामाबाद में एक डेमोक्रेसी चौक है. वहीं जमे थे इमरान. 120 दिनों तक प्रदर्शन करते रहे वो. इस्लामाबाद रुक गया जैसे.

दूसरी तस्वीर-

साल 2019. तारीख़, 27 अक्टूबर. इमरान ख़ान वज़ीर हैं पाकिस्तान के. अब उनके विरुद्ध एक जलसा निकला है. इसका भी नाम है- आज़ादी मार्च. कराची से निकलकर 31 अक्टूबर को ये मार्च पहुंचा इस्लामाबाद. इस मार्च को शुरू किया मौलाना फज़लुर रहमान. जिनकी पार्टी है- जमात उलेमा-ए-इस्लाम (JUI-F). दिलचस्प क्या है, मालूम? इस मार्च में नवाज शरीफ़ की ‘पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज’ भी शामिल है. ये लोग इमरान का इस्तीफ़ा मांग रहे हैं. इनका भी आरोप है कि इमरान फर्ज़ी चुनाव और फर्ज़ी रिज़ल्ट के सहारे सत्ता में आए हैं.

क्या है ये आज़ादी मार्च?
इसमें JUI-F और PML-N के अलावा पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (PPP)और आवामी नैशनल पार्टी (ANP)समेत विपक्ष का एक बड़ा धड़ा शामिल है. इनके अलावा मदरसे के हज़ारों छात्र भी शामिल हैं इस रैली में. कारों और ट्रकों का लंबा कारवां चल रहा है इस मार्च में. विपक्ष का इल्ज़ाम है कि 2018 में हुए जिस चुनाव में जीतकर इमरान ख़ान प्रधानमंत्री बने, वो फर्ज़ी था. JUL-F के लीडर फज़लुर रहमान का कहना है कि समूचे विपक्ष ने 25 जुलाई, 2018 को हुए उस चुनाव का बहिष्कार किया था और फिर से चुनाव करवाए जाने की मांग की थी. इन्हीं आरोपों के साथ फज़लुर रहमान ने जुलाई 2019 में इमरान से इस्तीफ़ा देने की मांग की. कहा, या तो ख़ुद सत्ता छोड़ दें या फिर संघर्ष को तैयार रहें. फज़लुर बर्बाद अर्थव्यवस्था पर भी घेर रहे हैं इमरान को. विपक्ष ने चेतावनी दी है. कि इस्लामाबाद में तब तक धरना देंगे, जब तक कि इमरान ख़ान को हटा नहीं देते. इनकी मुख्य मांगें हैं-

1. प्रधानमंत्री इमरान खान का इस्तीफ़ा
2. फिर से चुनाव
3. सेना की तरफ़ से नो दखलंदाज़ी
4. संविधान में इस्लाम से जुड़े जो नियम-क़ायदे हैं, उनकी पूरी हिफ़ाजत
5. सारे राजनैतिक बंदियों की रिहाई

इस मार्च का कश्मीर से क्या कनेक्शन है?
ये जो प्रोटेस्ट है, उसने ख़ुद को कश्मीर के साथ सॉलिडेरिटी जताने की जिम्मेदारी भी दी है. फज़लुर रहमान बोले, यही सोचकर मार्च शुरू करने के लिए 27 अक्टूबर की तारीख़ चुनी गई. 26 अक्टूबर, 1947 को उस समय जम्मू-कश्मीर के राजा रहे हरि सिंह ने अपने रियासत का भारत में विलय कर दिया. अगले दिन, यानी 27 अक्टूबर को भारतीय सेना कश्मीर में घुसी. वहां हुए पाकिस्तानी हमले का सामना करने. पाकिस्तान इस दिन का शोक मनाता है और हर साल इस तारीख़ को ‘ब्लैक डे’ मनाता है. फज़लुर रहमान और इस ‘आज़ादी मार्च’ में उनके साथ शामिल विपक्ष का कहना है कि उनके इस प्रोटेस्ट का एक दिन कश्मीर के नाम है. कश्मीरियों से एकजुटता जताने के नाम है.

सरकार और विपक्ष में क्या डील हुई है?
‘आज़ादी मार्च’ शुरू होने से एक रोज़ पहले सरकार और विपक्ष के बीच एक समझौता हुआ. इसमें मार्च से जुड़े ‘टर्म्स ऐंड कंडीशन्स’ तय किए गए. सरकार ने कहा, जब तक प्रदर्शनकारी शांति से विरोध करेंगे, कानून नहीं तोड़ेंगे, तब तक सरकार कोई अड़चन नहीं डालेगी. प्रदर्शनकारियों ने वादा किया है कि वो इस्लामाबाद से ‘रेड ज़ोन’ में नहीं घुसेंगे. ‘रेड ज़ोन’ वो इलाका है इस्लामाबाद का, जहां संसद है. विदेशी दूतावास हैं. सरकारी और मिलिटरी इमारतें हैं. इस्लामाबाद के इतवार बाज़ार मैदान में एक इलाका तय किया गया है प्रदर्शनकारियों के लिए. यहां से तकरीबन सात किलोमीटर दूर है रेड ज़ोन. इस इलाके के पास पड़ता है पेशावर मोड़ इलाका. ख़बर है कि यहां इंटरनेट सेवा ब्लॉक कर दी गई है. ऐसी भी ख़बरें आ रही हैं कि मीडिया चैनल्स को हिदायत दी गई है कि वो इस मार्च को ब्लैक आउट करें. समझौते के बावजूद इमरान सरकार पूरी सर्तकता बरत रही है. ख़ूब सारी पुलिस फोर्स को तैनात किया गया है.

इस मार्च के मायने क्या हैं?
मौलाना फ़जलुर रहमान की पहचान इस्लामिक कट्टरपंथ से जुड़ी है. उनका कनेक्शन तालिबान से रहा है. वो खुलकर तालिबान से सपोर्ट जताते रहे हैं. इस वजह से इस पूरे मूवमेंट को एक कट्टरपंथी करेक्टर मिला है. वैसे अब तक तो ये ‘आज़ादी मार्च’ शांति से होता दिख रहा है. प्रदर्शनकारी कानून नहीं तोड़ रहे हैं. हिंसा नहीं कर रहे हैं. प्रदर्शनकारियों को इस प्रोटेस्ट की इजाज़त देकर इमरान सरकार की तरफ से भी मैच्योरिटी दिखाई गई है. मगर प्रदर्शनकारियों का प्रोग्राम लंबा दिखता है. कह रहे हैं, जब तक इस्तीफ़ा नहीं देते इमरान तब तक प्रदर्शन चलेगा. इमरान के इस्तीफ़ा देने की कोई सूरत लगती नहीं. क्योंकि तमाम विफलताओं के बावज़ूद सेना उनके साथ बनी हुई दिखती है. ऐसे में जैसे-जैसे समय आगे बढ़ेगा, फ्रस्ट्रेशन भी बढ़ सकता है. तब क्या होगा?

आगे दोनों पक्षों पर मैच्योरिटी दिखाने का दबाव होगा. पाकिस्तान पहले से ही बहुत परेशानी में है. किसी भी किस्म की अतिरिक्त अराजकता या राजनैतिक हिंसा का नया फ्रंट अफॉर्ड करने की स्थिति में नहीं हैं वो. फिलहाल जो सबसे बड़ा मेसेज निकलकर आ रहा है इस मार्च से, वो है विपक्षी एकता. PPP और PML-N जैसी धुर विरोधी पार्टियों को एक बार फिर साथ मिलकर संघर्ष करने का एक कॉज़ मिल गया है. लेकिन  क्या इस मंच पर साथ मिलने का मतलब आगे की एकजुटता भी होगी? ऐसा लगता तो नहीं वैसे. प्रदर्शनकारी लोकतंत्र के हिफाज़त की बातें कर रहे हैं. और एक मज़बूत और जिम्मेदार विपक्ष किसी भी देश की बेहतरी के लिए बेहद ज़रूरी भी है. मगर पाकिस्तान में ऐसे मूवमेंट्स के ईमानदार होने की संभावना बहुत हल्की होती है. आप नहीं जानते, कब कौन कहां से किसके तार कस रहा है. ‘डीप स्टेट’ कब किस तरफ झुक रहा है, किसे पिक कर रहा है और किसे ड्रॉप करने की राह बना रहा है, ये भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है.


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