Submit your post

Follow Us

33 साल पहले आज के दिन भारतीय सेना सर्जिकल स्ट्राइक करने गई थी, पर खूनी दाग लग गया

आज से ठीक 33 साल पहले की बात है. 13 अक्टूबर, 1987. ये दिन भारतीय सेना के सबसे नाकाम दिनों में से एक है. इसका शोक भी बहुत बड़ा है. कई लोग बेमौत मारे गए थे. अफगानिस्तान हो या इराक, इस तारीख की कड़वी यादों ने कभी हमारा पीछा नहीं छोड़ा. ये किस्सा भारतीय सेना के उस सर्जिकल स्ट्राइक का है, जिसने उसकी भद्द पिटवा दी थी. मारने गए थे, खुद मारे गए. ये ऐसा मिशन था, जिसे भारत का ‘वियतनाम चैप्टर’ कहते हैं.  इसी दिन का इतिहास था, जो आगे चलकर 1991 में राजीव गांधी की हत्या का कारण बना.


सेना का वो ऑपरेशन, जो शुरू से ही गलत हुआ

उत्तरी श्रीलंका में एक छोटा शहर है. पलाली. यहां भारतीय सेना के इंडियन पीस कीपिंग फोर्स (IPKF) का बेस था. ये जगह जाफना शहर का एक हिस्सा थी. जाफना प्रायद्वीप और श्रीलंकाई मुख्यभूमि के बीच संपर्क का ये एक अहम केंद्र था. जाफना में थी जाफना यूनिवर्सिटी. इसे LTTE (लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम) इस्तेमाल करता था. भारतीय खुफिया एजेंसियों को इनपुट मिला. 11 अक्टूबर 1987 को LTTE की टॉप लीडरशिप की एक मीटिंग है. इस मौका का फायदा उठाने की योजना बनाई गई. एक खास ऑपरेशन को अंजाम देने की प्लानिंग हुई.

जाफना यूनिवर्सिटी
जाफना यूनिवर्सिटी

लिट्टे की टॉप लीडरशिप को इकट्ठा खत्म करने की प्लानिंग थी

इरादा LTTE के टॉप कमांडोज़ को पकड़ना और उनका खात्मा करना था. गणित कहता था कि अगर लीडरशिप ही नहीं होगा, तो लिट्टे का संघर्ष कमजोर पड़ जाएगा. 10वें पैरा कमांडो ग्रुप के 120 कमांडोज़. 13वीं सिख लाइट इनफैंट्री के 60 जवान. सबको इस मिशन पर रवाना करने की योजना बनी. जवानों को हेलिकॉप्टर की मदद से जाफना यूनिवर्सिटी के पास मैदान में उतारा जाना था. जिन कमांडोज को पहले उतरना था, उन पर जिम्मेदारी थी ड्रॉप जोन तलाशने की. ताकि कमांडोज़ की अगली खेप को उतारा जा सके. इतनी सारी प्लानिंग की, लेकिन बुनियादी बात भूल गए. बिना किसी मैप के भेज दिया. ऐसा लगा कि भारतीय सेना एकतरफा योजना बना रही है. ऐसे जैसे कोई शतरंज का खिलाड़ी सोचे कि बस उसकी ही बारी है. सामने वाले की चाल ही नहीं आएगी.

इस सीक्रेट ऑपरेशन के बारे में लिट्टे को पहले से मालूम था

IPKF को लगा था कि सब मक्खन की तरह हो जाएगा. उधर, लिट्टे को इस पूरे ऑपरेशन के बारे में पहले से पता चल गया था. उन्होंने भारतीय और श्रीलंकाई सेना के रेडियो सिग्नल पकड़ लिए थे. जवाबी हमले की पूरी तैयारी कर रखी थी उसने. जाफना यूनिवर्सिटी को किले में तब्दील कर दिया गया था. इस सबकी भनक न तो भारतीय सेना को थी और न ही श्रीलंका को. रात के समय, जैसा कि तय था, 40 पैरा कमांडोज़ की टीम मैदान में उतरी. अंधेरे के कारण लिट्टे को इनके उतरने का पता नहीं चल पाया. जब ये कमांडोज़ अपनी पोजीशन लेने लगे, तब लिट्टे ने गोलीबारी शुरू कर दी. इतनी भारी गोलीबारी के बीच कमांडोज़ आगे आने वाले हेलिकॉप्टर्स के लिए ड्रॉप जोन मार्क नहीं कर पाए. जब अगला हेलिकॉप्टर कमांडोज़ की खेप को उतारने वहां पहुंचा तो पायलट्स को नीचे गोलीबारी का आभास हुआ. उन्हें ड्रॉप जोन भी नहीं मिला. नतीजन, उन्होंने कमांडोज़ को नीचे नहीं उतारा. वापस पलाली लौट गए.

लिट्टे का मुखिया प्रभाकरण
लिट्टे का मुखिया प्रभाकरण

उस रात भारत की प्लानिंग के हिसाब से कुछ नहीं हुआ

हेलिकॉप्टर की कोशिशें बंद नहीं हुईं. कुछ काम नहीं आया मगर. अगली खेप के आने तक लिट्टे ने अपनी तैयारी और बेहतर कर ली थी. अगली बार हेलिकॉप्टर आया तो भारी हथियारों और मशीनगन से हमला किया गया. हमले में पायलट घायल तो हुए, लेकिन उन्होंने कमांडोज़ की उस खेप को नीचे उतार दिया. अब IPKF के कमांडोज़ बाकी फोर्स के आने का इंतजार कर रहे थे. उधर, लिट्टे के स्नाइपर्स उन्हें चुन-चुनकर निशाना बना रहे थे. भारत के लिहाज से देखें तो कुछ भी प्लानिंग के मुताबिक नहीं हो पा रहा था. लाइट इनफैंट्री को पहुंचने में भी देर हुई. लिट्टे की गोलीबारी के कारण जितने कमांडोज़ भेजे जाने थे, उतने नहीं भेजे जा सके. योजना बिल्कुल नाकाम साबित हो रही थी. जहां 366 सिख लाइट इनफैंट्री जवानों को पहुंचना था, वहां केवल 30 ही पहुंचाए जा सके.

भारतीय जवान लिट्टे के जवाबी हमले के लिए तैयार ही नहीं थे

भारतीय पक्ष लिट्टे की ओर से की जा रही कार्रवाई के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था. इस स्थिति के लिए न कोई योजना थी, न कोई मदद थी और न ही बच निकलने का कोई रास्ता ही था. दोनों पक्षों के बीच 24 घंटे से ज्यादा समय तक लड़ाई होती रही. 6 पैरा कमांडो मारे गए. 29 इनफैंट्री जवान भी काम आ गए. उनकी लाश तक नहीं मिली. एक सिख सिपाही को LTTE ने बंधक बना लिया. 35 और जवान मारे गए. बहुत दुर्गति हुई जवानों की. लिट्टे ने हेलिकॉप्टर्स पर निशाना लगाया. 12 अक्टूबर और 13 अक्टूबर की वो दरम्यानी रात भारत के लिए बहुत भारी थी. भारतीय सेना के इतिहास में ये सबसे बड़े नुकसानों में से एक था.

30 जुलाई, 1987 को राजीव गांधी श्रीलंका गए. श्रीलंकाई सेना की तरफ से गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया. उसी वक्त एक सैनिक अचानक निकलकर बाहर आया और राइफल की बट से राजीव के सिर पर हमला कर दिया.
30 जुलाई, 1987 को राजीव गांधी श्रीलंका गए. श्रीलंकाई सेना की तरफ से गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया. उसी वक्त एक सैनिक अचानक निकलकर बाहर आया और राइफल की बट से राजीव के सिर पर हमला कर दिया.

श्रीलंका में तमिल और सिंहली आबादी लड़ने में लगी पड़ी थी

ये 80 का दशक था. श्रीलंका के हालात बहुत खराब थे. इसकी नींव में था सामुदायिक संघर्ष. श्रीलंका में बौद्ध सिंहली बहुसंख्यक थे. उनके हाथों सालों तक सताए गए तमिल अल्पसंख्यकों का गुस्सा हिंसा बनकर बाहर फूटा. 1970 के आखिरी सालों से हालात बिगड़ने लगे थे. तमिल समुदाय की ओर से मैदान में उतरे थे कई चरमपंथी गुट. हथियारबंद. सब तरह के हथियार थे इनके पास. इनको अलग तमिल देश चाहिए था. श्रीलंका के उन इलाकों को मिलाकर, जहां बहुसंख्यक तमिल आबादी रहती है. श्रीलंका की सरकार इसके लिए तैयार नहीं थी. स्वाभाविक है. कोई भी सरकार नहीं होगी. तमिलों की नाराजगी को लगातार अनदेखा किया गया. इसके बाद ऐसी स्थिति बनी कि गृहयुद्ध छिड़ गया.

श्रीलंका में तमिलों की हालत खराब थी

श्रीलंका के अल्पसंख्यक तमिल डरे हुए थे. उनको लगता था कि उनकी अलग पहचान छीन ली जाएगी. उन्हें लगता था कि बहुसंख्यक सिंहल लोग उनकी भाषा और धर्म को खत्म करना चाहते हैं. 1956 में श्रीलंका ने एक विवादित कानून पर ठप्पा लगाया. सिंहली भाषा को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया. तमिल अपनी भाषा को लेकर बेहद संवेदनशील थे. वैसे इसका एक आर्थिक पहलु भी था. सरकारी नौकरियों में तमिलों के लिए अवसर कम होने लगे थे.

भारतीय तमिलों को थी श्रीलंका के तमिलों से हमदर्दी

जून 1977. तमिलनाडु में एमजी रामचंद्रन (MGR) की सरकार बनी. तमिलनाडु को अपनी तमिल पहचान के कारण श्रीलंका के तमिलों से बड़ी सहानुभूति थी. अब भी है. बहरहाल, हुआ ये कि तमिलनाडु सरकार श्रीलंका के तमिल अलगाववादियों की मदद करने लगी. कुछ अलगाववादी संगठनों को सैन्य प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराया गया. केंद्र में जनता पार्टी की सरकार थी. इमर्जेंसी के बाद हुए चुनावों में इंदिरा गांधी हार गई थीं. जनता पार्टी की सरकार ज्यादा उम्र जी नहीं पाई. आपसी संघर्ष ने उन्हें समय से पहले ही सत्ता से बाहर कर दिया. 1980 में इंदिरा गांधी दोबारा प्रधानमंत्री बनीं. MGR तो इंदिरा के सहयोगी थे. तमिल पहचान जैसे भावुक मुद्दे पर इंदिरा उनका विरोध कैसे कर सकती थीं! हुआ ये कि केंद्र की कांग्रेस सरकार ने भी श्रीलंका के तमिल अलगाववादियों को मदद देना शुरू कर दिया. फिर धीरे-धीरे सभी गुटों को पीछे छोड़कर LTTE बन गया तमिल संघर्ष का सबसे जीवंत प्रतीक. LTTE, यानी लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम. दुनिया के सबसे खतरनाक चरमपंथी संगठनों में से एक.

एम जी रामचंद्रन
एम जी रामचंद्रन

ब्लैक जुलाई, जिसके बाद श्रीलंका में शुरू हुआ गृह युद्ध

फिर आया जुलाई 1983. इतिहास में इसे ‘ब्लैक जुलाई’ के नाम से जाना जाता है. श्रीलंका में तमिलों के खिलाफ हिंसा शुरू हुई. 24 जुलाई, 1983 से 29 जुलाई, 1983 तक. खूब दंगे हुए. आंकड़े कहते हैं. इनमें 4,000 के करीब तमिल मारे गए थे. ये हिंसा प्रतिक्रियात्मक थी. 23 जुलाई, 1983 को LTTE ने एक घातक हमला किया था. इसमें 23 श्रीलंकाई सैनिक मारे गए थे. इसके बाद श्रीलंका की सरकार और LTTE के बीच युद्ध छिड़ गया. भारत ने शांति बहाल करने की काफी कोशिश की. श्रीलंका की सरकार को मनाने की, समझाने को बहुत हाथ-पैर मारे. कोई फायदा नहीं हुआ लेकिन. स्थितियां लगातार बिगड़ती चली गईं. इस बीच 31 अक्टूबर, 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हो गई. उनके बाद उनके बेटे राजीव गांधी ने कमान संभाली.

भारत खुद कीचड़ में कूदने को बेताब था

राजीव गांधी की जिंदगी LTTE के जिक्र बिना अधूरी है. ये उनकी विदेश नीति की बहुत बड़ी नाकामयाबी थी. भारत श्रीलंकाई तमिलों को हक दिलाना चाहता था. उसे डर भी था. ऐसा भी तो हो सकता था कि श्रीलंका में आजादी हासिल करने के बाद वो भारत के तमिल इलाकों को मिलाकर ‘ग्रेटर तमिल लैंड’ बनाने की मांग करने लगें. भारत के लिए ये बहुत बुरी स्थिति होती. इस पूरे मामले में एक बात सबसे बुरी थी. न तो श्रीलंका और न ही LTTE, दोनों में से कोई भी भारत की मदद लेने को नहीं मरा जा रहा था. दोनों को लगता था कि वो खुद ही काफी हैं. कुल मिलाकर कहें, तो भारत को इस मामले से दूर रहना था. पर वो था कि उलझा पड़ा था.

1987 बहुत अहम साल साबित हुआ

फिर आई जनवरी 1987. श्रीलंका में सरकार सख्त हुई. जाफना के अंदर कर्फ्यू लगा दिया. सेना वाले कर्फ्यू के लिए एक अलग शब्द है. मार्शल लॉ. तो ये ही वहां जाफना में लागू कर दिया गया. वहां रहने वाले तमिलों का हाल बुरा था. जरूरी चीजें भी नहीं मिल पा रही थीं. भारत के तमिल बिफर पड़े. सरकार पर दबाव बना. भारत ने श्रीलंका से बहुत गुहार लगाई. कहा, इंसानियत दिखाओ. कर्फ्यू खत्म करो. श्रीलंका के राष्ट्रपति जेआर जयवर्धने राजी नहीं हुए मगर. 2 जून को भारत सरकार ने समंदर के रास्ते जाफना के लिए मदद भेजी. खाने-पीने की चीजें और बाकी जरूरी सामान. श्रीलंका ने इन जहाजों को लौटा दिया. कहा, हमारे घर का मामला है. हम खुद निपट लेंगे. राजीव गांधी ने फिर हवाई जहाज से मदद भेजी. श्रीलंकाई तमिलों, खासतौर पर लिट्टे की मदद करने के लिए भारत कोई कसर नहीं छोड़ रहा था. आखिरकार श्रीलंका को नर्म होना पड़ा. बातचीत के लिए रजामंदी देनी पड़ी.

ऑपरेशन पवन की तैयारी में भारतीय सेना
ऑपरेशन पवन की तैयारी में भारतीय सेना

भारत और श्रीलंका ने समझौता किया, लिट्टे को झटका लगा

भारत और श्रीलंका, दोनों बात करने बैठे. जुलाई 1987 में दोनों के बीच एक समझौता हुआ. इसमें एक शर्त शामिल थी. ये कि भारत लिट्टे से हथियार रखवा देगा. माने, लिट्टे हिंसा का रास्ता छोड़ देगा. लिट्टे को इस समझौते से झटका लगा. वो इसे मानने को तैयार नहीं था. मगर उसके आगे कोई और रास्ता तो था नहीं. बुझे मन से लिट्टे ने भी इस समझौते के लिए हामी भर दी. ऊपर से भले लिट्टे राजी हो गया हो, लेकिन उसने कभी इस समझौते को मंजूर नहीं किया. समझौते पर अमल हुआ. भारतीय सेना के IPKF ने जाफना के पास पलाली में अपना अड्डा बनाया. उसका काम था, सब दुरुस्त रखना. कानून का राज बनाए रखना.

लिट्टे और भारत की ‘लव स्टोरी’ आखिरकार खत्म हुई

शुरुआत में ऊपर-ऊपर से सब ठीकठाक दिख रहा था. उस समय तक भारतीय सेना भी किसी संघर्ष में नहीं उलझना चाहती थी. फिर एक घटना घटी. अक्टूबर में श्रीलंका की सेना ने लिट्टे के दो कमांडर्स को पकड़ लिया. उन्हें पलाली में ही रखा गया. श्रीलंकाई सेना और IPKF की साझा हिरासत में. श्रीलंका सरकार ने कहा कि उन कमांडोज को कोलंबो लेकर आओ. लिट्टे ने चेतावनी दी. IPKF ने लिट्टे का साथ दिया. फिर स्थिति सिर के बल उलट गई. IPKF लिट्टे के उन गिरफ्तार कमांडोज को श्रीलंका सरकार के हवाले करने के लिए राजी हो गया. लिट्टे के दोनों कमांडरों ने साइनाइड खाकर जान दे दी. और इसके साथ ही लिट्टे और IPKF का तलाक हो गया जैसे. अब दोनों एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े थे. आपस में लड़ रहे थे. इसके बाद ही शुरू हुआ था ऑपरेशन पवन. लिट्टे का सफाया करके जाफना पर कब्जा करने का मिशन. 13 अक्टूबर की जो कहानी हमने आज सुनाई, वो उसी ऑपरेशन पवन का हिस्सा थी. हालांकि बाद में IPKF जाफना लौटकर आया. 20 दिन के खूनी संघर्ष के बाद IPKF ने जाफना पर कब्जा कर लिया. लिट्टे के टॉप कमांडोज़ जंगल के रास्ते भाग गए.

इस एक रात का नाकामयाबी अब भी भारत को सालती है

राजीव गांधी की बड़ी थू-थू हुई थी इसके बाद. 1989 में वो चुनाव हार गए. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने IPKF को वापस भारत बुला लिया. मार्च 1990 तक सारे भारतीय सैनिक श्रीलंका से लौट आए. तीन साल के अंदर श्रीलंका में इंडियन आर्मी के करीब 1,200 लोग मारे गए. भारत इस नुकसान से कभी नहीं उबर पाया. आज भी जब किसी और देश की जमीन पर हो रहे सैन्य संघर्ष में सशस्त्र भूमिका निभाने की बात आती है, तो भारत को 13 अक्टूबर की वो रात याद आती है. इतना ही नहीं, इन घटनाओं के कारण ही आगे चलकर लिट्टे ने राजीव गांधी की हत्या कराई.


लद्दाख में अचानक क्या हुआ था कि चीनी सेना के साथ झड़प में जवान शहीद हो गए? देखें विडियो-

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

गंदी बात

बहू-ससुर, भाभी-देवर, पड़ोसन: सिंगल स्क्रीन से फोन की स्क्रीन तक कैसे पहुंचीं एडल्ट फ़िल्में

बहू-ससुर, भाभी-देवर, पड़ोसन: सिंगल स्क्रीन से फोन की स्क्रीन तक कैसे पहुंचीं एडल्ट फ़िल्में

जिन फिल्मों को परिवार के साथ नहीं देख सकते, वो हमारे बारे में क्या बताती हैं?

चरमसुख, चरमोत्कर्ष, ऑर्गैज़म: तेजस्वी सूर्या की बात पर हंगामा है क्यों बरपा?

चरमसुख, चरमोत्कर्ष, ऑर्गैज़म: तेजस्वी सूर्या की बात पर हंगामा है क्यों बरपा?

या इलाही ये माजरा क्या है?

राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे शख्स से बच्चे ने पूछा- मैं सबको कैसे बताऊं कि मैं गे हूं?

राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे शख्स से बच्चे ने पूछा- मैं सबको कैसे बताऊं कि मैं गे हूं?

जवाब दिल जीत लेगा.

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

उस अंधेरे में बेगम जान का लिहाफ ऐसे हिलता था, जैसे उसमें हाथी बंद हो.

PubG वाले हैं क्या?

PubG वाले हैं क्या?

जबसे वीडियो गेम्स आए हैं, तबसे ही वे पॉपुलर कल्चर का हिस्सा रहे हैं. ये सोचते हुए डर लगता है कि जो पीढ़ी आज बड़ी हो रही है, उसके नास्टैल्जिया का हिस्सा पबजी होगा.

बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

मां-बाप और टीचर बच्चों को पीट-पीट दाहिने हाथ से काम लेने के लिए मजबूर करते हैं. क्यों?

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

और बिना बैकग्राउंड देखे सेल्फी खींचकर लगाने वाली अन्य औरतें.

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

पढ़िए फिल्म 'पिंक' से दर्जन भर धांसू डायलॉग.

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

ऐसा क्या हुआ, कि सरे राह दौड़ा-दौड़ाकर उसकी हत्या की?

हिमा दास, आदि

हिमा दास, आदि

खचाखच भरे स्टेडियम में भागने वाली लड़कियां जो जीवित हैं और जो मर गईं.

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.