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जब बियर की बोतल में फूंक मारकर गाना बनाया, जिसपर हेलन झूमकर नाची

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‘पंचम’. हिंदी सिनेमा के सबसे ज़्यादा चाहे गए संगीत निर्देशक राहुल देव बर्मन को इसी प्यार भरे नाम से बुलाती है सारी दुनिया. आज वो होते तो ज़रूर किसी गाड़ी के बोनट पर पाना मारकर, किसी बोतल के ढक्कन से साइकिल का पहिया रगड़कर या किसी दोस्त की पीठ पर धप्पा देकर धुन निकाल रहे होते. 50 के दशक में पंचम जब पापा सचिन देव बर्मन की उंगली पकड़ इंडस्ट्री में आए, हिन्दी सिनेमाई म्यूजिक कागोल्डन पीरियड’ चल रहा था. और उनके स्वतंत्र संगीत निर्देशक बनते-बनते यह स्वर्णिम काल बीतने को था. सपने देखनेवाली पीढ़ी जा रही थी और आज़ादी के बाद वाले आदर्शों से मोहभंग का दौर था. लेकिन पंचम ने उसी निराशा के बीच अपने संगीत के लिए जगह बनाई, बिना किसी समझौते के.

कितने कमाल की बात है कि हमारे सिनेमाई संगीत का सबसे चमकता सितारा उस दौर में हुआ, जब ‘एंग्री यंग मैन’ ने सिनेमा में संगीत की ज़रूरत को ही दोयम दर्जे पर धकेल दिया था. सत्तर के दशक में पंचम ने नए दौर की प्रदर्शनकारी आधुनिकता को स्वर दिया. अस्सी के अंधेरे दशक में जब बॉलीवुड डिस्को और साउथ की रीमेक वाली ‘पीटी परेड’ धुनों पर थिरक रहा था, पंचम गुलज़ार के साथ मिलकर ‘इजाज़त’, ‘नमकीन’, ‘लिबास’ और ‘अंगूर’ का संगीत रच रहे थे. और जब 90s में उन्हें सिनेमाई दुनिया ने भुला दिया, वो पोस्ट लिबरलाइज़ेशन के दौर में निरंतर खोती जा रही इन्नोसेंस को ‘1942 ए लव स्टोरी’ की भोली धुनों में वापस लेकर आए.

आज उनके जीवन और संगीत से जुड़े इक्कीस चुनिंदा किस्से-कहानियां, जो बताते हैं कि क्यों पंचम ख़ास थे, क्यों सच में सिनेमाई संगीत के बॉस  थे.


1. पूरी दुनिया में ‘पंचम’ के नाम से मशहूर हुए राहुल देव बर्मन का बचपन में नाम तबलू रखा गया था. एक बार की बात है, ‘दादामुनि’ अशोक कुमार मिलने आए थे घर सचिन दा के. घर में नई संतान आई थी, उसी की बधाई देने. उन्होंने नवजात तबलू को खूब ऊंचे स्वर में रोते देखा. दादामुनि ने कहा, ये तो रोता भी पंचम स्वर में है! बस, तबलू का नाम चल निकला ‘पंचम’, उमर भर के लिए.

2. गुरुदत्त ने पंचम को 1958 में ‘गुरुदत्त फिल्म्स’ के बैनर में बनने वाली फिल्म ’राज़’ के लिए साइन किया था. सुनील दत्त और वहीदा रहमान स्टारर ’राज़’ एक सस्पेंस मिस्ट्री थी जो हॉलीवुड की फ़िल्म ’द वुमन इन व्हाइट’ से प्रेरित थी. लेकिन ’राज़’ कुछ रील्स की शूटिंग के बाद ही बंद हो गई और पंचम की इस पहली साइन्ड फ़िल्म के गीत भी इतिहास हो गये. इस फिल्म के लिये पंचम ने दो गीत कम्पोज़ किये थे. एक गीत हेमंत कुमार और गीता दत्त के स्वरों में डुएट था और एक सोलो. पंचम ने हालांकि बाद में दोनों धुनों का इस्तेमाल अलग अलग फ़िल्मों में किया. 1961 में अपनी पहली रिलीज फ़िल्म ’छोटे नवाब’ में ’घर आजा घिर आए’ और बाद में 1962 में ‘बॉम्बे टू गोआ’ में ’तुम मेरी ज़िंदगी में’ वो दोनों कम्पोजिशंस थीं जो पंचम ने असल में गुरुदत्त की ’राज़’ के लिये बनाई थीं.

3. पंचम का फिल्मों के लिए गीत रचने का एक खास तरीका था. वो अपने निर्देशकों को पहले बिठाकर फिल्म की पूरी कहानी सुनाने को कहते थे, और उसमें यह उल्लेख साथ होता था कि गानों की सिचुएशंस को तसल्ली से बताया जाए. उनका असिस्टेंट इस दौरान नोट्स लेता रहता था. इसके बाद कई बार पंचम अपने धुनों के बैंक में से इन सिचुएशंस के अनुसार दस उपयुक्त धुनें निकालते थे. फिर उन्हें चमकाकर उनमें से पांच सही धुनें छांटी जाती थीं और फिर निर्देशक को अगली बैठकी में सुनवाई जाती थीं. कई बार इसी प्रोसेस से गाने बन जाते थे, कई बार धुन खारिज हो जाती थी और फिर ज़ीरो से काम शुरु हो जाता था.

4. ये साठ के दशक की शुरुआत थी. आशा भोंसले और पंचम जब पहली बार मिले थे उस समय आशा एस्टैब्लिश प्लेबैक सिंगर थीं,और पहली शादी से उनकी दो संतानें थीं. पंचम तब तक अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ चुके थे और पिता सचिन देव बर्मन को असिस्ट किया करते थे. हालांकि आरडी ने फिल्मों में स्वतंत्र रूप से संगीत देना 1961 से ही शुरु कर दिया था, लेकिन उनकी पहली बड़ी हिट ‘तीसरी मंज़िल’ बनी, जिसमें आशा भोंसले और रफ़ी के गाए ‘ओ हसीना ज़ुल्फ़ोंवाली’ और ‘ओ मेरे सोना रे’ जैसे शानदार गीत थे.

5. आशा और पंचम ने 1980 में शादी की और उनके संगीतमय साथ ने हिन्दी सिनेमा को 80 के अंधेरे दशक में खुद पर गर्व करने के कुछ चुनिंदा मौके दिए. आशा प्यार से आर डी बर्मन को बब्स  कहती थीं. अस्सी के दशक में ‘इजाज़त’ के लिए खाली हाथ शाम आयी है, कतरा कतरा  और ‘सागर’ के लिए ओ मारिया  जैसे लोकप्रिय डुएट के साथ उन्होंने गुलज़ार के साथ मिलकर ‘दिल पड़ोसी है’ जैसा पसन्दीदा म्यूज़िक एलबम भी रचा.

6. जब मज़रूह साब ने नासिर हुसैन को पंचम का नाम ‘तीसरी मंज़िल’ के म्यूज़िक के लिये रिकमंड किया तो नासिर साब ने शर्त रखी कि हीरो शम्मी कपूर इनका म्यूजिक अप्रूव करेंगे तभी इनको मौका मिलेगा. पंचम ने ‘तीसरी मंज़िल’ के लिये कुल 40 धुनें कम्पोज़ की थीं, जिनमें से नौ शम्मी जी को सुनाईं. शम्मी कपूर ने उस सिटिंग में कम्पोज़िशंस सुनने के बाद पंचम से कहा ‘वाह क्या बात है बर्खुरदार’. पंचम उर्दू में कमज़ोर थे. उन्होंने मज़रूह से पूछा ‘क्या ये बर्खुरदार भी गाने में डालने को कह रहे हैं?’. यही ‘तीसरी मंजिल’ पंचम की पहली बड़ी हिट बनी.

7. गुलज़ार साब और पंचम की दोस्ती के किस्से तो बारिशों के पानी से सिनेमाई इतिहास में बिखरे हैं. और जब गुलज़ार इन्हें सुनाते हैं तो ये उतने ही पारदर्शी भी लगते हैं. गुलज़ार कहते हैं, ‘एक तो बेचारे की हिन्दी वीक थी, ऊपर से मेरी पोएट्री’. एक बार का किस्सा है, गुलज़ार अपनी नई फिल्म ‘इजाज़त’ के लिए नया गीत लिखकर पंचम के पास लाए. पंचम ने गीत पढ़ा और उसे हवा में उड़ाते हुए बोले, ‘हद है! इसमें गीत कहां है? ऐसे तो कल को तुम मुझे टाइम्स ऑफ इंडिया उठाकर दोगे और कहोगे कि इसकी हेडलाइन पर गाना बनाओ!’ लेकिन पंचम ने वो गाना बनाया. गीत था, ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है’.

8. इसी गीत में गुलज़ार की लिखी लाइन है, ‘एक सौ सोलह चांद की रातें, एक तुम्हारे कांधे का तिल’. इन एक सौ सोलह चांद की रातों ने बीते सालों में हिन्दी फिल्म म्यूज़िक के चाहनेवालों को बहुत परेशान किया है. ये 116 का क्या मतलब है, इसके अर्थ पर खूब डिबेट्स चली हैं तमाम सिने फोरम और चैट रूम्स में. लेकिन ‘कतरा कतरा’ किताब की भूमिका में गुलज़ार ने एक कमाल की बात बताई है. हुआ यूं कि जब दो दस्तावेजकारों ने किताब के लिए गुलज़ार के आरडी के साथ रचे गीतों को गिनना शुरु किया, तो उनकी कुल संख्या ठीक 116 निकली. गुलज़ार कहते हैं कि उन्होंने सोचा भी नहीं था, उनकी इतने साल पहले लिखी लाइन यूं भविष्य में सच्चाई बन जाएगी.

9. पंचम कहते थे गुलज़ार से, कि जब भी कोई गाना कंपोज़ करता हूं, उसके लिए सही सिंगर का चेहरा अपने आप मेरी आंखों के आगे आ जाता है. कौन सा गाना लता जी गायेंगी, कौन सा मोहम्मद रफ़ी, और कौन सा किशोर की आवाज़ पर जंचेगा. लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि धुन बनाते ही तेरा थोबड़ा मेरी आंखों के सामने आ जाता है. मैं उस धुन को तभी अलग रख देता हूं, कि ये गुलज़ार की फिल्म में काम आयेगा.

10. पंचम जीवन की रोज़मर्रा की ध्वनियों में संगीत ढूंढ लेने के लिए मशहूर थे. ‘आपकी कसम’ के गाने ‘सुनो, कहो..’ का आइडिया उन्हें चलते पंखे की क्लिक सुनकर आया था. एक बार रणधीर कपूर उनके घर पहुंचे थे, देखा पंचम अपने सहयोगियों के साथ मिलकर आधी भरी बियर की बोतलों में हवा फूंककर कुछ ध्वनियां निकालने की कोशिश कर रहे हैं. रणधीर को लगा पंचम बौरा गए हैं. उन्होंने पूछा, ‘ये हो क्या रहा है?’ तो पंचम बोले, ‘हम एक नई धुन रचने की कोशिश कर रहे हैं’. रणधीर को इस कोशिश का ठीक नतीजा तब समझ आया जब उन्होंने ‘शोले’ का म्यूज़िक सुना. पंचम उस दिन बियर की बोतलों से जो निकाल रहे थे, यही वो साउंड है जो ‘महबूबा महबूबा’ गाने की शुरुआत में सुनाई देती है.

11. एक बार की बात है, फिल्ममेकर राकेश बहल के साथ रात के खाने के बाद आइसक्रीम खाने जाते हुए पंचम मुम्बई के ट्रैफिक में फंस गए. बार-बार ब्रेक मारकर गाड़ी चल रही थी. रास्ता जाम था, लेकिन वहां भी पंचम का खुराफाती दिमाग़ काम पर था. पंचम ने ब्रेक-रन-ब्रेक का साउंड पकड़ लिया. इसी ब्रेक के साउंड से पंचम के रचे ‘घर’ के गीत ‘तेरे बिना जिया जाये ना’ का ओपनिंग म्यूज़िक निकला.

12. गुलज़ार की फिल्म ‘परिचय’ के लिए जब उन्होंने ‘मुसाफ़िर हूं यारों’ रचा, वे अपनी पहली पत्नी से तलाक की प्रक्रिया में थे और होटल के कमरे में ज़िन्दगी बिता रहे थे. बताते हैं कि पूरा गीत उन्होंने एक रात में ही रच दिया था. पंचम पर पुरस्कृत किताब लिखनेवाले अनिरुद्ध भट्टाचार्य बताते हैं कि ‘मुसाफिर हूं यारों’ का संगीत सत्यजित रे की क्लासिक ‘पाथेर पांचाली’ के टाइटल म्यूजिक से बहुत मिलता है. इसकी वजह यह भी है कि पंचम उस्ताद अली अकबर खां के पास भी संगीत सीखे हैं.

13. पंचम इंडस्ट्री में आये तो संगीतकार बनने ही थे लेकिन डायरेक्टर-एक्टर महमूद ने उन्हें उनकी दूसरी फिल्म ‘भूत बंगला’ में रॉकी का एक मज़ेदार किरदार देकर एक्टर भी बना दिया. उस फ़िल्म में महमूद और पंचम की कॉमिक टाइमिंग जबरदस्त थी. उसके बाद पंचम ने फिल्म ‘प्यार का मौसम’ में राजेन्द्र नाथ के सेक्रेटेरी की भूमिका भी निभाई. कम लोगों को पता है कि जब महमूद ने ‘पड़ोसन’ बनानी शुरु की तो सुनील दत्त वाले भोला के किरदार के लिये महमूद की पहली पसंद पंचम ही थे, और पंचम के अपोजिट सायरा बानो वाले रोल में महमूद ने साइन किया था संगीतकार अनिल बिस्वास की बेटी शिखा बिस्वास को. लेकिन जब पिताजी सचिन देव बर्मन को ये बात पता चली तो उन्होंने पंचम को फिल्मों में एक्टिंग करने से बिलकुल मना कर दिया और पंचम का एक्टिंग करियर वहीं खत्म हो गया.

14. ‘शोले’ का म्यूज़िक राजकमल स्टूडियो में रिकॉर्ड हुआ था. ये स्टूडियो मुम्बई का पहला सिक्स ट्रैक रिकॉर्डिंग सिस्टम वाला स्टूडियो था. उस समय तक सिंगर्स के अलग से रिकॉर्ड की तकनीक तो आ गई थी, लेकिन पूरा अॉर्केस्ट्रा साथ ही ट्रैक रिकॉर्ड किया करता था. साठ से सत्तर साजिन्दे साथ मिलकर संगीत बजाया करते थे और किसी एक की भी छोटी सी चूक पूरा ताना-बाना बिगाड़ सकती थी. ऐसी कोई गड़बड़ ना हो, इसकी ज़िम्मेदारी पंचम के उम्दा असिस्टेंट मनोहारी दा और बासु दा के ज़िम्मे होती थी.

15. ‘शोले’ का ही एक और किस्सा. हाल में जब ‘शोले’ को थ्रीडी रिलीज़ के लिए तैयार किया जा रहा था तो संगीतकार राजू सिंह बहुत कोशिश कर भी ये नहीं जान पाए कि ठाकुर के परिवार की हत्या वाले सीन में पंचम ने बैकग्राउंड म्यूजिक में किस इंस्ट्रूमेंट का इस्तेमाल किया है? अनूठा साउंड था वो. लेकिन इस वजह से म्यूजिक एनहांसमेंट का काम अटक गया. बहुत कोशिश के बाद पता चला कि पंचम ने ट्रक के पीछे वाले हिस्से से वो उपकरण बनवाया था और पीछे के टायर्स के बीच की मैटल रॉड और बॉल पर सारंगी के तारों से वो धुन निकाली थी.

16. ‘शोले’ के साजिन्दों के इस विशाल दल में दो ख़ास नाम भी शामिल थे. संतूर पर शिवकुमार शर्मा और बांसुरी पर हरिप्रसाद चौरसिया. दोनों ही आगे जाकर नामी शास्त्रीय संगीतकार बने और शिव-हरि के नाम से चर्चित संगीतकार जोड़ी भी बनाई. ‘शिव-हरि’ की जोड़ी ने आगे जाकर यश चोपड़ा की कई फिल्मों में यादगार म्यूजिक दिया, जिनमें ‘सिलसिला’, ‘चांदनी’, ‘लमहें’ और ‘डर’ जैसी फिल्में शामिल हैं.

17. आर डी बर्मन के संगीतकार करियर में एक ऐसी फिल्म भी शामिल है जिसमें एक भी गाना नहीं है. सिनेमा प्रेमी बॉबी सिंह ने अपनी किताब में ‘हलचल’ फिल्म का ज़िक्र किया है, कॉमिक थ्रिलर फिल्म जिसका निर्माण 1971 में हुआ था. इसमें गीत कोई नहीं था, लेकिन बैकग्राउंड म्यूजिक में आरडी बर्मन ने अपने सटीक काम से समां बांध दिया था. फिल्म का इंस्ट्रूमेंटल टाइटल ट्रैक इसका सबसे खास हिस्सा था, जिसे पूरी फिल्म में कई जगह माहौल बनाने के लिए प्रयोग किया गया.

18. अस्सी के दशक में ही पंचम ने अपने सुपरहिट संगीत के सहारे तीन स्टार पुत्रों को सिनेमा में लॉंच करने का सफ़ल प्लेटफॉर्म तैयार किया. सन्नी देओल की ‘बेताब’, संजय दत्त की ‘रॉकी’ और कुमार गौरव अपनी ‘लव स्टोरी’ से रातोंरात स्टार बन गए. अमृता सिंह का बांके सन्नी देओल के साथ ‘जब हम जवां होंगे’ गीत या ‘लव स्टोरी’ का जब ‘देखो मैंने देखा है ये एक सपना’ इंस्टैंट हिट बन गए थे उस दौर में. कुमार गौरव की सफ़लता तो अल्पजीवी साबित हुई, लेकिन उनके साथ भट्ट साब की ‘नाम’ कर संजय दत्त ने अपने अभिनय का खूब लोहा मनवाया. सन्नी और संजय दोनों लम्बी रेस के घोड़े साबित हुए.

19. पंचम ने अपने करियर में 331 हिन्दी फिल्मों में संगीत दिया. लेकिन उनका बांग्ला सिनेमा के संगीत में योगदान कम हिन्दीभाषी लोगों को पता है. पंचम के करियर में रचे 10 प्रतिशत गीत बांग्ला में रहे. इसके अलावा मज़ेदार बात ये है कि उनके कई चर्चित हिन्दी गीत जैसे अनामिका का ‘मेरी भीगी भीगी सी’, ‘प्यार का मौसम’ का ‘तुम बिन जाऊं कहां’ और ‘आंधी’ का ‘तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई शिकवा तो नहीं’ सबसे पहले बांग्ला में ही बनाए गए थे. बाद में उन धुनों का हिन्दी फिल्मों में उपयोग हुआ.

20. पंचम का फेवरिट इंस्ट्रुमेंट था हारमोनिका (माउथ ऑर्गन). पंचम ने फिल्मों में सबसे पहले हारमोनिका, 1957 में आई लेजेंडरी फ़िल्म ‘प्यासा’ के लिये बजाया था. उसके बाद पंचम ने अपनी बहुत सी फिल्मों मे तो हारमोनिका प्ले किया. दोस्ती का आलम ये था कि इसके साथ पंचम दूसरे संगीतकारों के लिये भी उनके ऑर्केस्ट्रा में माउथ अॉर्गन बजा देते थे. उन्होंने हेमंत कुमार के लिए ‘है अपना दिल तो आवारा’ में हारमोनिका बजाया, वहीं दोस्ती के रिश्ते के तहत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लिये उनके तमाम गीतों मे हारमोनिका प्ले किया. संगीतकार बने किशोर कुमार के लिये भी उन्होंने ‘दूर गगन की छांव में’ माउथ आर्गन बजाया.

21. आर डी बर्मन बेस्ट म्यूज़िक डाइरेक्टर के फिल्मफेयर अवार्ड के लिए 18 बार नॉमिनेट हुए. इनमें ‘सनम तेरी कसम’ (1983) ‘मासूम’ (1984) और ‘1942 ए लव स्टोरी’ (1995) के लिए उन्होंने पुरस्कार जीता. अफ़सोस यही था कि इनमें अंतिम, उनका ‘कमबैक अवार्ड’ लेने से पहले उनकी असमय मृत्यु हो गई. लेकिन याद रहेगा, बॉस  गए तब भी टॉप पर थे.

इस स्टोरी में मदद के लिए हमारे संगीत गुरु पवन झा का बहुत शुक्रिया


ये स्टोरी मिहिर ने की है.


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