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मोदी जी को सारे काम छोड़कर पहले इस नेता को मनाना चाहिए

नेपाल से आया मेरा दोस्त, दोस्त को खुश करो.

एक फिल्म थी- ‘आप की खातिर’. फिल्म क्या थी, कैसी थी, पता नहीं. मगर इसका एक गाना मुंहजुबानी याद है. बंबई से आया मेरा दोस्त, दोस्त को सलाम करो. बप्पी लहरी ने अपनी लहराती आवाज में गाना गाया था. लिखा था शैली शैलेंद्र ने. इसी की तर्ज पर हमने खबर की शुरुआत की. दोस्त की जगह खड्ग प्रसाद शर्मा ओली का नाम भरिए. शॉर्ट में, के पी शर्मा ओली. ओली नेपाल के प्रधानमंत्री है. तीन दिन की भारत यात्रा पर आए हैं. आने का न्योता खुद PM मोदी ने दिया था. हमने बुलाया, वो आ गए. आगे भारत अगर अपना फायदा चाहता है, तो उसे नेपाल को खुश करना होगा.

बहुत कुछ दांव पर लगा है
ओली स्टेट विजिट पर आए हैं. मतलब वो हमारे राजकीय अतिथि हैं. राष्ट्रपति भवन में ठहरेंगे. शनिवार को PM मोदी ने उनके स्वागत में भोज रखा है. इसी दिन दोनों की मुलाकात होगी. दोनों देशों का रिश्ता कहां जाएगा, इसका काफी कुछ तो इस मुलाकात में तय होगा.

नेपाल और पाकिस्तान के रिश्ते बहुत सीमित रहे हैं. दोनों SAARC के सदस्य हैं. मगर ओली के प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे पहले विदेशी मेहमान के तौर पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का नेपाल आना. बहुत बड़े बदलाव का संकेत था. नेपाल शायद ये बताने की कोशिश कर रहा था कि वो आजाद है.
नेपाल और पाकिस्तान के रिश्ते बहुत सीमित रहे हैं. दोनों SAARC के सदस्य हैं. मगर ओली के प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे पहले विदेशी मेहमान के तौर पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का नेपाल आना. बहुत बड़े बदलाव का संकेत था. नेपाल शायद ये बताने की कोशिश कर रहा था कि वो आजाद है.

PM बनने के बाद ओली ने सबसे पहले किस मेहमान को बुलाया?
5 मार्च, 2018. जगह, काठमांडू. नेपाल की राजधानी. इस दिन नेपाल में एक खास मेहमान आया. नेपाल के PM के पी शर्मा ओली एक दूसरे देश के प्रधानमंत्री के साथ हंसते-बोलते दिखे. साथ-साथ मुस्कुराती उनकी तस्वीरें नजर आईं. काठमांडू से तकरीबन सवा ग्यारह सौ किलोमीटर दूर कुछ लोग थे, जो बड़ी पैनी निगाहों से ये सब देख रहे थे. उन्हें तस्वीरें नहीं, एक बड़ी दरार दिख रही थी. उन्हें महसूस हो रहा था कि अब मुट्ठी खुल गई है. उसमें भरी रेत भी भरभरा कर निकल गई है. क्या था इन तस्वीरों में?

पाकिस्तानी PM का नेपाल पहुंचना छोटी बात नहीं थी
ये तस्वीरें थीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खाकन अब्बासी और ओली की. पाकिस्तान के PM नेपाल आए थे. ये कोई साधारण बात नहीं थी. पाकिस्तान और भारत के बीच कैसी गर्म हवा बहती है, ये कोई सीक्रेट नहीं. नेपाल और भारत कितने नजदीक थे, ये भी किससे छुपा है. दोनों की ये दोस्ती ही तो थी कि नेपाल में जब भी कोई नया प्रधानमंत्री बनता है, तो वो अपने पहले विदेशी दौरे पर भारत आता है. ओली कुछ ही दिन पहले PM बने थे. PM बनने के बाद जो पहला विदेशी राष्ट्राध्यक्ष उनके यहां पहुंचा, वो अब्बासी थे. ये बहुत बड़ा डिवेलपमेंट था. मगर इसके पीछे वजह क्या थी?

भारत के लिए बहुत नाराजगी है नेपाल में
वजह थी राष्ट्रवाद. ओली ने चुनाव के समय वादा किया था कि प्रधानमंत्री बनने के बाद वो नेपाल का दायरा बढ़ाएंगे. भारत से इतर बाकी देशों के साथ रिश्ते सुधारेंगे. नेपाल में पिछले लंबे समय से भारत के खिलाफ माहौल खराब हो रहा है. गहरी नाराजगी है वहां भारत को लेकर. इस नाराजगी के अलावा एक फिक्र ये है कि नेपाल को लगता है भारत उसपर हावी होता आया है. कि भारत के साये तले उसे पनपने का मौका नहीं मिल रहा. इस तरह से देखें, तो नेपाल एक किस्म की आजादी चाहता है भारत से. वो भारत के दोस्तों-दुश्मनों के हिसाब से अपनी विदेश नीति तय करने की परंपरा खत्म करना चाहता है. जब आप इस लकीर में आगे बढ़कर पाकिस्तानी PM को नेपाल में कदम रखते देखते हैं, तब आपको दो और दो जोड़ने का फॉर्म्युला समझ आता है.

बीते कई दशकों से नेपाल को ऐसा मजबूत लोकतांत्रिक नेता नहीं मिला. उनके पास पूरा बहुमत है. लोगों का सपोर्ट उनके साथ है. वो कड़े फैसले लेने और उसपर अमल करने की स्थिति में हैं.
बीते कई दशकों से नेपाल को ऐसा मजबूत लोकतांत्रिक नेता नहीं मिला. उनके पास पूरा बहुमत है. लोगों का सपोर्ट उनके साथ है. वो कड़े फैसले लेने और उसपर अमल करने की स्थिति में हैं. ओली ने ये जताने में कोई संकोच नहीं किया कि वो भारत को नेपाल के साये से आजाद करना चाहते हैं. उन्होंने कई बार कहा है. कि वो नेपाल का दायरा बढ़ाना चाहते हैं. विदेशी रिश्तों में भारत से आगे बढ़ना चाहते हैं.

ओली बहुत मजबूत हालत में हैं
ओली क्यों खास हैं? वो नेपाल के 25वें PM हैं. इस बात से समझिए कि पिछले 28 सालों में नेपाल को कितने सारे प्रधानमंत्री मिले हैं. अभी एक PM आया, फिर गया. कोई टिक ही नहीं पाता था. नेपाल ने लंबे समय तक राजनैतिक अस्थिरता देखी है. 1990 के बाद अब जाकर नेपाल को कोई बहुमत वाली सरकार मिली है. ओली के पास मेजॉरिटी है. आने वाले पांच सालों तक उनका प्रधानमंत्री रहना तय है. लोकतंत्र में सरकार के पास बहुमत होने का मतलब है कि वो मजबूत है. कड़े फैसले लेने की ताकत रखती है. जब देश की सरकार मजबूत हो, तो देश के तरक्की करने की उम्मीद बढ़ जाती है. जब बहुत वक्त बाद ऐसी नौबत बने, तो जनता का सरकार के प्रति समर्थन बढ़ जाता है. इसके अलावा नेपाल के सभी प्रांतों में भी अपनी-अपनी चुनी हुई स्थानीय सरकारें काम कर रही हैं. ऐसा तकरीबन 17 सालों बाद हुआ है. इस लिहाज से देखिए, तो नेपाल को लग रहा है कि बहुत दिनों बाद वो ठीक राह पर है. एक फीलिंग ये भी है वहां कि भारत से दूरी बनाकर ही चीजें बेहतर हो सकती हैं. इसीलिए वो अब भारत के हिसाब से चलने को राजी नहीं है.

नेपाल में चीन पैठ गया, तो भारत का ही नुकसान है
भारत को नेपाल के इस बदले बर्ताव से दिक्कत है. ये सच भी है कि अगर नेपाल भारत से दूर जाएगा, तो वो अपने बाकी पड़ोसियों के पास आएगा. भारत के अलावा उसका सबसे नजदीकी पड़ोसी है चीन. पाकिस्तान के ऊपर चीन की पकड़ है. अगर नेपाल के मामले में भी ऐसा ही हुआ, तो भारत को बहुत नुकसान होगा. नेपाल वैसे भी लगातार भारत से छिटकता दिख रहा है. चीन लगातार वहां भारत की जगह ले रहा है. अगर आप भारत-नेपाल के रिश्तों की गहराई जानते हैं, तो आपको समझ आएगा कि ये कितनी बड़ी बात है.

2014 में जब मोदी सत्ता में आए, तो बतौर प्रधानमंत्री पहले भूटान गए. फिर ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने ब्राजील पहुंचे. इसके बाद अगस्त में वो नेपाल गए थे. PM बनने के तीन महीनों के भीतर ही वो नेपाल पहुंचे थे.
2014 में जब मोदी सत्ता में आए, तो बतौर प्रधानमंत्री पहले भूटान गए. फिर ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने ब्राजील पहुंचे. इसके बाद अगस्त में वो नेपाल गए थे. PM बनने के तीन महीनों के भीतर ही वो नेपाल पहुंचे थे. फिर 2016 में ओली भी भारत आए थे.

भारत के दो सबसे करीबी पड़ोसी: नेपाल और भूटान
भारत का अपने दो पड़ोसियों- भूटान और नेपाल के साथ बहुत करीबी रिश्ता रहा है. दुनिया में शायद कोई भी ऐसे दो देश नहीं, जिनके बीच इतने गहरे रिश्ते हों. नेपाल के साथ रिश्तों की खास बात ये थी कि दोनों मुल्कों की संस्कृति भी करीब-करीब एक सी हैं. खान-पान, पहनावा, त्योहार. कितना कुछ है, जो इनको जोड़ता है. नेपाल के लोग तीर्थ करने भारत आते हैं. पढ़ने-नौकरी करने के लिए करोड़ों की तादाद में नेपाली यहां आते हैं. मेरे हॉस्टल में नेपाल के ढेरों बच्चे पढ़ते थे. हिंदुस्तान का ऐसा कौन सा शहर होगा, जहां नेपाली नहीं होंगे. कितने नेपाली तो पीढ़ियों से हिंदुस्तान में ही रहते हैं. भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा है. एक-दूसरे के यहां जाने के लिए वीज़ा नहीं लगता. दोनों तरफ के लोग दिन भर इधर-उधर जाते हैं.

बेटी-रोटी का रिश्ता है भारत और नेपाल में
मैं कुछ महीनों तक बिहार के रक्सौल में रही हूं. वो ‘इधर’ का आखिरी शहर है. उसके बाद एक पुल पार करिए और आप नेपाल पहुंच जाएंगे. नेपाल की नजदीकी और वहां जाने की सहूलियत ही है कि हमारे इधर एक मुहावरा बड़ा चलता है. मान लीजिए कोई ज्योतिषी किसी का हाथ देखकर कहता है कि विदेश जाने का योग है. तो सामने वाला तपाक से पूछेगा, नेपाल की बात तो नहीं कर रहे. नेपाली नागरिकों को भारत में संपत्ति खरीदने की इजाजत है. वो जिसको ‘बेटी-रोटी’ का रिश्ता कहते हैं, वैसा घरेलू सा रिश्ता है दोनों मुल्कों के बीच. इस रिश्ते में भारत हमेशा बड़े भाई का रोल प्ले करता रहा. लंबे समय तक नेपाल खुशी-खुशी छोटे भाई की तरह पीछे-पीछे चलता रहा. बात मानता रहा.

भारत द्वारा की गई नाकेबंदी के बाद जब स्थितियां बिगड़ीं, तो विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा. कि भारत नेपाल का बड़ा भाई है. वो उसके ऊपर हावी होने की कोशिश नहीं करता.
भारत द्वारा की गई नाकेबंदी के बाद जब स्थितियां बिगड़ीं, तो विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा. कि भारत नेपाल का बड़ा भाई है, न कि ‘बिग ब्रदर’. वो उसके ऊपर हावी होने की कोशिश नहीं करता. उन्होंने कहा कि भारत नेपाल की मदद करता है. उसके लिए परेशानियां नहीं खड़ी करता.

लेकिन अब नेपाल के शिकायतों की लिस्ट है
पिछले कुछ सालों में भारत और नेपाल की दोस्ती दरकी है. नेपाल की सबसे बड़ी शिकायत ये है कि भारत उसके आंतरिक मामलों में टांग अड़ाता है. उसकी राजनीति पर मनमाफिक असर डालने की कोशिश करता है. नेपाल के फायदे से ज्यादा अपने फायदे की सोचता है. मतलब, नेपाल को मोहरे की तरह इस्तेमाल करता है. नेपाल में मधेसी आंदोलन बड़ा मुद्दा रहा. तराई के इलाकों में रहनेवालों को मधेसी कहते हैं. भारत का सपोर्ट मधेसियों के साथ था. इसकी वजह ये थी कि नेपाल के ऊपरी इलाकों के मुकाबले निचले इलाकों में भारत का ज्यादा असर है. 2015 में नेपाल का नया संविधान लागू हुआ. मधेसी इसमें बदलाव चाहते थे. भारत ने नेपाल से कहा कि वो मधेसियों की सुने. इसके लिए वो सड़कों पर आ गए.  नेपाल ने भारत की बात को नजरंदाज किया. ये शायद पहला मौका था, जब नेपाल ने इस तरह भारत को टका सा जवाब दिया था. भारत ने भी इसका जवाब दिया. नेपाल की नाकेबंदी कर दी.

2015 में भारत ने सबसे बड़ी गलती कर दी
भूगोल कहिए कि कुदरत, नेपाल एक लैंड-लॉक्ड देश है. इसके तीन तरफ भारत और एक तरफ चीन है. चीन वाला हिस्सा वो है, जो तिब्बत से जुड़ा है. दुरुह हिमालयी इलाका. नेपाल को अगर किसी तीसरे देश के साथ कारोबार करना होगा, तो उसे भारत की मदद लेनी होगी. फिर चाहे वो ईंधन हो, अनाज हो, दवाएं हो, या मशीन हो. इसीलिए नेपाल का सबसे ज्यादा कारोबार भारत के ही साथ होता है. ऐसे में जब भारत ने नेपाल की आर्थिक नाकेबंदी कर दी, तो नेपाल में बड़ा संकट पैदा हो गया. जरूरी चीजों की कमी हो गई. उसी साल नेपाल में एक बड़ा भूकंप आया था. उससे हुई बर्बादी की अब तक भारपाई नहीं पाया था नेपाल. ऐसे में इस नाकेबंदी ने उसका बहुत नुकसान किया. इससे पहले भी भारत-नेपाल के रिश्तों में कई उतार-चढ़ाव आए थे. लेकिन ये एक तरह से निर्णायक साबित हुआ. नेपाल में भारत के खिलाफ जो माहौल बना, वैसा पहले कभी नहीं बना था. भारत ने कहा कि मधेसी प्रदर्शनों से अपनी सुरक्षा करने के लिए उसने ये किया. मगर जानकार कहते हैं कि ये रणनीति मधेसियों को सपोर्ट करने के लिए अपनाई गई थी. बरसों की कोशिशें इस एक घटना में धुल गईं जैसे. ऐसा लगा कि भारत ने नेपाल का भरोसा खो दिया.

2015 का भूकंप नेपाल के लिए बहुत सारी बर्बादी लेकर आया. न केवल लोग मरे, बल्कि संपत्ति का भी बहुत नुकसान हुआ. हजारों लोग बेघर हो गए.
2015 का भूकंप नेपाल के लिए बहुत सारी बर्बादी लेकर आया. न केवल लोग मरे, बल्कि संपत्ति का भी बहुत नुकसान हुआ. हजारों लोग बेघर हो गए.

उसके बाद नेपाल का मिजाज बिल्कुल बदल गया
उस समय ओली ही नेपाल के प्रधानमंत्री थे. इस घटना के बाद ओली का रवैया बदल गया. उन्हें महसूस हुआ कि भारत के साथ जाने की बजाय अगर भारत के खिलाफ जाया जाए, तो नेपाली जनता ज्यादा सपोर्ट करेगी. इसके बाद साफ दिखने लगा कि नेपाल चीन की तरफ झुक रहा है. भारत को लगा कि ओली चुनाव न जीतें, तो शायद चीजें बेहतर होंगी. इसी भ्रम में भारत ने ओली को न जीतने देने की बहुत कोशिश की. बहुत हाथ-पैर मारे कि ओली सत्ता में न आ सकें. लेकिन ये सारी कोशिशें नाकाम रहीं. इस सबका नतीजा क्या रहा? न केवल नेपाल के लोग, बल्कि एक समय में भारत के करीबी रहे ओली भी उससे दूर हो गए. ये भारतीय विदेश नीति की सबसे बड़ी हारों में से एक मानी जानी चाहिए.

नेपाल चीन की तरफ झुकाव दिखा रहा है
भारत से दूरी की वजह से जो वैक्यूम बना, उसे चीन भर रहा है. चीन की विदेश नीति बहुत आक्रामक है. इसी नीति का एक हिस्सा है छोटे-छोटे पड़ोसी देशों का अभिभावक टाइप बनना. उन्हें पैट्रनेज देना. खूब सारा निवेश करना. अंतरराष्ट्रीय मसलों में उनकी तरफदारी करना. चीन ने ओली को सपोर्ट किया था. जब ओली जीते, तो वो चीन-नेपाल सीमा पर पहुंचे. संकेत साफ था. वो चीन के साथ दोस्ती बढ़ाना ही नहीं चाहते. बल्कि चीन की तरफ झुकाव भी दिखा रहे हैं.

पिछले कुछ सालों से चीन लगातार नेपाल में निवेश कर रहा है. भूकंप के बाद भी चीन ने नेपाल को काफी पैसा दिया. खास इंफ्रास्ट्रक्चर के मद में.
पिछले कुछ सालों से चीन लगातार नेपाल में निवेश कर रहा है. भूकंप के बाद भी चीन ने नेपाल को काफी पैसा दिया. खास इंफ्रास्ट्रक्चर के मद में.

चीन जमकर पैसा बहा रहा है नेपाल में
चीन का जिक्र आने पर हमने निवेश की बात की. आपको बताते हैं कि चीन ने पिछले कुछ सालों में नेपाल के अंदर कितना इन्वेस्टमेंट किया है. 2015 में नेपाल में बड़ा भूकंप आया था. नेपाल का ढांचा क्या से क्या हो गया. घर, इमारतें, सड़कें, पुल. बहुत बर्बादी हुई. इसके बाद चीन ने नेपाल को करीब 31 अरब रुपयों की मदद दी. ये इन्फ्रास्ट्रक्चर की मद में था. नेपाल में सबसे ज्यादा FDI चीन ही कर रहा है. मार्च 2017 के नेपाल इन्वेस्टमेंट समिट में चीन की कंपनियों और निवेशकों ने नेपाल में 5 खरब से ज्यादा रुपयों का निवेश करने की बात कही. नेपाल में सबसे ज्यादा पर्यटक चीन से ही आते हैं. चीन ने वहां कई पनबिजली परियोजनाओं में भी जमकर पैसे लगाए हैं. चीन माउंट एवरेस्ट के नीचे से नेपाल तक बाहर महीने खुली रहने वाली सड़क बनाने की बात भी कर रहा है. आप किस देश की कितनी मदद कर रहे हैं और वहां कितना निवेश कर रहे हैं, इस बात से भी विदेश नीति तय होती है. भारत ने नेपाल में कई परियोजनाएं शुरू की. उनमें से कई ऐसी हैं, जो दशकों से पूरी नहीं हैं. जाहिर है, इस मामले में नेपाल को भारत से ज्यादा उम्मीद चीन में नजर आ रही है.

तराई और ऊंचाई के इलाकों में भारत के लिए अलग माहौल है
भारत की मुश्किलें एक और वजह से बढ़ी हैं. नेपाल के ऊंचाई वाले इलाकों में भारत के लिए उतना सपोर्ट नहीं है. जबकि तराई वाले इलाकों के लोग खुद को भारत के करीब पाते हैं. अब जो सिस्टम है, उसमें तराई के लोगों के लिए उतनी जगह नहीं है, क्योंकि उन्हें छोटे-छोटे प्रांतों में बांट दिया गया है. इससे देश की नीतियों में उनका प्रभाव कुछ सीमित हो गया है.

 

नेपाल को फिलहाल भारत से ज्यादा चीन में उम्मीदें दिख रही हैं. लेकिन वो भारत को भी नहीं छोड़ना चाहता. विदेश नीति ऐसे सिर के बल लुढ़कती भी नहीं है. जैसा पड़ोसियों में होता है कि मनमुटाव के बाद बोल-चाल बंद हो जाती है, वैसा पड़ोसी देशों में नहीं होता.
नेपाल को फिलहाल भारत से ज्यादा चीन में उम्मीदें दिख रही हैं. लेकिन वो भारत को भी नहीं छोड़ना चाहता. विदेश नीति ऐसे सिर के बल लुढ़कती भी नहीं है. जैसा पड़ोसियों में होता है कि मनमुटाव के बाद बोल-चाल बंद हो जाती है, वैसा पड़ोसी देशों में नहीं होता.

भारत ने नेपाल में बहुत गलतियां की हैं
भारत ने नेपाल के लिए बहुत किया है. लेकिन भारत ने नेपाल में कई गलतियां भी की हैं. भारत आने से पहले ओली ने नेपाली संसद में जो कहा, वो पढ़िए. आपको मालूम चल जाएगा कि भारत की सबसे बड़ी चूक क्या रही-

अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे रिश्ते बनाना हमारी प्राथमिकता है. आंतरिक मामलों में दखलंदाजी न की जाए, ये इन रिश्तों का आधार है. 

एक लाइन में, यही नेपाल की सबसे बड़ी शिकायत है. ओली भारत आए तो अपने देश की जनता को ये भरोसा दिला के आए कि वो भारत में ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे नेपाल के हितों पर फर्क पड़े.

भारत के लिए सबसे खराब स्थिति क्या होगी?
भूटान और नेपाल की अहमियत नक्शे पर उनकी लोकेशन की वजह से है. इनकी सीमाएं भारत से जुड़ी हैं. चीन और भारत के बीच ये एक बफर ज़ोन का काम करते हैं. माने दो प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच ऐसे देश, जिनके होने से टकराव टला रहता है. अगर भारत इन दो देशों को भरोसे में रखता है, तो चीन का असर कम होगा. आप देखिए कि चीन पाकिस्तान में क्या कर रहा है. उसने ग्वादर बंदरगाह बनाया. चाइना-पाकिस्तान इकॉनमिक कॉरिडोर (CPEC)PoK से होकर गुजरती है. ये सिर्फ एक सड़क नहीं है. बल्कि इसकी वजह से चीन भारत के कितने करीब पहुंच गया है. अगर नेपाल में भी ऐसा ही हुआ, तो भारत उस तरफ से भी कमजोर होगा. जिसको अंग्रेजी में ‘वलनरेबल’ कहते हैं, वो ही हालत होगी भारत की. अपने ‘इमिडिएट’ पड़ोसियों, यानी जिसके साथ हमारी सीमा लगती है, उनके बीच भारत अकेला होगा. अलग-थलग होगा. और चीन इन सब जगहों पर पैठ बना चुका होगा.

नेपाल को भारत की जितनी जरूरत है, उससे कहीं ज्यादा जरूरत नेपाल को भारत की है.
नेपाल को भारत की जितनी जरूरत है, उससे कहीं ज्यादा जरूरत नेपाल को भारत की है. इस बात को भारत भी अच्छी तरह समझता है. भारत चाहेगा कि नेपाल के पुराने गिले-शिकवे दूर हों और उसका भरोसा वापस हासिल किया जा सके.

भारत को नेपाल की ज्यादा जरूरत है
ऐसा नहीं कि नेपाल को भारत की जरूरत नहीं है. वो अपने भूगोल से लाचार है और आने वाले कुछ समय तक रहेगा. शायद इसीलिए ओली ने परंपरा निभाई और प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने पहले विदेशी दौरे पर भारत आए. नेपाल भारत से बिल्कुल नहीं बिगाड़ना चाहता. रिश्तों में, इतिहास में और दूरी में, हर लिहाज से भारत उसके सबसे नजदीक है. मगर नेपाल को भारत की जितनी जरूरत है, उससे कहीं ज्यादा जरूरत भारत को नेपाल की है. शायद इसीलिए PM मोदी ने ओली को भारत आने का न्योता दिया.

भारत जानता है कि नेपाल का भरोसा जीतना बहुत जरूरी है. और ये तभी हो सकता है, जब भारत नेपाल से ‘इंडिया फर्स्ट’ सोचने की उम्मीदों को कुछ लगाम दे. दुनियाभर में दक्षिणपंथ उठान पर है. तो इसमें अचरज नहीं कि नेपाल में भी ‘संप्रभुता’ और ‘राष्ट्रवाद’ कीवर्ड बन गए हैं. हिंदुस्तान के चश्मे से नेपाल में सिर उठाते ये मूल्य कुछ बेचैनी पैदा करने वाले लग सकते हैं. लेकिन इनके बावजूद मिल्ली का स्कोप अभी बाकी है. बस इतना ध्यान रखा जाए कि मामला अब नहीं, तो फिर कभी नहीं जैसा है. ओली के इस दौरे पर जो भी होगा, वो नेपाल-भारत संबंधों के मामले में ‘आर या पार’ वाले नतीजे पैदा कर सकता है.


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