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दिग्विजय के मंत्री को माओवादियों ने कुल्हाड़ी से मारा डाला, अब बेटी विधानसभा उपाध्यक्ष है

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आमतौर पर विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के लिए सदन में वोटिंग नहीं होती. परंपरा है कि अध्यक्ष जीतने वाली पार्टी से बनता है और उपाध्यक्ष सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी से. इस हिसाब से मध्यप्रदेश में विधानसभा उपाध्यक्ष बनना था भाजपा से. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उपाध्यक्ष बनीं लांजी (बालाघाट) से कांग्रेस विधायक हिना कावरे. ऐसा क्यों हुआ, इसकी कहानी थोड़ी लंबी है. वो बात में बताएंगे. पहले आप जानिए हिना और उनके पिता लिखिराम कावरे के बारे में. लिखिराम कावरे – दिग्विजय सिंह के वो मंत्री, जिन्हें माओवादियों ने घर से निकालकर कुल्हाड़ी से काट डाला था.

20 साल पहले का वो दिन

बालाघाट की सीमा छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव और महाराष्ट्र के गोंदिया से लगती है. दोनों जगहें माओवादी हिंसा से प्रभावित हैं. आज भले बालाघाट को माओवादी महज़ ‘कूलिंग ज़ोन’ या आरामगाह की तरह इस्तेमाल करें लेकिन 90 के दशक में उनका यहां बड़ा ज़ोर था. एक बाज़ार लूटने से शुरू हुई माओवादी घटनाएं धीरे-धीरे बढ़ीं.

इसी बालाघाट के एक गांव में रहते थे कांग्रेस नेता लखीराम कावरे. दिग्विजय सिंह ने 1998 में जब दूसरी बार सरकार बनाई तो लखीराम कावरे परिवहन मंत्री बने. 15 दिसंबर, 1999 का दिन. हिना कावरे की उम्र महज़ 13 साल थी. लखीराम कावरे गांव में अपने घर पर थे. एकाएक उनके घर को माओवादियों ने घेर लिया. कावरे को घर से बाहर निकालकर कुल्हाड़ी से काट दिया गया.

बालाघाट में माओवादी आंदोलन की शुरुआत लूटपाट से हुई. लेकिन वक्त के साथ माओवादियों ने बड़ी वारदातें करना शुरू कर दीं क्योंकि उनके पनपने के लिए यहां माकूल परिस्थितियां थीं.
बालाघाट में माओवादी आंदोलन की शुरुआत लूटपाट से हुई. लेकिन वक्त के साथ माओवादियों ने बड़ी वारदातें करना शुरू कर दीं क्योंकि उनके पनपने के लिए यहां माकूल परिस्थितियां थीं. (सांकेतिक फोटो, रॉयटर्स)

इस नृशंस हत्या के बाद पूरा मध्यप्रदेश हिल गया. राज्य सरकार ने तीन दिन का शोक घोषित किया और हत्यारों की खोज के लिए मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में एकसाथ छापामार अभियान शुरू किया गया. लेकिन 16 साल तक न पुलिस और न ही सीबीआई ये मालूम कर पाए कि कावरे को किसने मारा और आखिर क्यों.

श्याम, महेश और मुरली की जान की कीमत कावरे को चुकानी पड़ी

2015 में 35 लाख का इनाम माओवादी दिलीप गुहा पुलिस के हाथ लगा. इससे हुई पूछताछ में कावरे की मौत का राज़ खुला. गुहा के मुताबिक कावरे की हत्या की प्लानिंग आंध्रप्रदेश में हुई थी. श्याम, महेश और मुरली की हत्या के जवाब में. 2 दिसंबर, 1999 को माओवादी संगठन पीपल्स वार ग्रुप (PWG) के सेंट्रल कमिटी सेक्रेटेरियट के मेंबर नल्ला आदि रेड्डी (उर्फ श्याम), येर्राम रेड्डी संतोष (उर्फ महेश) और सीलम नरेश (उर्फ मुरली) आंध्रप्रदेश में करीमनगर के जंगलों में मारे गए. पुलिस का कहना था कि इनकी मौत एक एनकाउंटर में हुई है. लेकिन पीपल्स वार ग्रुप के जनरल सेक्रेटरी मुपल्ला लक्ष्मणा राव (उर्फ गणपति) का दावा था कि इन तीनों को पहले बैंगलोर से गिरफ्तार किया गया और फिर हेलिकॉप्टर से आंध्र के जंगलों में ले जाया गया. वहां उन्हें टॉर्चर किया गया और फिर गोली मार दी गई. ये बात भी चली कि इन तीनों को ज़हर दिया गया था.

गुहा ने दावा कि इन तीन हत्याओं के बाद PWG ने बदले के लिए नेताओं, मंत्रियों को निशाना बनाने की प्लानिंग की. कावरे की हत्या में मलाजखंड दलम (मलाजखंड बालाघाट में ही है और तांराबे की खदानों के लिए विख्यात है) के 12 और स्पेशल गुरिल्ला स्कॉड (एसजीएस) के 15 माओवादी शामिल हुए थे. गुहा ने ये भी कहा कि जिस समय कावरे की हत्या हुई थी, वह दलम का सामान्य सदस्य था और कोरची दलम के वरिष्ठ सदस्य विजय दादा की सुरक्षा में तैनात था. इसलिए उसे कावरे की हत्या में शामिल नहीं किया गया.

झीरम घाटी में हुआ माओवादी हमला हाल के दिनों में राजनेताओं पर हुआ सबसे बड़ा हमला था. (सांकेतिक फोटो)
झीरम घाटी में हुआ माओवादी हमला हाल के दिनों में राजनेताओं पर हुआ सबसे बड़ा हमला था. (सांकेतिक फोटो)

गणपति ने कहा था, हम खून का कर्ज़ हमेशा उतारते हैं

ऊपर लिखी बातें गुहा से हुई पूछताछ के बाद मीडिया में सामने आई थीं. लेकिन थोड़ा खोजने पर हमें 1 फरवरी, 2000 को रीडिफ डॉट कॉम पर छपा एक इंटरव्यू मिला. ये गणपति का इंटरव्यू था, जो पत्रकार चिंदू श्रीधरन ने ईमेल के ज़रिए किया था. श्रीधरन ने जब गणपति से महेश, श्याम और मुरली की मौत के बारे में पूछा था, तो गणपति ने इन्हें झूठे एनकाउंटर में मारा गया बताते हुए कहा था,

”…इन मौतों का बदला लिया जाएगा. हम खून का कर्ज़ हमेशा उतारते हैं…”

इस इंटरव्यू को पढ़कर ऐसा लगाता है कि लिखीराम कावरे राज्य और माओवादियों की खूनी लड़ाई में वो बन गए, जिसे दोनों पक्ष कोलैट्रल डैमेज कहकर बच लेते हैं. कावरे गृहमंत्री नहीं थे. उनके आदेश पर माओवादियों पर गोली नहीं चल रही थी. वो बेमौत मारे गए. ये समझ से परे है कि एक मंत्री को घेरकर मारने से माओवादी आंदोलन, जिसे पीपल्स वार जैसे बड़े-बड़े नाम दिए जाते हैं, उसे क्या हासिल हुआ होगा.

आज भी बालाघाट सरकारी रिकॉर्ड में मध्यप्रदेश का अकेला नक्सल प्रभावित ज़िला है. मध्यप्रदेश पुलिस और केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF)ने माओवादियों से लड़ने के लिए जो खास यूनिट्स बनाई हैं, वो यहां के जंगलों में तैनात हैं. 2018 में हुए मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव कवर करते हुए ‘दी लल्लनटॉप’ ने बालाघाट का भी दौरा किया था. वहां हमने देखे थे वो जंगल जहां बसे गावों में 60 सशस्त्र जवान तैनात थे, लेकिन सरकारी डॉक्टर बुलाने से एक नहीं आता था. हमने वहां वो लड़के भी देखे, जो सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे थे, और कहते थे कि सरकार रोज़गार वाला लोन बताती है लेकिन देती नहीं. चाहें तो बैंक जाकर पूछ लो कि मुख्यमंत्री गैरंटर बनने को तैयार है, लोन दोगे क्या. मध्यप्रदेश में जो सरकार बनी है, उसकी ज़िम्मेदारी है कि वो ये हालात बदले.

कमलनाथ ने कहा था, हिना मेरी बेटी है

लिखिराम की कमलनाथ से बड़ी नज़दीकी थी. उनके जाने के बाद कमलनाथ ने कहा था कि हिना उनकी बेटी है. कमलनाथ आज मध्यप्रदेश के सीएम हैं और हिना भी विधानसभा में हैं. तो ये लाज़मी था कि कमलनाथ हिना के लिए कुछ करें. हिना को डिप्टी स्पीकर पद के लिए चुना गया, इसकी एक वजह ये भी है.

माओवादी आंदोलन का जवाब सरकार ने ताकत से दिया. इसके नतीजे में खून ही खून बहा है. (फोटोःरॉयटर्स)
माओवादी आंदोलन का जवाब सरकार ने ताकत से दिया. इसके नतीजे में खून ही खून बहा है. (फोटोःरॉयटर्स)

भाजपा के चलते विधानसभा उपाध्यक्ष बनीं हिना

हिना कावरे इस बार लांजी से विधायक हैं. उन्होंने भाजपा के रमेश भतेरे को 19 हज़ार वोट से हराया था. हिना को हाल में ही कांग्रेस का राष्ट्रीय प्रवक्ता भी बनाया गया था. चूंकि वो लगातार दूसरी बार विधायक बनी हैं और पिता की विरासत थी, तो उनका नाम कमलनाथ कैबिनेट के संभावितों में था. लेकिन आखिरी लिस्ट में उनका नाम नहीं आया. हिना की किस्मत खुली भाजपा की वजह से. हमने बताया था कि परंपरा के हिसाब से विधानसभा अध्यक्ष बनना था कांग्रेस से और उपाध्यक्ष बनना था भाजपा से. लेकिन सरकार बनाने से ज़रा सा चूक गई भाजपा कांग्रेस के लिए कुछ भी आसान बनाने के पक्ष में नहीं थी. 8 जनवरी, 2019 को अध्यक्ष चुनने के लिए संसदीय कार्य मंत्री डॉ गोविन्द सिंह ने कांग्रेस विधायक नर्मदा प्रसाद प्रजापति के नाम का प्रस्ताव पेश किया. इसके बाद चार और विधायकों ने इसका समर्थन किया. भाजपा ने मांग कर दी कि वो कुंवर विजय शाह के नाम का प्रस्ताव करना चाहती है.

लेकिन प्रोटेम स्पीकर दीपक सक्सेना ने कहा कि वो पहले आए प्रस्तावों की जांच पहले करेंगे. उसके बाद भाजपा के प्रस्ताव को स्वीकार करेंगे. इसके बाद भाजपा के विधायकों ने हंगामा किया. तीन बार दस-दस मिनिट के लिए सदन स्थगित किया गया. जब कार्यवाही चौथी बार शुरू हुई तो शिवराज सिंह चौहान खड़े हुए और कह दिया भाजपा वॉकआउट करेगी. इसके बाद भाजपा विधायकों ने विधानसभा से राजभवन तक पैदल मार्च निकाला. इधर सदन चलता रहा. स्पीकर के पद के लिए वोटिंग हुई और एनपी प्रजापति 120 वोट के साथ मध्यप्रदेश की 15वीं विधानसभा के स्पीकर चुन लिए गए.

इससे पहले मध्यप्रदेश विधानसभा के सारे स्पीकर आम सहमति से चुने गए थे, एक बार को छोड़कर. सिर्फ 1967 एक ऐसा साल था जब स्पीकर के पद के लिए वोटिंग की नौबत आई थी. स्पीकर पद के लिए हुए ड्रामे ने 52 साल की परंपरा तोड़ दी.

एनपी प्रजापति गोटेगांव से विधायक हैं. (फोटोःकमलनाथ, फेसबुक)
एनपी प्रजापति गोटेगांव से विधायक हैं. (फोटोःकमलनाथ, फेसबुक)

फिर भाजपा की शुरू की परंपरा कांग्रेस ने तोड़ी

1990 में भाजपा के सीएम सुंदरलाल पटवा ने डिप्टी स्पीकर का पद विपक्ष को देने की शुरुआत की. पटवा के बाद जितने सीएम आए, उन्होंने विधानसभा में इस परंपरा को जारी रखा. लेकिन कांग्रेस ने मन बना लिया था कि वो भी डिप्टी स्पीकर पद के लिए भाजपा को छकाएगी. इसलिए विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने डिप्टी स्पीकर के चुनाव में प्रोटेम स्पीकर का तरीका ही अपनाया. 9 तारीख को कांग्रेस की ओर से हिना कांवरे और भाजपा की ओर से जगदीश देवड़ा ने नामांकन करवाया. इससे तय हो गया कि डिप्टी स्पीकर के लिए नौबत चुनाव तक जाएगी.

माने भाजपा के पास नंबर गेम खेलने का एक और मौका. लेकिन कांग्रेस ने ये मौका भाजपा को दिया नहीं. 10 जनवरी को जब सदन की कार्यवाही शुरू हुई तो स्पीकर ने कह दिया कि पहले हिना के पक्ष में आए चार प्रस्तावों की जांच होगी. भाजपा के जगदीश देवड़ा के पक्ष में दिया गया प्रस्ताव पांचवां था. खूब हंगामा हुआ. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसके बाद हिना कावरे को डिप्टी स्पीकर के पद पर निर्वाचित घोषित कर दिया.

भाजपा अब डिप्टी स्पीकर के चुनाव के खिलाफ हाईकोर्ट याचिका से लेकर स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने तक की बातें कर रही है. पार्टी ने राष्ट्रपति से मिलने का समय भी मांगा है.

नंदकुमार पटेल और उमेश पटेल. नंदकुमार और बड़े भाई के जाने ने उमेश की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स, फेसबुक)
नंदकुमार पटेल और उमेश पटेल. नंदकुमार और बड़े भाई के जाने ने उमेश की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स, फेसबुक)

नंदकुमार पटेल का बेटा भी बना है मंत्री

हना कावरे की बात हुई है तो साथ में उमेश पटेल का ज़िक्र भी होगा. झीरम घाटी में हुए माओवादी हमले में तब के छत्तीसगढ़ कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और उनके बड़े बेटे की हत्या हो गई थी. तब नंदकुमार पटेल की विरासत संभालने आगे आए उमेश पटेल. उमेश ने आईटी में इजीनियरिंग की थी, और एक कॉर्पोरेट कंपनी में काम कर रहे थे. पिता और बड़े भाई की मौत के बाद उन्होंने 2013 में खरसिया से चुनाव लड़ा और जीता. उमेश साल 2013 से 14 के बीच कांग्रेस के प्रदेश महासचिव भी रहे. 2018 में उन्होंने पूर्व आईएएस ओपी चौधरी को खरसिया से हराया.

इस बार छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनी है तो उमेश को कैबिनेट में जगह मिली है. 35 साल के उमेश इस बार बने छत्तीसगढ़ कैबिनेट में सबसे युवा मंत्री हैं. उनके पास उच्च शिक्षा, तकनीकि शिक्षा और रोज़गार, कौशल विकास, विज्ञान और तकनीक, कार्मिक नीति, खेल और युवा मामले – इतने विभागों का प्रभार है.


 

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