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इस दमघोंटू घटना के बाद दुनिया के कई नेता पुतिन के फैन हो गए थे

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जंग जीतने के सैकड़ों तरीके होते हैं. कोई गलत. कोई बहुत गलत. कोई बहुत बहुत गलत. इतने तरीके होते हैं, मगर कोई सही तरीका नहीं होता. जीतने वाले को चुनना होता है कि वो कितना गलत कर सकता है. कि वो जीतने के लिए कितनी ग्लानि लेकर जी सकता है. 

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन. रूसी खुफिया एजेंसी KGB में काम करते थे. 1998 में तत्कालीन राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन के साथ जुड़े. 1999 में प्रधानमंत्री बन गए. फिर राष्ट्रपति बने. फिर प्रधानमंत्री. फिर राष्ट्रपति. साल गुजरे, कैलेंडर बदले. पुतिन अब भी बने हुए हैं. पुतिन के जिक्र से दिमाग में कुछ खास तस्वीरें उभरती हैं. बर्फ से भरी झील में नंगे बदन तैरते पुतिन. बाघ के साथ तस्वीरें खिंचवाते पुतिन. हाथ में बंदूक थामे शिकार को जा रहे पुतिन. ऐसी कई तस्वीरें हैं. तस्वीरें क्या, उनकी हस्ती के कई टुकड़े समझ लीजिए. इन टुकड़ों में कितना भी अंतर हो, एक बात कॉमन है. सख्त. बेहद सख्त मिजाज इंसान. जो ठान लिया, वो कर दिया टाइप्स. किसी की परवाह न करने वाला. अमेरिका और यूरोप को ठेंगा दिखाकर आगे बढ़ जाने वाला. नो नॉनसेंस टाइप्स. इस इमेज के बनने की एक लंबी कहानी है. ये कहानी 12 साल पहले की एक रात शुरू हुई थी. बहुत ठंडी थी वो रात. इसे खत्म होने में चार दिन लग गए. और जब ये खत्म हुई, तो वो अंत और भी सर्द था.


 

थियेटर के अंदर से बेहोश लोगों को बाहर लेकर आते सुरक्षाकर्मी.
थियेटर के अंदर से बेहोश लोगों को बाहर लेकर आते सुरक्षाकर्मी.

जब भी दुनिया में कहीं हॉस्टेज क्राइसिस होता है, इसका जिक्र होता है
23 अक्टूबर, 2002. शहर: मॉस्को. रूस की राजधानी. जगह: डुबरोवका थियेटर. नॉर्ड-ओस्ट नाम का एक म्यूजिकल प्ले था. संगीत नाटिका टाइप. सारी टिकटें बिक चुकी थीं. वेनियामिन कावेरिन का एक उपन्यास है. द टू कैप्टन्स. इसी पर आधारित था ये नाटक. दूसरे विश्व युद्ध में मारे गए रूसी सैनिकों की बहादुरी भी है इसमें. रात के तकरीबन 9 बजे होंगे. मंच पर नाटक का दूसरा हिस्सा पेश किया जा रहा था. तभी एक बस थियेटर के अंदर घुस आई. बस के अंदर थे नकाबपोश. काले और वो चीता प्रिंट वाले कपड़ों में. 40-50 औरत और मर्द. खूब सारे हथियार लेकर आए थे. हवा में दनादन गोलियां दागते हुए सारे के सारे थियेटर के मेन हॉल में घुस गए. उस वक्त वहां करीब 850 से 900 लोग मौजूद थे. दर्शक, नाटक के कलाकार और थियेटर के कर्मचारी. सबको मिलाकर. नकाबपोश हमलावरों ने सबको बंधक बना लिया. ये घटना ‘मॉस्को थियेटर हॉस्टेज क्राइसिस’ के नाम से मशहूर है.

पहले अंदर जहरीली गैस छोड़ी गई और फिर कमांडोज को अंदर भेजा गया.
पहले अंदर जहरीली गैस छोड़ी गई और फिर कमांडोज को अंदर भेजा गया.

चेचन्या विद्रोहियों के एक गुट ने इसे अंजाम दिया
दुनियाभर में बंधक बनाए जाने की कई घटनाएं हुई हैं. भारत में भी हुई हैं. कंधार प्लेन हाइजैक तो याद होगा. कैसे सारे यात्रियों को बंधक बनाकर आतंकवादी को छुड़वा लिया था. हॉस्टेज बनाने का मकसद ही यही होता है. अपनी मांग मनवाना. तो ये नकाबपोश भी ऐसा ही इरादा साथ लाए थे. सारे के सारे चेचन्या के थे. चेचन विद्रोही. इनका सरगना था मोवसार बारायेव. चेचन्या में एक अलगाववादी कोशिश चल रही थी. इसके पीछे थे इस्लामिक कट्टरपंथी. इनसे ही मिला हुआ था ये गुट. इनकी मांगें साफ थीं. चाहते थे कि रूस चेचन्या से अपनी फौज हटा ले. उन्होंने कहा कि रूस तत्काल चेचन्या से अपनी फौजें हटाने का एलान करे. वर्ना वे बंधकों को मार डालेंगे. विद्रोहियों ने रूसी सरकार को एक हफ्ते का वक्त दिया. कहा, ये डेडलाइन है. इतने समय में मांगें नहीं मानी, तो बंधकों को मारना शुरू कर देंगे. विद्रोहियों ने अपने शरीर पर विस्फोटक बांधे हुए थे. पूरे थियेटर में विस्फोटक लगा दिया था. उन्होंने बंधकों को अपने घरवालों को फोन करने की इजाजत दी.

ये 2003 की तस्वीर है. मॉस्को हॉस्टेज क्राइसिस में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे पुतिन.
ये 2003 की तस्वीर है. मॉस्को हॉस्टेज क्राइसिस में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे पुतिन.

लंबे समय से आजादी के लिए संघर्ष कर रहा था चेचन्या
रूस ने अगस्त 1999 में चेचन्या पर चढ़ाई कर दी थी. इसको दूसरा चेचन युद्ध भी कहते हैं. यहीं से चेचन्या के साथ चल रहे संघर्ष में पुतिन की सीरियस एंट्री हुई थी. उत्तरी कॉसकस में एक इलाका है चेचन्या. यहां लड़ाई का लंबा अतीत रहा है. विदेशी ताकतों के खिलाफ लड़ने का. 15वीं सदी में ओटोमन साम्राज्य से लड़े. फिर रूसी साम्राज्य ने कॉसकस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की सोची. इसी चक्कर में 1817 में जंग भी शुरू हुई. कॉसकस वॉर. फिर रूस और चेचन्या के बीच संघर्ष चलता रहा. पुतिन अक्सर कहा करते थे. आतंकवाद और आतंकवादियों को किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं करेंगे. कहते थे, आतंकवाद के दांत खट्टे कर देंगे. इन बातों से पुतिन की खूब इमेज बिल्डिंग हुई थी. अब चेचन्या के विद्रोही मॉस्को पहुंच गए थे. पुतिन और रूसी सरकार को जवाब देने. उनके हौसले पस्त कर अपनी मांग मनवाने की. थियेटर के अंदर लोगों को बंधक बनाने का मकसद भी ये ही था.

पुतिन के आने के बाद से रूस की ताकत का ग्राफ लगातार ऊपर गया है.
पुतिन के आने के बाद से रूस की ताकत का ग्राफ लगातार ऊपर गया है.

क्या कह रहे थे विद्रोही हमलावर

विद्रोही हमलावरों ने एक वीडियो भी बनाया था. इसमें रूसी सरकार के लिए संदेश दिया गया था. मीडिया में आई थी इसकी खबर. विद्रोहियों ने कहा था:

हर मुल्क को अपनी किस्मत तय करने का हक है. रूस ने चेचन्या के लोगों से ये हक छीन लिया है. हम लोग आज यहां अपने ये हक लेने आए हैं. ये हक अल्लाह ने दिया है हमें. ऐसे ही जैसे उन्होंने बाकी मुल्कों को खुद अपनी तकदीर तय करने का हक दिया है. रूसी आक्रमणकारियों ने हमारी जमीन को मासूम बच्चों के खून से रंग दिया है. हम लंबे समय से न्याय का इंतजार कर रहे हैं. हम जो कर रहे हैं, वो चेचन्या की आजादी के लिए है. कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम कहां मरते हैं. चेचन्या में या कहीं और. हमने यहां मॉस्को में मरने का फैसला किया है. अपने साथ-साथ हम हजारों गुनहगारों की जान भी लेकर जाएंगे. अगर हम मरते हैं, तो और लोग आएंगे हमारी जगह लड़ने. हमारे लोग अपने देश को आजाद कराने के लिए बलिदान देंगे. हमारे देशप्रेमियों ने अपनी जान दी है. लोग उन्हें आतंकवादी और अपराधी कहते हैं मगर. ये सच नहीं है लेकिन. सच ये है कि रूस असली गुनहगार है. वो कर रहा है गुनाह.

एक समय था जब सोवियत संघ के पतन के बाद रूस अपनी ताकत और असर, दोनों खोता जा रहा था. फिर एंट्री हुई पुतिन की और हालात लगातार बेहतर होते गए.
एक समय था जब सोवियत संघ के पतन के बाद रूस अपनी ताकत और असर, दोनों खोता जा रहा था. फिर एंट्री हुई पुतिन की और हालात लगातार बेहतर होते गए.

23 अक्टूबर से 26 अक्टूबर तक चला ये मामला
विद्रोहियों ने करीब 150-200 बंधकों को रिहा कर दिया. इनमें बच्चे थे. औरतें थीं. मुसलमान थे. कुछ विदेशी नागरिक भी थे. 23 अक्टूबर से शुरू हुआ ये मामला 26 अक्टूबर पर पहुंच गया. बात फिर भी नहीं बनी. रूसी सरकार ने विद्रोहियों के सामने प्रस्ताव रखा. सुरक्षित किसी और देश को निकल जाओ. विद्रोहियों ने इसे ठुकरा दिया. विद्रोहियों की मांग मानने को रूसी सरकार तैयार नहीं थी. अगर उनकी मांग मान ली जाती, तो पुतिन की सख्त इमेज का क्या होता! पुतिन कहते थे कि आतंकियों के सामने झुक नहीं सकते. शायद इसीलिए बहुत सारा जोखिम उठाने का फैसला लिया गया. फैसला हुआ कि ताकत इस्तेमाल करेंगे.

कमांडोज़ भेजने से पहले सबसे मारक कदम उठाया जा चुका था
26 अक्टूबर की तारीख आई. शनिवार का दिन. सुबह-सुबह का वक्त था. रूसी कमांडोज़ ने थियेटर को चारों तरफ से घेर लिया. स्पेशल फोर्स और सेना के कमांडोज़. स्पेशल फोर्स, माने खास ट्रेनिंग पाए हुए कमांडो. सबके हाथों में हथियार. चेहरे पर मास्क. कमांडोज़ अंदर घुस गए. इन कमांडोज़ के अंदर घुसने से पहले भी कुछ हुआ था. चुपचाप. ये इस ऑपरेशन का सबसे मारक हिस्सा था.

रूसी सरकार द्वारा उठाया गया ये कदम सही था या नहीं, इसे लेकर दोनों पक्ष हो सकते हैं. पर ये भी एक सच है कि निर्दोष जानों को बचाने की जो जिम्मेदारी एक नागरिक सरकार पर होती है, वो मामूली नहीं होती.
रूसी सरकार द्वारा उठाया गया ये कदम सही था या नहीं, इसे लेकर दोनों पक्ष हो सकते हैं. पर ये भी एक सच है कि निर्दोष जानों को बचाने की जो जिम्मेदारी एक नागरिक सरकार पर होती है, उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है.

एयर कंडीशनिंग सिस्टम से थियेटर में भर दी जहरीली गैस
सुबह होने में कुछ वक्त बाकी था. घड़ी ने 5 बजाए होंगे. थियेटर के बाहर रोशनी थी. एकाएक वहां अंधेरा हो गया. इमारत के अंदर एक धुंध सी बनने लगी. वहां मौजूद लोगों के फेफड़ों में धुआं भरने लगा. कुछ अजीब सा था उस धुएं में. क्या बंधक, क्या विद्रोही. सबके अंदर जा रहा था. पहले-पहल लगा कि कहीं आग लगी है. उसी का धुआं आ रहा है. फिर उस धुएं का अजीब सा असर होने लगा. एयर कंडीशनिंग सिस्टम के रास्ते एक जहरीली हवा अंदर भेजी गई थी. एक बंधक थी अंदर. अना ऐंद्रिआनोवा. उन्होंने एक रेडियो स्टेशन को फोन मिलाया. अना ने जो कहा, उसे लाइव प्रोग्राम पर सुनाया गया. उनके शब्द थे:

हमें लगता है कि रूसी कुछ तो कर रहे हैं. हम पर रहम करो. हमें एक मौका दो. अगर कुछ कर सकते हो, तो करो. मुझे नहीं पता ये कौन सी गैस है. मुझे इसका असर दिख रहा है मगर. विद्रोही हमें मारना नहीं चाहते. हमारे अपने अधिकारी नहीं चाहते कि हम में से कोई भी जिंदा वापस आए. मुझे कुछ नहीं पता. हम इस गैस को देख रहे हैं. महसूस कर रहे हैं. बाहर से आ रही है ये गैस. क्या हमारी सरकार ने ये ही फैसला किया है? कि हम में से कोई भी जिंदा बचकर न आए?

आधे घंटे में जहरीली गैस ने असर दिखाया
विद्रोहियों ने जवाब दिया. बाहर की ओर निशाना करके अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. इसके बाद कमांडोज़ अंदर घुसे. कहते हैं कि जब फायरिंग शुरू हुई, तो विद्रोहियों ने बंधकों से अपनी जान बचाने को कहा. कहा कि सीट के पीछे छुप जाएं. फिर गैस का पूरा असर दिखने लगा. आधे घंटे के अंदर थियेटर के लोग बेहोश होने लगे. कुछ विद्रोही होश में थे. उनके और रूसी कमांडोज़ के बीच संघर्ष हुआ. खूब गोलियां चलीं. ऑपरेशन खत्म हुआ. सरकार ने कहा, सारे विद्रोही मारे गए. हालांकि ये भी खबर थी कि कुछ विद्रोही जिंदा पाए गए थे. उनको मार डाला गया मगर.

पुतिन लगातार अमेरिका और यूरोप को चुनौती दे रहे हैं. पहले की तरह एकबार फिर रूस बड़ा खिलाड़ी बन गया है. सीरिया हो या अफगानिस्तान, रूस हर जगह मौजूद है.
पुतिन लगातार अमेरिका और यूरोप को चुनौती दे रहे हैं. पहले की तरह एकबार फिर रूस बड़ा खिलाड़ी बन गया है. सीरिया हो या अफगानिस्तान, रूस हर जगह मौजूद है.

बचाने वालों को पता ही नहीं था कि इलाज किस चीज का होना है
सुबह के करीब 7 बजे लोगों को थियेटर के अंदर से निकालने का काम शुरू हुआ. बारिश हो रही थी. बर्फ गिर रही थी. इसके बावजूद बेहोश बंधकों का शरीर बाहर खुले में रख दिया गया. ‘द गार्डियन’ अखबार के पत्रकार ने लिखा. बंधकों के शरीर पर जख्म का कोई निशान नहीं था. उनके चेहरे सफेद पड़े थे. आंखें खुली थीं. एकदम शून्य. थियेटर के बाहर ऐम्बुलेंस खड़ी थी. लोगों को अस्पताल ले जाने के लिए अतिरिक्त गाड़ियां खड़ी थीं. उनकी तैयारी अलग थी मगर. उनमें से कोई भी रासायनिक हमले के पीड़ितों का इलाज करने को तैयार नहीं था. इतना ही नहीं. उस जहरीली गैस का नाम भी लोगों को मालूम नहीं था. शुरुआत में तो रूसी सरकार ने कहा कि कोई भी बंधक नहीं मरा. बंधकों के परिवार वाले इंतजार कर रहे थे. लेकिन सरकार उन्हें ठीक-ठीक कुछ बता नहीं रही थी. ऐसा कब तक चलता मगर. आगे गिनती हुई. मालूम चला कि कम से कम 118 बंधक भी मारे गए. विद्रोही तो मारे ही गए थे. सारे के सारे. कई लोग कहते हैं कि मरने वालों की तादाद और ज्यादा थी. रूसी सरकार ने कभी ईमानदारी से इसका खुलासा नहीं किया मगर.

मॉस्को का ये हॉस्टेज क्राइसिस पुतिन की छवि बनाने में बहुत मददगार साबित हुआ. इससे पहले निर्दोष लोगों की जान बचाने के सवाल पर लोगों ने सरकारों को घुटने टेकते देखा था. पुतिन का अंदाज अलग था मगर.
मॉस्को का ये हॉस्टेज क्राइसिस पुतिन की छवि बनाने में बहुत मददगार साबित हुआ. इससे पहले निर्दोष लोगों की जान बचाने के सवाल पर लोगों ने सरकारों को घुटने टेकते देखा था. पुतिन का अंदाज अलग था मगर. जाहिर है, इसकी चर्चा तो होनी ही थी.

इस ‘कामयाबी’ से पुतिन का सीना गर्व से फूल गया
रूसी सरकार ने इस ऑपरेशन को अपनी कामयाबी बताया. बंधकों के मारे जाने पर बस खेद जताया था. मामले को रफा-दफा करने की भी पूरी कोशिश हुई. मरने के कारणों में जहरीली गैस को गिना ही नहीं जा रहा था. कह रहे थे, भूख-प्यास से मरे. ऐसे मरे-वैसे मरे. ऐसी चीजें छुपती तो हैं नहीं. बाद में कई बातें सामने आईं. पता चला कि ज्यादातर मौतें दम घुटने के कारण हुईं. बचावकर्मियों को कुछ पता तो था नहीं. ऐसी जहरीले गैस से बेहोश हुए लोगों के मामले में क्या सावधानी बरतनी चाहिए, उनको पता नहीं था. सो उन्होंने बंधकों के शरीर को उल्टा लिटा दिया. ऐसे में पीड़ितों की जीभ उलट गई और सांस लेने का रास्ता ही ब्लॉक हो गया. बेचारे बेहोश लोग. कुछ समझ नहीं पाए और मर गए.

चेचन्या में लड़ाई के दौरान एक पार्क में छोड़े गए पियानो को देखता रूसी सैनिक. ये पहले चेचन युद्ध के समय की तस्वीर है.
चेचन्या में लड़ाई के दौरान एक पार्क में छोड़े गए पियानो को देखता रूसी सैनिक. ये पहले चेचन युद्ध के समय की तस्वीर है.

कई सवाल हैं, जिनके जवाब नहीं मिले
इस वाकये के बाद पुतिन का सिक्का जम गया. उन्होंने अपने इस कदम का बचाव किया. कहा, ये ही जरूरी था. उन्होंने कहा कि बहुतों को बचाने के लिए कुछ लोगों की जान का रिस्क लेना पड़ा. ब्रिटेन और अमेरिका ने भी रूस की पीठ थपथपाई. कहा, बहुत खूब. अमेरिका ने एक साल पहले ही वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का हमला झेला था. शायद इसी का असर था कि बुश ने पुतिन के फैसले को सही ठहराया. दुनिया ने पुतिन के सख्त-मिजाज अंदाज पर तालियां बजाईं. ये माना गया कि आतंकवाद को ऐसा ही जवाब दिया जा सकता है. उसके सामने घुटने नहीं टेके जा सकते. कुछ सवाल थे. बहुत चुभने वाले. जी दुखाने वाले. मन उदास करने वाले. क्या इतनी जहरीली गैस का इस्तेमाल होना चाहिए था? क्या इतने सारे लोगों की जिंदगी दांव पर लगाई जा सकती थी? क्या बिल्कुल निर्मम होकर ही उग्रवादियों को जवाब दिया जा सकता था? क्या आतंकवाद को ठेंगा दिखलाने के लिए सैकड़ों लोगों की जिंदगी से खेलना जरूरी था? ऑपरेशन की भनक भी न लगे, इसके लिए बंधकों की सुरक्षा की अनदेखी करना सही था? कहते हैं, एक बेगुनाह को बचाने के लिए 100 गुनहगार बच भी जाएं तो परवाह नहीं. जाहिर है. पुतिन ने ये कहावत नहीं सुनी.


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