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#MeToo मूवमेंट इतिहास की सबसे बढ़िया चीज है, मगर इसके कानूनी मायने क्या हैं?

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नाना पाटेकर के खिलाफ तनुश्री दत्ता के आरोप जबसे सामने आए, इतिहास में एक बड़ा मोड़ आया. ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी. सैकड़ों लड़कियां सामने आईं और उन्होंने वो कहा जो वो कभी न कह पाई थीं. इस बार उन्होंने अपने साथ हुए यौन शोषण के बारे में सीना तानकर, समाज की आंखों में आंखें डालकर कहा. एक औरत के तौर पर ये देखना सुखद है.

हर नए दिन हम औरतें कम डर रही हैं. और वो ज्यादा डर रहे हैं जिन्हें असल में डरना चाहिए. लड़कियों को चलते-फिरते हरास करने वाले, ऑफिस में उन्हें गलत तरीके से छूने वाले, डेट के नाम पर जबरन शरीर पर हाथ डालने वाले. सीनियर, टीचर या सत्ता की पोजीशन में होने की वजह से लड़कियों का शोषण करने वाले दुबककर अपने बिलों में घुस रहे हैं. ये ऐतिहासिक है.

ऐतिहासिक होने के साथ-साथ हम औरतों के लिए ये बहुत ही भावुक मोमेंट है. मुझे यकीन है, अपनी पीड़ा सोशल मीडिया पर लिखते हुए बहुत सी लड़कियां रो पड़ी होंगी. हम क्रोधित हैं. हमारे शरीर क्रोध से तप रहे हैं. और क्यों न हो. ये क्रोध न होता, तो आज समाज समाज को आईना दिखाने वाला कोई न होता.

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#MeToo मूवमेंट का औचित्य क्या है?

जब आसाराम या राम रहीम जैसे बड़े धार्मिक नाम के खिलाफ पहली औरत ने शिकायत की, जब हॉलीवुड के सबसे बड़े नाम हार्वी वाइनस्टीन के खिलाफ पहली औरत ने बोला, वो असल में क्या चाहती थीं? क्या वो फुटेज चाहती थीं. मीडिया अटेंशन चाहती थीं? नहीं. वो न्याय चाहती थीं. वो अपने दोषी को सजा दिलाना चाहती थीं. बीते साल सीरियल चाइल्ड मोलेस्टेशन के केस में दोषी करार दिए गए अमेरिकी स्पोर्ट्स डॉक्टर लैरी नासर का ट्रायल देखा है आपने? पीड़ित औरतों की बात सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. पर जब महिला जज दोषी को सजा सुनाती है, ऐसा लगता है पूरे औरत समाज की जीत हुई है.

ऐसे हम भारतीय औरतों को ध्यान रखना होगा कि अपना क्रोध जीवित रखें. मगर अपने गुनहगारों के खिलाफ शिकायत लिखवाना न भूलें. #MeToo मूवमेंट के खिलाफ बोलने वालों का असल में पहला आरोप यही होता है कि हम इस बात को कैसे सच मानें. हमारे समाज की बनावट ऐसी है कि पुरुष की कही हुई बात झट से मान ली जाती है. मगर औरत कुछ कहे, तो उसपर हम सबसे पहले डाउट करते हैं.

मेरी वकील दोस्त प्रज्ञा सिंह बताती हैं कि अगर कोई लड़की शिकायत करती है, तो सबूत खोजने का भार उसपर नहीं होता है. बल्कि ये भार आरोपी पर होता है कि वो खुद को निर्दोष साबित करने के लिए प्रूफ लाए. मगर हमारा समाज न सिर्फ पीड़ित औरत से प्रूफ मांगता है, बल्कि उसे उसके साथ हुए गलत का दोषी भी बताता है. ‘तुम गई ही क्यों थीं उसके साथ?’, तुम्हें रात को बाहर निकलने की ज़रुरत ही क्या थी?’, ‘तुमने लड़के से दोस्ती की ही क्यों?’.

हम औरतों के लिए जरूरी है कि ऐसे नाजुक समय में हम कानूनी तौर पर खुद को फूलप्रूफ रखें. क्रोध अच्छी बात है. ये हमारे अन्दर होना चाहिए. मगर ये भी सच है कि महज क्रोध हमें न्याय नहीं दिलाएगा.

ऐसे में हमें क्या करना चाहिए?

  1. सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित न रहें. अगर आपके साथ गलत हुआ है तो डरने की कोई बात नहीं है. आप FIR करवाएं. और हां, FIR करने का कोई वक्त नहीं होता. अगर आप किसी भी वजह से अपने साथ हुए यौन शोषण को रिपोर्ट नहीं कर सकी हैं, तो ये न सोचें कि देर हो गई है.
  1. अगर आपने अपनी बात सोशल मीडिया पर कही है और आपके सपोर्ट में और औरतें सामने आई हैं तो इससे आपका केस मजबूत होता है. लीगल तौर पर मीटू मूवमेंट का ये सबसे बड़ा फायदा है. अगर X ने मेरा यौन शोषण किया और ये बात मैंने सोशल मीडिया पर कही. जवाब में 5 और लड़कियों ने कहा कि X ने उनके साथ भी ऐसा किया था, आपकी बात का वजन इससे बढ़ेगा.
  1. ध्यान रहे कि सोशल मीडिया पर जाना आपका पहला कदम न हो. सोशल मीडिया पर अपनी बात कहना अच्छी बात है. मगर जरूरी बात ये है कि आप FIR पहले करवाएं. FIR करवाने के लिए आपको कोई सबूत नहीं चाहिए. पर आप कोई भी स्क्रीनशॉट संभाल कर जरूर रखें. अगर ऑईविटनेस हों तो और भी मजबूत केस होगा.

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हर अच्छी चीज एक बुरे पहलू के साथ आती है और #MeToo मूवमेंट की भी कुछ कानूनी कमियां हैं.

1.  कानून कहता है, ‘innocent until proven guilty’. यानी जबतक गुनाह साबित न हो, आरोपी निर्दोष होता है. पर सोशल मीडिया पर नाम आते ही मीडिया ट्रायल होने लगते हैं. कहने का अर्थ ये नहीं कि सभी औरतें झूठ बोलती हैं. पर अगर आज मैं कोई फेक अकाउंट बना किसी पुरुष को ब्लेम कर दूं, तो इससे पहले वो पुरुष सफाई दे पाए, मीडिया और सोशल मीडिया उसे आरोपी करार दे देगा. इसे ऐसे समझिए. मैं सोशल मीडिया पर लिख दूं कि मेरी दोस्त प्रिया ने मेरा पेन चुराया है. जबकि प्रिया ने असल में मेरा पेन नहीं चुराया. और चूंकि उसका प्रमोशन मुझसे पहले हो गया, मैंने खुन्नस में उसपर आरोप लगा दिया.

वहीं 5 न्यूज वेबसाइट ने प्रिया के खिलाफ़ मेरा ट्वीट देख उसपर खबर कर दी. दुनिया जान गई कि प्रिया चोर है. प्रिया की नौकरी चली गई. उसकी छोटी बच्ची को उसके क्लासमेट चोर की बेटी कहकर बुली करने लगे. उसके पति से ये सब झिला नहीं और उसने तलाक की बात कही. हो सकता है प्रिया सुसाइड तक की कोशिश कर ले क्योंकि उसे अपनी बात कहने का लीगली खुद को निर्दोष साबित करने का मौका ही नहीं मिला.

ये सच है कि किसी भी औरत को बहुत हिम्मत लगती है खुलकर अपने साथ हुए यौन शोषण के बारे में बोलने में. पर अगर सौ में से एक भी आरोप झूठा निकलता है तो एक जीवन बर्बाद हो सकता है.

2. #MeToo मूवमेंट का दुरुपयोग कानून के इंस्टीट्यूशन की सत्ता को बौना करता है. कानून के काम करने का तरीका सिलसिलेवार तरीके से चलना है. जब आप शिकायत करती हैं, तो कानून आरोपी पार्टी से जवाब मांगता है. वहीं जब सोशल मीडिया पर कचहरी लगती है, आरोपी को सुनने वाले सिर्फ तभी होते हैं, जब आरोपी कोई ताकतवर पुरुष हो. अगर आरोपी अपना अकाउंट डीएक्टिवेट कर भाग जाए, आपके सवालों का जवाब कोई नहीं देगा. और आपको कभी असल न्याय नहीं मिलेगा.

3. सोशल मीडिया पर मुद्दे जितनी जल्दी चढ़ते हैं, उतनी ही जल्दी गिरते हैं. अगर आपके केस में कोई सनसनी नहीं होगी, तो वो वायरल नहीं होगा. इस तरह छोटे मुद्दे दब जाएंगे. मीडिया आपमें इंटरेस्ट नहीं लेगा. जबकि कानून की निगाह में, कम से कम आदर्श रूप में, हर केस बराबर होता है.

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नाना पाटेकर, विकास बहल और चेतन भगत पर इस तरह के आरोप हैं.

4. अगर आपके साथ हरासमेंट हुआ है तो आपका पहला कदम अपने संस्थान की सेक्शुअल हरासमेंट कमिटी में जाना होना चाहिए. चाहे वो कॉलेज हो, स्कूल या कोई कंपनी. अगला कदम FIR लिखना होना चाहिए. याद रखिए, गलत तरीके से छूना, अश्लील बातें कहना, अश्लील मैसेज भेजना या वीडियो/तस्वीर दिखाना, सब हरासमेंट में आता है. जिसकी FIR IPC धारा 354A के तहत करवाइए.

5. अगर आप पुरुष हैं और आपके खिलाफ झूठा आरोप लगाया जा रहा है, आप पूरी तरह कॉन्फिडेंट हैं कि आपने कुछ नहीं किया. तो आप धारा 503 के तहत आपकी रेप्यूटेशन को हर्ट करने का का केस कर सकते हैं. अगर किसी गलत पब्लिक पोस्ट की वजह से आपकी रेप्यूटेशन को नुकसान हुआ है तो सेक्शन 499 के तहत मानहानि का दावा कर सकते हैं. और अगर आपको आपकी मर्जी के बगैर बार-बार मैसेज कर तंग किया जा रहा है तो आप IT एक्ट के तहत स्टॉकिंग का मुकदमा कर सकते हैं.

#MeToo मूवमेंट जितना ऐतिहासिक है, उतना ही जरूरी भी. आज की महिलाओं के साथ-साथ भविष्य में पब्लिक स्पेस में काम करने वाली औरतों के लिए. आज अगर हम औरतें वोट कर सकती हैं, या नौकरी कर सकती हैं, तो वो इसलिए कि हमसे पहले कई औरतें हमारे लिए लड़ीं.

एक औरत के तौर पर मैं दूसरी औरतों से यही कहूंगी कि वे सामने आएं. खुलकर बोलें. पर साथ ही साथ सच बोलें. अपनी शिकायत दर्ज करवाएं. और हां, महज किसी को बदनाम करने लिए इस मूवमेंट का इस्तेमाल न करें. बड़ा साहस लगता है यौन उत्पीड़न के खिलाफ बोलने में. अपनी निजी खुन्नस के चलते इन सच्ची औरतों को 10 कदम पीछे न धकेलें.

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MeToo campaign is an unprecedented happening in society with an uncertain legal support

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