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'कमाऊ है तो क्या, है तो औरत ही'

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हम तीन दोस्त- दो लड़कियां और एक लड़का ऑटोरिक्शा लेते हैं. लड़के को बीच में उतरना है. ऑटो वाले से 150 रुपये तय होते हैं. लड़का थोड़ी दूरी पर उतर जाता है. उसके अगले सिग्नल पर ऑटो वाला कहता है, हमें उतरना होगा. क्योंकि ऑटो खराब हो गया है. हमने आधा रास्ता भी तय नहीं किया है. रात का समय है. हम कहते हैं हमें दूसरा ऑटो अरेंज करके दो. ऑटो वाला मना कर देता है. अगला ऑटो 100 रुपये और मांगता है. वो सफ़र जो हम 150 में तय करने वाले थे, हमारे लिए 220 का बन जाता है. हम खीझते हैं, ऑटो वाले से लड़ते हैं. वो लड़ने को तैयार है. हम उसे 70 रुपये थमाकर पुलिस वाले से शिकायत करने की धमकी देते हैं. धमकी सुनते ही वो कहता है, ‘रुकिए, शायद ऑटो स्टार्ट हो रहा है’. अचानक ऑटो स्टार्ट हो जाता है. लेकिन उसके पहले ऑटो वाला अपनी पूरी जान लगा देता है, हमसे एक्स्ट्रा पैसे निकलवाने के लिए. मैं रोज ऑटो लेकर ऑफिस से घर आती हूं. मुझे शाम को अकेला देख ऑटो वाला 70 मांगता है. साथ खड़े उसके सभी साथी भी 70 पर अड़ जाते हैं. कोई लड़का कलीग साथ में हो तो 50 में चले जाते हैं.


 

2

मैं कनॉट प्लेस पर सबवे से सड़क पार कर रही हूं. एक भिखारी फटे हुए कपड़े पहने आता है. सबवे में चल रहे पुरुष उसे झिड़क देते हैं. भिखारी मेरे पास आता है. मैं तय करती हूं कि बिना उसकी ओर देखे चुपचाप आगे बढ़ती चली जाऊंगी. भिखारी मेरे पीछे-पीछे आता है. लेकिन उसने किसी लड़के का पीछा नहीं किया था. मैं उसे झिड़कने के लिए उसकी ओर देखती हूं. वो इस तरीके से मुस्कुराता है, जैसे उसे मेरी डांट से कोई फर्क ही नहीं पड़ता. फिर वो अपनी जीभ से अपने ऊपर वाला होंठ चाट मुझे इशारा करता है. सबवे ख़त्म हो गया है. मैंने ऊपर आने के लिए एस्केलेटर ले लिया है.


3

हम तीन लड़कियां ऑटो में हैं. लगभग 10 साल का एक लड़का सिग्नल पर फूल बेच रहा है. मैंने शॉर्ट्स पहने हैं. बच्चा ऑटो के पास आता है. कहता है ‘दीदी फूल ले लो’. मैं उसकी ओर ध्यान न देने का अभिनय करती हूं. वो मेरी जांघों पर हाथ रखकर कहता है, ‘दीदी ले लो ना’. मैं जब तक कुछ समझकर अपने गुस्से को किसी तरह की प्रतिक्रिया में बदलती, ऑटो स्टार्ट होता है. बच्चा भाग जाता है.


4

दिल्ली का पानी पीने लायक नहीं है. RO पानी की बोतलें ऑर्डर कर मंगवानी पड़ती हैं. लड़के बोतलें लेकर आते हैं, 30 रुपये लेकर पानी के डिस्पेंसर पर फिट कर जाते हैं. दो लड़के पानी लेकर आते हैं. पानी लगा कर तेजी से भागते हैं. मैं देखती हूं पानी की बोतल में सजावट वाला ‘हैप्पी बर्थडे’ बैनर तैर रहा है. पानी में सुनहरे रंग की किरकिरी भी तैर रही है. मैं पानी वाले को रोककर पानी बदलने को कहती हूं. वो मुस्कुरा कर कहता है, ‘अरे कुछ नहीं होता, पी लो ना. ये गंदा नहीं है’. मुझे और मेरी रूममेट को विश्वास नहीं होता कि कोई पीने के पानी से इस तरह का मजाक कैसे कर सकता है. जब हम उससे लड़ते हैं तो कहता है, ‘अच्छा ठीक है पानी बदल दूंगा. लेकिन अगली बोतल कल मिलेगी’. मैं कहती हूं घर में पीने का पानी ख़त्म है. वो कहता है, ‘तो यही पानी रख लो. वरना कल तक इंतजार करो.’


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मैं दुकान में सामान लेने जाती हूं. मैंने टैंक टॉप के ऊपर बटन खोलकर शर्ट डाल रखी है. दुकान वाला मेरी आंखों में देख बात नहीं करता, वो लगातार मेरे सीने को ओर घूरता रहता है. वो सामान लेने घूमता है. मैं चेक करती हूं कि मेरा क्लीवेज तो नहीं दिख रहा है. नहीं, मैंने ‘ठीक’ तरीके से कपड़े पहने हैं. वो फिर भी मेरे स्तनों से ही बात करता है.


ऑटो वाले, दुकान वाले, पानी वाले, भिखारी. ये सब वो लोग हैं, जो हमें रोज़ मिलते हैं. इनसे हमारा रिश्ता पर्सनल नहीं, पैसों का है. जब हम इनसे मिलते हैं, हम एक अर्थव्यवस्था के दो यूनिट होते हैं. जो हमारे बीच होता है, वो एक ‘ट्रांसैक्शन’ होता है. और हम उम्मीद करते हैं, कि इसे एक ट्रांसैक्शन ही होना चाहिए. जब ये दो पुरुषों के बीच होता है, ये महज एक ट्रांसैक्शन ही होता है. लेकिन जब इनमें एक तरफ औरत आ जाती है, तो ये हैरेसमेंट में बदल जाता है. ऐसा हर बार नहीं होता. शायद 10 में से 1 बार ही होता हो. लेकिन ऐसा होने का स्कोप हमेशा बना रहता है. औरत संभोग के लिए है, और ये फैक्ट अर्थव्यवस्था में बदलता नहीं देखा जाता.

हम कह सकते हैं कि हम उन दिनों के बाहर आ गए हैं, जब अर्थव्यवस्था को केवल पुरुष चलाते थे. लड़कियां ऑफिसों में काम करती हैं. मेरे ऑफिस में भी सैकड़ों लड़कियां हैं. लेकिन ऑफिस में काम करने वाली लड़कियों को जब प्रमोशन मिलता है, या उनके काम की तारीफ़ होती है, लोग कहते हैं कि लड़की है इसलिए हो गया. कॉलेजों में प्लेसमेंट होते हैं. जब उनमें लड़कियों को चुन लिया जाता है, लड़के कहते हैं कि लड़की थी, इसलिए हो गया. औरतों की किताबें छपती हैं, तो लोग कहते हैं, ‘इसकी कविताएं तो कुछ ख़ास नहीं, लेकिन लड़की सुंदर है’.

एक ट्रांसैक्शन में, या चैरिटी में, हमेशा उसका पलड़ा भारी होता है, जिसे पैसे देने होते हैं. भीख मांगने का मतलब ही यही होता है कि आप किसी और से मेहरबानी चाहते हैं. लेकिन जब भिखारी देखता है सामने एक पुरुष नहीं, औरत है, उसकी आर्थिक असमर्थता गौण हो जाती है, और पौरुष हावी हो जाता है. तब वो एक भिखारी नहीं, एक पुरुष होता है. जब पानी वाला, या ऑटो वाला या एक औरत से अपनी सेवा के बदले पैसे ले रहा होता है, वो ये मानकर चलता है कि सामने वाली पार्टी के पास दिमाग नहीं है. दिमाग हो भी तो, उसके पास विरोध करने के लिए आवाज नहीं है.

जब वक़्त रात का हो, उन्हें मालूम होता है कि सामने वाली औरत अपने आप में काफी नहीं, इसे एक पुरुष पर निर्भर होना है. और अगर वो पुरुष ऑटो वाला है, तो वो मनचाहे दाम ले सकता है. इसमें एक सवाल छुपा होता है- आप क्या चुनना चाहती हैं, अपनी सेफ्टी, या पैसों की बचत? ज्यादा पैसे देकर मैं हर बार अपनी सेफ्टी चुन लेती हूं. और एक बार फिर सामने वाले की आर्थिक असमर्थता उसके पुरुष होने के पीछे छिप जाती है.

ये सच है कि आर्थिक रूप से कमज़ोर औरतें ज्यादा असुरक्षित हैं. उन्हें पब्लिक ट्रांसपोर्ट लेकर पुरुषों के बीच धक्का-मुक्की सहते हुए जाना पड़ता है. लेकिन वो लड़कियां जो कैब लेना अफोर्ड कर सकती हैं, या पर्सनल ऑटो बुक कर सकती हैं, वो क्या सेफ हैं? एक अकेली समर्थ औरत भी घर में प्लम्बर, कारपेंटर या पानी वाले को बुलाने के पहले सौ बार सोचती है.

औरतें अर्थव्यवस्था का हिस्सा होते हुए भी, अर्थव्यस्था का वो यूनिट नहीं होतीं जो पैसे देने वाली पार्टी में आकर सक्षम और सेफ महसूस कर सकें. वो पैसे देने वाली पार्टी होकर भी महज शरीर बनकर रह जाती हैं.

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