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हर रात रोते हैं तो आप प्यार में नहीं, परेशान हैं

1.

‘तुम ठीक से सोयी नहीं क्या?

न, सोयी तो हूं. क्यों?

आंखें सूजी-सूजी हैं.

और आपने मुस्कुराकर ‘पता नहीं क्यों’ वाला एक्सप्रेशन देकर बात ख़त्म कर दी.’

2.

सुबह सोचा, मैंने एक और रात यूं ही बिता दी. क्या मुझे उठकर ऑफिस जाना चाहिए? क्या होगा ऑफिस जाकर. थोड़ा काम, जिसमें जी नहीं लगेगा. उठकर ब्रश करूं क्या? नहीं, अभी थोड़ी देर और बस बिस्तर पर बिता लूं. और आप लेटे रहे. अब ऑफिस शुरू होने में 15 मिनट हैं. आज मैं फिर से लेट हूं. जल्दी-जल्दी नहाया और घर छोड़ दिया.

PP KA COLUMN

3.

ऑफिस में बॉस काम से खुश नहीं है. आपकी वर्क रिपोर्ट में रोज दूसरों से कम काम होता है. क्या ये काम करने लायक है? क्या मैं किसी लायक हूं? क्या मैंने ऑफिस को कुछ दिया है? क्या मैंने किसी को कुछ दिया है? हर बार फेल ही तो हुआ हूं. हर काम में. अच्छी औलाद नहीं बन सका. अच्छा प्रेमी नहीं बन सका. अच्छा दोस्त नहीं बन सका. अच्छा इंसान नहीं बन सका.

4.

नहीं, अभी खाने का जी नहीं है. थोड़ा लेट जाऊंगा.

रोटी खाने का जी नहीं है. चाय पिला दो. चिप्स खा लेता हूं.

5.

मैं फोकस क्यों नहीं कर पाती? मैं स्क्रीन को देखते हुए क्यों कुछ और सोचने लगती हूं. मुझे बाहर निकलना है, बाहर निकलना है. दूर जाना है. शहर छोड़ देना है. मुझे घर को नहीं लौटना. मुझे और नहीं मुस्कुराना.

6.

मुझे रोना है. रोने में एक अजीब सा सुकून मिलता है. फफक-फफककर. कोई वजह नहीं है. इतनी सारी वजहें हैं, किसी को एक वजह क्या बताऊं. मैं डूब रहा हूं. डूब रहा हूं. मुझे इस समंदर से बाहर नहीं आना है. बस यूं ही डूबने देना है. मैं चाहता हूं कोई मेरे सीने पर एक भारी सा पत्थर रख दे और मैं धीरे-धीरे डूब जाऊं. कुछ याद न रहे. कुछ कहना न रहे. यूं डूबना कितना सुख देता है.

7.

मैं सुबह उठती हूं, तो जी भारी रहता है. ऐसा लगा है किसी ने हजारों सुइयां चुभो रखी हों. छोटी छोटी. उनमें से हल्का-हल्का खून आ रहा हो. एक ज़ख्म सा महसूस होता है अंदर.

8.

मुझसे नहीं होगा ये. ये सड़क मुझसे पार नहीं होगी. मुझसे उठकर दोस्तों से नहीं मिला जाएगा. मुझसे कैमरा की ओर देखकर मुस्कुराया नहीं जाएगा. मुझसे लिखा नहीं जाएगा. मुझसे कुछ नहीं होगा. मुझसे कोई काम मत कहो.

9.

ये लिपस्टिक का शेड मुझ पर सूट नहीं करता. मुझ पर कुछ भी सूट नहीं करता. मैं अंदर से इतनी बदसूरत हूं, बाहर से मेकअप लगाकर क्या होगा? मैंने जाने कितने लोगों को निराश किया है, वो मुझसे नफरत करते हैं. वो मुझसे रूठ गए हैं. वो कभी नहीं मानेंगे. मेरे अंदर साहस ही नहीं है कि उनके पास जाकर उन्हें मनाऊं.

10.

कोई ऐसी चीज नहीं है जो सुरूर पैदा कर दे? जो हमेशा के लिए दिमाग को काबू में कर ले. ये दिमाग मुझसे मेरे काबू में नहीं रहता. सोते समय भी नहीं. ऐसा सपने आते हैं कि रोते हुए आंख खुलती है. साथ वाले लोग कहते हैं सोते में चौंकती हूं? क्या इस दिमाग का कोई इलाज नहीं है?

***

इलाज है.

अगर आप इसे पढ़ रहे हैं, महसूस करते हैं कि ऐसा आपके साथ होता है, मुमकिन है कि आप दिमागी तौर पर परेशान हैं. बीमार नहीं, बस परेशान. आप औरत हो सकती हैं, मर्द हो सकते हैं. सिंगल, शादीशुदा, तलाकशुदा हो सकते हैं. आप एक अच्छे-खासे रिलेशनशिप में हो सकते हैं.

आपको मालूम है कि आपके चारों तरफ सब कुछ ठीक है. नहीं है तो हो जाएगा. नहीं हो पाया तो आप कर लेंगे. लेकिन इस दिमाग का क्या करें, जो आपके बस में नहीं है?

जिस दिमागी फितूर की गिरफ्त में आप खुद को पाते हैं, वो एक समस्या है. ये पल भर या कुछ दिनों की उदासी नहीं है. किसी एक समस्या से नहीं निकलता. महीनों तक दिमाग में रखी गई बात से होता है. चूंकि आपको लगता है ये कोई बड़ी बात नहीं, आप इसे नहीं कहते. और कहते-कहते कुछ बातें दिमाग में यूं घर कर लेती हैं कि निकाले नहीं निकलतीं. और जब तक आप खुद को नुकसान पहुंचाने पर उतारू न हो जाएं, आप महसूस नहीं करते कि ये भी एक तकलीफ है.

और जब दिमाग पर बस चलना पूरी तरह बंद हो जाता है, तो आपको एक डॉक्टर बताता है कि आप ‘डिप्रेस्ड’ हैं.

‘डिप्रेस’ बड़ा ही आम शब्द है. कोई भी तकलीफ आपको डिप्रेस कर सकती है, रुला सकती है. फिर आप उससे उबर जाते हैं. पर कई बार नहीं उबर पाते. और महीनों, सालों तक किसी अजीब से अपराधबोध को अंदर छिपाए बैठे रहते हैं. फिर किसी दिन खुद ही अपने पाप-पुण्य का लेखा-जोखा कर लेते हैं. खुद के ही दिमाग में कचहरी बैठाकर खुद को दोषी करार दे देते हैं. और ये मान बैठते हैं कि आप गुनहगार हैं.

अगर आप किसी लंबी उदासी से घिरे हुए हैं, तो उसे कहिए. अपने दोस्तों, अपने घरवालों से. अपने प्रेमी से. यकीन मानिए, आप नहीं चाहेंगे कि ये बड़ा हो जाए. आप नहीं चाहेंगे कि ये उदासी क्लिनिकल डिप्रेशन में बदल जाए और आप डॉक्टर के पास जाएं. यकीन मानिए, आप नहीं चाहेंगे कि रोज आपको नींद की गोली खाकर सोना पड़े. आप नहीं चाहेंगे कि महीनों आप दवाएं खाते रहें. और उन मुसीबतों को, जिसे आज से कुछ महीने पहले तक बात कर सुलझाया जा सकता था, आप उसे डॉक्टर के क्लिनिक में जाकर सुलझाएं.

प्रेम नहीं होता तो न करें. नौकरी अच्छी नहीं लगती तो बदल दें. पति मारता है तो पुलिस में शिकायत कर दें. सास ताने देती है तो उससे कह दें. पत्नी से प्रेम नहीं है तो उसे बता दें. लड़ लें, चीख लें, रो लें, पर दिल में न रखें. चीजों को जोड़कर रखने के चक्कर में खुद को अंदर से न तोड़ें. क्योंकि अगर आज आप इससे हार मान लेंगे, तो पूरी जिंदगी इसके गुलाम बने रह जाएंगे.

अगर आपको लगता है कि आप इस दिक्कत का सामना कर रहे हैं, तो थेरेपिस्ट के पास जाएं. बात न बने तो साइकायट्रिस्ट के पास जाएं. जो कहते हैं कि दिमाग के डॉक्टर के पास तो केवल ‘पागल’ जाते हैं, उनकी न सुनें. यकीन मानिए, साइकायट्रिस्ट आपकी मदद कर सकते हैं. क्योंकि दिमागी तकलीफ भी तकलीफ है. शरीर पर आई बाहरी चोटों की तरह. उसके लिए डॉक्टर के पास जाना कोई शर्म की बात नहीं है.

***

मैं साइकायट्रिस्ट के पास जाती हूं. गोलियां खाती हूं. कभी-कभी सोचती हूं कि फालतू गोलियां खा रही हूं. लेकिन खुद को बताती हूं कि नहीं, ये जरूरी है. मैं ऑफिस आती हूं, रोज का काम करती हूं. मैं नॉर्मल हूं. और आज नॉर्मल हूं तो इसलिए कि सही समय पर मैंने डॉक्टर से बात करना सही समझा. वो जो मुझसे प्रेम करते हैं, उनसे अपने हालात नहीं छिपाए.

ऑफिस के बाद कपड़े बदलती हूं, जूते कसती हूं, जिम चली जाती हूं. जिस दिन नहीं जा पाती, पार्क में एक घंटा दौड़ती हूं. हर 10 मिनट पर लगता है छोड़ दूं, अब घर जाकर बिस्तर पर लेट जाऊं, पर नहीं लेटती. खुद को थोड़ा-थोड़ा धकिया के आगे बढती रहती हूं.

कभी-कभी लगता है कि अब कुछ नहीं होगा तो रो पड़ती हूं. जब लोग पूछते हैं क्या हुआ तो बनावटी मुस्कान के साथ ‘कुछ नहीं’ नहीं कहती. कहती हूं कि परेशान हूं, मदद करो. क्योंकि रोना शर्म की बात नहीं है. लोगों से मन की बात कहना आपको कमज़ोर, या मर्दों को ‘औरत जैसा’ कमज़ोर नहीं बनाता. रोने से किसी का पौरुष कम नहीं होता.

ये दुनिया या देश या परिवार के लिए नहीं, खुद के लिए आपका अपना कर्तव्य है. खुश रहने का कर्तव्य. जीने का कर्तव्य.

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