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पीपी का कॉलम: क्या करूं, डर लगता है

ये कॉलम मुझे प्रिय है. सिर्फ इसलिए नहीं कि अपने मन की सारी बातें यहां कह सकती हूं. और वेबसाइट के माध्यम से कई लोगों तक पहुंचा सकती हूं. ये भी वजहें हैं. पर एक पुख्ता और ज्यादा बड़ी वजह ये कि कल को मेरा दिमाग मेरा न रहे, शरीर में लिखने की ताकत न रहे, विचार जवाब दे दें या मर जाऊं, तो कम से कम किसी के गूगल पर नाम टाइप करने पर मिल सकूं. किताबों और स्याही में अमर होने का कॉन्सेप्ट थोड़ा पुराना और रोमैंटिक हो चला है.

PP KA COLUMN

फिर कुछ ऐसा हो जाता है कि लिखने पर विश्वास टूटने लगता है. लोगों की बातें सुनकर लगता है किसके लिए लिखूं. लोग तो हैडिंग में ‘सेक्स’ देखकर क्लिक करते हैं. गूगल सर्च में ‘कटरीना सेक्स’ डालकर वेबसाइट तक पहुंचते हैं. जब तक कुछ हिला देने वाले न हो, लोग पढ़ना ही नहीं चाहते. ऐसे में क्यों न अपनी बातें किसी डायरी में लिखकर छोड़ दूं. या फेसबुक पर हजार दोस्तों के लिए लिखकर ख़त्म कर दूं. आज सुबह से ही लिखने का जी नहीं किया. इसलिए शाम 4 बजे लैपटॉप उठाया. आज जो कुछ लिख रही हूं, उसमें कोई दलील या स्ट्रक्चर शायद न मिले. मुझे नहीं मालूम मैं क्या लिख रही हूं.

पूरा हफ्ता गुस्से, डर और सवालों से भरा हुआ था. बेंगलुरु में सैकड़ों लड़कियों का मोलेस्टेशन हुआ था. और फेसबुक पर लोग उसे ये कहकर जस्टिफाई कर रहे थे कि छोटे कपड़े पहनकर जाएंगी तो और क्या होगा. कुछ कह रहे थे वो वेश्याएं थीं, उन्हें पेमेंट नहीं मिला इसलिए मोलेस्टेशन का ड्रामा कर रही थीं. लड़कियां सबको जवाब दे रही थीं. सितारे नेताओं को गरिया रहे थे. अक्षय कुमार बता रहे थे कैसे उनका खून खौलता है. तापसी पन्नू न्यूज़ चैनलों पर बात कर रही थीं. कुछ लोग सड़क पर मार्च निकालने की बात कह रहे थे और दूसरे बोल रहे थे, इससे क्या होगा. कभी मार्च निकालने से कुछ हुआ है क्या.

लेकिन वो सोशल मीडिया की दुनिया है. असल दुनिया में हर लड़की पहले से कुछ और ज्यादा डर रही थी. मैं अक्सर फ़िल्में अकेले देखती हूं. इस बार रिलीज हुई फिल्म के लिए एक साथी खोज रही थी. कि ऑफिस के बाद फिल्म देखी तो रात 9.30 बज जाएंगे. अकेली घर वापस कैसे आउंगी, इसलिए फिल्म नहीं देखी. ऑफिस में लेट होता था तो एक बाइक वाले साथी से कहती थी, सोसाइटी के गेट तक छोड़ दो. इस बार लेट हुआ तो उससे घर तक का ड्रॉप मांगा. उसने भी तब तक दोबारा बाइक स्टार्ट नहीं की जबतक ये न देख लिया कि सचमुच घर के अंदर पहुंच चुकी हूं. आजकल रहने के लिए घर तलाश रही हूं. मकान मालिकों से ऑफिस के बाद की मीटिंग न रखकर छुट्टी के दिन भी सुबह 10 बजे की मीटिंग रखी, कि किसी की नीयत का क्या भरोसा. कुछ महीनों से स्विमिंग सीखना चाह रही हूं. इसलिए जॉइन नहीं कर पा रही कि रोज सुबह नोएडा शहर का लोकल अखबार पढ़ लेती हूं. लोगों ने किस-किस तरह और कितने दिनों की जान पहचान के बाद लड़कियों का रेप कर उन्हें काट कर या चाकू से गोदकर फेंका है, ये अंदर तक हिला देता है.

घर की तलाश के ही सिलसिले में एक सुंदर और बड़ा सा बंगला देखा. कॉर्नर का घर, कम दामों में, पूरा अपना. घर में लॉन, एक तरफ मार्केट और एक तरफ मेन रोड. नहीं ले सकी. दोस्तों को बताया तो उन्होंने कहा, लड़कों के लिए ही ठीक है. क्योंकि मार्केट में एक पब भी है और घर की बाउंड्री छोटी है. नया घर देखने जाती हूं तो मन में ये विचार नहीं आता कि अगर इसे फाइनल कर दिया तो कहां पर क्या सजाऊंगी. ये आता है कि दिन के वक़्त अगर कोई उचक्का दीवार फांद घर में आकर छिप गया, और रात में निकल आया, तो क्या करूंगी.

मैं एक छत पर बने दो कमरे के पोर्शन में एक दोस्त के साथ रहती हूं. घर से लगी हुई छत पर कंस्ट्रक्शन चल रहा है. रात को काम चलता रहता है. दोस्त की नाइट शिफ्ट लगी हुई है. और रात को अकेले देर तक रोज सटी हुई छत से आती पुरुषों की आवाजों से डर लगता है. भूत-प्रेत से नहीं लगता. कुछ दिनों से अपने लैपटॉप में फिल्म चलाकर, बत्तियां जलाकर सो रही हूं. क्या करूं, डर लगता है.

ये डर, डरपोक होने का परिचायक नहीं है. मैं एक निडर लड़की हूं, मैं ये मानती हूं. और मेरे जैसी लाखों निडर लड़कियां हैं जो अकेली रह रही हैं, ट्रेवल कर रही हैं. पर इस समाज में सेफ रहने के लिए ये डर एक जरूरत बन गया है. जैसे हम खिड़कियों में शीशे लगा लेते हैं कि ठंडी हवा या धूल न घुस आए, वैसे ही. और उन्हीं शीशों की तरह डरने की ये जरूरत इतनी आम है कि लगता ही नहीं ये डर है. यूं लगता है कि ये तो आदत में शुमार है कि घर में खिड़की है तो शीशा तो रखना ही पड़ेगा.

ये सिर्फ मेरे लिए ही बुरी बात नहीं है कि मुझे होने वाले मकान मालिक, स्विमिंग कोच या काम कर रहे मजदूरों से डर लगता है. ये खराब है उनके लिए. सोचिए कोई सिर्फ आपके पास इसलिए न आए कि उसे डर हो कि आप उसके साथ कुछ बुरा कर देंगे. आप पुरुष हों और कोई लड़की सिर्फ इसलिए आपसे मिलने में घबराए कि आप पुरुष हैं. ये कितना बुरा है आपके लिए, आपके पुरुष दोस्तों के लिए, आपके जवान लड़कों और होने वाले बेटों के लिए.

‘निर्भया’ कांड के बाद लड़कियां रात को बस में चढ़ने से डरने लगी थीं. अब डिलीवरी बॉयज से खाना कलेक्ट करते वक़्त उन्हें लगता है कि इसने मुझे देख लिया है. सबका पता नहीं, पर मुझे ज़रूर लगता है. ये उस बेचारे डिलीवरी बॉय के लिए कितना बुरा है जो घर-घर खाना पहुंचा कर रात को थककर अपना निवाला तोड़ता होगा. यकीन मानिए, चार दिन पहले खाना ऑर्डर किया तो लड़के ने कहा, मैडम नीचे आकर कलेक्ट कर लीजिए. हमें दरवाजे तक जाकर न डिलीवर करने के सख्त निर्देश मिले हैं.

जो समाज हमने बना लिया है, वो सिर्फ लड़कियों नहीं, लड़कों के लिए भी बुरा है. ऐसे मौके पर किसी तरह का ज्ञान नहीं देना चाहती. कही हुई बातों को दोहराना नहीं चाहती. बस ये चाहती हूं कि बजफीड का ये वीडियो आप देखें. और इससे पहले कि जवाब में आप ये कहें कि कुछ लड़कों का दोष सारे लड़कों पर क्यों मढ़ा जाता है, सिर्फ इस वीडियो पर हंस भर देने के पहले, आप समझें कि हम एक आजाद और तथाकथित सेकुलर देश में आज भी इस तरह का वीडियो क्यों बना रहे हैं.

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