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'इंटरव्यू के लिए जा रही हो, बिकिनी वैक्स करा लो, सेलेक्शन पक्का है'

pp ka column

‘भैया आ गए, भैया आ गए’. और गिरे हुए पर्दों को और करीब लाकर उनके बीच की दो अंगुल दूरी भी खत्म कर दी जाती है. शरीर से उतारे उलटे पड़े कपड़े समेट कर छिपा दिए जाते हैं. भैया मां को सामान सप्लाई करते हैं. और चले जाते हैं. पर्दों के भीतर वैक्सिंग करा रही लड़कियां रिलैक्स हो जाती हैं. मानो औरतों की इस स्पेस में 2 मिनट के लिए तूफ़ान सा आ गया हो. लड़के की मां यानी सुनीता ब्यूटी पार्लर की मालकिन फिर टांग पर टांग चढ़ा टीवी देखने लगती है.

ये छोटे-छोटे ब्यूटी पार्लर हर शहर में होते हैं. इन्हें मालूम होता है कि ये छोटे हैं, इसलिए ये आपसे बड़ी-बड़ी बातें नहीं कहते. 300 रुपये में वैक्सिंग कर देते हैं. 10 रुपये में थ्रेडिंग कर देते हैं. ये आपको हेयर या बॉडी स्पा जैसी चीजें करवाने को नहीं कहते. हां, ये जरूर कहते हैं कि चेहरा काला हो गया है, ब्लीच करा लो.

ये ब्यूटी पार्लर होते हैं, ‘यूनिसेक्स सैलून’ नहीं. यहां दुल्हन सजाई जाती है, ‘ब्राइडल पैकेज’ नहीं होते. यहां एक ही तौलिए को बार-बार गीला कर दसियों लड़कियां वैक्सिंग के बाद अपना शरीर पोंछती हैं. ये वो जगह है जहां लड़कियों के शरीरों की गंध एक-दूसरे में मिल जाती है. अगर अखाड़ों को पुरुषों के स्पेस पर देखें, जहां एक पुरुष कई लड़कों को कंट्रोल करता है, ब्यूटी पार्लर एक औरतों का स्पेस होता है. जहां एक औरत दूसरी लड़कियों को कंट्रोल करती है. और तीसरी औरत को अपनी सेवाएं देती है.

‘इंटरव्यू के लिए जाना है तो बिकिनी वैक्स करा लो. सेलेक्शन पक्का है.’

साल भर पहले मैं वैक्सिंग के लिए गई. उसने कहा, आज बहुत कस्टमर हैं. कल आ जाना तो बेहतर होगा. मैंने कहा, नहीं, कल एक इंटरव्यू है. लड़की ने झट से जवाब दिया, ‘बिकिनी वैक्स करा लो, सेलेक्शन पक्का है.’ और हल्के से आंख मार दी. ये बात ऑफेंसिव हो सकती थी. परोक्ष रूप से न सिर्फ मुझे रंडी कहा गया था, बल्कि उसमें ये अर्थ छिपा हुआ था कि औरत को दिमागी रूप से कुशल होने के जरूरत ही नहीं है. अगर वो चिकने बदन के साथ, अच्छे से तैयार होकर जाए. और इंटरव्यू लेने वाले को अच्छा सेक्स दे सके, तो सिलेक्शन पक्का है. और ये बोलते वक़्त वो मुझे कोई ‘बुरी’ लड़की नहीं समझती. बल्कि उसकी आवाज का कॉन्फिडेंस और गर्व ये बताता है कि कोई औरत अगर इतनी खूबसूरत और सेक्स में इतनी कुशल हो कि मर्द बिना उसका इम्तेहान लिए उसे नौकरी दे दे, तो ये अच्छी बात होगी.

लेकिन मैं ऑफेंड नहीं हुई. कोई और औरत किसी और माहौल में ये बात कहती तो ऑफेंड हो जाती. कोई पुरुष कहता तो भी ऑफेंड हो जाती. पर जैसे होली में गंदा वाला मजाक करना स्वीकार्य होता है. शादियों में ‘गाली’ गाना स्वीकार्य होता है, वैसे ब्यूटी पार्लर जैसे स्पेस में इस तरह की बात कहना स्वीकार्य हो जाता है. यहां बात नारीवाद की नहीं है. यहां बात उस नैतिकता से दूर जाने की है, जो विशेषकर औरतों को जकड़कर रखती है. ये लड़कियां बाहर जाकर किसी से नहीं कह सकतीं कि नौकरी पाने के लिए सेक्स कर लो. ये ठीक उस तरह है जैसे एक पुरुष दूसरे पुरुष से प्रेम और दोस्ती में कहता है कि ‘इतना प्यार आ रहा है जी कर रहा है तेरी गां* मार लूं’. दूसरा पुरुष ऑफेंड होने के बजाय हंस पड़ता है. इस वाक्य का छिपा हुआ मतलब भले ही ये हो कि पुरुष दूसरे का रेप करने की बात कह रहा है, असल में ये दुनिया की नैतिकता से दूर भागने का जरिया भर है. जो बात दुनिया के सामने नहीं कह सकते, वो किसी एक से अकेले कह लेना एक अजीब सी आत्मीयता का एहसास दिलाता है. भले ही कही जाने वाई चीज गाली ही क्यों न हो.

दीदी, आपके पांव तो बहुत सेक्सी हैं.

बिकिनी वैक्स करा लो.

ये ब्रा नई खरीदी है?

नए हेयरकट में माल लग रहे हो दीदी.

कस्टमर के लिए ये सब सुनना आम बात है. एक लड़की के मुंह से ये बात सुनकर औरत को डरा हुआ नहीं महसूस होता. क्योंकि उसे मालूम है कि सामने वाली लड़की उसे नुकसान नहीं पहुंचाएगी. लेकिन कोई पुरुष अगर यही बात करे तो वो डर जाएगी, क्योंकि पुरुष और औरत के बीच नैतिकता कि एक ऐसी दीवार होती है कि खूबसूरत को खूबसूरत कहना भी यूं सुनाई पड़ता है कि सामने वाला सेक्स की मांग कर रहा हो. सामने वाली औरत मुझसे कहे कि आज साड़ी में बला की खूबसूरत लग रही हो, तो गले लगा लूंगी. पुरुष यही मैसेज में भेज दे तो शायद उसे ब्लॉक कर दूं, क्योंकि मात्र उसका पुरुष होना मुझे उसकी नीयत पर शक करने के लिए उकसा देता है. यही हमारे समाज की सबसे बड़ी हार है.

ब्यूटी पार्लर में जब भैया सामान देने आते हैं, खुद असहज से रहते हैं. लड़कियों की गंध में इकलौता पुरुष होना भैया को अजीब महसूस करवाता है. भैया खुद ही सर झुकाए निकल जाते हैं. ये भेद महंगे बड़े पार्लर में नहीं मिलता, जहां पुरुष औरतों के बाल काटते हैं. क्योंकि पैसे दे पाने की काबिलियत के साथ नैतिकता गायब होती जाती है. ‘गायब’ के माने ‘खत्म’ होना नहीं. कहने का अर्थ ये है कि नैतिकता अब सोच का मसला नहीं होता. इसलिए एक महंगे पार्लर वाली कभी अपने कस्टमर को ‘दीदी’ नहीं कहती, ‘माल’ तो दूर की बात है. ये नए पूंजीवादी, वैयक्तिक समाज का चरित्र है, जो खुद को नैतिक-अनैतिक से दूर रखता है.

इन ब्यूटी पार्लर में जाने कितने शरीर और मन मुक्त हो रहे होते हैं. पीरियड नहीं हो रहे, प्रेगनेंसी में तकलीफ है, पति दारूबाज है, शादी के पहले कैसी ब्रा खरीदूं फलाना लड़का मुझे देख मुस्कुराता है जाने कितनी बातें होती हैं. ‘आज मुझे पेट में बहुत दर्द है’ से लेकर सास ने मुझसे अचार डलवाया तक. जैसे जैसे ये छोटे पार्लर खतम हो रहे हैं. घरेलू औरतों के संवाद की एक स्पेस खत्म हो रही है.


 

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