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ससुर के सामने बहू पेट फुलाए, मैक्सी पहने घूमे, अच्छा लगता है क्या?

pp ka column

फलाने की बिटिया घर आई हुई है. उसके ‘कुछ है’.

मुश्किल नहीं ‘कुछ है’ का मतलब समझना. फलाने की बिटिया घर आई हुई है क्योंकि ‘कुछ’ होने के दौरान ज्यादा काम करना अच्छी बात नहीं. लेकिन ससुराल में रहकर काम नहीं करेगी तो अच्छा नहीं लगेगा. फिर ये भी तो अच्छा नहीं लगेगा कि ससुर के सामने मैक्सी पहनकर, पेट फुलाकर घूमे. इसलिए फलाने की बिटिया मायके आ गई है. सास से सेवा करवाना अच्छी बात नहीं, इसलिए उसकी मां उसका खयाल रखेगी.

अजीब सी शर्म जुड़ी है प्रेग्नेंसी के साथ. पुरानी फिल्मों के वो सीन याद आते हैं जब पत्नी पति के सामने शरमा के मुस्कुरा भर देती थी. कभी पेट पर पति का हाथ रख इशारा कर देती थी. बस समझ जाओ कि प्रेगनेंट हूं. शरमा रही हूं क्योंकि मेरी प्रेग्नेंसी से फिल्म देखने वालों को ये पता चल जाएगा कि हमने सेक्स किया था.

हालांकि प्रेग्नेंसी छिपाने की इकलौती वजह शर्म नहीं है. कहते हैं पेट में पल रहे बच्चे को किसी की नजर न लगे, इसलिए औरत को बाहर नहीं जाने देते. किसी के सामने नहीं आने देते. जितने दिन तक बिना बताए काम चल जाए, उतने दिल चला लिया जाता. जब पेट बाहर आता तो अपने आप पता चल जाता. एक औरत दूसरे के कान में बताती, दूसरी तीसरी के. पुरुषों को उनकी पत्नियां बतातीं. मुझे नहीं लगता हमारे गांवों, या शहरों में भी अभी लोग इतने सहज हैं कि बहू टेस्ट करवाकर लौटे, और घर में आकर प्रेग्नेंसी की अनाउंसमेंट कर सके.

और प्रेग्नेंसी के माने किसी तरह की छूट नहीं. ससुराल में रहते हुए तब तक औरतें काम करती हैं, जबतक लेबर पेन न शुरू हो जाए. भारी बाल्टियां उठाती हैं, झुककर पोंछा लगाती हैं. फिर अगर लड़का हुआ तो ठीक. सास हरेरा से लेकर सोंठ के लड्डू तक, 75 तरह की चीजें खिलाती हैं. ब्राह्मण के घर पैदा हुआ हो तो ब्राह्मण भोज करवाया जाता है. बेटी हुई तो ‘ठीक है, लक्ष्मी आई है’ पर बात ख़त्म हो जाती है. डिलीवरी के बाद बहू का पुराना जीवन फिर से शुरू.

पर ये गृहशोभा की दुनिया है.

एक और दुनिया है, फेमिना और कॉस्मोपॉलिटन वाली. जिसके जैसी हमारी औरतें होना चाहती हैं. ट्रेन में चढ़ने से पहले ये मैगजीनें उठाने वाली औरतों के अंदर एक इच्छा होती है, वैसा ही दिखने की जैसा मैगजीन के चिकने पन्नों में छपा होता है. एक अच्छी सी ड्रेस, उसके साथ मैचिंग बैग और ब्रेसलेट डालकर ऑफिस जाने वाली औरतें. इन्हें अपनी प्रेगनेंसी को लेकर शर्म नहीं लगती. इन्हें लगता है अपने बेबी बंप की तस्वीर क्लिक कर ये फेसबुक पर डालें. ठीक करीना कपूर खान या जेनीलिया डिसूजा देशमुख की तरह.

प्रेगनेंसी के बारे में बात करने का एक ये भी तरीका है कि उसे ‘वुमन पावर’ से जोड़ा जाए. ये तो एक औरत की शक्ति है, जो बच्चे पैदा कर सकती है. पुरुषों के पास इतनी शक्ति कहां. ये वरदान है मातृत्व का, जो केवल औरतों को मिला है. हम स्ट्रॉन्ग औरतें न केवल ऑफिस का काम करती हैं, बल्कि घर भी संभालती हैं. इसके साथ हम बच्चे पैदा कर उन्हें पालती भी हैं. हमारी प्रेग्नेंसी के बारे में दुनिया जाने. हमारा फोटोशूट हो. हम इसके बारे में फेसबुक पर लिखें. क्योंकि ये जो काम हम कर रहे हैं, ये महान है.

पहला पीरियड मिस होने से लेकर डिलीवरी तक डॉक्टर के बताए हुए नियमों पर चलती हैं. भरपूर आराम करती हैं. लेबर पेन के दौरान पति से लेकर मां-बाप सबको कष्ट होता है. मां कहती है, आप सर्जरी ही कर दें. मेरी बच्ची को दर्द से मुक्ति मिले. आजकल कई दफे डॉक्टर आपको कन्विंस कर ले जाते हैं कि सर्जरी ही इस प्रेग्नेंसी का सॉल्यूशन है. भारी भरकम बिल चुकाकर आप बाहर निकलते हैं. बेटे और बेटी की होने पर बराबर खुश होती है. अस्पताल के कमरे बच्चों के बायोलॉजिकल सेक्स के मुताबिक़ सजाए जाते हैं. लड़का है तो ब्लू, लड़की है तो पिंक.

किड्स सेक्शन में बेटी और बेटे के लिए अलग अलग खिलौने लेते हैं. अलग अलग कपड़े लेते हैं. क्योंकि आपको बाजार के नियमों ने सिखाया होता है कि बचपन से उनकी चॉइस में भेद करना सीखो. इस दूसरी दुनिया के लोग शिकार होते हैं ‘मदर-बेबी’ इंडस्ट्री का. जो इंडस्ट्री आपको लगातार बताती है कि आपका काम कितना महान और रिश्ता कितना कोमल है.

लेकिन बच्चे दोनों तरह की औरतें पैदा करती हैं. गांवों से लेकर बड़े शहरों तक औरत के लिए बच्चे पैदा करने की अनिवार्यता कम नहीं होती. भले ही माने बदल जाते हों.

मैं करीना कपूर खान से सहमत हूं, जब वो कहती हैं कि प्रेग्नेंसी एक बड़ी ही नॉर्मल चीज है. इसके बारे में इतना हल्ला क्यों. लेकिन क्या ये इस हद तक नॉर्मल है कि इससे औरत के बच्चा पैदा करने की चॉइस ख़तम हो जाए? इतना नॉर्मल है कि बच्चा पैदा न करना अब्नॉर्मल है? इतना नॉर्मल है कि हर शादीशुदा कपल से बार-बार हर इंसान ‘कम से कम एक तो कर लो’ कहता रहे?

शायद ये सवाल हमें खुद से करना चाहिए कि पेट में चौथा बच्चा लिए 9वें महीने तक बोझा उठाते रहना ‘वुमन पावर’ कैसे है.

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आरामकुर्सी

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