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तमाम पुरुषों के नाम, जिनको रोने की छूट नहीं है

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कुछ साल पहले की बात है. मेरी एक सहेली की अपने बॉयफ्रेंड से लड़ाई हुई. तमाम बहसों के बाद दोनों एक रेस्टोरेंट में मिले. लड़के ने लड़की से कहा कि वो अब इस रिश्ते को ख़त्म करना चाहता है. सहेली इस बात के लिए तैयार नहीं थी. वो रो पड़ी. वो रोई तो लोग उसे देखने लगे. रेस्टोरेंट में सभी को मालूम पड़ गया कि इस कपल में लड़ाई हो रही है.

PP KA COLUMN

बॉयफ्रेंड का ये कहना कि वो ब्रेकअप करना चाहता है, गलत नहीं था. सीधी से बात है, जो रिश्ता आपसे निभ न रहा हो, आप उसे ख़त्म कर दें, ये दोनों के लिए बेहतर होता है. लेकिन लड़के ने ये बात बताने के लिए रेस्टोरेंट जैसी जगह को चुना. वो भी ठीक है, शायद वो अकेले मिलने में असहज महसूस कर रहा हो. लड़की रोई, वो भी ठीक है, क्योंकि जब आपकी संवेदनाओं को धक्का लगता है, आप रोते हैं.

अब मैं बताती हूं कि इसमें क्या ठीक नहीं था. उस लड़के का ये कहना कि तुम पब्लिक में रो क्यों रही हो. तुम मुझे इस तरह ‘एम्बैरेस’ क्यों कर रही हो. क्या तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता कि लोग देख रहे हैं. वो मेरे बारे में क्या सोचेंगे, कैसा जल्लाद हूं मैं. लड़की को रुला रहा हूं. तुम घर पहुंचने तक कंट्रोल नहीं कर सकती क्या? ओह तो तुम इसलिए रो रही हो कि मैं ब्रेकअप न करूं. कितनी ड्रामेबाज़ हो तुम. आंसू तो तुम्हारी आंखों में हमेशा तैनात रहते हैं. जब भी कोई काम निकालना हो, झट से बहा दिए.

एक लंबे समय से हम एक चीज पर विश्वास करते आ रहे हैं कि लड़कियों के पास दो हथियार होते हैं जिनके दम पर वो लड़कों को हमेशा काबू में कर ले जाती हैं. एक, उनकी खूबसूरती. दूसरा, उनका रोना.

मैं अक्सर रोती हूं. कभी किसी वजह से, कभी बेवजह. कभी दुख में, कभी ख़ुशी में. और कभी बस यूं ही कोई गाना सुनते हुए, कोई कविता पढ़ते हुए. मुझे आंसू बड़ी सहजता से आ जाते हैं. कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती. मुझे रोकर यूं नहीं लगता कि ये कोई बड़ा काम है. मुझे पब्लिक में रोने से कोई परहेज नहीं है. और इसी वजह से लोग मुझसे बहुत कुछ कहते हैं.

लोग समझ नहीं पाते कि रोना किसी के लिए सहज चीज हो सकती है. लेकिन ये उनकी गलती नहीं है. हमने ये सीखा है कि रोना एक बुरी चीज है. रोने वाला व्यक्ति कमजोर होता है. और कमजोर होना बुरी बात है. उससे भी ज्यादा हमने ये सीखा है कि रोना एक हथियार है. जिसका उपयोग कर लोग, खासकर लड़कियां ‘विक्टिम कार्ड’ खेलती हैं. रोकर वो डांट खाने से बच सकती हैं. गलतियां छिपा ले जाती हैं. पुरुषों के गुस्से से बच जाती हैं. बड़ी-बड़ी बहसों को वो बिना किसी दलील के जीत जाती हैं क्योंकि उनके रोते ही बहस ख़त्म हो जाती है.

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कुल मिलाकर, हम ये समझते हैं कि रोना और न रोना एक दूसरे के विपरीत है. और जो मैं कहने की कोशिश कर रही हूं वो ये कि रोने और न रोने के बीच की रेखा बहुत हल्की है. जिसे हम अपने दिमाग में बहुत भारी मानते हैं.

रोने को कमज़ोरी मानना और कमज़ोर को बुरा मानना कुछ और नहीं, हमारे पुरुषवादी समाज की देन है. पुरुषवादी समाज, जिसमें युद्ध, लड़ाइयां, क्रोध और हिंसा को कभी कोई कमज़ोरी नहीं कहता, रोने को कमज़ोरी कहता है. जिस लड़की के ब्रेकअप का ज़िक्र मैंने शुरुआत में किया, उसमें लड़के ने ये तो देखा कि लड़की का रोना कितना बेतुका था. मगर ये नहीं देखा कि उसका क्रोध, या पब्लिक प्लेस में प्राइवेट बात करना उससे ज्यादा बेतुका था. असल में पुरुषवाद हमारे लिए तय कर देता है कि बेतुका क्या है. इसलिए हर तरह के पौरुष में तुक होता है, तर्क होता है. लेकिन संवेदनाओं का आंसुओं के सहारे बह जाना तर्कहीन हो जाता है.

पुरुष और स्त्री के बीच होने वाली बहसों में कई बार पुरुषों की आवाज़ ऊंची हो जाती है. वो चीख पड़ते हैं. क्रोधित होते हैं. इन्हीं बहसों में कई बार औरतें टूट जाती हैं, रोने लगती हैं. तब औरत को बताया जाता है कि उसने अपना विक्टिम कार्ड खेल दिया है. मगर चीखने वाले या क्रोधित हुए पुरुष को कभी नहीं कहा जाता कि वो ‘मौखिक हिंसा’ का कार्ड खेल रहा है. अगर बहस में मसला तर्क का है, तो क्रोध भी उतना ही बुरा है न, जितना रोना? मगर हम क्रोध को अपना लेते हैं. रोने से चिढ़ उठते हैं.

Indian policemen cry during the funeral of four slain colleagues in Srinagar March 23, 2008. Four policemen and a militant were killed on Sunday after a gun battle in Kashmir's main city, police said. REUTERS/Danish Ismail (INDIAN-ADMINISTERED KASHMIR)

श्रीनगर में साथी की मौत पर रोता पुलिसवाला (2008). तस्वीर: रॉयटर्स 

रोने से हमारी ये सामूहिक चिढ़, ये सामूहिक डर केवल औरतों नहीं, पुरुषों के लिए भी उतना ही खतरनाक है. मेरे कई पुरुष दोस्तों ने मुझसे कहा है कि वे रोना चाहते हैं, फिर भी रो नहीं पाते. आंसू आते ही नहीं. उन्होंने कभी रोना सीखा ही नहीं. और जो कभी रो पड़ते हैं, उन्हें लोगों ने ‘छक्का’, ‘लड़की’, ‘गे’ कहकर बुरा महसूस करवाया है.

मैं ये नहीं कहती कि रोना एक महान काम है और हमें खूब रोना चाहिए. जो मैं कहना चाहती हूं वो ये है कि अगर आपके सामने कोई रोए तो आप चिढ़ें या चौंकें क्यों? या आप इतना बदहवास क्यों हो जाते हैं कि समझ नहीं पाते कि रोने वाले व्यक्ति से क्या कहें? क्या उसके कंधे पर हाथ रखना, उसे गले लगाना, या उसका हाथ थामना एक सही फैसला होगा? वो रो रहा/रही है तो अब मैं क्या करूं? चुप रहूं या कहीं भाग जाऊं? धरती में समा जाऊं?

मैं बताऊं, कुछ न सूझे तो कुछ न कहिए. मगर रोने वाले को असहज और बुरा मत महसूस करवाइए. जैसे आप पब्लिक में ठहाका लगा कर हंसते हैं, या ट्रैफिक में खीजकर क्रोधित हो जाते हैं, वैसे ही अगला व्यक्ति परेशान होकर रोने लगता है. ये आपकी हंसी या क्रोध जितना ही नॉर्मल है.

जगजीत की आवाज में ग़ालिब की ये मशहूर ग़ज़ल सुन लीजिए.

पीपी के कॉलम को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें:

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