Submit your post

Follow Us

उसकी सलवार में नहीं, हमारी सोच में दाग है

16.73 K
शेयर्स

ओपेन मैगज़ीन के 1 जून के अंक में पढ़ा:

मुंबई के पास के अंबरनाथ गांव में जब 14 की एक बच्ची ने सुसाइड कर लिया, लोगों ने कहा, जरा सी उम्र में पढ़ाई का बोझ बहुत था. बेचारी सह नहीं पाई. लेकिन उसके दोस्तों ने बताया कि लड़की डिप्रेशन का शिकार थी. पीरियड के समय होने वाले दर्द की वजह से हर महीने स्कूल से छुट्टी लेती थी. दर्द इतना बढ़ जाता कि एग्जाम तक छोड़ देती. ये कोई संयोग नहीं, कि जिस समय लड़की ने सुसाइड किया, उसके पीरियड चल रहे थे. लेकिन उसके मां-बाप को अंदाजा ही नहीं था कि उनकी बेटी हर महीने कितना कुछ सह रही थी.

(हेमा देशपांडे, ओपेन मैगजीन के लिए)

बीती साइकल के साथ मेरे पीरियड को 12 साल पूरे हुए. इन 12 सालों में कुल कितनी बार मुझे दर्द के चलते अस्पताल ले जाया गया है, इसकी शायद गिनती भी नहीं की जा सकती. मेरे घर से 500 किलोमीटर दूर होने पर भी मां हर महीने घर बैठे कैलेंडर पर निशान लगाया करती है. क्योंकि मां को आज भी अपने दिन याद हैं. एक किस्सा सुनाया था उन्होंने:

हम अपना किराए का घर बदल रहे थे. घर की बड़ी बेटी होने के नाते घर के सारे काम मेरे हिस्से आते. मेरे पीरियड का पहला दिन था. मम्मी ने हाथ में झाडू दे बगल वाला कमरा बुहारने भेजा. झाड़ू लगाते हुए जोर का दर्द उठा. मैं बिछी हुई खटिया पर लेटी. चक्कर आ गया. जाने कब सो गई. मम्मी बगल के कमरे से आवाज लगाती रहीं. जब मेरी ओर से कोई जवाब नहीं आया, मम्मी कमरे में आईं. मुझे सोता हुआ पाकर झल्ला उठीं. और मुझे नींद में खींच के एक जोर का तमाचा धर दिया. मेरी आंख खुली. लगा सबकुछ घूम रहा है. जैसे-तैसे उठकर मैं फिर झाडू लगाने लगी. मम्मी गुस्से में मुझे आलसी कहते हुए निकल गईं. मेरे पेट में खूब दर्द था. आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे.

तुम्हें लग रहा होगा कि नानी मुझसे इतना सौतेला बर्ताव कैसे कर सकती हैं. लेकिन उनका कोई दोष नहीं था. असल में उन्हें पता ही नहीं था.

नानी को सचमुच पता नहीं रहा होगा. क्योंकि पीरियड को हमारे समाज में समस्या माना ही नहीं जाता. दर्द और आलस को ढोंग माना जाता है. और जो कभी लड़की अपना चिड़चिड़ापन जाहिर कर दे, उसे बर्बाद, जिद्दी, बिगड़ैल और नकचढ़ी कह दिया जाता है.

मैंने कई साल गर्ल्स हॉस्टल में गुजारे हैं. ये देखा है कि किस तरह लड़कियों के बॉयफ्रेंड उन्हें ‘don’t make a big deal out of it’ कहकर पीरियड से जुड़ी उनकी समस्याओं को अवैध साबित कर देते थे. आज भी पीरियड का नाम ले कर नौकरीपेशा औरतों के लिए ऑफिस से छुट्टी लेना कितना बड़ा काम है, समझ सकती हूं. ऐसे में औरतों को मुंह लटकाकर आधे मन से काम करना पड़ता है. या पीरियड को बुखार बताकर छुट्टी लेनी पड़ती है.

पीरियड के समय और उससे पहले होने वाले शारीरिक और मानसिक बदलाव, जिसे हम PMS यानी प्री-मेन्स्ट्रुअल सिंड्रोम कहते हैं. उसपर आज भी बहस जारी है. क्योंकि समाज के एक बड़े हिस्से का मानना है कि ये असल तकलीफ नहीं, बल्कि औरतों की कल्पना का एक हिस्सा है. पीरियड के समय औरत के अंदर की ऊर्जा, जो असल में उसे बच्चे के पोषण में लगानी चाहिए थी, PMS जैसे वाहियात ख़याल बुनने में लगा दी जाती है. ये भी एक मान्यता है. कुछ औरतें पीरियड को ‘बिग डील’ बना देती हैं, ये सिर्फ पुरुषों की ही नहीं, खुद कई औरतों की भी सोच होती है.

कुछ साल पहले अपनी गायनेकॉलॉजिस्ट से बात करते हुए मैंने पाया कि 100 लड़कियों में एक केस ऐसा भी होता है जिन्हें पीरियड के समय लेबर पेन जैसा दर्द होता है. हॉस्टल में अपने अलावा दूसरी लड़कियों को दर्द में जमीन पर लोटते हुए पाया. लेकिन कई ऐसी लड़कियों को भी पाया जिनके पीरियड आ कर चले जाते थे, और उनकी रूममेट तक को खबर नहीं लगती थी. इन लड़कियों के लिए दूसरी लड़कियों का दर्द समझ पाना कई बार मुश्किल होता था. कहने का अर्थ ये है कि ये किन्हीं एक या दो लोगों का दोष नहीं कि पीरियड से जुड़ी तकलीफों को मेडिकल तौर पर तवज्जो नहीं मिलती. ये एक समाज के तौर पर हमारी नाकामी है.

बात डिप्रेशन और सुसाइड की. पीरियड के दिनों में, या उसके पहले उदासी, अपराधबोध, और डर का कारण डॉक्टर शरीर के हॉर्मोन में होने वाले बदलावों को मानते हैं. लेकिन सुसाइड का कारण हॉर्मोन में होने वाले बदलाव नहीं हो सकते. एक आम इंसान की तरह, जिसने दिमाग की कोई पढ़ाई नहीं की है, मैं ये समझती हूं कि आत्महत्या किसी भी व्यक्ति का आखिरी कदम होता है. मुझे नहीं मालूम कि उस 14 साल की लड़की के दिमाग में जान देने के पहले क्या चल रहा था. लेकिन कुछ आंकड़े ज़रूर हैं जो हमें उसके दिमाग में घुसने के लिए एक छोटी सी खिड़की साबित हो सकते हैं.

देश के कई स्कूलों में लड़कियों के लिए टॉयलेट न होना, उनके पढ़ाई छोड़ने का एक बड़ा कारण हैं. UNICEF ने 2015 में एक सर्वे किया, जिसमें पता चला कि उत्तर प्रदेश में लगभग 28 लाख लड़कियां टॉयलेट न होने की वजह से पीरियड के दौरान स्कूल नहीं जा पातीं. और लगभग 19 लाख पीरियड की वजह से स्कूल जाना हमेशा के लिए छोड़ देती हैं. देश भर में एक-चौथाई लड़कियां पीरियड की वजह से स्कूल जाना छोड़ती हैं.

(आंकड़े ओपेन मैगजीन से)

2010 के एक सर्वे के मुताबिक़ देश की हर 100 महिलाओं में से 12 ही सैनिटरी नैपकिन का उपयोग करती हैं. देश में पीरियड की उम्र में होने वाली महिलाओं की संख्या 35 करोड़ से भी ज्यादा है. आप अनुमान लगा सकते हैं कि आज से सिर्फ 6 साल पहले तक कितनी औरतें केवल कपड़ों को धो-सुखा कर उसका बार बार इस्तेमाल कर रही थीं. कपड़े का उपयोग करने के साइड इफ़ेक्ट वेजाइना में खुजली, लाली से लेकर उस जगह के सड़ने और उसमें कीड़े पड़ने तक हो सकते हैं. जी हां, एक ऐसा दृश्य जिसकी कल्पना भर से जी कांप उठता है.

पिछले कुछ दशकों में सरकार ने पोलियो ड्रॉप से लेकर कॉन्डम के प्रचार में खूब पैसे लगाए हैं. आज बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी स्कीमें निकाली जा रही हैं. प्रधानमंत्री लोगों से सब्सिडी छोड़ने की अपील करते हैं. ये सब अच्छे काम हैं. लेकिन देश की करोड़ों महिलाओं से कोई पैड यूज करने की अपील नहीं करता. जिस तरह शौचालय बनवाने की करते हैं. इसके दो ही कारण हो सकते हैं. या तो ये मुद्दा इतना बड़ा माना ही नहीं जाता. या फिर इससे जुड़ी शर्म के कारण इसे छोड़ दिया जाता है.

जब औरतों के सामने मुंह बाए खडीं इस शारीरिक समस्याओं के बारे में लोग बात करने से इतना कतराते हैं, तो मानसिक विषयों पर बात होना तो आने वाले कुछ सालों तक एक असंभव लगता है. यही शर्म, यही चुप्पी औरतों के कलेजे में जहर बनती है. और उन्हें लील लेती है.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में 2009 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक एम्स अस्पताल ने एक सर्वे किया. पोस्ट मॉर्टम के लिए आईं महिलाओं की लाशों में से ऐसे शरीर अलग किए जो 15-45 की उम्र के बीच के थे. उनके यूट्रस से टिशू निकालकर, उनके पीरियड की साइकल का पता लगाया. इस तरह 100 लाशें अलग की गईं. ये उन महिलाओं की थीं, मौत के समय जिनके पीरियड चल रहे थे. और पाया कि इनमें से आधे से ज्यादा औरतों की मौत का कारण सुसाइड था. ये महज संयोग नहीं हो सकता.

पीरियड कई औरतों के लिए एक मेडिकल समस्या है. लेकिन इस समस्या का सुसाइड में बदलना एक समाज के तौर पर हमारी नाकामी है. अपनी औरतों को समझ पाने की, उन्हें बचा पाने की नाकामी है.

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

आरामकुर्सी

16 साल की उम्र में इंदिरा गांधी ने फिरोज़ का पहला प्रपोज़ल ठुकरा दिया था

इंदिरा से अलग होकर फिरोज़ मुस्लिम परिवार की एक महिला के प्रेम में पड़ गए थे. आज बड्डे है.

मोहन भागवत इस तरह बने आरएसएस के चीफ

मोहन भागवत मार्च 2009 में संघ के छठे सरसंघचालक बने, लेकिन इसकी भूमिका साल 2000 में लिखी जा चुकी थी.

अगर जिन्ना की ऐम्बुलेंस का पेट्रोल खत्म न हुआ होता, तो शायद पाकिस्तान इतना बर्बाद न होता

मरते वक्त इतने लाचार हो गए थे जिन्ना कि मुंह पर मक्खियां भिनभिना रही थीं.

वो संत, जो ज़मीन का छठा हिस्सा मांगता था और लोग खुशी-खुशी दे देते थे

गांधी के चुने पहले सत्याग्रही. ज़िंदगी में सिर्फ एक विवाद हुआ. इनका सपना आज भी अधूरा है.

तेज़ी से बढ़ रहा IIPM कैसे ख़त्म हुआ, जिसमें अब शाहरुख खान भी फंस गए हैं

जानिए उस पत्रकार की कहानी, जिसने IIPM के फर्ज़ीवाड़े का महल गिराया.

क्या है मैकमहोन लाइन, जिसके अंदर चीन के लकड़ी का पुल बनाने का दावा कर रहे BJP सांसद?

चीन और भारत के इस बॉर्डर का लंबा और विवादित इतिहास रहा है.

इन तीन औरतों ने इस छोटे से फायदे के लिए 42 बच्चों को मार डाला

एक बच्ची को उल्टा लटकाकर उसका सिर पानी में डाल दिया, उसे तड़पते देखती रहीं.

कहानी संविधान सभा में रहे राजा बहादुर सरदार सिंह की 2,500 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी की

जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाया है.

इंडिया में 'वॉर एंड पीस' पर बवाल मचा है, जानिए लियो टॉल्स्टॉय की किताब में क्या है

चलिए इसी बहाने इस क्लासिक किताब की चर्चा तो हो रही है

भारत का सामान बॉयकॉट करने की धमकी देने वाले पाकिस्तानी ये बात नहीं जानते हैं

ट्विटर पर कोई टॉपिक ट्रेंड कैसे करता है?

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.