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मंटो की बीवी नर्गिस के घर जाने को अपमानजनक क्यों मानती थीं?

ये किस्सा एक संस्मरण है. मंटो का लिखा. नर्गिस के बारे में. जद्दनबाई की बिटिया. राज कपूर की हीरोइन. सुनील दत्त की बीवी. प्रिया, नम्रता और संजय दत्त की मां. ये किस्सा नर्गिस, मंटो की बीवी और सालियों के बीच बुना गया. राजकमल प्रकाशन की किताब ‘मीना बाजार’ से हम आपके लिए लाए हैं. इस किताब में मंटो ने फिल्मी दुनिया की तमाम हस्तियों पर लिखा है. कहना न होगा. खालिस अपनी शैली में. 3 मई को नर्गिस की बरसी होती है. 11 मई को मंटो का जन्मदिन होता है. इस किस्से के ज़रिये दोनों को याद कर रहे हैं.

अब आप मंटो की कलम के हवाले.

*** ** ***
..

“मैं फिल्मिस्तान में कर्मचारी में था. सुबह जाता, तो रात को आठ बजे के करीब लौटता. एक दिन संयोगवश वापसी जल्दी हुई, अर्थात मैं दोपहर के ही करीब घर पहुंच गया. भीतर प्रवेश किया तो सारा वातावरण संगीतमय प्रतीत हुआ, जैसै कोई साज के तार छेड़कर स्वयं छिप गया हो. ड्रेसिंग टेबल के पास मेरी दो सालियां वैसे तो अपने बाल गूंथ रहीं थीं. होंठ दोनों के फड़फड़ा रहे थे, मगर आवाज नहीं निकलती थी. दोनों मिलजुल कर घबराहट की ऐसी तस्वीर पेश कर रही थीं जो अपनी घबराहट छिपाने की खातिर बेमतलब दुपट्टा ओढ़ने की कोशिश कर रही हों. पास वाले कमरे के दरवाजे का पर्दा अंदर से दबा हुआ था.

मैं सोफे पर बैठ गया. दोनों बहनों ने एक-दूसरे की तरफ कसूरवार निगाहों से देखा. हौले-हौले खुसर-फुसर की. फिर दोनों ने एक साथ कहा, “भाजी, सलाम!”
“वालेकुम सलाम !”
मैंने ध्यान से उनकी ओर देखा, “क्या बात है?”
मैंने सोचा कि सब मिलकर सिनेमा जा रही हैं. दोनों ने मेरा सवाल सुनकर फिर खुसुर-फुसुर की. फिर एकदम खिलखिलाकर हंसीं और दूसरे कमरे में भाग गईं .
मैंने सोचा कि शायद उन्होंने अपनी किसी सहेली को आमन्त्रित किया है, वह आने वाली है और चूंकि मैं अचानक चला आया हूं, इसलिए इनका प्रोग्राम गड़बड़ हो गया है.
दूसरे कमरे में कुछ देर तक दोनों बहनों की कानाफूसी चलती रही.
उनकी दबी-दबी हंसी की आवाजें भी आती रहीं. इसके बाद में सबसे बड़ी बहन, यानी मेरी श्रीमती, मुझे सुनाने के लिए कहती हुई बाहर निकली, “मुझे क्या कहती हो, कहना है तो खुद उनसे कहो.”
“सआदत साहब, आज आप बहुत जल्दी आ गए?”
मैंने कारण बता दिया कि स्टूडियो में कोई काम नहीं था, इसलिए चला आया.
फिर अपनी बीवी से पूछा, “क्या कहना चाहती हैं मेरी सालियां?”
“ये कहना चाहती हैं कि नर्गिस आ रही है.”
“तो क्या हुआ, आए! वह क्या पहले कभी नहीं आई?”
मैं समझा वह इस पारसी लड़की की बात कर रही है, जिसकी मां ने एक मुसलमान से शादी कर ली थी और हमारे पड़ोस में रहती थी. मगर मेरी बीवी ने कहा, “हाय , वह पहले कब हमारे यहां आई है?”
“तो क्या ये कोई और नर्गिस है”
“मैं नर्गिस एक्ट्रेस की बात कर रही हूं .
मैने आश्चर्य से पूछा, “वह क्या करने आ रही है यहां?”

मेरी बीवी ने मुझे सारा किस्सा सुनाया. घर में टेलिफोन था, जिसका तीनों बहनें अवकाश के क्षणों में बड़ी उदारता से प्रयोग करती थीं. जब अपनी सहेलियों से बात करते करते थक जातीं, तो किसी किसी अभिनेत्री का नम्बर घुमा देतीं. वह मिल जाती तो उससे ऊटपटांग बातें शुरू हो जातीं, हम आपसे प्रभावित हैं ,”
“आज ही दिल्ली से आई हैं , बड़ी मुश्किल से आपका नम्बर हासिल किया है”, “भेंट करने के लिए तड़प रही हैं”, “जरूर हाजिर होती लेकिन परदे की पाबंदी है”,
“आप बहुत हसीन हैं” ,”गला बड़ा ही सुरीला है”. (“हालांकि उन्हें मालूम नहीं होता कि इसमें अमीरबाई बोलती है या शमशाद)”

आमतौर पर फिल्म ऐक्ट्रेसों के नंबर डायरेक्टरी में दर्ज नहीं होते. वे खुद दर्ज नहीं करातीं, ताकी उनके चाहने वाले बेकार तंग न करें. मगर इन तीनों बहनों ने मेरे दोस्त आगा खलिश कश्मीरी के जरिए करीब करीब इन तमाम एक्ट्रेसों के पते और फोन नम्बर प्राप्त कर लिए थे, जो उन्हें डायरेक्ट्री में नहीं मिले थे.

इस टेलिफोनी खुराफात के दौरान जब उन्होंने नर्गिस को बुलाया और बातचीत की, तो बहुत पसंद आ गई. इस वार्तालाप में उनको अपनी उम्र की आवाज सुनाई दी. अत: कुछ भेंटों और कुछ वार्तालापों में ही वो उससे लूल गईं. मगर अपनी असलियत छिपाए रहीं. एक कहती मैं अफ्रीका की रहने वाली हूं. वहीं दूसरी बार कहती कि लखनऊ से अपनी खाला के पास आई है. दूसरी वह प्रकट करती कि वह रावलपिंडी की रहने वाली है और सिर्फ इसलिए बम्बई आई है कि उसे नर्गिस को एक बार देखना है. तीसरी, यानी मेरी बीवी कभी गुजरातिन बन जाती, कभी पारसन.
टेलिफोन पर कई बार नर्गिस ने झुंझलाकर पूछा कि तुम लोग असल में हो कौन?

क्यों अपना नाम पता छिपाती हो?
साफ-साफ क्यों नहीं बताती कि रोज-रोज की टनटन खत्म हो?

साफ है कि नर्गिस इनसे प्रभावित थी. उसे नि:संदेह अपने सैकड़ों चाहनेवालों के फोन आते होंगे, मगर ये तीन लड़कियां उनसे कुछ भिन्न थीं. इसलिए वह सख्त बेचैन थी कि उनकी असलियत जाने. उनसे मिले-जुले, संपर्क स्थापित करे. अत: अब भी उसे मालूम होता कि इन रहस्यमई लड़कियों ने उसे बुलाया है तो वह सौ काम छोड़कर आती और देर तक टेलिफोन से चिपकी रहती.
एक दिन नर्गिस के अनवरत आग्रह पर ये तय हो गया कि उनकी भेंट होकर रहेगी.

मेरी श्रीमति ने अपने घर का पता अच्छी तरह समझा दिया और कहा कि यदि फिर भी मकान मिलने में कोई परेशानी हो तो बाईकुला के पुल के पास किसी होटल से टेलिफोन कर दिया जाए. वे सब वहां पहुंच जाएंगी.

जब मैंने घर में प्रवेश किया, बाईकुला पुल के एक स्टोर से नर्गिस ने फोन किया था कि वह वहां पहुंच चुकी है लेकिन मकान नहीं मिल रहा. अत: तीनों भागम-भागम की हालत में तैयार हो रहीं थीं कि मैं एक अभिशाप के रूप में पहुंच गया.

छोटी दो का खयाल था कि मैं नाराज होऊंगा. बड़ी यानी मेरी बीवी केवल बौखलाई हुई थी कि यह सब क्या हुआ है? मैंने नाराज होने की कोशिश की, मगर मुझे इसके लिए कोई यथेष्ट और उचित कारण नहीं मिला. सारा किस्सा काफी दिलचस्प और बेहद मासूम था. यदि “कान-मिचौनी” की यह हरकत केवल मेरी श्रीमति द्वारा की गई होती तो बिल्कुल जुदा बात थी.

पूरा घर ही उनका था. एक साली आधी घरवाली होती है और यहां दो सालियां थीं.
मैं जब उठा, तो दूसरे कमरे में खुश होने और तालियां बजाने की आवाजें बुलंद हुईं.

बाईकुला के चौक में जद्दनबाई की लम्बी-चौड़ी मोटर खड़ी थी. मैंने सलाम किया, तो उन्होंने हस्व-मामूल बड़ी ऊंची आवाज में उसका उत्तर दिया और पूछा, “कहो, मंटो कैसे हो?”

जद्दनबाई ने पिछली सीट पर बैठी हुई नर्गिस की ओर देखा, “कुछ नहीं, बेबी को अपनी सहेलियों से मिलना था मगर उनका मकान नहीं मिल रहा.”
मैंने मुस्कुराकर कहा, “चलिए, मैं आपको ले चलूं.”
नर्गिस यह सुनकर खिड़की के पास आ गई, “आपको उनका मकान मालूम है?”
मैंने और अधिक मुस्कुराकर कहा, “अपना मकान कौन भूल सकता है?”
जद्दनबाई के गले ने विचित्र सी आवाज निकाली. पान के बीड़े को दूलरे कल्ले में बदलते हुए कहा , “यह तुम क्या कहनीकारी कर रहे हो?”
मैं दरवाजा खोलकर जद्दनबाई के पास गया, “बीबी! यह अफसानागिरी मेरी नहीं, मेरी बीवी और उसकी बहनों की है.”
इसके बाद मैंने संक्षेप मे सारी घटनाओं का उल्लेख कर दिया. नर्गिस बड़ी दिलचस्पी से सुनती रहीं. जद्दनबाई को बड़ी कोफ्त, बड़ी परेशानी हुई.

“ये कैसी लड़कियां हैं! पहले ही दिन कह दिया होता कि हम मंटो के घर से बोल रही हैं. खुदा की कसम ! बेचारी बेबी को इतनी उलझन होती थी कि मैं तुमसे क्या कहूं! जब टेलिफोन आता, तो भागी-भागी जाती. मैं बार बार पूछती, यह कौन है जिससे इतनी देर मीठी मीठी बातें होती हैं? मुझसे कहती जानती नहीं कौन हैं, मगर बड़ी अच्छी हैं. दो-एक बार मैंने भी टेलिफोन उठाया. बातचीत बड़ी सुंदर थी. मगर माफ करना, कमबख्त अपना नाम पता साफ साफ बताती ही नहीं थीं.

आज बेबी आईं और खुशी से दीवानी हो रही थी. कहने लगी बीबी उन्होंने बुलाया है. अपना ऐड्रेस दे दिया है. मैंने कहा, पागल हुई हो. हटो, जाने कौन हैं, कौन नहीं हैं. पर इसने मेरी एक न मानी. बस पीछे पड़ गई. इसलिए मुझे साथ आना ही पड़ा. खुदा की कसम अगर ये मालूम होता कि ये आफतें तुम्हारे घर की हैं ……”
मैंने बात काटकर कहा, “तो साथ में आप नाजिल न होतीं.
जद्दनबाई के कल्ले में दबे हुए पान में चौड़ी मुस्कुराहट पैदा हुई. “इसकी जरूरत ही क्या थी, मैं क्या तुम्हें नहीं जानती?”
स्वर्गीय जद्दनबाई को उर्दू साहित्य से बड़ा प्रेम था, मेरे लेख, कहानियां आदि बड़े भाव से पढ़ती और पसंद करती थीं. उन दिनों मेरा एक लेख “साकी” में प्रकाशित हुआ था, संभवत:- “प्रगतिशील कब्रिस्तान”. मालूम नहीं उनका मन क्यों इस ओर चला गया. बोलीं, “खुदी की कसम, मंटो, बहुत सुन्दर लिखते हो!
जालिम, क्या व्यंग्य किया है लेख में. क्यों बेबी, उस दिन क्या हाल हुआ था मेरा वह लेख पढ़कर. मगर नर्गिस अपनी नई सहेलियों के बारे में सोच रही थीं. व्याकुलतापूर्ण स्वर में उसने अपनी मां से कहा, “चलो बीबी.”
जद्दनबाई ने मुझसे कहा, “चलो भाई.”

घर पास ही था. मोटर स्टार्ट हुई और हम पहुंच गए. ऊपर तीनों ने बालकनी से हमें देखा. छोटी दोनों का खुशी के मारे बुरा हाल हो रहा था. खुदा जाने आपस में क्या खुसर-फुसर कर रही थीं. जब हम ऊपर पहुंचे तो विचित्र रीति से सबकी भेंट हुई. नर्गिस अपनी हम उम्र लड़कियों के साथ दूसरे कमरे में चली गईं.

बहुत देर तक विभिन्न दृष्टिकोणों से “कान-मिचौनी” के सिलसिले की समालोचना की गई. मेरी बीवी की बौखलाहट जब किसी कदर कम हुई तो उसने आथित्य-सत्कार का कर्तव्य निभाना आरंभ किया. मैं और जद्दनबाई फिल्म उद्योग की समस्याओं पर विचार-विमर्श करते रहे.
पान खाने के मामले में वो बड़ी खुशणोंक थीं. हर समय अपनी पानदानी साथ रखती थीं. बड़ी देर के बाद मौका मिला था इसलिए मैंने उस पर खूब हाथ साफ किया. नर्गिस को मैंने काफी दिनों के बाद देखा था.

दस-ग्यारह बरस की बच्ची थी, जब मैंने एक दो फिल्मों की नुमाइश में उसे अपनी मां की उंगली के साथ लिपटी देखा था. चुंधियाई हुई आंखों, आकर्षणहीन सा लंबा चेहरा, सूखी-सूखी टांगें, ऐसा मालूम होता था कि सोकर उठी है या सोने वाली है. मगर अब वह जवान लड़की थी. उम्र ने उसके खाली स्थान भर दिए थे. मगर आंखें वैसी की वैसी थीं , छोटी और स्वप्नमई, बीमार-बीमार. मैंने सोचा इस खयाल से उसका नाम नर्गिस उपयुक्त और सही है. तबीयत में बेहद ही मासूम खलडरापन था. बार-बार अपनी नाक पोंछती थी, जैसे निरंतर जुकाम से पीड़ित हो. (‘बरसात’ फिल्म में इसकी यह बात अदा की तरह पेश की गई है)

किन्तु नर्गिस के उदास उदास चेहरे से यह स्पष्ट था कि वह अपने अंदर कलाकारी का जौहर रखती है. होंठो को किसी तरह भींचकर बात करने और मुस्कुराने में एक बनावट थी, मगर साफ पता चलता था कि वह बनावट श्रृंगार का रूप धारण करके रहेगी. आखिर कलाकारी की बुनियादें बनावट पर ही तो निर्भर होती हैं.

एक बात जो विशेष रूप से मैंने महसूस की, वह यह है कि नर्गिस को इस बात का अहसास था कि वह एक दिन बहुत बड़ी स्टार बनने वाली है, स्टार बनकर फ़िल्मी दुनिया पर चमकने वाली है. मगर यह दिन निकट लाने और उसे देखकर प्रसन्न होने की उसे कोई जल्दी नहीं थी. इसके अतिरिक्त अपने बचपन की नन्हीं-मुन्नी खुशियां घसीटकर वह बड़ी-बड़ी, विहंगम खुशियों के दायरे में नहीं ले जाना चाहती थी.

तीनों हम-उम्र लड़कियां दूसरे कमरे में जो बातें कर रही थीं, उनका दायरा घर की चारदीवारी तक महदूद था. फिल्म-स्टूडियो में क्या होता है, रोमांस क्या बला है, इससे उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं थी. नर्गिस भूल गयी थी कि वह फिल्म-स्टार है, परदे पर जिसकी अदाएं बिकती हैं. और उसकी सहेलियां भी भूल गयीं थीं कि नर्गिस स्क्रीन पर बुरी हरकतें करनेवाली अभिनेत्री है.

मेरी बीवी, जो उम्र में नर्गिस से बड़ी थी, अब उसके आगमन पर बिल्कुल बदल गयी थी. उसका व्यवहार उससे ऐसा ही था, जैसा अपनी छोटी बहनों से था. पहले उसको नर्गिस से इसलिए दिलचस्पी थी कि वह फिल्म एक्ट्रेस है, परदे पर बड़ी कुशलता से नित्य नए-नए मर्दों से प्रेम करती है, हंसती है, ठंडी आहें भरती है, कहकहे लगाती है. अब उसे ख्याल था कि वह खट्टी चीज़ें न खाए, ज्यादा ठंडा पानी न पिए, अधिक फिल्मों में काम न करे, अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखे. अब उसकी दृष्टि में नर्गिस का फिल्मों में काम करना कोई लज्जास्पद बात न थी.
इधर-उधर की बातों के बाद नर्गिस से मांग की गयी कि वह गाना सुनाए. इस पर जद्दनबाई ने कहा, “मैंने इसको संगीत की शिक्षा नहीं दी. मोहनबाबू इसके खिलाफ थे और सच पूछिए, तो मुझे भी पसंद नहीं था. थोड़ी बहुत टूं-टां कर लेती है.” इसके बाद वह अपनी बेटी से मुखातिब हुईं, “सूना दो, बेबी ! जैसा भी आता है, सुना दो.”

नर्गिस ने बड़ी ही अबोध रीति से गाना आरम्भ कर दिया- परले दरजे की कनसुरी आवाज़ में रस, न लोच. मेरी छोटी साली उससे कई गुना अच्छा गाती थी. मगर मांग की गयी थी नर्गिस से और वह भी आग्रह-पूर्वक, इसलिए दो-तीन मिनट तक उसका गाना सहन करना ही पड़ा. जब उसने समाप्त किया, तो सबने प्रशंसा की. थोड़ी देर के बाद जद्दनबाई ने छुट्टी चाही. लड़कियां नर्गिस से गले मिलीं. दुबारा मिलने के वायदे हुए. कुछ खुसुर-फुसुर हुई और हमारे अतिथि चले गए.

नर्गिस से यह मेरी पहली मुलाकात थी. लड़कियां टेलीफोन करती थीं और नर्गिस अकेली मोटर में चली आती. इस आवागमन में उसके अभिनेत्री होने का कॉम्प्लेक्स लगभग मिट गया. वह लड़कियों से और लड़कियां उससे यूं मिलती, जैसे वह उनकी बहुत पुरानी सहेली है, या कोई रिश्तेदार है. लेकिन जब वह चली जाती, तो कभी-कभी तीनों बहनें आश्चर्य प्रकट करतीं- खुदा की कसम ! अजीब बात है कि नर्गिस बिल्कुल एक्ट्रेस मालूम नहीं होती!

इस दौरान तीनों बहनों ने उसकी एक ताज़ा फिल्म देखी, जिसमें प्रकट है कि वह अपने हीरो की प्रेमिका थी, जिससे वह प्यार और मुहब्बत की बातें करती थी और उसे विचित्र निगाहों से देखती थी, उसके साथ लगकर खड़ी होती थी, उसका हाथ दबाती थी. मेरी बीवी कहती, “कमबख्त उसके फ़िराक में कैसी लम्बी लम्बी आहें भर रही थी, जैसे सचमुच उसके इश्क में गिरफ्तार है !” और उसकी दो छोटी बहनें अपने कुंवारे, एक्टिंग से अनभिज्ञ दिलों में सोचती, ‘और वह कल हमसे पूछ रही थी कि गुड़ की भेली कैसे बनती है!”

नर्गिस की कलाकारी के बारे में मेरा विचार बिल्कुल दूसरा था. निश्चित रूप से भावनाओं एवं अनुभूतियों का अभिनय वह सही तौर पर नहीं करती थी. मुहबब्त की नब्ज किस तरह चलती है, यह अनाड़ी उंगलियां कैसे अनुभव कर सकती हैं? इश्क की दौड़ में थककर हांफना और स्कूल की दौड़ में थककर सांस का फूल जाना, दो अलग चीज़ें हैं. मेरा विचार है कि स्वयं नर्गिस भी इसके अंतर और भेद से परिचित नहीं थी. नर्गिस के शुरू-शुरू के फिल्मों में जानकार निगाहें फ़ौरन मालूम कर सकती हैं कि उसकी कलाकारी ‘फ़रेबकारी’ से मुक्त थी.

कलाकार का यह कमाल है कि कलाकारी में बनावट की मिलावट मालूम न हो. लेकिन नर्गिस की कलाकारी की बुनियादें चूंकि अनुभव पर आधारित नहीं थी, अतः उसमें यह विशेषता नहीं थी. यह केवल उसकी लगन थी कि वह भावनाओं और अनुभूतियों का सफल अभिनय न कर सकने के बावजूद अपना काम निभा जाती थी. उम्र और अनुभव के साथ-साथ अब वह बहुत पुख्तगी अख्तियार कर चुकी है. अब उसको इश्क की दौड़ और स्कूल की एक मिल की दौड़ में थककर हांफने का रहस्य और भेद मालूम है. अब तो उसको सांस के हलके-से-हलके उतार-चढ़ाव की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि भी ज्ञात है.

यह बहुत अच्छा हुआ कि उसने कलाकारी की मंजिलें धीरे-धीरे तय कीं. अगर वह एक ही छलांग में आखिरी मंजिल पर पहुंच जाती, तो फिल्म देखनेवाले समझदार लोगों और दर्शकों के जज्बात को बहुत ही गंवार क़िस्म का दुःख पहुंचता. और यदि लड़कपन की अवस्था में परदे से अलग, व्यक्तिगत जीवन में भी वह अभिनेत्री बनी रहती और अपनी आयु को मक्कार और चालाक बजाजों के गज से नापकर दिखाती, तो मैं इस आघात की ताब न लाकर निस्संदेह मर गया होता !

नर्गिस ने ऐसे घराने में जन्म लिया था कि उसको येन-केन-प्रकारेण अभिनेत्री बनना ही था. जद्दनबाई के गले में बुढ़ापे का घुंघरू बोल रहा था. उनके दो पुत्र थे, किन्तु उनका सारा ध्यान और सारा प्रेम नर्गिस पर ही केन्द्रित था. उसकी शक्ल व सूरत साधारण थी. गले में सुर की उत्पत्ति की भी कोई संभावना न थी, परन्तु जद्दनबाई जानती थीं कि सुर उत्पन्न किया जा सकता है और साधारण शक्ल व सूरत में भी आतंरिक प्रकाश से, जिसे जौहर कहते हैं, आकर्षण और दिलकशी पैदा की जा सकती है. यही वजह है कि उन्होंने जान मारकर उसकी परवरिश की और कांच के अत्यंत कोमल और छोटे-छोटे कण जोड़कर अपने सुनहरे स्वप्न को साकार किया.

जद्दनबाई थीं. उनकी मां थीं. उनका मोहनबाबू था. बेबी नर्गिस थी. उसके दो भाई थे. इतना बड़ा कुनबा था, जिसका बोझ सिर्फ जद्दनबाई के कन्धों पर था. मोहनबाबू एक बड़े रईसजादे थे. जद्दनबाई के गले के स्वरों और कोकिल-कंठ के जादू में ऐसे उलझे कि दीन-दुनिया का होश न रहा. खूबसूरत थे. शिक्षित थे. स्वस्थ थे. लेकिन ये सब दौलतें जद्दनबाई के दर पर भिखारी बन गईं. जद्दनबाई का उस ज़माने में डंका बजता था. बड़े-बड़े खानदानी नवाब और राजे उनके मुजरों पर सोने और चांदी की बारिश करते थे. मगर जब बारिशें थम जातीं और आकाश निखर जाता, तो जद्दनबाई अपने मोहन को सीने से लगा लेतीं कि उसी मोहन के पास उनका दिल था !

मोहनबाबू अपने अंतिम समय तक जद्दनबाई के साथ थे. वह उनका बड़ा सम्मान और आदर करती थीं, इसलिए कि वह राजाओं और नवाबों की दौलत में गरीब के खून की बू सूंघ चुकी थीं. उनको अच्छी तरह मालूम था कि उनके इश्क की धारा एक ही दिशा को नहीं बहती. वह मोहनबाबू से प्रेम करती थीं कि वह उनके बच्चों का बाप था.

विचारों के बहाव में जाने किधर बह गया….नर्गिस को, बहरहाल, एक्ट्रेस बनना था, चुनांचे वह बन गयी. उसके उन्नति के शिखर पर पहुंचने का रहस्य -जहां तक मैं समझता हूं -उसकी ईमानदारी है, उसका साहस है, जो कदम-ब-कदम, मंजिल-ब-मंजिल उसके साथ रहा है.

एक बात जो इन भेंटों में विशेष रूप से मैंने महसूस की, वह यह है कि नर्गिस को इस बात का एहसास था कि जिन लड़कियों से वह मिलती है, वे किसी अन्य प्रकार के पानी और फूल, माटी और वायु से बनी हैं. वह उनके पास आती थीं और घंटों उनसे मासूम ढंग की बातें करती थी. उसको शायद यह भय था कि वे उसका निमंत्रण ठुकरा देंगी. वे कहेंगी कि वे उसके यहां कैसे जा सकती हैं? मैं एक दिन घर पर मौजूद था कि उसने सरसरी तौर पर अपनी सहेलियों से कहा, “अब कभी तुम भी हमारे घर आओ.”

यह सुनकर तीनों बहनों ने बड़े ही भौंडेपन से एक- दूसरे की ओर देखा. वे शायद यह सोच रही थीं कि हम नर्गिस की यह दावत कैसे स्वीकार कर सकती हैं? परन्तु मेरी बीवी चूंकि मेरे विचारों से परिचित थी, इसलिए एक दिन नर्गिस के लगातार आग्रह पर उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया गया और मुझे बताये बिना तीनों उसके घर चली गयीं.

नर्गिस ने अपनी कार भेज दी थी. जब वे बम्बई के खूबसूरत स्थान मेरीन ड्राइव के उस फ़्लैट में पहुंची, जहां नर्गिस रहती थी, तो उन्होंने अनुभव किया कि उनके आगमन पर विशेष प्रबंध किया गया है. मोहनबाबू और उनके दो नौजवान लड़कों को आगाह कर दिया गया था कि वे घर में प्रवेश न करें, क्योंकि नर्गिस की सहेलियां आ रही हैं. पुरुष नौकरों को भी उस कमरे में आने की अनुमति नहीं थी, जहां इन ‘सम्मानित’ मेहमानों को ठहराया गया था. स्वयं जद्दनबाई थोड़ी देर के लिए औपचारिक तौर पर उनके पास बैठीं और फिर अंदर चली गयीं. वह उनकी अबोध गुफ्तगू में हायल नहीं होना चाहती थीं.

तीनों बहनों का कहना है कि नर्गिस उनके आगमन पर फूले न समाती थी. वह इतनी ज्यादा खुश थी कि बार-बार घबरा-सी जाती थी. अपनी सहेलियों के सत्कार में उसने बड़े जोश और उत्साह का प्रदर्शन किया. पास ही पीरजैन डेरी थी, जिसके मिल्क शेक मशहूर थे. गाड़ी में जाकर नर्गिस स्वयं यह सामान जग में तैयार कराके लायी, क्योंकि वह यह काम नौकर के सुपुर्द नहीं करना चाहती थी, इसलिए कि इस बहाने से नौकर के भीतर आने की संभावना को बल मिलता था.

आतिथ्य-सत्कार के इस जोश व खरोश में नर्गिस ने अपने नए सेट का गिलास तोड़ दिया. मेहमानों ने अफ़सोस जाहिर किया, तो नर्गिस ने कहा, “कोई बात नहीं, बीबी गुस्सा होंगी, मगर डैडी उनको चुप करा देंगे और मामला ठीक हो जाएगा.”

मोहनबाबू को उससे और उसको मोहनबाबू से मुहब्बत थी. मिल्क शेक पिलाने के बाद नर्गिस ने मेहमानों को अपना एल्बम दिखाया, जिसमें उसकी विभिन्न फिल्मों के ‘स्टिल’ थे. उस नर्गिस में, जो उनको ये फोटो दिखा रही थी और उस नर्गिस में, जो इन तस्वीरों में मौजूद थी, कितना अंतर था ! तीनों बहनें कभी उसकी ओर देखतीं और कभी एल्बम के पृष्ठों की ओर और अपने विस्मय को इस प्रकार प्रकट करतीं, “नर्गिस, तुम यह नर्गिस कैसे बन जाती हो ?”
नर्गिस जवाब में केवल मुस्कुरा देती.

मेरी बीवी ने मुझे बताया कि घर में नर्गिस की हर हरकत, हर अदा में अल्हड़पन था. उसमें वह शोखी, वह तर्रारी, वह तीखापन नहीं था, जो परदे पर उसमें दिखायी देता है. वह बड़ी ही घरेलू किस्म की लड़की थी. मैंने खुद यही महसूस किया था. लेकिन जाने क्यों, उसकी छोटी-छोटी आंखों में मुझे एक विचित्र प्रकार की उदासी तैरती नजर आती थी, जैसे कोई लावारिश लाश तालाब के ठहरे पानी पर हवा के हल्के-हल्के झोंकों से बहती होती है !

यह निश्चय था की जिस मंजिल पर नर्गिस को पहुंचना था, वह कुछ अधिक दूर नहीं थी. भाग्य अपना निर्णय उसके पक्ष में करके सारे संबंधित कागजात उसके हवाले कर चुका था. लेकिन फिर वह क्यों चिंतित और संतप्त थी? क्या अज्ञान के तौर पर वह यह महसूस तो नहीं कर रही थी कि इश्क और मुहब्बत का यह कृत्रिम खेल खेलते-खेलते एक दिन वह किसी ऐसे जलशून्य, निर्जन रेगिस्तान में निकल जाएगी, जहां रेत-ही-रेत, धूल-ही-धूल होगी. प्यास से उसका कंठ सूख रहा होगा और क्षितिज पर छोटी-छोटी बदलियों के स्तनों में केवल इसलिए दूध नहीं उतरेगा कि वे ख्याल करेंगी कि नर्गिस की प्यास केवल बनावट है. धरती की कोख में पानी की बूंदें और अधिक अंदर को सिमट जाएंगी. इस विचार से कि उसकी प्यास महज एक दिखावा है और यह भी हो सकता है कि स्वयं नर्गिस भी यह महसूस करने लगे कि मेरी प्यास कहीं झूठी तो नहीं?

इतने बरस बीत जाने पर, मैं अब उसे स्क्रीन पर देखता हूं, तो मुझे उसकी उदासी कुछ अजीब-सी लगती है. पहले उसमें एक निश्चित खोज थी, लेकिन अब खोज भी उदास और कुंठित हो गयी है. क्यों ? इसका उत्तर स्वयं नर्गिस ही दे सकती है.

तीनों बहनें चूंकि चोरी-चोरी नर्गिस के यहां गयी थीं, इसलिए वे अधिक देर तक उसके पास न बैठ सकीं. छोटी दो को यह अंदेशा था कि ऐसा न हो कि मुझे इसका पता हो जाए. अतः उन्होंने नर्गिस से विदा चाही और वापस घर आ गयीं.

नर्गिस के सम्बन्ध में वे जब भी बात करतीं, घूम-फिरकर उसके विवाह की समस्या पर आ जातीं. छोटी दो को यह जानने की इच्छा थी कि वह कब और कहां शादी करेंगी ? बड़ी, जिसकी शादी हुए पांच वर्ष हो चुके थे, सोचती थी कि वह शादी के बाद मां कैसे बनेगी?

कुछ देर तक मेरी बीवी ने नर्गिस से इस ख़ुफ़िया मुलाक़ात का हाल छिपाए रखा. अन्ततः एक रोज बता दिया. मैंने बनावटी नाराजगी जाहिर की, तो उसने सच समझते मुझसे माफ़ी मांगी और कहा, “दरअसल में हमसे गलती हुई, मगर खुदा के लिए अब आप इसकी चर्चा किसी से न कीजिएगा !”

वह चाहती थी कि बात मुझ ही तक रहे. एक अभिनेत्री के घर जाना तीनों बहनों के नज़दीक बहुत ही घटिया बात थी. वे इस ‘हरकत’ को छिपाना चाहती थीं. अतः जहां तक मुझे मालूम हुआ, इसका उल्लेख उन्होंने अपनी माँ से भी नहीं किया था, हालांकि वह बिल्कुल संकुचित विचारों की नहीं थीं.

मैं अब तक न समझ सका कि उनकी वह हरकत निंदनीय हरकत क्यों थी? अगर वे नर्गिस के यहां गयी थीं, तो इसमें बुराई ही क्या थी ? कलाकारी निंदनीय और घृणित क्यों समझी जाती है ? क्या हमारे परिवार में ऐसे व्यक्ति नहीं होते, जिनकी सारी उम्र धोखेबाजी और छल-कपट में गुज़र जाती है ? नर्गिस ने कलाकारी को अपना पेशा बनाया, उसने इसको रहस्य बनाकर नहीं रखा था. कितना बड़ा फरेब है यह, जिसमें ये लोग फंसे रहते हैं!”

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(Story updated.)
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गंदी बात

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जिन फिल्मों को परिवार के साथ नहीं देख सकते, वो हमारे बारे में क्या बताती हैं?

चरमसुख, चरमोत्कर्ष, ऑर्गैज़म: तेजस्वी सूर्या की बात पर हंगामा है क्यों बरपा?

या इलाही ये माजरा क्या है?

राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे शख्स से बच्चे ने पूछा- मैं सबको कैसे बताऊं कि मैं गे हूं?

जवाब दिल जीत लेगा.

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

उस अंधेरे में बेगम जान का लिहाफ ऐसे हिलता था, जैसे उसमें हाथी बंद हो.

PubG वाले हैं क्या?

जबसे वीडियो गेम्स आए हैं, तबसे ही वे पॉपुलर कल्चर का हिस्सा रहे हैं. ये सोचते हुए डर लगता है कि जो पीढ़ी आज बड़ी हो रही है, उसके नास्टैल्जिया का हिस्सा पबजी होगा.

बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

मां-बाप और टीचर बच्चों को पीट-पीट दाहिने हाथ से काम लेने के लिए मजबूर करते हैं. क्यों?

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

और बिना बैकग्राउंड देखे सेल्फी खींचकर लगाने वाली अन्य औरतें.

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

पढ़िए फिल्म 'पिंक' से दर्जन भर धांसू डायलॉग.

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

ऐसा क्या हुआ, कि सरे राह दौड़ा-दौड़ाकर उसकी हत्या की?

हिमा दास, आदि

खचाखच भरे स्टेडियम में भागने वाली लड़कियां जो जीवित हैं और जो मर गईं.

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.