Submit your post

Follow Us

कश्मीर: जो लड़ाके कभी भारत के लिए आतंकवादियों से लड़े, हमने उनको दगा दिया

1994. कश्मीर घाटी में गर्मियों का मौसम. चिनार के पेड़ों पर सब्ज़ रंग लटके थे. घाटी में खून सवार था. रोज ही कोई न कोई मारा जाता. या मर जाता. उन दिनों की ही बात है ये. वायरलेस सेट पर आए दिन एक अजीब सी बातचीत सुनाई देती. एक आवाज कहती-

हेलो बुलबुल, हेलो बुलबुल बोल रहा हूं. कोयल से पूछो. आज रात वो कौन सा गाना गाएगी?

‘गुड आतंकी, बैड आतंकी’
कोई सुने, तो सोचे. कि ये क्या अजीब सा माजरा है. कौन बुलबुल, कैसी कोयल. मगर जानने वाले जानते थे. कि बुलबुल किसी का राज वाला नाम था. सेना का एक खुफिया अफसर. जो बांदीपोरा के पास तैनात था. 5 राष्ट्रीय रायफल्स के साथ काम करता था. और कोयल? वो आम के मौसम में पेड़-पेड़ फुदककर मीठी हांक लगाने वाली चिड़िया नहीं थी. इस सीक्रेट नाम के पीछे जो चेहरा था, उससे कश्मीर का हर आतंकवादी नफरत करता था. बहुत ज्यादा नफरत. इसलिए कि वो आतंकियों को चुन-चुनकर मारता था. उसका नाम था मोहम्मद यूसुफ पारे. मीठे गले से कश्मीरी-डोगरी गीत गाने वाला एक इंसान. जो 90 के दशक में कश्मीर के सबसे खौफनाक माने जाने वाले लोगों में गिना जाने लगा. लोग उसको कुका पारे कहा करते थे. कुका पारे का भी एक आतंकवादी संगठन था. इखवान-उल-मुस्लमीन. मगर जैसे गुड बैक्टीरिया और बैड बैक्टीरिया होते हैं. वैसे ही कुका के आतंकी ‘अच्छे आतंकी’ थे. और बाकी बुरे आतंकी. एक, हिंदुस्तान के दोस्त. दूसरे, हिंदुस्तान के दुश्मन.

कुका और उसके
कुका और उसके इखवानी साथी सेना की मदद कर रहे थे. आतंकवादियों को खत्म कर रहे थे. बस इतना ही नहीं, बल्कि सेना और खुफिया तंत्र इंटेलिजेंस इनपुट के लिए भी उनकी मदद लेता था (फोटो: The Lallantop)

कुका बताता था, सेना छापे मारती थी
कुका कहता- हिजबुल को खत्म करना है. लोग कहते, वो सेना का आदमी है. कि सेना और उसके पीछे सरकार, दोनों कुका की मदद करते हैं. ये बात सच भी थी. सेना और सुरक्षा बलों को इखवान के होने से मदद मिलती. वो लोकल लोग थे. स्थानीय लोग अगर स्थानीय लोगों से लड़ रहे हैं. तो जाहिर है, असर ज्यादा होगा. ऊपर से कुका खुद सीमा पार पाकिस्तान के आतंकी शिविर में ट्रेनिंग लेकर आया था. आतंकवादी बनकर लड़ा था. फिर उसने सरेंडर कर दिया. और भारत की तरफ से लड़ने लगा. कुका आतंकियों के तौर-तरीकों से वाकिफ था. इसलिए वो घाटी के आतंकियों के लिए ज्यादा खतरनाक था. वायरलेस पर गूंजने वाले उस कोयल वाले मेसेज का मतलब होता कि कुका सेना को बताएगा. कि उन्हें रात को कहां पर छापा मारना चाहिए. ताकि आतंकवादी पकड़े या मारे जा सकें.

इखवानियों का मामला कुछ-कुछ शायद वैसा ही था, जैसा छत्तीसगढ़ के सल्वा जुडुम. आदिवासियों को लेकर तैयार की गई एक फौज, जो नक्सलियों से लड़ती. और इस सल्वा जुडुम की पीठ पर थी सरकार. उन्हें खास नक्सलियों से भिड़ने के लिए ही तैयार किया गया था. आइडिया ये था कि आदिवासियों के बीच के ही लोग नक्सलियों से लड़ेंगे, तो इसका ज्यादा असर होगा. कहते हैं कि ये कुका और उसके इखवान ही थे, जिनकी वजह से 1996 में घाटी के अंदर चुनाव कराया जाना मुमकिन हो सका.

कुका की पार्टी का नाम था- आवामी लीग. ये भारत के साथ रहने के समर्थन में थी. कुका कहता, पहले घाटी से आतंकियों को भगाएंगे. बाकी की बातें बाद में होंगी. ये 1996 के चुनाव के वक्त की तस्वीर है. जब कुका अपने समर्थकों के साथ चुनाव प्रचार कर रहा था (फोटो: रॉयटर्स)
कुका की पार्टी का नाम था- आवामी लीग. ये भारत के साथ रहने के समर्थन में थी. कुका कहता, पहले घाटी से आतंकियों को भगाएंगे. बाकी की बातें बाद में होंगी. ये 1996 के चुनाव के वक्त की तस्वीर है. जब कुका अपने समर्थकों के साथ चुनाव प्रचार कर रहा था (फोटो: रॉयटर्स)

बस मुखबिरी नहीं करते थे, खुद भी आतंकियों को निशाना बनाते
कुका और उसके साथियों ने बस सेना और खुफिया एजेंसियों की मदद नहीं की. वो ग्राउंड पर ऑपरेशन भी करते थे. आतंकवादियों पर हमला करते. उन्हें निशाना बनाते. फिर 1996 के चुनाव में वो लोकतंत्र का हिस्सा बने. हुआ ये कि नैशनल कॉन्फ्रेंस चुनाव लड़ने से झिझक रही थी. बाकियों का भी यही हाल था. क्योंकि अव्वल तो 1989 के चुनावों में धांधली होने के बाद चुनाव प्रक्रिया से जुड़ने वाली कोई भी पार्टी घाटी में जनाधार खो देती. और दूसरी वजह ये कि आतंकी राजनैतिक पार्टियों से जुड़े लोगों को चुन-चुनकर निशाना बना रहे थे.

मगर भारत को तो चुनाव कराने थे. ये दिखाने के लिए चीजें नॉर्मल हो रही हैं. लंबे राष्ट्रपति शासन के बाद दुनिया को ये दिखाना था कि कश्मीर में लोकतंत्र कायम है. कोई तानाशाही नहीं है. कोई अराजकता नहीं है. मगर चुनाव लोगों की भागीदारी के बिना कैसे होंगे? यहां भी कुका पारे मददगार साबित हुआ. उसने एक राजनैतिक पार्टी बनाई. जम्मू ऐंड कश्मीर आवामी लीग. लोकसभा चुनाव हुए. उसमें कुका के सारे उम्मीदवार हार गए. फिर विधानसभा चुनाव हुए. इसमें कुका खुद भी खड़ा हुआ. बस वो जीता, बाकी उसके सारे कैंडिडेट्स हार गए. जीतते भी कैसे? कश्मीर तो कुका और उसके इखवान लड़ाकों से डरता था. जिससे डरते हैं, उससे छिटकते हैं. हां, इतना जरूर हुआ कि कुका खुद एक बार विधायक बन गया. नैशनल कॉन्फ्रेंस ने चुनाव में भागीदारी के लिए शर्त रखी. भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर को ज्यादा स्वायत्तता दिए जाने का वादा किया. चुनाव में नैशनल कॉन्फ्रेंस जीती. फार्रूख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने.

1996 में लंबे समय बाद घाटी में चुनाव होने जा रहे थे. लेकिन मुख्य राजनैतिक पार्टियां चुनाव लड़ने में सशंकित थीं. जैसे, नैशनल कॉन्फ्रेंस. उसने पहले इस चुनाव का बहिष्कार किया. मगर उनका इलेक्शन में शामिल होना जरूरी था. लोकतंत्र में यकीन के नाम पर. तब भारत सरकार ने उनके साथ बातचीत की. आश्वसान दिया कि कश्मीर को ज्यादा स्वायत्तता दी जाएगी. तब जाकर NC मानी (फोटो: The Lallantop)
1996 में लंबे समय बाद घाटी में चुनाव होने जा रहे थे. लेकिन मुख्य राजनैतिक पार्टियां चुनाव लड़ने में सशंकित थीं. जैसे, नैशनल कॉन्फ्रेंस. उसने पहले इस चुनाव का बहिष्कार किया. मगर उनका इलेक्शन में शामिल होना जरूरी था. लोकतंत्र में यकीन के नाम पर. तब भारत सरकार ने उनके साथ बातचीत की. आश्वसान दिया कि कश्मीर को ज्यादा स्वायत्तता दी जाएगी. तब जाकर NC मानी (फोटो: The Lallantop)

नैशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार बनी, उसी से दिक्कतें शुरू हो गईं
इन चुनावों के ही समय से इखवान-उल-मुस्लमीन और सेना-खुफिया एजेंसियों के बीच दिक्कतें शुरू हुईं. क्योंकि इधर वालों के लिए उनको संभाल पाना मुश्किल हो रहा था. कई बार इखवान मनमर्जी पर उतर आते. कई बार अनुशासन ही नहीं रहता. रही-सही कसर तब पूरी हुई, जब इनकी नैशनल कॉन्फ्रेंस के साथ दिक्कतें शुरू हुईं. असल में इखवानों पर कई तरह के इल्जाम भी लगते थे. कि वो लोगों को धमकाकर पैसा वसूलते हैं. एक्स्ट्रा जूडिशल हत्याएं करते हैं. मतलब न पुलिस, न अदालत. खुद से इंसाफ कर दिया. अब्दुल्ला सरकार ने इखवान लड़ाकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की. इखवान कैडर में से कइयों पर मुकदमे चले. उन्हें सजा हुई. 1998 का साल आते-आते बस इखवानों के गुजरे दौर की बातें रह गई थीं. वक्त आगे बढ़ गया था. वो पीछे छूट गए थे.

सेना-सरकार का हाथ नहीं रहा, तो क्या हुआ?
अंग्रेजी में एक शब्द होता है- वरनरेबल. मतलब जिन्हें निशाना बनाना या नुकसान पहुंचाना बड़ा आसान हो. यही रह गए थे अब इखवान. सेना-सरकार का हाथ अब सिर पर नहीं था. ऊपर से राज्य सरकार से छत्तीस का आंकड़ा. न हिफाजत, न संसाधन. सरकार का साथ देने की वजह से ज्यादातर कश्मीरी उनको गद्दार मानते थे. उनसे नफरत करते थे. जिन आतंकवादी संगठनों को इखवानों ने निशाना बनाया था, अब उनके लिए पलटवार करना आसान हो गया था. इखवान कैडर में रहे लोगों पर आतंकवादी हमले तेज हो गए.

कुका मारा गया. जिस नाम से कश्मीर खौफ खाता था, आतंकवादी डरते थे, वो बड़ी आसानी से मर्डर कर दिया गया. वो भी उसके अपने गढ़ हाजिन में (फोटो: रॉयटर्स)
कुका मारा गया. जिस नाम से कश्मीर खौफ खाता था, आतंकवादी डरते थे, वो बड़ी आसानी से मर्डर कर दिया गया. वो भी उसके अपने गढ़ हाजिन में (फोटो: रॉयटर्स)

कुका नहीं, जैसे गैंग्स ऑफ वासेपुर का मनोज वाजपेयी हो गया
सितंबर 2003 में कुका पारे भी मारा गया. कश्मीर में, खासकर हाजिन में, उसके मारे जाने की कई कहानियां चलीं. जैसे फिल्म के क्लाइमेक्स के लिए अलग-अलग कई स्क्रिप्ट लिखे गए हों. कुछ कहते. सैकड़ों की तादाद में आतंकवादी थे. उन्होंने कोका की गाड़ी को घेर लिया. और गोलियों से, हथगोलों से उसे छलनी कर दिया. कोई कहता कि हाथ में डंडे और पत्थर लेकर औरतें उसके पीछे भाग रही थीं. उसे मार रही थीं. फिर कई कहानियां ऐसी थीं, जो ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के मनोज वाजपेयी की याद दिलाती थीं. गोली लगी है, बदन खून से लथपथ है, फिर भी लड़ रहे हैं. ये सारी कहानियां मिथ थीं. झूठी. जैसे लोगों को यकीन न हो रहा हो. कि कुका पारे को इतनी आसानी से मारा जा सकता है. और इसीलिए वो उसकी मौत को बड़ा करके बताने के लिए ये कहानियां बना रहे हों. लार्जर देन लाइफ टाइप की.

कहते हैं कि 1996 के चुनाव कुका और उसके साथियों की वजह से ही मुमकिन हो पाए. कुका ने बाद में कहा भी. कि नैशनल कॉन्फ्रेंस ने चुनाव लड़ने की शर्त रखी थी. लेकिन उसने कोई कंडीशन नहीं रखी (फोटो: रॉयटर्स)
कहते हैं कि 1996 के चुनाव कुका और उसके साथियों की वजह से ही मुमकिन हो पाए. कुका ने बाद में कहा भी. कि नैशनल कॉन्फ्रेंस ने चुनाव लड़ने की शर्त रखी थी. लेकिन उसने कोई कंडीशन नहीं रखी (फोटो: रॉयटर्स)

खतरे के बारे में मालूम था, तब भी उसकी सुरक्षा नहीं बढ़ाई गई
असलियत ये थी कि हाजिन शहर में कुका अपनी जीप में बैठकर जा रहा था, जब जैश-ए-मुहम्मद के दो आतंकवादी हाथ में AK-47 लेकर आए और उसे भून दिया. जैश ने बाद में इसका जिम्मा लिया था. कहा था कि उसने अपने कमांडर गाजी बाबा की हत्या का बदला लिया. सवाल था कि कुका इतनी आसान मौत कैसे मारा गया? जबकि वो अपनी मांद, यानी हाजिन में था. और उसे सरकारी सुरक्षा मिली हुई थी. और तब सामने आईं दो चिट्ठियां. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2001 और 2002 में कुका ने एक चिट्ठी लिखकर मांग की थी कि उसे मुहैया कराई गई सुरक्षा उसकी सिक्यॉरिटी कैटगरी के मुताबिक नहीं है. उससे बहुत कम है. उसने अपनी जान का खतरा बताते हुए बुलेट प्रूफ कार मांगी थी. मगर उसकी सुरक्षा नहीं बढ़ाई गई. राज्य सरकार, केंद्र सरकार, सेना, खुफिया एजेंसियां. इन सबको मालूम था कि आतंकी जिस दिन मौका पाएंगे, कुका को मार डालेंगे. लेकिन फिर भी कोई खास जतन नहीं किया गया. ऐसा लगा, मानो उसे उसके हाल पर छोड़ दिया गया था.

ये कुका की हत्या के बाद की तस्वीर है. जब उसका जनाजा निकल रहा था. तस्वीर में जो लड़की पथराई आंखों से ऊपर ताकती हुई रो रही है, वो कुका की बेटी है (फोटो: रॉयटर्स)
ये कुका की हत्या के बाद की तस्वीर है. जब उसका जनाजा निकल रहा था. तस्वीर में जो लड़की पथराई आंखों से ऊपर ताकती हुई रो रही है, वो कुका की बेटी है (फोटो: रॉयटर्स)

बाप इख्वान रहा था, तो जवान बेटे का गला काट दिया
वो 2003 की बात है. अब 2018 चल रहा है. इंडिया टुडे की ताजी रिपोर्ट बताती है. कि बीते सालों में इखवानी लड़ाकों की हत्या लगातार होती रही है. हाजिन के पास ही है बोनिखान गांव. वहां अब्दुल गफ्फार बट का परिवार रहता है. 4 अप्रैल, 2018. रात का तीसरा पहर था, जब अब्दुल के दरवाजे पर दस्तक हुई. दो हथिारबंद नकाबपोश घर में घुस आए. वो अब्दुल और उनके 24 साल के बेटे मंजूर को साथ ले गए. करीब आधे घंटे बाद गोलियां चलने की आवाज पूरे गांव ने सुनी. खून में लथपथ अब्दुल किसी तरह घिसटते हुए घर पहुंचे. मंजूर की लाश दो दिन बाद पास ही के एक सेब के बगीचे से बरामद हुई. उसका सिर धड़ से अलग था. अब्दुल किसी जमाने में इखवान हुआ करते थे. बोनिखान से कुछ दूर प्रेंग नाम का गांव है. गांव में रहते थे मुहम्मद याकूब वागे. 25 मई, 2018 को पांच आतंकी उनके घर में घुस आए. एक ने याकूब की बीवी को पकड़ा. दूसरे ने उनके नाबालिग बेटे को. बाकी तीन ने मिलकर याकूब का गला काट दिया.

गांववाले रातभर जागकर पहरा देते हैं
अप्रैल 2018 से लेकर अब तक हाजिन के आसपास के गांवों में इसी तरह करीब छह लोग मारे जा चुके हैं. ये सब किसी न किसी तरह से इखवानों के साथ जुड़े थे. ये इलाका ही इखवानी एरिया माना जाता है. 2 अप्रैल को एक स्थानीय ड्राइवर और एक क्रिकेट खिलाड़ी नसीर अहमद शेख को किडनैप करके उनकी हत्या कर दी गई थी. इससे पहले अगस्त 2017 में नसीर के एक रिश्तेदार मुजफ्फर अहमद पर्रे की भी सिर काटकर हत्या हुई थी. हाजिन को उसके अतीत की ‘सजा’ भुगतनी पड़ रही है. लश्कर-ए-तैयबा यहां काफी मजबूत हो चुका है. वो चुन-चुनकर इखवानों को मार रहा है. इखवान में रहे लोगों, उनके रिश्तेदारों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है. ये तो ताजी घटनाएं हैं. 2003 में फ्रंटलाइन में छपी एक खबर के मुताबिक, उस समय तक 150 से ज्यादा इखवानों का मर्डर हो चुका था. हाजिन में रहने वाले कई लोग अपना घर-बार छोड़कर बाहर जा चुके हैं. ताकि अपनी जान बचा सकें. कई परिवार ऐसे हैं, जिन्हें कई बार ठिकाना बदलना पड़ा है. कई गांव ऐसे हैं, जहां रातों को लोगों की ड्यूटी लगती है. पहरेदारी पर. इन गांवों में अंधेरा होते ही जीवन सिमट जाता है. लोग ग्रुप बनाकर रात-रातभर जागते हैं. रखवाली करते हैं. ताकि उनके बीच का कोई आतंकियों के हाथों मारा न जाए. इन इखवानी इलाकों में लोगों की हत्याओं की वजह से पुलिस और खुफिया एजेंसियों को भी घाटा हुआ है. उनका मुखबिर तंत्र लगभग खत्म हो चुका है. आने वाले दिनों में सिस्टम को इसका काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है.

एक वक्त में कुका और उसके लड़ाकों का गढ़ होता था हाजिन. अब यहां लश्कर ने पैर जमा लिए हैं.
एक वक्त में कुका और उसके लड़ाकों का गढ़ होता था हाजिन. अब यहां लश्कर ने पैर जमा लिए हैं. वो इखवानों को चुन-चुनकर निशाना बना रहे हैं (फोटो: रॉयटर्स)

इखवान कहते हैं- भारत ने उन्हें इस्तेमाल करके छोड़ दिया
इखवानों को लगता है कि उनका इस्तेमाल किया गया. उन्होंने भारत का साथ दिया. आतंकवादियों से लड़े. उन्हें मारा. खुफिया एजेंसियों की मुखबिरी की. ये सब करके उन्हें न केवल कश्मीरियों से, बल्कि हिजबुल और लश्कर जैसे आतंकी संगठनों की भी दुश्मनी मोल ली. इखवानों का मानना है कि भारत ने उन्हें अपने फायदे के लिए यूज किया. फिर डंप कर मरने-भुगतने के लिए छोड़ दिया. कहने को राज्य सरकार इखवान मेंबर्स की मौत के बाद उनके परिवार को 1 लाख बीस बजार रुपये का मुआवजा देती है. लेकिन आरोप है कि ये मुआवजा हासिल करने के लिए रिश्वत मांगी जाती है. या फिर मुआवजा मिलते-मिलते कई साल बीत जाते हैं. कई मौकों पर सेना ने कहा भी. कि वो इखवानियों की हिफाजत करेगी. उन्हें सुरक्षा देगी. लेकिन ऐसा होता हुआ दिखा नहीं.

इखवानों को इस लड़ाई में शामिल करना, उनसे खुलकर मदद लेना ही गलत था. दूसरा ये गलत हुआ कि उन्हें एक्सपोज्ड छोड़ दिया गया
इखवानों को इस लड़ाई में शामिल करना, उनसे खुलकर मदद लेना ही गलत था. दूसरा ये गलत हुआ कि उन्हें एक्सपोज्ड छोड़ दिया गया.

पहले भी गलती की, अब भी गलती कर रहे हैं
ऐसा नहीं था कि भारत को इखवानों की जरूरत न रही हो. या कि कश्मीर समस्या सुलझ गई हो. और ऐसा भी नहीं कि इखवानों के साथ रिश्ता सोलह आने खत्म कर लिया गया हो. नई सदी शुरू होने के बाद भी कई इखवान सेना और पुलिस के लिए मुखबिरी करते रहे. उन्हें इसके एवज में एक छोटी सी रकम मिलती थी. मगर ये सब बहुत सीमित स्तर पर था. वैसे देखें, तो मिला-जुलाकर इनसे दूरी बना ली गई थी. ये दूरी बनाने का फैसला एक किस्म का पॉलिसी चेंज था. ऊपर की कुर्सी पर बैठकर फैसला लेने वाले लोग ‘ट्रायल ऐंड ऐरर’ करते रहते हैं. कभी एक तरीका आजमाया. कभी दूसरा. कभी ये किया, लेकिन जमा नहीं, तो वो बंद कर दिया. और हर तरीका नैतिक और ईमानदार हो, ये भी जरूरी नहीं. इखवानों के साथ भी यही हुआ था. इसके अलावा उन्हें संभालने, काबू में रखने में जो दिक्कतें आ रही थीं, वो भी एक बड़ा कारण बना होगा. भारत ने शायद उनके साथ अपने असोसिएशन पर फिर से गौर किया और सोचा, फायदा हो भी तो जोखिम बड़ा है. क्योंकि हथियारबंद लड़ाकों को सपोर्ट देने के अपने दर्जनों नुकसान भी तो हैं. सेना और सुरक्षाबलों की बात अलग है. लेकिन ये तो प्राइवेट आर्मी जैसा सिस्टम था.

स्टेट और टेररिस्ट्स की लड़ाई इन दोनों के बीच ही होनी चाहिए. देश का तंत्र लड़े. अपने सिस्टम के साथ. किसी और को प्लेयर नहीं बनाया जा सकता. उसे इस लड़ाई में एक पार्टी नहीं बनाया जा सकता. आप थोड़ा सोचेंगे, तो समझ आएगा. कि इस तरह के लड़ाकों के गिरोह को किसी भी तरह से प्रश्रय दिया ही नहीं जाना चाहिए था. हाथ वापस खींचना तो अलग बात है. हाथ थमाना ही नहीं चाहिए था. हाथ थमाने का नतीजा इखवान अब तक भुगत रहे हैं. वो, उनका परिवार, उनके रिश्तेदार. लोग बेमौत मारे जा रहे हैं. बाप इखवान लड़ाका था और आतंकी बेटे का गला काट रहे हैं. इस सबमें सबसे ज्यादा गलती भारत की है. ये हमारा ‘ऐरर ऑफ जजमेंट’ भर नहीं था. नैतिकता, मानवाधिकार, सुरक्षा हर लिहाज से गलत था. और अब उन्हें यूं ही मरने के लिए (एक्सपोज्ड) छोड़ देना भी बहुत बड़ी गलती है.


ये भी पढ़ें: 

पाकिस्तान का वो ट्रेन्ड कश्मीरी आतंकी, जो बैकफायर कर गया
पड़ताल: क्या कश्मीर में तिरंगे पर रखकर गाय काटी गई?
सेना ने कश्मीर में दूसरी बार ह्यूमन शील्ड का इस्तेमाल किया
जीप पर कश्मीरी को बांधने वाले आर्मी मेजर गोगोई एक लड़की के साथ हिरासत में लिए गए
मेजर गोगोई ने बताया कि उन्होंने एक कश्मीरी को जीप के आगे क्यूं बांधा
जिस मेजर ने गाड़ी के बोनट पर कश्मीरी को बांधा था, उसके साथ आर्मी ने क्या किया?
36 घंटे पहले गायब हुए कश्मीरी प्रोफ़ेसर का पिता को फोन आया, कहा, “अल्लाह के पास जा रहा हूं.”
जो लड़का कश्मीर का नाम कर सकता था, वो आतंकवादी बन गया है
बुरहान की मां बोलीं, ‘बेटा इस्लामी निजाम के लिए मरा, काफिरों से लड़ते हुए’
अफरीदी के कश्मीर पर बयान पर गौतम गंभीर ने कहा- अबे ये नो बॉल है!
भारत के ‘राष्ट्रीय खाने’ पर उमर अब्दुल्लाह ने फिरकी ली है
राजदीप सरदेसाई ने कश्मीर पर कुछ कहा है


कश्मीर में पांच साल गुज़ारने वाले पत्रकार की मुंह ज़ुबानी

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

गंदी बात

अपने गांव की बोली बोलने में शर्म क्यों आती है आपको?

अपने गांव की बोली बोलने में शर्म क्यों आती है आपको?

ये पोस्ट दूर-दराज गांव से आए स्टूडेंट्स जो डीयू या दूसरी यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं, उनके लिए है.

बहू-ससुर, भाभी-देवर, पड़ोसन: सिंगल स्क्रीन से फोन की स्क्रीन तक कैसे पहुंचीं एडल्ट फ़िल्में

बहू-ससुर, भाभी-देवर, पड़ोसन: सिंगल स्क्रीन से फोन की स्क्रीन तक कैसे पहुंचीं एडल्ट फ़िल्में

जिन फिल्मों को परिवार के साथ नहीं देख सकते, वो हमारे बारे में क्या बताती हैं?

चरमसुख, चरमोत्कर्ष, ऑर्गैज़म: तेजस्वी सूर्या की बात पर हंगामा है क्यों बरपा?

चरमसुख, चरमोत्कर्ष, ऑर्गैज़म: तेजस्वी सूर्या की बात पर हंगामा है क्यों बरपा?

या इलाही ये माजरा क्या है?

राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे शख्स से बच्चे ने पूछा- मैं सबको कैसे बताऊं कि मैं गे हूं?

राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे शख्स से बच्चे ने पूछा- मैं सबको कैसे बताऊं कि मैं गे हूं?

जवाब दिल जीत लेगा.

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

उस अंधेरे में बेगम जान का लिहाफ ऐसे हिलता था, जैसे उसमें हाथी बंद हो.

PubG वाले हैं क्या?

PubG वाले हैं क्या?

जबसे वीडियो गेम्स आए हैं, तबसे ही वे पॉपुलर कल्चर का हिस्सा रहे हैं. ये सोचते हुए डर लगता है कि जो पीढ़ी आज बड़ी हो रही है, उसके नास्टैल्जिया का हिस्सा पबजी होगा.

Lefthanders Day: बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

Lefthanders Day: बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

मेरा बाएं-हत्था होना लोगों को चौंकाता है. और उनका सवाल मुझे चौंकाता है.

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

और बिना बैकग्राउंड देखे सेल्फी खींचकर लगाने वाली अन्य औरतें.

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

पढ़िए फिल्म 'पिंक' से दर्जन भर धांसू डायलॉग.

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

ऐसा क्या हुआ, कि सरे राह दौड़ा-दौड़ाकर उसकी हत्या की?

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.