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जीरो-हीरो-जीरो. क्या फिर हीरो बनेंगी मायावती

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आज बीएसपी अध्यक्ष और यूपी की चार बार सीएम रही मायावती 60 साल की हो गईं. मेरे ख्याल से वह देश की अब तक की सबसे शक्तिशाली और सफल दलित नेता हैं. उनसे पहले अंबेडकर हुए. उनका काम आजादी से पहले शुरू हुआ और बाद तक चला. जिन गांधी ने अपने ख्यालों के हिसाब से कांग्रेस चलाई. जिनके चलते नेहरू पीएम बने. उन्होंने जाति को लेकर जो कुछ किया, वह सांकेतिक ही रहा. और तब गांधी को आइना दिखाने का काम किया डॉ. अंबेडकर ने. जो हिंदू धर्म दलितों को जानवरों के बराबर मानता रहा हो, वो अगर ये कहे कि हमें इनमें न गिनो तो क्या गलत है. अंग्रेजों के टाइम गोलमेज सम्मेलनों में इसी बात पर अंबेडकर और गांधी आमने सामने थे. बाद में पूना पैक्ट हो गया और उसी का मॉर्डन वर्जन रहा आजाद भारत में एससी और एसटी के लिए सीटें रिजर्व होना.
मगर इन सबके बाद भी अंबेडकर को शक था. और बहुत जायज था. कि राजनीति में तो हम एक आदमी एक वोट का सिद्धांत मानने जा रहे हैं, मगर असलियत में भी क्या ऐसा होगा. हर एक व्यक्ति इस लोकतंत्र में बराबरी का हक पाएगा. अंबेडकर इसके लिए लड़ते रहे और आखिर में खीजकर लाखों समर्थकों समेत बौद्ध धर्म अपना लिया.

और रही राजनीतिक या सामाजिक बराबरी की बात, तो अभी तक तो ऐसा नहीं हो पाया है पूरी तरह से. मगर जितना भी हुआ है, उसमें दो चीजों का खूब रोल है. पहला रिजर्वेशन. जब दलितों के बच्चे सरकारी दफ्तरों में पहुंच गए, व्यवस्था का हिस्सा बन गए तो उनकी आगे बढ़ने की रफ्तार पर ब्रेक लगाने वालों को पहली झिझक हुई. मगर असली खेल तब हुआ, जब इन अफसरों के भी ऊपर मंत्री, मुख्यमंत्री बनकर दलित बैठे.

मगर ये काम भी शुरुआत में मुख नहीं मुखौटा वाला रहा. बाबू जगजीवन राम को दलितों ने अंबेडकर के बाद अपना सबसे बड़ा नेता माना. मगर उन्होंने दलितों के लिए क्या किया. 1977 तक इंदिरा गांधी के वफादार रहे. जब हवा बदली तो जनता पार्टी में आ गए. मगर पीएम तब भी नहीं बन पाए. एक दलील ये भी दी जाती है कि बाबूजी को सवर्ण मानसिकता के लोगों ने पीएम नहीं बनने दिया. और अस्सी के दशक में तो उनका देहांत ही हो गया.

तब तक दलित कांग्रेस के सत्ता ट्राएंगल का निचला कोना भर रहे. इसके दूसरी तरफ मुसलमान थे. और सबसे ऊपर, इन दोनों के कंधों पर सवार. ब्राह्मण और दूसरी सवर्ण जातियां. सत्ता के मजे लेतीं. ओबीसी भी इस पर दावा ठोंकने लगे थे. शुरुआत राममनोहर लोहिया ने की थी और लड़ाई को आगे बढ़ाया चौधरी चरण सिंह ने.

पर दलितों का क्या. इस क्या का जवाब खोजा एक पंजाबी दलित ने. जो केंद्र सरकार की नौकरी करता था. केमिस्ट्री का जानकार. नाम, कांशीराम. उन्होंने पहले तो दलित सरकारी कर्मचारियों के लिए डीएस फोर बनाया. फिर बामसेफ और आखिर में 1984 में बहुजन समाज पार्टी.

मायावती बीएसपी से शुरू से ही जुड़ी थीं. बीएसपी के सबसे पहले सांसदों में भी वह एक थीं. साल था 1989. सीट थी बिजनौर. और मार्जिन था लगभग 9 हजार वोट का. इस मार्जिन ने सोसाइटी के तमाम मार्जिन को धकियाने के लिए नींव तैयार कर दी.

मगर नींव का खयाल 1977 में पड़ चुका था. तभी जब दलितों के सबसे बड़े नेता बाबू जगजीवन राम साम दाम दंड भेद कैसे भी करके बस अपनी इकलौती बची राजनीतिक महात्वाकांक्षा को पूरा करना चाह रहे थे. तभी दिल्ली में दलितों की एक मीटिंग में कांशीराम की मुलाकात पोस्ट ऑफिस में काम करने वाले प्रभु दास की बेटी मायावती से हुई. मायावती उस वक्त पेशे से टीचर थीं. इंदरपुरी की जेजे कॉलोनी के एक स्कूल में पढ़ाती थीं. लॉ भी कर रही थीं डीयू से. और अरमान बस एक था. कि आईएएस बनना है. वह स्पीच भी गजब की देती थीं. अपनी कौम के लोगों में सम्मान भरती मायावती को कांशीराम ने एक बात कही. मूवमेंट से जुड़ जाओ. ऐसी जगह पहुंच जाओगी कि दर्जनों आईएएस ऑर्डर लेंगे तुमसे.

शुरुआत कुछ नाकामियों या कि तैयारियों से हुई. 1984 में बीएसपी बनने के बाद मायावती वेस्टर्न यूपी की कैराना सीट से चुनाव लड़ीं. हार गईं. पार्टी का भी कुल टोटल जीरो रहा. 1985 में बिजनौर सीट से उपचुनाव लड़ीं. हार गईं. 1987 में हरिद्वार से उपचुनाव लड़ीं. फिर हार गईं. मगर कांशीराम और मायावती को पता था. कि हर हार जीत के कुछ और करीब बढ़ना है. और 1989 में मायावती माननीय सांसद बन ही गईं. उनके अलावा बीएसपी के दो और लोग जीते. 1991 में आंकड़ा घटकर 2 हुआ. और उसके बाद बढ़ा, बढ़ता ही रहा. 2014 में ये जीरो पर पहुंच गया. मगर सिर्फ इस वजह से बीएसपी को अगर कोई रेस से बाहर करार दे, तो आप उसकी राजनीतिक समझ पर तरस खा सकते हैं. क्योंकि जीरो से जीरो के सफर के बीच बीएसपी का मूवमेंट, दलितों की स्थिति और सियासत की एबीसी हमेशा के लिए बदल चुकी है.

बदलाव का पहला पड़ाव अगर बीएसपी का बनना था, तो दूसरा 1993 में ओबीसी नेता मुलायम सिंह यादव की नई पार्टी सपा के साथ राजनीतिक गठजोड़. इसने बीएसपी को सत्ता का पहली बार हिस्सेदार बना दिया. और फिर 1995 में ही बीएसपी हिस्सेदार से सीधे दावेदार हो गई. बीजेपी के सपोर्ट से मायावती सीएम बन गईं. सरकार ज्यादा नहीं चली. मगर दलितों के लिए ये एक नई दिवाली जैसा था. उनके बीच की बेटी, बहन, देश के सबसे बड़े सूबे की सीएम. और देखिए राजनीति का खेल-तमाशा. कि जिन सवर्णों के खिलाफ बीएसपी का मूवमेंट था, कथित तौर पर उन्हीं की अलंबरदार पार्टी के सपोर्ट से वह पहली बार सीएम बनीं.

ये साल और इसका एक बवाल मोदी विरोधियों को भी बार-बार याद करना चाहिए. खासतौर पर उन्हें जो बिहार चुनाव के बाद यूपी में भी बीजेपी विरोधी दलों की एकता का नारा लगा रहे हैं. मुलायम और मायावती के साथ आने की पैरवी कर रहे हैं. लालू-नीतीश की लड़ाई राजनीतिक थी. मगर मुलायम मायावती की रंजिश राजनीतिक ही नहीं निजी भी है. और उसकी वजह है स्टेट गेस्टहाउस कांड. 1995 में जब बीएसपी ने एसपी के साथ अपना गठबंधन तोड़ लिया तो तय हो गया कि मुलायम सिंह यादव की सरकार तो गई. ऐेसे में खबरों के मुताबिक सपा के दर्जनों बाहुबली छवि वाले विधायक पहुंच गए लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस, जहां मायावती अपने विधायकों के साथ मौजूद थीं. बीएसपी विधायकों को यहां डराने धमकाने का काम किया गया. इतना ही नहीं मायावती के साथ भी बहुत बदसलूकी की गई. उनकी जान पर बन आई. उधर बीजेपी विधायकों को जब यह खबर लगी तो वह भी स्टेट गेस्ट हाउस पहुंच गए. पलड़ा बराबरी पर टिका तब मामला संभला. मगर मायावती सपा के इस सुलूक को न कभी भूली हैं और न भूलेंगी. खैर, असल बात आगे बढ़ाते हैं.

बीएसपी का शुरुआती दौर मिशनरी और उग्र था. रैलियों की शुरुआत में कह दिया जाता था. अगर कोई सवर्ण यहां बैठा है, तो उठकर चला जाए. नारे लगते थे. तिलक, तराजू और तलवार. इनको मारो जूते चार. और कनसुनी मानें तो ये भी कहा जाता था कि ठाकुर, ब्राह्मण बनिया चोर, बाकी सब हैं डीएसफोर.

अब बीएसपी वाले भी कम से कम खुले में इसकी बात नहीं करते. उन्हें भी सत्ता का बड़ा चौसर समझ आ गया है. कि सिर्फ अपने 20-25 फीसदों वोटों के सहारे ताकतवर किंग नहीं बना जा सकता. बीएसपी अब सर्वजन के नारे पर सवार है. इसकी शुरुआत साल 2007 से हुई. जब बीएसपी का हाथी गणेश बन गया और सवर्णों, खासतौर पर ब्राह्मणों को लुभाने में कामयाब हो गया. नारा दिया गया कि हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है. एक और भी था. ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा.

हाथी यानी बीएसपी और उनकी सुप्रीमो मायावती के आगे बढ़ने की कहानी में एक बार फिर पीछे लौटना होगा. 1995 में सीएम बनने के बाद मायावती ने पार्टी पर अपना प्रभुत्व जमाना शुरू कर दिया. कांशीराम ने भले ही औपचारिक रूप से 2001 में उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाया हो. मगर 1991 में ही यह तय हो गया था. इसीलिए बीएसपी में कांशीराम के तमाम कद्दावर सहयोगियों को किनारे होना पड़ा. जंगबहादुर पटेल, राशिद मसूद जैसे दर्जनों नाम हैं, जिन्होंने अपने खून पसीने से कांशीराम के साथ मिलकर बीएसपी को खड़ा किया, मगर माया युग में जो एक एक कर पार्टी से बाहर कर दिए गए या मजबूर होकर उन्होंने पार्टी छोड़ दी.

ये मायावती का अपना तरीका था. संगठन बन चुका था. अब उन्हें हर फैसले पर अगर मगर नहीं चाहिए था. वह आयरन हैंड के साथ पार्टी चलाना चाहती थीं. और इन्हीं तेवरों के साथ उन्होंने सरकार भी चलाई. इसका दूसरा मौका मिला 1996 में. यूपी में फिर हंग असेंबली थी. बीजेपी 170 का आंकड़ा पार कर अटकी थी. बहुमत के लिए 213 चाहिए थे, जो उसके पल्ले नहीं थे. ऐसे में फिर बीएसपी को सपोर्ट दिया गया. इस मौके को लपकने में बीएसपी एक सेकंड के लिए भी नहीं हिचकी. तो क्या हुआ जो 1996 का ये चुनाव उन्होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लड़ा था. वैसे भी रणनीतिकार आज तक नरसिम्हा राव को इस सियासी भूल के लिए कोसते हैं. उनके मुताबिक जिस दिन कांग्रेस बीएसपी की जूनियर पार्टी बन गई, उस दिन से यूपी में उसका खेल हमेशा के लिए खत्म हो गया.

बहरहाल, मायावती दूसरी बार मुख्यमंत्री बनीं एक नायाब राजनीतिक समझौते के तहत. छह छह महीने सीएम बनना. पहले मायावती. फिर बीजेपी का कोई. और जब बीजेपी के कल्याण सिंह सीएम बने, तो मायावती कुछ ही महीनों में इस गठबंधन से बाहर आने का मन बना चुकी थीं. उन्हें सत्ता पर सीधे नियंत्रण चाहिए था और बीजेपी के कल्याण सिंह इस राह में रुकावट थे. ये बात और है कि मायावती का ये दांव नाकाम रहा. मौजूदा गृहमंत्री राजनाथ सिंह तब यूपी बीजेपी अध्यक्ष थे. उनके निर्देशन में एक पॉलिटिकल ऑपरेशन चला. कांग्रेस और बीएसपी दोफाड़ हो गईं. कांग्रेसियों ने नरेश अग्रवाल की अगुवाई में लोकतांत्रिक कांग्रेस बना ली. बीएसपी के टूटे धड़े ने नरेंद्र सिंह की अगुवाई में जनतांत्रिक बसपा बना ली. दोनों बीजेपी सरकार का हिस्सा बन गईं.

मायावती के लिए ये भी एक सबक था. इसलिए 2002 के चुनाव में हंग असेंबली आने पर उन्होंने अड़ियल रुख अपना लिया. साफ कह दिया कि बीजेपी सहयोग करे तो सरकार बनाऊंगी, मगर सीएम मैं ही रहूंगी. इस बार मायावती ने और सख्ती से प्रशासन चलाया. पार्टी की भी हालत हर तरह से मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. बीजेपी की हालत न निगलते न उगलते की हो चुकी थी. साल डेढ़ साल में सपोर्ट वापस ले लिया. फिर फौरी गठबंधन बना मुलायम सिंह यादव सत्ता में आए. बीएसपी विपक्ष में बैठी. इस दौरान बीएसपी ने अपनी राजनीति में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव किया. सवर्णों को साथ लाने का बदलाव. खासतौर पर ब्राह्मणों को लुभाने का. इसके लिए कमांडर बने वकील सतीश चंद्र मिश्र. हर जिले में भाईचारा सम्मेलन हुए. नए सिरे से जातिवार गणित सुलझाई गई. दलितों के अलावा ब्राह्मणों को, ठाकुरों को झोंककर टिकट दिए गए. मायावती ने अपने दिन याद दिलाए और नारा दिया. चढ़ गुंडन की छाती पर, बटन दबाओ हाथी पर.

पोल पंडितों ने कहा, फिर हंग असेंबली होगी. बीएसपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी. किसी ने भी उसे 403 में 150-160 से ज्यादा सीटें नहीं दीं थीं. मगर जब डिब्बा खुला तो 1991 के बाद पहली मर्तबा किसी पार्टी की अपने दम सरकार बनी. बीएसपी ने 206 सीटें जीतीं.

इस जीत के बाद मायावती की सियासत सरपट भागने लगी. देश के सबसे बड़े सूबे की सीएम. उन्होंने लॉ एंड ऑर्डर के मोर्चे पर जबरदस्त चुस्ती दिखाई. लोग आज भी कहते हैं. हर कौम के. कि बाकी सब तो ठीक है, मगर मायावती के राज में गुंडई खतम हो गई थी. मायावती इस दौरान दिल्ली की सियासत में भी दिलचस्पी लेती दिखीं. खासतौर पर तब, जब न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर लेफ्ट को उनके पुराने दोस्त मुलायम ने झटका दे दिया. मुलायम कलाम की ओट में देशहित की बात कर कांग्रेस की गोद में बैठ गए तो बीएसपी के बाजार भाव बढ़ गए. सीपीएम के तत्कालीन महासचिव प्रकाश करात मायावती के घर पहुंच गए. नए सिरे से जुगलबंदी होने लगी. देश के लिए दलित पीएम की जरूरत की बात होने लगी. लगा कि 2009 में अगर बीएसपी यूपी से 40 प्लस सीटें ले आती है, अगर किसी मौजूदा गठबंधन को स्पष्ट जनादेश नहीं मिलता है, तो कांशीराम का सपना पूरा हो सकता है. कांशीराम कहते थे कि दलितों के दिन तब फिरेंगे, जब उनके बीच का कोई इस देश की सबसे ऊंची गद्दी पर पूरे रसूर और ताकत के साथ बैठेगा.

पर सोच सच्चाई में नहीं बदल पाई. मायावती को सत्ता में रहने के बावजूद यूपी में तीसरे नंबर पर रहना पड़ा. संगठन के मामले में बेहद कमजोर कांग्रेस ने 21 सीटें जीतीं. सपा ने 23. और बीएसपी 20 पर ही रुक गई. और 1991 के बाद पहली मर्तबा 200 का आंकड़ा अपने दम पार करने वाली कांग्रेस ने यूपीए 2 के तहत काम शुरू किया.

इसके बाद मायावती ने यूपी में नए सिरे से मजबूत होने पर फोकस किया. लखनऊ और नोएडा में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य हुए. बड़े बड़े पार्क बने, मूर्तियां लगीं. मेले हुए. शहर बसे. और एक अदद सड़क भी बनी. यमुना एक्सप्रेस वे.

इसके साथ ही विवादों की फाइल भी मोटी होती गई. आय से अधिक संपत्ति को लेकर मामला खुला जो अब तक चल रहा है. ताज कॉरिडोर को लेकर जांच शुरू हुई. अपने सीएम रहते अपनी ही बड़ी बड़ी मूर्तियां बहुजन प्रेरणा स्थल में लगवाने को लेकर मायावती की आलोचना भी हुई.

पर बहिन जी जानती थीं कि उनका कोर वोट बैंक इन सबसे बहुत खुश है. गांव के दक्खिन टोले में रहने वाला और लंबरदारों के सामने अब भी नीचे बैठने वाला दलित जब लखनऊ आता. इन पार्कों को देखता. तो उसकी रीढ़ की हड्डी कुछ तन जाती. बीएसपी राज ने दलितों को नया नजरिया, नया स्वाभिमान दिया. मगर सत्ता सिर्फ एक वर्ग के साथ से नहीं मिली थी. सवर्ण मायावती का दामन छोड़ने को तैयार थे.

2012 के चुनाव आए तो उन्होंने टैक्टिकल वोटिंग की. हाथी हराओ की रणनीति के तहत ज्यादातर साइकल की बटन दबा आए. और तब पहली बार समाजवादी पार्टी ने भी स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाई.

इसके बाद मायावती का पॉलिटिकल ग्राफ ढलान पर आता दिखा. विधानसभा चुनाव के बाद उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों पर ध्यान देना शुरू किया. संगठन में बड़े फेरबदल हुए. सवर्णों को किनारे कर दलितों और पिछड़ों को निगरानी दी गई. मुसलमानों को नए सिरे से लुभाने की कवायद हुई. मगर मोदी की आंधी में सब बेकार रहा. इतना बेकार कि 1984 की तरह हाथ आया जीरो बटा सन्नाटा.

इन नतीजों के बाद बीएसपी खेमे में कुछ महीने तो सन्नाटा खिंचा रहा. मगर हार उनके लिए नई चीज नहीं थी. पार्टी फिर उठ खड़ी हुई दिखती है. 2017 के विधानसभा चुनावों के लिए उसने खम ठोंक दी है. ज्यादातर सीटों पर प्रत्याशी घोषित हो चुके हैं. उन्होंने तैयारियां भी शुरू कर दी हैं.

और उसी क्रम में शुक्रवार को मायावती का जन्मदिन और इस दौरान हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस खास हो गई. ठहरकर देखते हैं कि क्या कहा उन्होंने.

  1.  जब मेरी सरकार थी, इस दिन दलितों गरीबों के लिए हजारों करोड़ की स्कीम अनाउंस करती थी. अब अखिलेश यादव की सपा सरकार है. मेरी स्कीम बंद करवा दीं. सारा पैसा सैफई में अपने पापा का बर्थडे फूहड़ ढंग से मनाने में ही खर्च कर देते हैं.
  2.  मुसलमानों को आंखें खोलनी चाहिए. सपा राज में कितने सांप्रदायिक दंगे हुए हैं, सबको नजर आ रहा है. बीजेपी को रोकना होगा.
  3.  दलित बीजेपी से सावधान रहें. ये आज वोट पाने के लिए अंबेडकर की बात कर रहे हैं. अब तक कहां थे. और इन्हें वाकई चिंता है तो नौकरी के दौरान प्रमोशन में एससी को रिजर्वेशन को लेकर संसद में बिल क्यों नहीं ला रहे हैं.
  4.  एससी और एसटी के जो लोग बौद्ध जैसे धर्म में चले गए हैं. उन्हें भी रिजर्वेशन का फायदा मिलना चाहिए.
  5. गरीब सवर्णों को रिजर्वेशन मिलना चाहिए.

गौर करिए. मायावती फिर पुराने प्लैंक पर हैं. पहला, रिजर्वेशन के मुद्दे पर आक्रामक रवैया. ताकि कोर वोट बैंक सेफ रहे. बीजेपी इन दिनों अंबेडकर के बहाने इसे तोड़ने में लगी है. दूसरा, सपा के पाले से मुसलमानों को खींचना. मुस्लिम बीएसपी को संदेह के नजरिए से देखते रहे हैं. क्योंकि इसने तीन बार बीजेपी संग मिल सरकार बनाई. मायावती उन्हें अखिलेश राज में हुए तमाम दंगों की याद दिला रही हैं. और यह भी याद करने को कह रही हैं कि उनकी सरकार में दंगे नहीं होते थे. तीसरा, गरीब सवर्णों को रिजर्वेशन का वादा. और अगर ये वादा एक चौथाई भी काम कर गया. तो खेल पलट जाएगा.

मायावती यूपी में आज भी सबसे ताकतवर राजनीतिक खिलाड़ी हैं. प्रदेश में एंटी इनकमबैंसी माहौल बन रहा है. ऐसे में दो विकल्प बचते हैं. बीजेपी, या बीएसपी. दोनों ही संगठन और बूथ पर मजबूत हैं. मगर बीजेपी का कमांडर अभी तय नहीं है. और बीएसपी में कमांडर के अलावा ऊपर के लेवल पर कोई और नहीं है.

खैर, आखिर में मायावती के प्लस माइनस पर क्विक रीड मारते हैं .

मजबूती

  1. सख्त सीएम की छवि. खासतौर पर लॉ एंड ऑर्डर के मामले में. ब्यूरोक्रेसी पर नकेल कर रखती थीं.
  2. दलितों के लिए कई योजनाएं बनाईं और लागू कर दिखाया. मसलन, कांशीराम आवास योजना.
  3.  दलित ताकतवर तब महसूस करेगा, जब थाने और कलेक्टरी में उसकी सुनवाई हो. मायाराज में थानाध्यक्ष के लिए दलितों का कोटा अलिखित रूप से तय था. प्रशासनिक अमला भी इसी लीक पर चलता था. 2 और 3 के एफर्ट कोर वोट बैंक को बांधने में सहायक रहे और आगे भी रहेंगे.
  4.  दो शहर और एक सड़क. लखनऊ खासतौर पर गोमती पार का लखनऊ मायावती की छाप सदियों तक लिए रहेगा. ग्रेटर नोएडा की भी यही कहानी है. और यमुना एक्सप्रेस वे भी उसी विजन का नतीजा है.
  5.  अपने तमाम राजनीतिक विकल्प खुले रखती हैं. कांग्रेस, लेफ्ट के साथ रिश्ते बनाकर रखती हैं. बीजेपी के साथ भी तीन बार तो आ ही चुकी हैं. बस सपा ही पक्की दुश्मन है. तो राजनीतिक रूप से ज्यादातर को स्वीकार्य हैं.

कमजोरी

  1. यूपी में चार चार बार शासन के बावजूद मायावती बीएसपी को दूसरे सूबों में मजबूती से नहीं ले जा पाईं. इस कमजोरी के चलते ही दिल्ली पर उनका दावा हलका दिखता है.
  2. सुप्रीमो हैं, तो पकड़ भी साफ है. मगर दूसरी पांत के कोई नेता नहीं. जो हैं, वो हां जी मैडम करने वाले हैं. पुराने कद्दावरों को एक एक कर जमींदोज कर दिया.
  3. मीडिया से दूरी. उनका तर्क है कि मेरा वोटर जानता है कि मीडिया सवर्ण पार्टियों की ही तरफदारी करेगी. मगर इसके चलते इतनी बड़ी नेता के देश समाज के कई मुद्दों पर राय ही पता नहीं चलती. इंटरव्यू वह देती नहीं. प्रेस कॉन्फ्रेंस में कागज देखकर बोलती हैं. सवाल कभी लेती नहीं. इसके चलते उनकी छवि ओल्ड स्कूल नेता की बन रही है.
  4. डिजिटल इंडिया के दौर में बीएसपी उतनी हाईटेक नजर नहीं आती. प्रचार के नए माध्यमों के बीच वह अभी भी काडर और साइलेंट कैंपेनिंग के भरोसे है. इससे सिर्फ कोर वोट इन्टैक्ट रहता है. नए लोग कम जुड़ते हैं .
  5. दलितों के अलावा दूसरे तबकों को मायावती के तौर तरीके तानाशाही लगते हैं. इस तरह की खबरें चलती हैं कि कमरे में बस उनके लिए ही कुर्सी लगती है, बाकी सब जमीन पर बैठते हैं. सबको उनके पैर छूने होते हैं. कोई उनसे करीबी को लेकर पब्लिक में डींगें हांकता है तो पर कतर दिए जाते हैं. या फिर बीएसपी में कब किसे निकाल फेंका जाए, कोई भरोसा नहीं. इससे अटकलों और अविश्वास का माहौल रहता है. इसके अलावा बीएसपी पर टिकट बेचने के आरोप भी सबसे ज्यादा लगते हैं.

पर ऑल सैड एंड डन. बीएसपी इज नॉट डन.

मायावती जब 2007 में जीतकर आई थीं, तब जो कहा था, वही दोहराऊंगा.
माया महाठगिनी हम जानी.
मायावती को पता है कि पोल पंडितों को, दिल्लीछाप पत्रकारों को ठेंगा दिखाकर भी कैसे यूपी की किल्ली हासिल की जा सकती है. वह पहले भी ऐसा कर चुकी हैं. दोबारा भी करने का माद्दा रखती है. इति.

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