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ये 8 लोग होते तो यूपी में योगी नहीं, मायावती की सरकार होती!

नसीमुद्दीन सिद्दीकी के पार्टी से निकलने के साथ ही बीएसपी की एक और मीनार गिर गई. कांशीराम की बनाई यह पार्टी यहां तक इस तरह टूट-टूटकर ही पहुंची है और आज हाथी लेट चुका है. पार्टी से निकलकर नसीमुद्दीन ने मायावती पर जो गंभीर आरोप लगाए, उन पर ‘बहनजी’ को अपनी शैली के विपरीत आगे आकर सफाई देनी पड़ी. इतने सालों में बहुत कुछ जमा हुआ है, जो अब इस तरह ढलकाया जा रहा है.

नसीमुद्दीन अब आर के चौधरी, राशिद मसूद, ओम प्रकाश राजभर और स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं की लिस्ट में दर्ज हो गए हैं. ये लोग वो नेता हैं, जिन्होंने बीएसपी के लिए नींव के पत्थर की भूमिका निभाई, लेकिन इन्हीं नेताओं के साथ रिश्ते खराब करने में मायावती जरा भी नहीं झिझकीं.

मायावती पर आरोप है कि इन्होंने अपने रहते किसी को पार्टी में उठने नहीं दिया. यही आरोप जयललिता और ममता बनर्जी पर भी लगा. दूसरी पार्टियों में नेताओं की कतार नज़र आती है, लेकिन इन महिला नेताओं की पार्टियों में ढूंढ़ने पर भी कोई ‘2 नंबर’ नहीं मिलता.

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मायावती, जयललिता और ममता

1984 में पार्टी के बनने से लेकर अब तक बसपा से कई बड़े नेता निकाले जा चुके हैं और कई नाराज होकर खुद चले गए. कईयों ने बाद में अपनी पार्टियां बनाईं, लेकिन इनमें से अधिकांश अपना महत्व खो चुके थे. हालांकि, पार्टी से अलग होकर ये नेता भले अपना करियर न बचा पाए हों, लेकिन बड़ा नुकसान बसपा ने झेला. पार्टी का बना-बनाया कुनबा वक्त-वक्त पर बिखरता रहा.

नसीमुद्दीन के बहाने बात बीएसपी की उन फूटों की, जिनसे पार्टी धंसती चली गई:

#1. जंग बहादुर पटेल

इस लिस्ट में पहला नाम जंग बहादुर का है. कांशीराम के बेहद करीबियों में से एक जंग बहादुर ने बीएसपी बनने के कुछ साल बाद ही 1990 में पार्टी छोड़ दी थी. बीएसपी से निकलकर उन्होंने बहुजन समाज दल बनाया, लेकिन अपनी पार्टी के साथ जंग बहादुर सफल नहीं हुए. ये पार्टी खत्म हो चुकी है. कुर्मी जाति से आने वाले पटेल को मायावती से विरोध की वजह से ही पार्टी से निकलना पड़ा था. कांशीराम के वक्त मायावती का रुतबा बढ़ने से कई नेताओं को पार्टी से अपना हिसाब करना पड़ा था.

जंग बहादुर ने जब अपनी पार्टी बनाई थी, उससे कुछ वक्त पहले ही बीएसपी के एक और बड़े नेता राज बहादुर ने अपने समर्थकों के साथ पार्टी छोड़ दी थी. ऐसे में पटेल का जाना पार्टी को बड़ा झटका था. लेकिन दूसरे सबसे बड़े नेता (मायावती) के हिसाब से चल रही पार्टी की कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं आया. किसी को भी दुत्कार-लताड़ देने की परंपरा बीएसपी में अब भी कायम है.

#2. डॉ. राशिद मसूद

1993 में जब सपा-बसपा ने मिलकर सरकार बनाई थी, तब राशिद को कैबिनेट मंत्री बनाया गया था. राशिद भी कांशीराम के ज्यादा करीब रहे. 1994 में इन्होंने बीएसपी छोड़कर अपनी पार्टी बना ली. नाम रखा राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी. हालांकि उनकी भी पार्टी सफल नहीं रही. आज इस पार्टी का कहीं नामो-निशान नहीं है. अभी मसूद राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के यूपी अध्यक्ष हैं.

#3. सोनेलाल पटेल

कांशीराम के करीबियों की लिस्ट में सोनेलाल पटेल का भी नाम था. मंचों पर इनकी कुर्सी कांशीराम के बगल में ही लगाई जाती थी. पर इन्होंने 1995 में बीएसपी छोड़ दी थी. बीएसपी छोड़कर सोनेलाल ने ‘अपना दल’ नाम से अपनी पार्टी बनाई, जिसके बाद में दो धड़े हो गए. एक इनकी पत्नी के हाथ में है और दूसरा इनकी बेटी अनुप्रिया पटेल के हाथ में. आज अनुप्रिया का अपना दल (एस) केंद्र और यूपी की सत्ता में भागीदारी में है, लेकिन सोनेलाल पटेल बहुत पीछे छूट चुके हैं.

#4. ओम प्रकाश राजभर

लंबे समय तक बीएसपी में रहने के बाद ओम प्रकाश राजभर ने 2002 में हाथी का साथ छोड़ दिया था. बाहर आकर इन्होंने अपनी पार्टी बनाई, ‘सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी’. राजभर उन खुशकिस्मत नेताओं में से हैं, जो बीएसपी से निकलने के बाद भी राजनीतिक रूप से जीवित हैं. हालांकि ऐसा हमेशा से नहीं था. पार्टी बनाने से लेकर 13 सालों तक राजभर यूपी की सियासत से गायब रहे. इनकी किस्मत खुली 2014 में, जब इन्होंने बीजेपी से गठबंधन कर लिया. ये गठबंधन 2017 के विधानसभा चुनाव में भी रहा. इन नजरिए से कहा जा सकता है कि यूपी सरकार में इनकी भी हिस्सेदारी है.

ओम प्रकाश राजभर
ओम प्रकाश राजभर

#5. स्वामी प्रसाद मौर्य

2017 विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे में पर्याप्त तवज्जो न मिलने पर मौर्य ने बेटे समेत बीएसपी छोड़ दी थी. बाहर आकर मौर्य ने मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाया. इनके बारे में ओबीसी वोटों पर पकड़ का दावा किया जाता है. हालांकि, इनके जाने से माया के तेवरों में कोई कमी नहीं आई. वह बोलीं कि अच्छा हुआ स्वामी खुद चले गए, वरना वह खुद उन्हें निकाल देतीं. मौर्य जिस जाति से ताल्लुक रखते हैं, वो यादव और कुर्मियों के बाद यूपी का तीसरा सबसे बड़ा जाति समूह है. ये गैर-यादव ओबीसी पूरे प्रदेश में पसरे हुए हैं और काछी, मौर्य, कुशवाहा, सैनी और शाक्य के उपनामों से जाने जाते हैं. 2011 में बाबू सिंह कुशवाहा के बर्खास्त होने के बाद मौर्य पार्टी में ओबीसी का अघोषित चेहरा बन गए थे.

चार बार विधायक रहे स्वामी साल 1980 में राजनीति में आए थे. 1996 में जब बीएसपी ने कांग्रेस संग चुनाव लड़ा, तो मौर्य पहली बार विधायक बने. सालभर बाद ही लाल बत्ती मिल गई. 2001 में माया ने उन्हें बीएसपी विधायक दल का नेता बनाया. 2003 में जब माया सीएम बनीं, तो मौर्य फिर मंत्री बने. दो साल बाद उन्हें संगठन का काम करने के लिए कहा गया, तो वह विधान परिषद के रास्ते सदन पहुंच गए. लखनऊ की एक सभा में वह कह गए थे कि दलित-पिछड़ों को गौरी-गणेश की पूजा नहीं करनी चाहिए, जिस पर पार्टी की किरकिरी हुई थी.

स्वामी प्रसाद मौर्य
स्वामी प्रसाद मौर्य

मौर्य के पार्टी से इस्तीफा देने के पीछे तगड़ी वजह थी. मौर्य की विधानसभा सीट बदल दी गई थी. 2012 में वह कुशीनगर की पडरौना सीट से जीते थे. 2017 में उन्हें रायबरेली की ऊंचाहार सीट से लड़ने को कहा गया. ऊंचाहार से पिछले चुनाव में मौर्य के बेटे उत्कृष्ट चुनाव लड़े थे और हार गए थे. अपनी बेटी संघमित्रा को माया की गुडबुक में शामिल करवाने के लिए स्वामी ने उनको 2014 के लोकसभा चुनाव में मैनपुरी में मुलायम के खिलाफ उतार दिया था.

बीएसपी से नाराजगी के बाद मौर्य बीजेपी में शामिल हो गए थे. तब यूपी बीजेपी अध्यक्ष रहे केशव प्रसाद मौर्य स्वामी को पार्टी में लेने के पूरी तरह खिलाफ थे, क्योंकि दोनों एक ही जाति से आते हैं और अभी तक केशव इसके इकलौते दावेदार थे. हालांकि ओम माथुर ने किसी तरह स्वामी को पार्टी जॉइन करवा दी. वैसे स्वामी जो मंसूबा लेकर बीजेपी गए थे, वो पूरा नहीं हुआ. अंदरखाने के मुताबिक स्वामी से वादा किया गया था कि 60 टिकट उनके कहे पर बांटे जाएंगे. ये संख्या पहले 40, फिर 30, फिर 15 और आखिर में 5 हो गई. लेकिन बीजेपी की लिस्ट में स्वामी के पांच भी नाम नहीं थे. स्वामी के बेटे को तो टिकट मिल गया था, लेकिन बेटी को नहीं मिल पाया था. इस चुनाव में स्वामी इकलौते थे, जिनके घर में बीजेपी ने दो टिकट दिए थे. पर भाजपा के नेता भी मानते हैं कि स्वामी प्रसाद मौर्य के आने के बाद भाजपा के प्रचार में तेजी आई थी.

बीजेपी में शामिल होते समय अमित शाह के साथ स्वामी
बीजेपी में शामिल होते समय अमित शाह के साथ स्वामी

#6. बाबू सिंह कुशवाहा

27 सालों तक बीएसपी से जुड़े रहे बाबू सिंह कुशवाहा की कहानी 1995 से शुरू होती है. उस साल गयाचरण दिनकर ने ही बांदा में चल रही IRD और स्पेशल कम्पोनेंट योजना में धांधली के चलते कुशवाहा की जांच कराई थी. इस दौरान नसीम ने बाबू को बचा लिया. नसीम ने कुशवाहा को मायावती के ऑफिस में टेलीफोन अटेंडेंट की नौकरी दिलवा दी. यहां से कुशवाहा ने ऐसा चक्कर चलाया कि माया के कैबिनेट तक पहुंच गए.

 मायावती सरकार के सबसे ताकतवर रहे मंत्रियों में से एक कुशवाहा पर सबसे बड़ा दाग NRHM घोटाले का है, जिसमें 50 से ज्यादा लोगों की संदिग्ध हालत में मौत हुुई. 2007 से 2012 के बीच केंद्र सरकार के नेशनल रूरल हेल्थ मिशन के लिए यूपी को करीब 8,657 करोड़ रुपए का फंड मिला, जिसमें से हजार करोड़ का नेताओं-अफसरों में बंदरबांट हुआ. इस मामले में CBI लंबे समय तक कुशवाहा पर हाथ नहीं डाल पाई. पर बाद में इनको जेल भी जाना पड़ा. कुशवाहा की राजनीति इस चीज से समझी जा सकती है कि ये बीएसपी से निकाले गए, बीजेपी में शामिल किए गए. कुशवाहा का बचाव करने में जब बीएसपी कमजोर हो गई, तो 2011 में इनसे जबरन इस्तीफा दिलवाया गया और अगले ही साल ये बीजेपी में शामिल हो गए. इनके कांग्रेस में आने की बात खुद राहुल गांधी से हो रही थी और इनके परिवार के दो सदस्य सपा में हैं.

बाबू सिंह कुशवाहा
बाबू सिंह कुशवाहा

2017 के विधानसभा चुनाव का माहौल बनते ही बाबू सिंह ने अपनी खुद की पार्टी ‘जन अधिकार मंच’ की घोषणा की. कहा कि उनकी पार्टी यूपी की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी. पार्टी बनाते ही बाबू ने सबसे पहले आरक्षण का मुद्दा उठाया था. कहा था कि यूपी में पिछड़ों की संख्या 60% है, जबकि आरक्षण सिर्फ 27% लोगों को मिलता है. उनकी पार्टी बाकियों को आरक्षण दिलाएगी.

पुलिस की गिरफ्त में बाबू सिंह कुशवाहा
पुलिस की गिरफ्त में बाबू सिंह कुशवाहा

#7. आर के चौधरी

आर के चौधरी वो नेता हैं, जिनका पार्टी में आना-जाना लगा रहा. बीएसपी बनने पर ये इसमें शामिल हुए थे, लेकिन पहले 2001 और फिर 2016 में वह पार्टी से बाहर हुए. पहली बार उन्हें निकाला गया, दूसरी बार वह खुद निकले. चौधरी 1981 में कांशीराम की डीएस-4 से जुड़े थे. उन्हीं के साथ काम करते हुए बीएसपी के संस्थापक सदस्य बने. 1993 में जब सपा-बसपा ने मिलकर सरकार बनाई, तो चौधरी कैबिनेट मंत्री बने. 1996 में वो बीएसपी के टिकट पर लखनऊ की मोहनलालगंज सीट से विधायक बने.

विधायकी के कुछ साल सब ठीक चला. परिवहन मंत्री भी बने, लेकिन 2001 में मायावती ने अति-महत्त्वाकांक्षी होने का आरोप लगाकर इन्हें बाहर कर दिया. चौधरी रौ में थे. अगले ही साल 2002 के चुनाव में अपनी ही सीट से निर्दलीय लड़ गए. जीत भी गए. दो साल ऐसे चलाया, फिर 2004 में अपनी पार्टी बना ली. नाम रखा, ‘राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी’. 12 सालों तक उन्होंने डीएस-4 की तर्ज पर बीएस-4 संगठन भी चलाया. 2007 में जब बीएसपी ने आक्रामक जीत दर्ज की थी, तब चौधरी ने अपनी ही पार्टी से चुनाव लड़ते हुए विधायकी की हैट्रिक लगाई थी. तब उन्होंने बीएसपी के ही कैंडिडेट को हराया था.

आरके चौधरी
आर के चौधरी

2012 के चुनाव में चौधरी सपा की चंद्रा रावत से चुनाव हार गए. इस हार के बाद वो बीएसपी में वापस आ गए, लेकिन उनकी दूसरी पारी लंबी नहीं चली. माया ने उन्हें 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ाया, लेकिन चौधरी बीजेपी के कौशल किशोर से हार गए. 2016 में जब यूपी में चुनाव का माहौल गर्म था, तो उन्होंने मायावती पर टिकट के बदले पैसों का आरोप लगाकर पार्टी छोड़ दी. चौधरी के ठीक पहले स्वामी प्रसाद मौर्य ने पार्टी छोड़ी थी, ऐसे में माया को लगातार झटके मिले. पार्टी के अंदरखाने यह चर्चा रही कि चौधरी की वापसी से फायदा हुआ था. हालांकि इसके उलट बताने वाले भी कम नहीं थे.

2017 के विधानसभा चुनाव में चौधरी का बीजेपी के साथ गठबंधन था. बीजेपी ने मोहनलालगंज सीट पर अपना कैंडिडेट नहीं उतारा था और चौधरी निर्दलीय लड़े थे. हालांकि आर के को मोदी-लहर का कोई फायदा नहीं मिला. जिस सीट पर उन्होंने हैट्रिक लगाई, वहीं वो तीसरे नंबर पर रहे. ये सीट सपा (71,574 वोट) ने जीती और दूसरे नंबर पर रहा बीएसपी कैंडिडेट (71,044 वोट) महज़ 530 वोटों से चुनाव हार गया. चौधरी को 55,684 वोट मिले थे. बीजेपी को पूरा भरोसा था कि चौधरी के बूते वह मोहनलालगंज में खाता खोल लेगी. चौधरी भले चुनाव हार गए, लेकिन बड़ा नुकसान बीएसपी का हुआ. आर के दलितों की दूसरी सबसे बड़ी उपजाति पासी जाति से हैं, जिसमें उनका अच्छा असर है. यूपी के दलित वोटों का 16% पासी वोट है.

मायावती के पैर छूते आरके चौधरी
मायावती के पैर छूते आर के चौधरी

#8. नसीमुद्दीन सिद्दीकी

यूपी चुनाव के दौरान बीजेपी नेता दयाशंकर सिंह के मायावती को ‘वेश्या से बदतर’ कहने के बाद नसीमुद्दीन ही थे, जिनके नेतृत्व में बीएसपी कार्यकर्ता दयाशंकर की मां-बहन-बेटी-बीवी को चौराहे पर पेश करने के नारे लगा रहे थे. इस मामले में इन पर केस भी चल रहा है. बीएसपी में दूसरे नंबर के नेता रहे नसीमुद्दीन राजनीति से पहले वॉलीबॉल के मैदान पर खेलते थे. बांदा के सेवरा गांव में पैदा हुए नसीम पहले सेना में गए और फिर रेलवे में ठेकेदारी की. 1988 में बीएसपी बनने के चार ससाल बाद वह पार्टी से जुड़ गए. तब बीएसपी कांशीराम की थी. वैसे पार्टी जॉइन करने से पहले उन्होंने बांदा नगर निगम का चुनाव लड़ा था, जिसमें वह हार गए थे.

1991 में बीएसपी ने उन्हें विधानसभा चुनाव का टिकट दिया और उन्होंने अपना चुनाव निकाल लिया. लेकिन बाबरी विवाद के बाद जब दो साल बाद 1993 में चुनाव हुए, तो नसीम विधायकी बरकरार नहीं रख पाए. 1996 के चुनाव में भी वह हार गए थे. 1995 में जब माया पहली बार मुख्यमंत्री बनीं, तो उन्होंने नसीम को कैबिनेट में जगह दी. इसके बाद मार्च 1997 से अगस्त 1997 तक और मई 2002 से अगस्त 2003 तक नसीम कैबिनेट में रहे. 2007 में जब माया ने आक्रामक जीत दर्ज करते हुए सरकार बनाई, तो नसीम पांच साल मंत्री रहे. पार्टी के मुस्लिम चेहरे के तौर पर.

नसीमुद्दीन सिद्दीकी
नसीमुद्दीन सिद्दीकी

2017 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने नसीम के 28 साल के बेटे अफजल को खूब प्रमोट किया. इस चुनाव में बीएसपी ने मुस्लिमों को आकर्षित करने की बहुत कोशिश की. 9 अक्टूबर को लखनऊ में रैली करते हुए खुद माया ने मुस्लिमों से कांग्रेस और सपा को वोट न देने के लिए कहा, ताकि बीजेपी का फायदा न हो. अफजल को वेस्ट यूपी के आगरा, अलीगढ़, मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद और बरेली शहरों की जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन बीएसपी नाकाम रही. अफजल 2012 से राजनीति में एक्टिव हैं. 2014 में अफजल फतेहपुर सीट से लोकसभा चुनाव भी हार गए थे.

राजनीति में माया ने किसी से नहीं दिखाया लगाव

पिछले 15 सालों में मायावती ने बीएसपी के करीब 50 नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया है. इन 50 नेताओं में से 13 मंत्री रह चुके थे, 13 मंत्री की हैसियत रखते थे और बाकी भी पार्टी में बढ़ते हुए नेता माने जाते थे. किसी नई या बढ़ती हुई पार्टी के लिए ये नेता कितने महत्वपूर्ण होते हैं, इस बात को बीएसपी की मौजूदा हालत से समझा जा सकता है. 2007 से 2012 के बीच सीएम रहते हुए माया ने 26 बड़े नेताओं को पार्टी से निकाला था. इनमें से 13 या तो मंत्री थे या मंत्री की हैसियत वाले या विधायक-सांसद थे.

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बीएसपी की ये लिस्ट बहुत लंबी है

ऊपर हमने जिन नेताओं का जिक्र किया, उनके जाने की बीएसपी को अगले कई सालों तक उठाना पड़ेगा. इनके अलावा भी कई ऐसे नेता हैं, जो कांशीराम से लेकर माया के राज में रहे, लेकिन उन्हें माया की अजीब किस्म की राजनीति का शिकार होना पड़ा. इस लिस्ट में राम लखन वर्मा, दद्दू प्रसाद, बरखूराम वर्मा, श्रीराम यादव, कैप्टन सिकंदर रिजवी, दीनानाथ भास्कर, राज बहादुर, बलिहारी बाबू, ईसम सिंह, रामरती बिंद, सरदेस अंबेडकर, अहमद मसूद, मोहम्मद अरशद, रामप्रसाद, प्रमोद कुरील, जगन्नाथ राही, अशोक वर्मा, प्रमोद कुरील और माया प्रसाद जैसे नेताओं का नाम है. बसपा के मुखपत्र ‘बहुजन संगठन’ के सम्पादक राम प्रसाद और दिल्ली बीएसपी कार्यालय के प्रभारी अशोक कुमार को तो बेइज्जत करके पार्टी से निकाला गया था.

कांशीराम के साथ मायावती
कांशीराम के साथ मायावती

कांशीराम और उनके वक्त के नेताओं ने मायावती को बेहतरीन काडर तैयार करके दिया था, लेकिन कार्यकर्ताओं से न मिलने वाली नीति के चलते माया अब ढलान पर हैं. दिग्गज नेताओं के बाहर होने की वजह से माया जातीय समाजों से सीधा संबंध नहीं बना पाईं, जिनके बूते वह इतनी बार यूपी जैसे सूबे की मुखिया बनीं. आज खुद बीएसपी के नेताओं के लिए माया तक पहुंचना उतना ही मुश्किल है, जितना माया के सर्वेसर्वा बनने के बाद कांशीराम तक पहुंचना मुश्किल हो गया था. जब नेता ही नहीं होंगे, तो वोट कहां से पहुंचेगा.


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