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जब मजदूरों के एक नेता ने इंदिरा गांधी की सरकार की चूलें हिला दीं

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दुनिया भर के कामगार पहली मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाते हैं. शिकागो में 4 मई 1886 में मजदूर आठ घंटे काम की मांग को ले कर प्रदर्शन कर रहे थे. प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए गोलियां चला दी गईं. इसमें कई मजदूर मारे गए. इसके बाद पहली मई को शिकागो के शहीद मजदूरों की याद में मजदूर दिवस मनाया जाने लगा. भारत में लेबर किसान पार्टी ऑफ हिन्‍दुस्‍तान ने 1 मई 1923 को मद्रास में इसकी शुरुआत की थी. मजदूर दिवस के मौके पर भारत के मजदूर आंदोलन की खास हड़तालों और नेताओं की कहानियां आपके सामने पेश हैं:

दत्ता सामंत

“डॉक्टर साहेब” यही वो नाम था, जिससे दत्तात्रेय नारायण सामंत को बंबई का मिल मजदूर जनता था. 21 नवम्बर 1931 को पैदा हुए दत्ता सामंत का अपने शुरुआती जीवन में मजदूर आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं था. वो मेडिसिन के छात्र थे और पढ़ाई पूरी करने के बाद पंतनगर, घाटकोपर में डॉक्टर के तौर पर काम करने लगे. ये पहला मौका था जब दत्ता सामंत को पहली बार मजदूरों के दुख-दर्द को जानने का मौका मिला. ये वो दौर था जब मुंबई में काम कर रहे 10 में से 7 मजदूर कपड़ा मिल के कामगार हुआ करते थे. धीरे-धीरे दत्ता सामंत ट्रेड यूनियन के सक्रिय नेता बन कर उभरे. हालांकि उनकी सक्रियता ऑटोमोबाइल यूनियन में ज्यादा थी और उन्होंने वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर कई सफल हड़तालें की थीं.

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ग्रेट बॉम्बे टेक्सटाइल स्ट्राइक  

बॉम्बे की कपड़ा इंडस्ट्री के साथ दिक्कत ये थी कि अंतरराष्ट्रीय बाजार का प्रभाव बहुत पड़ता था. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से मुंबई का कपड़ा उद्योग खुद को बचाए रखने के लिए जद्दोजहद कर रहा था. पिछले दो दशक से मजदूरों की दिहाड़ी में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया था. दत्ता सावंत की सफलता से प्रभावित होकर कपड़ा मिल मजदूरों ने उन्हें अपने आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए कहा. दत्ता ने अपने संगठन राष्ट्रीय मिल मजदूर संघ के खिलाफ जाकर मजदूरों का साथ दिया. ये संगठन कांग्रेस की ट्रेड यूनियन इंटक से जुड़ा था. इस निर्णय के दो परिणाम हुए. पहला, उनका कांग्रेस से मोहभंग हुआ और वो वामपंथी राजनीति के करीब चले गए. दूसरा, आने वाले दिनों में ये हड़ताल भारत के इतिहास में सबसे लंबी चलने वाली मजदूर हड़तालों में से एक साबित होने जा रही थी.

दत्ता सामंत ने मजदूर आन्दोलन में अपनी उग्र छवि और हिंसक प्रदर्शनों के कारण पहचान कायम की थी. लेकिन ऑटोमोबाइल क्षेत्र उस समय अच्छा पैसा बना रहा था. मालिकों के लिए वेतन बढ़ाना उतना मुश्किल नहीं था. टेक्सटाइल उद्योग के हालात अलग थे. आन्दोलन शुरू हुआ. तीन लाख मिल मजदूर डॉक्टर साहेब के नेतृत्व में घर बैठ गए. दत्ता की मांग थी कि वेतन बढ़ाने के साथ-साथ बॉम्बे औद्योगिक कानून 1947 में भी तब्दीली करनी थी. इस कानून के हिसाब से सिवाय राष्ट्रीय मिल मजदूर संघ के अलावा कोई भी आधिकारिक मिल मजदूर यूनियन नहीं होगी.

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इधर इंदिरा गांधी ऐसे किसी उग्र रुझान के मजदूर नेता को बर्दाश्त नहीं करना चाह रही थीं. उन्होंने ठान ली कि दत्ता की कोई भी मांग पूरी नहीं होनी चाहिए. यही वो दौर था, जब कांग्रेस की शह पर बॉम्बे में रैडिकल रुझानों वाले एक नेता को खड़ा किया जा रहा था. उस नेता का नाम था बाल ठाकरे. एक साल चली इस हड़ताल में बॉम्बे ने हिंसक आंदोलन देखे. बाहर से मजदूर लाकर मिल चलाने की कोशिश हुई लेकिन सफल नहीं हो पाई. अंततः सेंट्रल मुंबई की तमाम कपड़ा मिल शहर से बाहर शिफ्ट हो गई. यहीं से बॉम्बे के मजदूर आंदोलन का अंत शुरू हुआ. एक साल बाद ये आन्दोलन बिना किसी परिणाम के समाप्त हो गया. लाखों मिल मजदूर सड़क पर आ गए.

डॉक्टर साहेब की हत्या

डॉक्टर साहेब की लोकप्रियता का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए 1984 के चुनाव में भी वो साउथ बॉम्बे की अपनी सीट निर्दलीय के रूप में जीत पाने में कामयाब रहे थे.

16 जनवरी 1997 को दत्ता सामंत सुबह साढ़े दस अपने ऑफिस के लिए निकल रहे थे कि चार मोटरसाइकिल सवारों ने उन पर अंधाधुंध गोलिया दाग दीं. उनकी मौत के बाद मुंबई में जोरदार प्रतिरोध हुआ. लगभग 3 लाख मजदूर उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए. किस्सा ये भी है कि हजारों की तादाद में मजदूर बाल ठाकरे के घर मातोश्री को फूंकने पहुंच गए थे. उनकी हत्या का आरोप छोटा राजन और गुरु साटम गैंग पर लगा. तीन हत्यारों को 2005 में गिरफ्तार कर लिया गया. जबकि एक आरोपी विजय चौधरी 2007 में एनकाउंटर में मारा गया.

जॉर्ज फर्नांडिस  

बिहार से राज्यसभा सांसद रहे जॉर्ज फर्नांडिस का जन्म मैंगलोर में 3 जून 1930 में हुआ. उन्हें 1946 में उन्हें बैंगलोर भेजा गया ताकि वो पादरी बन सकें. लेकिन जॉर्ज का मन यहां लगा नहीं और वो 1949 में बॉम्बे आ गए. यहां उनके पास कोई रोजगार नहीं था. करीब एक महीने तक वो दर-दर की ठोकर खाते रहे. वो खुद बताते थे, “बॉम्बे के अपने शुरुआती दिनों में मैं चौपाटी के किनारे बेंच पर रात गुजारता था. आधी रात को पुलिस वाले आते और मुझे भगा देते थे.” कुछ दिन यूं ही भटकने के बाद उन्हें एक जगह प्रूफ रीडर की नौकरी मिल गई. जिंदगी कुछ पटरी पर लौटी. काम के दौरान ही उनका परिचय समाजवादी मजदूर आंदोलन से हुआ.

उन पर डॉक्टर लोहिया का गहरा प्रभाव पड़ा. वो सक्रिय रूप से मजदूर आन्दोलन में कूद पड़े. इस दौरान वो 1961 में बॉम्बे नगर निगम के पार्षद बने. लेकिन वो मोड़ 1967 में आया जब जॉर्ज को नया नाम मिला जाइंट किलर. लोकसभा के चुनाव होने को थे. बॉम्बे साउथ की सीट से कांग्रेस के मजबूत नेता सदाशिव कानोजी पाटिल के खिलाफ उन्हें चुनाव लड़ने के लिए कहा गया. यहां उनकी पार्टी संसोपा के लिए कोई उम्मीद नहीं थी. परिणाम उम्मीदों के ठीक उलट था. 48.5 फीसदी वोट लेकर जॉर्ज ने ऐतिहासिक जीत हासिल की. इसके बाद उनकी राजनीतिक पारी इतिहास के पन्नों में आसानी से खोजी जा सकती है.

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74 की रेल हड़ताल

आजादी के बाद तीन वेतन आयोग आ चुके थे, लेकिन रेल कर्मचारियों के वेतन में कोई दर्ज करने लायक बढ़ोत्तरी नहीं हुई थी. जॉर्ज उस समय ऑल इंडिया रेलवे मैन्स फेडरेशन के अध्यक्ष हुआ करते थे. वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हड़ताल करने का निश्चय हुआ. इसके लिए नेशनल कोऑर्डिनेशन कमिटी बनी. 8 मई 1994 को बॉम्बे में हड़ताल शुरू हुई. बाद में टैक्सी ड्राइवर, इलेक्ट्रिसिटी यूनियन और ट्रांसपोर्ट यूनियन भी इसमें शामिल हो गईं. मद्रास की कोच फैक्ट्री के दस हजार मजदूर भी हड़ताल के समर्थन में सड़क पर आ गए. गया में रेल कर्मचारियों ने अपने परिवारों के साथ पटरियों पर कब्ज़ा कर लिया. एक बार के लिए पूरा देश रुक गया.

सरकार की तरफ से हड़ताल के प्रति सख्त रुख अपनाया गया. एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक हड़ताल तोड़ने के लिए 30,000 से ज्यादा मजदूर नेताओं को जेल में डाल दिया गया. 27 मई को बिना कोई कारण बताए कोऑर्डिनेशन कमिटी ने हड़ताल वापिस लेने का एलान कर दिया. इस तरह देश की सबसे सफल रेल हड़ताल का अंत हुआ. बाद के दौर में इस बारे में कहा कि हड़ताल में शामिल लोगों अगल-अलग राग अलापने लगे. ऐसे में आंदोलन को आगे ले जाना मुश्किल हो गया था. एक सच यह भी है कि इस हड़ताल ने सरकार के मन में जिस असुरक्षा की भावना को पैदा किया था, उसने आपातकाल लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.


 

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