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'आग पर चलते हुए मंटो पहली बार खुद को ढूंढ़ पाया था'

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मंटो वाला महीना में आज हम आपको कुछ अलग पढ़वाएंगे. मंटो का एकदम ताजा माल. एक किताब है दोज़खनामा. यानी कब्रों में लेटे मंटो और ग़ालिब की बातचीत. दोज़खनामा किताब रबिशंकर बल ने लिखी थी 2010 में. बांग्ला भाषा में. मगर हम हिंदी वालों को 2015 में मिली. वाया अनुवाद गली. शुक्रिया अमृता बेरा. अनुवाद के लिए. और शाबाश हार्पर हिंदी. इस उम्दा किताब को हम तक पहुंचाने के लिए.

हां तो इसी दोज़खनामा किताब का एक चैप्टर है. मंटो अपने किस्से सुना रहे हैं. और किसे. मिर्ज़ा ग़ालिब को. ये किस्सा भी मंटो की कहानी लगती है. इसका कोई टाइटल नहीं है. मंटो के लिखे को टाइटल देना वैसे भी गलत है. तो बस पढ़िए मंटो का ये किस्सा.


 

मिर्ज़ा साहब, इस मिस्कीन को माफ़ कीजियेगा. मंटो अपने क़िस्से से बार-बार ग़ायब हो रहा है. यही मेरी फ़ितरत है. अगर आप मेरे क़िस्सों को पढ़ते तो समझ पाते कि उनमें मंटो अब है और अब नहीं, वह एक काफ़िर रूह की तरह भागा-भागा फिरता रहता है.

भागने के अलावा कोई और चारा भी नहीं. सआदत हसन कभी मंटो का सामना नहीं कर पाता था. सआदत हसन के कितने ठाट थे. ख़ानदानी रूआब. ऐसे कपड़े चाहिए. वैसे लाहोरी जूतों के बिना नहीं चलेगा. अनारकली बाज़ार के करनाल बूट शॉप से कम-से-कम दस-बारह जोड़ी चप्पलें ख़रीदनी ही होंगी. कितनी और ख़ुश ख़्यालियां. और मंटो उसके कान खींचते- खींचते, झकझोरते हुए कहता, साला सूअर का बच्चा नवाबी झाड़ रहा है, जो लिखा है, उसकी क़िस्मत जानता है.

काले कपड़े से महुंबांध कर क़ैदख़ाने में डाल देंगे तुझे. सारा हिन्दुस्तान तेरे लिखे की बदबू से भर जायेगा. साला, सूअर कहीं का, इतना बड़ा काफ़िर है तू कि “ठण्डा गोश्त” जैसी कहानी लिखता है? लोग क्या कहते हैं, सुना है तूने? बस आदमी और औरत के गोश्त के बारे में लिखा है. रेड लाईट एरिया छोड़ कर और है क्या तुम्हारे लिखे में! हाथ खड़े कर दिए, मिर्ज़ा साहब, नहीं कुछ और नहीं है. ख़ून है. बलात्कार है. मुर्दों के साथ संभोग है, गालियां ही गालियां हैं. और इन सब तस्वीरों के पीछे छुपे हुए हैं कुछ साल.

ख़ून में बह गये कुछ साल. 1946, 1947 और 1948. नो मैंस लैंड है. देश के अन्दर एक भूखंड. जहां टोबा टेक सिंह मरा था. टोबा टेक सिंह का नाम आप लोगों ने नहीं सुना. सुनेंगे भी कहां से? वह तो पागलपन से सिवा कुछ और नहीं था! न, न, भाईजान लोग, घबराइए नहीं, आग का क़िस्सा अब शुरू होगा. मैं टोबा टेक सिंह को लेकर बातें बनाने नहीं बैठूंगा. पर जानते हैं, मंटो को तो बहुतों ने अलग-अलग ढंग से समझने की कोशिश की है.

आख़िर ये सूअर का बच्चा है कौन. पागल या मैनिऐक, मानसिक रोगी या फ़रिश्ता. मुझे लोगों की इस समझने की चाह पर मूतने का मन करता था, सालों किस तरह समझोगे तुम, क्या तुमने कभी मेरी तरह सूरज को डूबते हुए देखा है. तो कैसे समझ सकोगे कि मैं सबसे पहले औरतों के पांवों को क्यूं देखा करता था. इसलिए इस समझने की कोशिश को छोड़ो, मंटो को अगर ढूंढ़ना चाहते हो तो उसके लिखे क़िस्सों को पढ़ो.

वे लोग, वह लड़कियां जिन्हें तुम सड़कों, चालों, रंडीख़ानों और बॉम्बे के स्टूडियो में देखते हो, चाहो तो उन्हीं में मंटो को ढूंढ़ सकते हो. वे कहते थे, ये कहानियां हैं या कीचड़? अरे भाई, जिस समय में रह रहे हो, अगर उस समय को समझ न सको तो मेरे अफ़सानों को पढ़ो, और अगर मेरे क़िस्से तुम्हें बर्दाश्त नहीं हो रहे हैं तो समझ लो कि इस समय को ही बर्दाश्त करना मुमकिन नहीं. लेकिन यह सब बोल कर क्या फ़ायदा? उन लोगों ने तो मंटो के बदन को आग में तपती सीकों से दाग़ दिया था. क्या वह लेखक है, वह तो पोर्नोग्राफ़र है, उसका कारोबार इंसानों की ज़िन्दगी के गंदे पहलुओं को ले कर है.

जबकि मैंने जब भी कोई कहानी शरू की, 786 की संख्या, बिसमिल्लाह का नाम लिखना कभी नहीं भूला. भाईजान लोग, यह सब मेरे जलते हुए अंगारों पर चलने का ईनाम था. आप लोगों को मास्टर ख़ुदा बख़्श की बात याद है न? जिसने पिकाडिली सर्कस में आंखों पर काला कपड़ा बांध, गाड़ी चला कर एक नया करतब दिखाया था? ख़ुदा बख़्श के बाद अमृतसर में अल्ला रक्खा नाम के एक शख़्स हाज़िर हुए, सुना कि वह ख़ुदा बख़्श के गुरू थे. उन्होंने सड़क पर गड्ढा खोद कर कोयले जलते थे. और उन सुलगते अंगारों पर चलते थे. अल्ला रक्खा का जादू देखने के लिए दिन पे दिन भीड़ बढ़ने लगी.

उनको लेकर तमाम क़िस्से कहानियां फैलने लगे. मैं चुपचाप बैठा उस आदमी को देखता रहता था. जलते अंगारों पर कैसे कोई इंसान चल सकता है? चलने के बाद वे पैर उठाकर दिखाते थे, जिन पर कोई भी फफोला नहीं होता था. मैंने बीबीजान से अलहल्लाज की कहानी सुनी थी. एक बार हल्लाज बहुतों को साथ लेकर, रेगिस्तान पार कर मक्का जा रहे थे. चलते-चलते मुसाफ़िर भूख से थक गए. उन्होंने हल्लाज से कहा, पीरसाहब, यहां खजूर
नहीं मिल सकते हैं?

हल्लाज ने हंस कर कहा, ‘खजूर खाओगे?’
जी बहुत भूख लगी है. पैर उठ नहीं रहे हैं.
रुको. हल्लाज के रेगिस्ता न की हवा में हाथ घुमाते ही उनके हाथ में खजूरों से भरा एक बर्तन आ गया. फिर चलना शुरू हुआ, फिर थोड़ी देर के बाद भूख से परेशान होकर रेत पर बैठ जाना पड़ा. भाईजान लोग, एक वह वक़्त था. है न मिर्ज़ा साहब, जब ज़िन्दगी का मतलब एक के बाद एक रेगिस्तान पार होना होता था. और रातें मरुभूमि के आसमान के तारों का साथी बन कर कटा करती थीं. वह पीर, साधक और हजरतों की राह थी. कि तने, कि तने समय पहले हम सब उस राह से हट कर इस दोज़ख़ की ओर चले आए. अपने शोर-शराबे में, नर्क में, सड़ी मांस की बदबू में. भूख मिटाने के लिए इस बार मुसाफ़िरों ने हलवा मांगा. हल्लाज हंस दिए, ‘सिर्फ़ हलवा खा कर पेट नहीं भरेगा, और कुछ चाहिए?’

जी नहीं हुज़ूर, आगे चलने के लिए बस उतना ही काफ़ी है. वह तो है. पिंजरा भी न रहने से दीन की राह पर चलोगे कैसे? यह कह कर उन्होंने फिर से हवा में हाथ घुमा कर हलवा हाज़िर कर दिया. हलवे की ख़ुशबू से पूरा रेगिस्ता न भर गया. हलवा खाने के बाद एक ने कहा, ‘पीरसाहब, ऐसा हलवा तो बग़दाद छोड़ कर और कहीं नहीं मिलता है.’

हल्लाज ने हंस कर कहा, ‘बग़दाद या रेगिस्तान, ख़ुदा के लिए सब जगह एक है.’
और खजूर कहां से मिले थे?
हल्लाज कुछ देर तक ख़ामोश बैठे रहे, उसके बाद उठ कर सीधे खड़े हो गए. जैसे कि वह कोई पेड़ हों. कहने लगे, ‘अब मुझे पकड़ कर झकझोरो.’
क्यूं पीरसाहब?
देखो तो सही. हल्लाज हंसे.
सब मिलकर हल्लाज को हिलाने लगे. हल्लाज जैसे खजूर का पेड़ हो गये हों, उनके बदन से पके खजूर टपकने लगे. गाढ़े बदामी रंग के खजूर सूरज की रोशनी में जवहारातों की तरह चमक रहे थे. अल्ला रक्खा साहब का जादू देखते-देखते मैं मंसूर हल्लाज के उस क़िस्से के ही बारे में सोच रहा था. मिर्ज़ा साहब यह तो ख़ालिस जादू था, हाथ की सफ़ाई का खेल नहीं. एक इंसान अगर खजूर का पेड़ हो सकता है, तो फिर कोई इंसान जलते हुए अंगारों पर क्यूं नहीं चल सकता? इसका मतलब है. इंसान दुनिया में कितनी कूवत ले कर आता है? लेकिन उस ताक़त का कितना छोटा सा हिस्सा उजागर हो
पाता है? हम बस कितना थोड़ा सा देख पाते हैं? हम क्यूं नहीं देख पाते हैं, मिर्ज़ा साहब? मीर साहब का वह शेर याद है आपको?

दुनिया में रहो ग़मज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ करके चलो जाके बहुत याद रहो .

दुनिया में रहो, पर इसे समझने की कोशिश मत करो, भाईजान लोग. यहां एक किताब की तरह रहो . जिसके वर्कों पर सब कुछ लिख कर ले जाना . बताता हूं उसके बाद क्या हुआ. देख रहा हूं कि आपके चेहरे बेज़ार हो उठे हैं. उस दिन अचानक अल्ला रक्खा ने कहा, ‘तुमलोग ख़ुदा पर ऐतबार करते
हो?’

जी हुज़ूर . भीड़ के अन्दर से आवाज़ आई .
और मुझ पर?
हुज़ूर नबी हैं. सब कहने लगे .
अल्ला रक्खा साहब ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे. नबी? नबी को देखा है? नबी कौन हैं जानते हो?
हुज़ूर, बताइए.

तो फिर एक क़ि स्सा सुनाता हूं, सुनो. अबु सईद अबुल ख़ैर के बारे में सुना है कभी? ख़ुरसान के सूफ़ी कामिल. यह सब बारहसौ-तेरहसौ साल पुरानी बातें हैं. तब दुनिया कैसी थी जानते हो?
कैसी हुज़ूर?
तब तरह-तरह की हवाएं बहा करती थीं. और उन हवाओं को बदन से लिपटाए, अलग अलग इंसान, अलग-अलग तरह से पागल हो जाते थे. कहते- कहते अल्ला रक्खा साहब हंस दिए. तो पीर अबु सईद एक दिन अपने एक शागिर्द दरवेश को लेकर जंगल के बीच से गुज़र रहे थे. उस जंगल में ज़हरीले सांप रहते थे. अचानक एक सांप ने आ कर अबु सईद के पैरों को कस लिया. शागिर्द तो डर से वहीं जम गया. उसकी ऐसी हालत देख, अबु सईद ने कहा, ‘डरो मत.’
यह साप मुझे सजदा करने आया है . यह मुझे काटेगा नहीं . क्या तुम चाहते हो, यह
तुम्हें भी सजदा करे?’

जी बिल्कुल. शागिर्द की आंखें और चेहरा चमकने लगा. जब तक तुम ख़ुद को नहीं भूल पाते, यह कभी तुम्हें सजदा नहीं करेगा. भाईयों, वह एक नबी थे. उनका कुछ भी अपना नहीं होता. सिर्फ़ अल्लाह की बात बताने के लि ए वे इस दुनिया में हैं. तो लो, अब अपना इम्तहान दो.

कैसा इम्तहान? अल्लारक्खा साहब कैसी परीक्षा चाहते हैं? भीड़ में सब एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे. तुमलोगों ने कहा था कि तुम अल्लाह पर एतबार करते हो, और मुझ पर भी. तो जिस किसी को भी एतबार है. मेरे साथ आग पर चलने के लिए आ जाए. अल्ला रक्खा की बात सुन कर भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी. कोई चुपचाप सरक गया तो कोई आग की ओर देखते ही भाग गया. तब मुझसे रहा नहीं गया, मिर्ज़ा साहब. मैं अल्ला रक्खा साहब की ओर बढ़ा. जूता-मोज़ा खोल, अपना कुर्ता समेट लिया.

अल्ला रक्खा साहब ने हैरान हो कर मेरी तरफ़ देख कर कहा, ‘बेटा तू मेरे साथ आग पर चलेगा?’
जी. तो फिर आ. उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर खींचा. क़लमा पढ़:

ला लाहा इल्ला ल्ला हो मुहम्मदुर रसूलल्ला ह. ला इलाहा इल्ला ल्ला हो मुहम्मदुर रसूलल्ला ह.

क़लमा पढ़ते-पढ़ते लगा, जैसे मेरा बदन हवा की तरह हल्का हो गया है. मिर्ज़ा साहब, मैं अल्ला रक्खा साहब का हाथ पकड़ कर आग के घेरे में घुस गया. मैं उनके पीछे-पीछे सुलगते हुए अंगारों पर चलने लगा. मिर्ज़ा साहब, मैं पहली बार अपने आप को ढूंढ़ पाया. मेरे पिताजी के ग़ुस्से से बाहर, मेरे उच्च शिक्षित सौतेले भाईयों की उपेक्षा से बाहर, अल्ला रक्खा साहब के पीछे-पीछे, आग के घेरे में चलते-चलते, मैं अपनी राह पर चलता रहा . नहीं, मेरे पैरों में छाले नहीं पड़े, मिर्ज़ा साहब.

सच कहूं तो लावारिसों की तरह मेरे दिन कटते थे. स्कूल की पढ़ाई-लिखाई बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी. स्कूल में पढ़ने के दौरान ही साहित्य जैसे मेरी मज्जा के अन्दर घुल गया था. हम कुछ दोस्तों ने मिलकर आग़ा जाफ़र कश्मीरी का नाटक करने के लिए, एक मंडली तैयार की. एक दिन पिताजी ने आकर हारमोनियम, तबला सब तोड़ दिया. कहा, मैं यह सब नहीं कर सकता. और मेरी ज़िद उतनी ही बढ़ गई. पढ़ाई की कि ताबें छोड़ कर तरह-तरह के बड़ों के लिए लिखे अफ़साने पढ़ने लगा. मेरी उम्र में कोई ऐसी कि ताबें नहीं पढ़ता था.

ख़राब लड़का होने की वजह से, स्कूल में मुझे ‘टॉमी’ नाम का ख़िताब मिल गया. तीन बार कोशिश करके थर्ड डिविज़न से मैट्रि क का इम्तहान पास किया, और मज़े की बात क्या है. जानते हैं, मैं उर्दू में फ़ेल हुआ था. वह भी दिन बीते थे, भाईजान लोग. पढ़ाई-लिखाई तो बट्टे-खाते में गयी. मैं जुआख़ाना जाने लगा. मैं वहां फ़्लश खेलता था. पहले मैं नौसिखिया था, लेकिन बहुत जल्दी ही मैं सारी चालें सीख गया, मेरे दिन-रात जुआख़ाने में बीतने लगे. कौन जाने कितने दिनों तक यह सब चलता रहा. जानते हैं, एक दिन मैं बहुत बोर हो गया.

हर वक़्त ख़ुद की बाज़ी लगाने में खीझ आने लगी मुझे. तो क्या मैं कुछ भी नहीं था? बस एक ऐसा माल था, जिसको ले कर बाज़ी लगाई जा सके. तय किया. बस, चलो मंटो. अब किसी और राह पर चला जाये. ज़िन्दगी की डगर एक ही नहीं होती, अब न हो कि सी और राह पर ही चल कर देखा जाये. लेकिन क्या करता? जुए के ठेके को छोड़ कर कहां जाता? सड़कों ने ही मुझे जगह दी, इस रास्ते से उस रास्ते. इस गली से उस गली, मैं ख़्वाबों में बेसुध घूमता फिरता था, सड़क के कुत्तों से मेरी दोस्ती हो गयी, मैं उनके साथ बैठा रहता, उन्हें प्या र करता, वे मेरा बदन चाटते . मैं क़ब्रस्तानों में घूमता रहता था. कितने ही फ़क़ीरों के पास बैठ कर कितनी ही कहानियां सुनी थीं.

मिर्ज़ा साहब, वह सब कहानियां भी खो गईं. मैं उन्हें लिख नहीं पाया. इससे पहले ही 1919 में जलियांवाला बाग़ का वह हत्या कांड हुआ था. तब मेरी उम्र केवल सात साल की थी. पर मैंने देखा, कैसे सारा पंजाब जाग उठा था, अमृतसर की सड़कों पर मोर्चे, स्लोगन . भगत सिंह मेरे आदर्श थे. मेरे पढ़ने की मेज़ पर भगत सिंह की तस्वीर रखी रहती थी. जिन दिनों मैं सड़कों पर घूमता रहता था, एक दि न जलियांवाला बाग़ के एक पेड़ के नीचे बैठे हुए मेरे मन में आया, क्या दुनिया को इस तरह तहस-नहस नहीं कि या जा सकता है, जिससे ये टॉमी हमारे ऊपर बिना कुछ सोचे-समझे और गोलियां न चला सकें?

जानते हैं मिर्ज़ा साहब, कई बार मेरे दिल में बम बनाने का भी ख़्याल आया था. साला अमतृसर को ही उड़ा दूंगा. गोरे सूअर के बच्चों को देश से भगाऊंगा ही. बाला, आशिक़, फ़क़ीर हुसैन, कैप्टन वाहिद, ज्ञानी अरूर सिंह को यह सब बातें बताया करता था. वे ज़ोर-ज़ोर से हंसते. वे सब मेरे दोस्त थे. उनका कहना था. मौज-मस्ती, ऐश करो, मारो गोली अमृतसर को. हम सब अज़ीज़ के होटल में बैठ कर गांजा पीते थे. आशिक़ फ़ोटोग्राफ़र था, फ़क़ीर कविताएं लि खता था और ज्ञानी अरूर सिंह दांतों का डॉक्टर था.

कैप्टन क्या करता था. वह याद नहीं. गांजे में दम लगा कर आशिक़, रफ़ीक गजनवी स्टाईल में गाने गाया करता था . अनवर तस्वीरें बनाता और गाने सुन कर ‘वाह,वाह’ करता जाता था . अज़ीज़ के अंधेरे होटल में, बीच-बीच में अनवर भी गाने लगता था, ‘ऐ इश्क़ कहीं ले चल’. अख़्तर शेरानी के शेरों को उसने तरन्नुम में ढाल लिया था. कौन जाने, अज़ीज़ का होटल अब कौन सी क़ब्र में है.


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