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माणिक सरकार: बिना कार-फोन वाला गरीब सीएम जो सर्जिकल स्ट्राइक कराता है

हिंदुस्तान में सादगीपसंद मुख्यमंत्री नहीं हुए, ऐसा नहीं है. अरविंद केजरीवाल पहली बार दिल्ली के सीएम बनने पर कुछ वक्त तक उसी नीली वैगन-आर में चलते थे, जिसमें बैठकर वो वोट मांगने जाते थे. एक वक्त था, जब गोआ में लोग सड़क पर निकलते और उनके मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर उनके ठीक बगल से अपने पुराने स्कूटर पर निकल जाते. घड़ी पीछे घुमाएं तो और उदाहरण मिल जाएंगे. लेकिन कोई उदाहरण माणिक सरकार की बराबरी करता नहीं दिखता. माणिक सरकार भारत के एक राज्य में 4 बार के सीएम हैं लेकिन साइकिल पर चलते हैं. उनकी पत्नी सब्ज़ी मंडी में खुद तरकारी छांटकर लाती हैं. जियो क्रांति को ठेंगा बताते माणिक के पास मोबाइल भी नहीं है. लेकिन माणिक सरकार ही वो सीएम हैं, जिनके चलते त्रिपुरा शाम के बाद घर से निकलने का साहस ला पाया. और माणिक सरकार ही वो सीएम है, जिसके चलते भारत की सबसे मज़बूत पार्टी का त्रिपुरा जीतने का सपना अधर में लटका है.

देश का सबसे ‘गरीब’ मुख्यमंत्री

त्रिपुरा में एक कस्बा है धनपुर. राजधानी अगरतला से 63 किलोमीटर दूर, ज़िला लगता है सिपाहीजला, जो बांग्लादेश से सटा है. ऐसे बताएं तो इस कस्बे में ऐसा कुछ खास नहीं कि आपको नाम बताने भर से याद रह जाए. लेकिन हर पांच साल में एक बार इस कस्बे का नाम देश भर के अखबारों में छपता है. तब, जब माणिक सरकार यहां आकर पर्चा भरते हैं. पर्चे के साथ एक एफिडेविट होता है जिसमें वो अपनी संपत्ति की घोषणा करते हैं. हर बार आंकड़े देखकर लोग अचंभा करते हैं. कि मुख्यमंत्री होकर भी इस आदमी ने पैसे कैसे नहीं जोड़े. 2018 के विधानसभा चुनाव में पर्चा भरते वक्त माणिक के पास 1520 रुपए कैश और बैंक खाते में 2410 रुपए थे. बस.

अपना नामांकन भरते माणिक सरकार. (फोटोःपीटीआई)
अपना नामांकन भरते माणिक सरकार. (फोटोःपीटीआई)

और ये हमेशा से रहा है. वामपंथ में उपभोग की जो आलोचना सिखाई जाती है, उसे माणिक ने अपनी ज़िंदगी में उतारा है. सीपीएम के जनप्रतिनिधियों के लिए बने सामान्य नियम के तहत बतौर मुख्यमंत्री माणिक को मिलने वाली तनख्वाह पार्टी फंड में जाती है. घर चलाने के लिए उन्हें पार्टी से स्टाइपेंड मिलता है – 5000 रुपए महावारी. नवंबर 1999 को इंडिया टुडे के कौशिक डेका ने उनसे सवाल किया कि इस स्टाइपेंड में वो घर कैसे चलाते हैं और मुख्यमंत्री आवास छोड़ना पड़े तो कहां जाएंगे. माणिक ने बड़ी सादगी से जवाब दिया,

”मेरा ज़ाती खर्चा बहुत कम है – रोज़ का एक पैकेट गुल मंजन और एक चारमिनार सिगरेट. बस. तो मेरी पत्नी की पेंशन में हम दोनों का काम चल जाता है. रही बात घर की, तो वो देखा जाएगा.”

जायदाद के तौर पर माणिक को अपनी मां अंजली सरकार से एक घर मिला है. 432 स्क्वेयर फीट के इस मकान पर टीन का शेड डला हुआ है.

माणिक सरकार लेफ्ट के एक कार्यक्रम में केरल में. लाल झंडा लेकर चलते हैं, लेकिन कुर्ता हमेशा सफेद होता है. (फोटोःपीटीआई)
माणिक सरकार लेफ्ट के एक कार्यक्रम में केरल में. लाल झंडा लेकर चलते हैं, लेकिन कुर्ता हमेशा सफेद होता है. (फोटोःपीटीआई)

लेकिन सादगी पर सवाल भी हैं

माणिक सादगी भरी ज़िंदगी जीते हैं, इसमें कम लोग शुबहा करते हैं. लेकिन कितनी, इस बारे में राय अलग-अलग है. त्रिपुरा के मुख्यमंत्री रहे समीर रॉय बर्मन के बेटे सुदीप रॉय बर्मन त्रिपुरा कांग्रेस अध्यक्ष रहते सवाल करते थे,

”माणिक सरकार के पास जो सैकड़ों सफेद कुर्ते पायजामे के सेट हैं, उनके लिए पैसा कहां से आता है? जो ‘ओरा’ का चश्मा वो पहनते हैं, वो 60,000 रुपए का आता है. सैंडल उनकी 6000 की है. माणिक की सादगी करीने से गढ़ा गया एक झूठ है.”

माणिक ने तब इन आरोपों के जवाब में ये कहा था कि उन्हें सलीके से ओढ़ना-पहनना पसंद है लेकिन वो महंगा सामान नहीं खरीदते. उनके चश्मे की कीमत उन्होंने 1800 रुपए बताई.

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करियर ग्राफ ऐसा कि आईआईटियन शर्मा जाएं

राजनीति ऐसा करियर नहीं माना जाता जहां हर साल-दो साल में तगड़ा प्रमोशन मिले. लेकिन माणिक सरकार जिस तेज़ी से शिखर तक पहुंचे, उसे देखकर मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करने वाले हुलस जाएं. 22 जनवरी, 1949 को त्रिपुरा के उदयपुर में पैदा हुए माणिक एक साधारण परिवार से आते हैं. पिता अमूल्य सरकार टेलर थे और मां अंजली स्वास्थ्य विभाग में कर्मचारी थीं. लेकिन माणिक की जीवन सब असाधारण रहा है. कॉलेज के दिनों में दो ही चीज़ों में मन लगता था – क्रिकेट और राजनीति. 19 बरस की उम्र में माणिक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी – मार्कसिस्ट (CPM)के नज़दीक चले गए. अगरतला के महाराजा बीर बिक्रम कॉलेज (एमबीबी कॉलेज) के छात्रसंघ चुनाव में वो बतौर स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) कैंडिडेट खड़े हुए. चुनाव जीते और स्टूडेंट यूनियन के जनरल सेक्रेटरी रहे.

माणिक शायद ‘युवा नेता’ बने रह जाते लेकिन किस्मत का फेर ऐसा कि 1967 के साल में कांग्रेस सरकार के खिलाफ पूरे त्रिपुरा में प्रदर्शन शुरू हो गए. माणिक ने इनमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और इसने उन्हें CPM की स्थाई सदस्यता दिला दी. यहां से माणिक आगे और आगे ही गए. 1971 में वो SFI के राज्य सचिव बने और दस साल तक बने रहे. अगले साल, याने 1972 में 23 साल के माणिक को CPM की त्रिपुरा स्टेट कमिटी में शामिल कर लिया गया.

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1978 के साल में त्रिपुरा में पहली लेफ्ट सरकार ने शपथ ली और माणिक पार्टी सेक्रेटेरियट पहुंच गए. फिर आया साल 1980. अगरतला विधानसभा सीट पर उपचुनाव की घोषणा हुई और पार्टी ने टिकट दिया 31 साल के माणिक सरकार को. माणिक चुनाव जीते और सदन में पार्टी के चीफ व्हिप बना दिए गए. ये उपचुनाव माणिक का असल राजनैतिक अन्नप्राशन्न था. इस दौरान माणिक पार्टी के अंदर बढ़ते रहे. डेमोक्रैटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI) के सचिव बनाए गए और साल 1993 आने तक माणिक CPM के राज्य सचिव बन गए. इसी साल वो त्रिपुरा में वाम मोर्चे के संयोजक भी बन गए.

इसके बाद आया साल 1998, जब माणिक धनपुर से विधायक बने और सदन में CPM विधायक दल के नेता चुने गए – माने त्रिपुरा के सीएम. तब से माणिक सरकार पूर्वोत्तर में अंगद का पांव बने हुए हैं. उन्होंने हर चुनाव जीता है और किसी चुनाव में CPM का वोट प्रतिशत 50 % से कम नहीं रहा.

माणिक सरकार आज बड़े लोकप्रिय हैं. उनकी रैलियों में हज़ारों की भीड़ जुटती है. (फोटोःपीटीआई)
माणिक सरकार आज बड़े लोकप्रिय हैं. उनकी रैलियों में हज़ारों की भीड़ जुटती है. (फोटोःपीटीआई)

सादगी के परे के माणिक

त्रिपुरा से बाहर का मीडिया माणिक का ज़िक्र ‘सादगी राग’ के अलावा कम कर पाता है. लेकिन सफेद कुर्ते पहनने वाला ये ‘सादा’ मुख्यमंत्री राजनीति का खेल एकदम निर्दयता से खेलता है. माणिक के बारे में ये कहा जाता है कि वो ईमानदार भले हों लेकिन वो विरोधियों (कंपटीटर पढ़ें) को बर्दाश्त नहीं करते. पार्टी में उन्हें किसी से भी खतरा महसूस हो तो उसके पर कतर दिए जाते हैं. खासकर सीएम बनने के बाद से उन्होंने किसी को सिर नहीं उठाने दिया. चाहे वो पार्टी का महत्वाकांशी नेता हो या त्रिपुरा के उग्रवादी.

विदेश नीति वाला सीएम

माणिक जब त्रिपुरा के सीएम बने तो त्रिपुरा उग्रवाद की चपेट में था. एक साल पहले ही राज्य में आफ्सपा (AFSPA)लगा था. उग्रवादी त्रिपुरा को भारत से अलग देश बनाना चाहते थे. माणिक के पहली बार सीएम बनने के 20 दिनों के अंदर उनके स्वास्थ्य मंत्री बिमल सिन्हा को नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (NLFT) के उग्रवादियों ने मार डाला. बिमल सिन्हा अपने भाई को छुड़ाने गए थे जिसे NLFT ने अगवा कर लिया था. तो माणिक ने सीएम बनकर अपना पहला लक्ष्य तय किया राज्य को चुनी हुई सरकार के काबू में लाना – माने माणिक सरकार के. इसके लिए माणिक ने वो किया, जो भारत के किसी मुख्यमंत्री ने पहले कभी नहीं किया था.

स्ट्रेंजर्स नो मोर में माणिक सरकार की विदेश नीति में तफसील से बात की गई है.
स्ट्रेंजर्स नो मोर में माणिक सरकार की विदेश नीति में तफसील से बात की गई है.

भारत में विदेश नीति केंद्र के पाले में है. राज्य इसमें कभी दखल नहीं देते. तो अलगाववादी संगठनों से निपटने या बात करने का काम केंद्रिय एजेंसियां ही करती हैं. लेकिन त्रिपुरा की समस्या ज़्यादा स्थानीय थी. त्रिपुरा अकेला ऐसा राज्य है जिसकी राजधानी तक अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर पड़ती है. आप अगरतला शहर में चाहें तो पैदल बांग्लादेश में दाखिल हो सकते हैं. ऐसा ही राज्य के बड़े इलाके के साथ है. तो माणिक ने उग्रवाद के खिलाफ अपने स्तर पर काम करना शुरू किया.

अपनी किताब ‘Strangers No More’ में अलगाववादियों के खिलाफ माणिक सरकार की रणनीति के बारे में संजॉय हजारिका लिखते हैं-

“21वीं शताब्दी के पहले दशक में माणिक सरकार ने खुद की विदेश सुरक्षा नीति बनानी शुरू की. इस नीति में नई दिल्ली का हस्तक्षेप कम से कम रखा गया. माणिक सरकार ने सूबे के आला पुलिस अधिकारी जीएम श्रीवास्तव, मुख्य सचिव वीएम तुलिदास पर पूरा भरोसा जताया. सेना के खुफिया विभाग के एक अधिकारी की मदद से इन लोगों ने ऐसी रणनीति तैयार की, जिसके जरिए विद्रोहियों पर तेजी के साथ कड़ी मार की जा सके.

2003 और 2006 के बीच सुरक्षा बलों की स्पेशल यूनिट्स ने बांग्लादेश में छिपे बैठे आतंकवादियों पर 20 दफा हमले किए. इन हमलों में सुरक्षा बलों के साथ उन विद्रोहियों को शामिल किया गया जिन्होंने कुछ समय पहले ही त्रिपुरा सरकार के सामने आत्मसमर्पण किया था. इसके अलावा अलगाववादियों को ठिकाने लगाने के लिए बांग्लादेश की अपराधिक गैंग की भी मदद ली गई. त्रिपुरा सरकार ने इन्हें पैसा देने का बहकावा देकर अपने पक्ष में कर लिया.”

विदेश से तालमेल. माणिक सरकार बांग्लादेश के रेलमंत्री मज़ीबुल हक के साथ. (फोटोःपीटीआई)
विदेश से तालमेल. माणिक सरकार बांग्लादेश के रेलमंत्री मज़ीबुल हक के साथ. (फोटोःपीटीआई)

2008 में बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार आई. शेख हसीना के संबंध भारत से अच्छे रहे हैं. तो उन्होंने त्रिपुरा के उग्रवादियों के लिए बांग्लादेश में जाकर छिपने के रास्ते बंद कर दिए. इधर से माणिक चोट करते रहे. ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स (ATTF)और NLFT के गुरिल्ला तेजी से आत्मसमर्पण करने लगे. कुछ ही सालों में त्रिपुरा में उग्रवाद लगभग खत्म हो गया. ATTF और NLFT आज की तारीख में अप्रासंगिक संगठन हो गए हैं.

27 मई, 2015 को एक कैबिनेट मीटिंग में माणिक सरकार ने राज्य से आफ्सपा (AFSPA)हटा दिया. इसके साथ त्रिपुरा पहला राज्य बना जिसने उग्रवाद का सफलतापूर्वक सफाया करके आफ्सपा हटा दिया. इससे लोगों की ज़िंदगी पहले से कहीं आसान हो गई. यह माणिक सरकार की सबसे बड़ी सफलता मानी जाती है.

NLFT के उग्रवादियों के हाथों मारे गए पत्रकार शांतनु भौमिक के घर वालों को सांत्वना देते माणिक सरकार. (फोटोःपीटीआई)
NLFT के उग्रवादियों के हाथों मारे गए पत्रकार शांतनु भौमिक के घर वालों को सांत्वना देते माणिक सरकार. (फोटोःपीटीआई)

एक अकेली बार जब पत्नी ने काम में दखल दिया

माणिक की पत्नी पांचाली भट्टाचार्य सेंट्रल सोशल वेलफेयर बोर्ड में काम करती थीं. रिटायर हो गई हैं. अमूमन सीएम बनने वाले व्यक्ति के उन रिश्तेदारों के भी वारे-न्यारे हो जाते हैं. जिनसे रिश्ता साइन थीटा – कॉस थीटा (गणित की क्लास याद कीजिए) करके समझना पड़ता है, उनके भी. लेकिन माणिक की अपनी पत्नी तक उनके प्रभाव का इस्तेमाल नहीं करतीं. न उनके काम में कभी दखल ही देती हैं. माणिक ने कभी कार नहीं खरीदी और सरकारी गाड़ी में वो सिर्फ बतौर त्रिपुरा सीएम ही चलते हैं. तो पांचाली तरकारी लाने रिक्शा कर के जाती हैं. बिना लाव लश्कर.

लेकिन एक बार ऐसा हुआ था कि पांचाली ने किसी की सिफारिश माणिक से की. ये सिफारिश खुद माणिक के सुरक्षा दस्ते की ओर से आई थी. बात ये थी कि माणिक सुबह उठकर अगरतला की सड़कों पर टहलने लगे थे. माणिक ने दशकों से चले आ रहे उग्रवाद के खिलाफ सख्त कदम उठाए थे. इसलिए उनके सुरक्षा दस्ते को इस बात का डर था कि कोई अनहोनी न हो जाए. लेकिन माणिक ने कोई चेतावनी मानने से इनकार कर दिया. तब दस्ते के लोग पांचाली से मिले और उनसे कहा कि सीएम साहब को समझाएं. तब माणिक के लिए एक ट्रेडमिल खरीदी गई. लेकिन इस ट्रेडमिल के बिल पर देने वाले के नाम के जगह त्रिपुरा सरकार नहीं लिखा था. वहां लिखा नाम था – पांचाली भट्टाचार्य.

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किस्सागो सरकार

माणिक सरकार लोगों के बीच लोकप्रिय हैं इसकी एक वजह वो तरीका है जिसमें वो बात करते हैं. लेफ्ट पर इल्ज़ाम लगता है कि वो अपनी बात इतनी जटिल भाषा में कहते हैं कि आम लोगों की समझ में नहीं आती. लेकिन माणिक कम्यूनिकेशन एक्सपर्ट हैं. कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे नरेंद्र मोदी. माणिक जब शहरी इलाकों में कोई सभा करते हैं तो वो तेज़ तर्रार बयान देते हैं. लेकिन जब वो राज्य के आदिवासी इलाकों में रैली करते हैं तो अपनी किस्से की शैली में कहते हैं. उदाहरण और जुमले इस्तेमाल करते हैं. एक सभा में उन्होंने कहा,

” भाजपा वो चिड़िया है जो बसंत भर के लिए आती है. ये कुछ दिन गाना गाएगी और फिर फुर्र हो जाएगी तो सालभर नज़र नहीं आएगी.”

इसी तरह एक दूसरी रैली में उन्होंने रंगों की राजनीति पर कहा,

”लेफ्ट का लाल रंग आम लोगों के खून पसीने का रंग है. ‘कट्टरवाद’ का भगवा सिर्फ खून बहाता है.”

इस तरह के बयान बहुत गंभीर नहीं होते. लेकिन लोक इसी भाषा को समझता है. इसलिए माणिक त्रिपुरा के उन आदिवासी इलाकों में भी प्रसिद्ध हैं जो पिछड़े हुए हैं.

राजनीति छवियों का खेल है. इस लिहाज़ से माणिक सरकार के पास चुनाव जीतने लायक छवि है तो. उनपर आजतक भ्रष्टाचार का कोई इल्ज़ाम नहीं लगा है. लेकिन त्रिपुरा में मसले कई हैं. मसलन रोज़गार. बिजली भी आती-जाती रहती है. फिर राज्य लंबे समय से लेफ्ट के शासन में है. सरकार और पार्टी के बीच का फर्क मिट सा गया है. तो एंटी इन्कम्बेंसी का माहौल है और भाजपा इसे भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते. न्यूज़ 18 को दिए एक इंटरव्यू में भाजपा के पूर्वोत्तर प्रभारी राम माधव ने कहा कि माणिक सरकार की छवि एक धोखा है. बकौल राम माधव, माणिक त्रिपुरा में एक हिंसाचारी, भ्रष्टाचारी और अत्याचारी सरकार चला रहे हैं. अब भाजपा कभी उम्दा बैट्समैन रहे माणिक को रनआउट कर पाएगी या नहीं, ये 3 मार्च को मालूम चल जाएगा.


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