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क्या भारत को मालदीव पर हमला कर देना चाहिए?

मालदीव. आसमानी-फिरोजी पानी वाला हिंद महासागर का छोटा सा मुल्क. जो कई बार ऐसा भी दिखता है, मानो गीला-पिघला मूंगा समंदर बनकर तैर रहा हो. चीजें अगर इंप्रेशन से तय होती हैं, तो मालदीव दुनिया का ‘हनीमून अड्डा’ है. लोग यहां बस अपने पहले हनीमून पर नहीं जाते. जिनकी शादी को बरसों बीत गए हों, वो भी यहां जाकर हनीमून मूड में हो जाते हैं. मालदीव वैसे चाहे जितना भी रोमांस भरा हो, यहां पॉलिटिक्स बड़ी कड़वी है. पिछले कुछ महीनों से यहां चीजें ठीक नहीं चल रही हैं. ऐसा ही कुछ भारत के साथ उसके रिश्तों का भी हाल है. तनाव, शक, आशंका, शिकायत. यही सब हो रहा है दोनों देशों के बीच.

इस साल 23 सितंबर को मालदीव में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने वाले हैं. आशंका है कि मौजूदा राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की पार्टी निष्पक्ष तरीके से इलेक्शन नहीं होने देगी. अगर ऐसा हुआ, तो इसका मतलब होगा कि चुनाव दिखावटी होंगे. यामीन की सत्ता को वैधता देने का जरिया भर होंगे. सुब्रमण्यन स्वामी का कहना है कि अगर मालदीव इलेक्शन में सेटिंग होती है, तो भारत को उसके ऊपर हमला कर देना चाहिए. 24 अगस्त, रात 8:02 बजे ट्विटर की अपनी बित्ताभर जगह में स्वामी ने ये सुझाव दिया. सरकार ने कह दिया, ये स्वामी के निजी विचार होंगे. इसका भारत सरकार से कोई लेना-देना नहीं है. मगर मालदीव सरकार ने इसे ‘जाने दो’ वाले अंदाज में नहीं लिया. मालदीव के विदेश मंत्रालय ने भारत के राजदूत अखिलेश मिश्रा को तलब किया. उनसे स्वामी के बयान पर सफाई मांगी गई.

भारत सरकार कहती है कि ये ट्वीट स्वामी की निजी राय है. लेकिन ये भी सच है कि मालदीव को लेकर भारत सरकार क्या करें क्या न करें वाली स्थिति में है.
भारत सरकार कहती है कि ये ट्वीट स्वामी की निजी राय है. लेकिन ये भी सच है कि मालदीव को लेकर भारत सरकार ‘क्या करें क्या न करें’ वाली स्थिति में है.

गयूम का दौर – जब भारत से खूब दोस्ती थी

एक लंबे समय तक मालदीव में तानाशाही रही. ममून अब्दुल गयूम 1978 से 2008 तक मालदीव के राष्ट्रपति रहे. गयूम के पद का नाम भर था राष्ट्रपति. थे वो तानाशाह. तीन दशक लंबी अपनी तानाशाही में गयूम ने कई बार चुनाव करवाए. ऐसे इलेक्शन, जहां उनके मुकाबले कोई नहीं होता था. रेस में अकेले दौड़ो, तो जीतोगे ही.

गयूम की तानाशाही का एकमात्र प्लस पॉइंट ये था कि वो मालदीव में खूब सारी दौलत लाए. आज जो मालदीव की अर्थव्यवस्था है, उसके पीछे गयूम ही हैं. दुनिया के कोने-कोने से आने वाले पर्यटक. उनके साथ आने वाली ढेर सारी विदेशी मुद्रा. लोगों को मिलने वाली नौकरियां. कारोबार. अकेली होटल इंडस्ट्री ही इतनी बड़ी है यहां कि मालदीव के लोग कम पड़ते हैं. विदेशियों को भी नौकरी मिलती है यहां. गयूम की वजह से मालदीव दक्षिण एशिया का सबसे अमीर मुल्क है. चूंकि मालदीव कोई परीलोक नहीं है, सो यहां भी आपको मुट्ठीभर लोग खूब अमीर मिलेंगे. देश के अमीर होने का मतलब ये नहीं कि स्वास्थ्य जैसी बुनियादी चीजें एकदम मक्खन हों. खैर, फिलहाल इन चीजों के बारे में बात करना हमारे फ्रेम में नहीं है.

मालदीव के राष्ट्रपति गयूम दिसंबर 1988 में भारत आए थे. राजीव गांधी का शुक्रिया करने. भारत ने नवंबर में गयूम के तख्तापलट की कोशिश को फौज भेजकर नाकाम कर दिया था. फोटोः रॉयटर्स
मालदीव के राष्ट्रपति गयूम दिसंबर 1988 में भारत आए थे. राजीव गांधी का शुक्रिया करने. भारत ने नवंबर में गयूम के तख्तापलट की कोशिश को फौज भेजकर नाकाम कर दिया था. (फोटोः रॉयटर्स)

लोकतंत्र आया, लड़खड़ाया और धम्म से गिर गया

2008 में मालदीव में पहली बार लोकतांत्रिक ढंग से चुनाव हुआ. माने पब्लिक के पास ऑप्शन थे – या तो मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी के मोहम्मद नशीद चुनें या तो गयूम को ही जिता दें. कई और छोटी पार्टियां भी थीं. पहले राउंड की वोटिंग में गयूम ही सबसे आगे रहे. लेकिन जब दूसरे राउंड की वोटिंग हुई, तब दूसरी पार्टियों ने मोहम्मद नशीद के समर्थन का ऐलान कर दिया. इससे नशीद आगे हो गए और मालदीव में लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए पहले राष्ट्रपति बन गए.

2012 में नशीद के हाथ से सत्ता छिन गई. उन्होंने एक जज की गिरफ्तारी का आदेश दिया. लोगों ने उनके खिलाफ विरोध शुरू किया. आखिरकार नशीद को इस्तीफा देना पड़ा. बाद में उन्होंने कहा कि बंदूक के जोर पर उनसे जबरन इस्तीफा दिलवाया गया. उनका इशारा गयूम की तरफ था. उनके जाने के बाद उपराष्ट्रपति वहीद को राष्ट्रपति बनाया गया.

इस्तीफे के बाद नशीद ने कहा कि उनपर पद छोड़ने का दबाव था. नशीद कई बार भारत से मालदीव में दखल देने की अपील कर चुके हैं. (फोटोःरॉयटर्स)
इस्तीफे के बाद नशीद ने कहा कि उनपर पद छोड़ने का दबाव था. नशीद कई बार भारत से मालदीव में दखल देने की अपील कर चुके हैं. (फोटोःरॉयटर्स)

उठापटक ही उठापटक

2013 में राष्ट्रपति चुनाव करवाए गए. चुनावों में खूब विवाद हुआ. पहली बार जब वोट डले, तो उसमें गड़बड़ी के आरोप लगे. सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा चुनाव करवाने का आदेश दिया. जिस तय तारीख पर चुनाव हुआ था, वो नहीं हुआ. तारीख आगे खिसकी. काफी हो-हंगामे के बाद आखिरकार इलेक्शन हुए. जीत हुई अब्दुल्ला यमीन की. यमीन रिश्ते में पूर्व राष्ट्रपति गयूम के सौतेले भाई हैं. लोगों ने कहा, गयूम की मदद से ही यमीन का राष्ट्रपति बनना मुमकिन हो पाया. यमीन बोले, देश में शांति और तरक्की लाना चाहते हैं.

फिर आया 2015. फरवरी का महीना था. एकाएक न्यूज आई कि पूर्व राष्ट्रपति नशीद को गिरफ्तार कर लिया गया है. नशीद पर इल्जाम लगा कि उन्होंने सत्ता में रहते हुए गलत तरीके से एक जज को गिरफ्तार करने का आदेश दिया था. भारत और अमेरिका, दोनों ने नशीद की गिरफ्तारी का विरोध किया. उधर नशीद के समर्थक भी इस गिरफ्तारी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे. इन सबके बीच नशीद पर मुकदमा चलाया गया. पहले तो उन्हें बेगुनाह कहकर रिहा कर दिया गया. लेकिन फिर जल्द ही दोबारा अरेस्ट कर लिया गया. फिर उनके ऊपर आतंकवाद-विरोधी कानूनों के तहत आरोप तय किए गए.

मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन चीन के राष्ट्रपति ज़ी जिनपिंग के साथ. इधर के सालों में मालदीव लगातार चीन की ओर झुका है. (रॉयटर्स)
मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन चीन के राष्ट्रपति ज़ी जिनपिंग के साथ. इधर के सालों में मालदीव लगातार चीन की ओर झुका है. (रॉयटर्स)

यामीन के उत्पात पर रोक लगाई सुप्रीम कोर्ट ने

UN ने इस पूरी कार्रवाई को पक्षपाती कहा. लेकिन चीजें अपने मूड से होती रहीं. खबर आई कि नशीद को 13 साल जेल की सजा हुई है. नशीद अकेले नहीं थे, जिन्हें जेल भेजा गया. राष्ट्रपति यमीन ने ज्यादातर विपक्षी नेताओं को जेल में फिंकवा दिया. कुछ खुद ही देश छोड़कर भाग गए. 2016 में नशीद को बीमारी का इलाज कराने के नाम पर जेल से छुट्टी मिली. वो पहुंचे लंदन. उन्होंने वहां शरण मांगी. तब से वो वापस मालदीव नहीं लौटे हैं.

यमीन की सत्ता भी तानाशाही जैसी थी. विरोधियों पर रहम नहीं. आलोचना के लिए कोई सहनशीलता नहीं. विपक्ष के लिए कोई जगह नहीं. राजनैतिक अस्थिरता. भ्रष्टाचार के आरोप. मगर चीजें तो अभी और बदतर होनी थीं. विपक्षी पार्टियों ने मालदीव की सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाली. अपील थी कि राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की सरकार को अस्थायी तौर पर बर्खास्त कर दिया जाए. इसके पीछे जो वजह गिनाई गईं, उनमें अव्यवस्था, अधिकारों का बेजा इस्तेमाल, घनघोर भ्रष्टाचार जैसी चीजें शामिल थीं. सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील पर तो कान नहीं दिया, लेकिन अपनी कार्रवाई शुरू की. नौ लोगों को जेल से रिहा करने का आदेश दिया. अदालत का कहना था कि पक्षपाती तरीके से मुकदमा चलाकर उन्हें जेल भेजा गया. अदालत ने मुहम्मद नशीद के ऊपर आतंकवाद-विरोधी कानूनों के तहत तय की गई सजा भी खारिज कर दी. जेल में बंद कई नेताओं की रिहाई का भी ऑर्डर दिया. इसके अलावा 12 सांसद भी थे, जिनकी सीटें यामीन के इशारे पर छीन ली गई थीं. सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें भी वापस बहाल कर दिया. इसके बाद संसद की शक्ल बदल गई. अब विपक्ष को बहुमत मिल गया. यानी वो चाहता तो राष्ट्रपति यमीन के ऊपर महाभियोग चला सकता था.

यामीन की रिहाई के लिए श्रीलंका में मालदीव के दूतावास के बाहर हो रहे प्रदर्शन. (फोटोः रॉयटर्स)
यामीन की रिहाई के लिए श्रीलंका में मालदीव के दूतावास के बाहर हो रहे प्रदर्शन. (फोटोः रॉयटर्स)

मालदीव की इमरजेंसी

ऐसा होता, तो यामीन के हाथ से सत्ता छिन जाती. यामीन ने सत्ता बचाने के लिए इमरजेंसी लगा दी. इमरजेंसी लगाने का मतलब था अपने खिलाफ पनप रहे हर तरह के विरोध को दबाना. यामीन ने अपने ही भाई पूर्व राष्ट्रपति ममून अब्दुल गयूम को गिरफ्तार कर लिया. यामीन सरकार ने 82 साल के गयूम पर इल्जाम लगाया. कि उन्होंने सांसदों और जजों को रिश्वत दी. पैसे के दम पर उन्हें अपने साथ मिलाकर यामीन सरकार का तख्तापलट करने की साजिश रची. यामीन सरकार ने अपनी हरकतों को जायज ठहराने के लिए तमाम कोशिशें की. कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जज बिक चुके हैं. कि एक जज के घर में उसके गद्दे के नीचे खूब सारा रिश्वत का पैसा मिला. इस तरह यामीन लोगों की नजरों में न्यायपालिका को गलत ठहराकर ये साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ जो भी कहा, वो रिश्वत खाकर कहा. फिर जून में खबर आई कि गयूम को 19 महीने जेल की सजा हुई है.

लोगों के मन में सवाल उठना वाजिब था. गयूम ने तो सत्ता तक पहुंचाने में यामीन की मदद की थी. 2013 के राष्ट्रपति चुनाव में गयूम पार्टी प्रमुख थे. उन्होंने ही यामीन को अपनी पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया. पूरे मालदीव में यामीन के साथ घूमकर उनके लिए चुनाव प्रचार किया. उनके लिए सपोर्ट जुटाया. फिर भी यामीन ने उनके साथ ऐसा सलूक क्यों किया? असल में पिछले कई महीनों ने गयूम कुछ मुद्दों पर यामीन से असहमत थे. उन्होंने यामीन से दूरी बना ली. यामीन ने बदला लेने के लिए गयूम को दी जाने वाली सरकारी पेंशन बंद करवा दी. मगर फिर भी गयूम दूर ही रहे. उनका ये विरोध उनके ऊपर हाथ डालने की एक बड़ी वजह था. लेकिन शायद इसके पीछे कुछ वजह अतीत की भी रही हो.

नशीद की लगाई इमरजेंसी के बाद से मालदीव में हालात लगातार खराब हुए हैं. (फोटोःरॉयटर्स)
यामीन की लगाई इमरजेंसी के बाद से मालदीव में हालात लगातार खराब हुए हैं. (फोटोःरॉयटर्स)

यामीन और गयूम की हिस्ट्री जानेंगे तो दुश्मनी समझ आएगी

यामीन और गयूम सौतेले भाई हैं, ये तो हमने बता दिया. अब इनके बैकग्राउंड की थोड़ी कहानी भी जान लीजिए. इनके पिता का नाम था शेख अब्दुल गयूम इब्राहिम. इब्राहिम साहब जज हुआ करते थे. उनकी आठ बीवियां थीं. गयूम की मां ऊपर के तबके की थीं. जबकि यामीन की मां गरीब घर की थीं. शुरुआत में वो गयूम परिवार के यहां नौकर थीं. घर का कामकाज करती थीं. बाद में इब्राहिम ने उनसे शादी कर ली. मगर शादी का मतलब ये नहीं था कि गयूम और यामीन को एक जैसी परवरिश मिली हो. गयूम को हर चीज बेहतर मिली. जबकि यामीन काफी हद तक उपेक्षित रहे. गयूम ने राष्ट्रपति रहते हुए अपने रिश्तेदारों को खूब आगे बढ़ाया. शायद इसी वजह से उन्होंने यामीन को भी मदद दी होगी. शायद ये चिढ़ भी रही हो यामीन के मन में.

तो ये मालदीव की स्थिति है. सत्ता और ताकत, दोनों यामीन के हाथों में है. विपक्ष के नेताओं समेत उन्होंने चीफ जस्टिस, सुप्रीम कोर्ट के जज, दो पूर्व रक्षा मंत्री, दर्जनों अधिकारियों, नेताओं को जेल में बंद करके रखा हुआ है. ऐसे में चुनाव का ऐलान करना क्या किसी बेहतरी की उम्मीद देगा. भारत समेत कई देश मालदीव में लोकतंत्र की हालत पर चिंता जता रहे हैं. मगर चीन मालदीव के साथ है.

मालदीव में होने वाले चुनाव में विपक्ष के कैंडिडेट इब्राहिम मुहम्मद सोलिह और पूर्व राष्ट्रपति नशीद. (फोटोःरॉयटर्स)
मालदीव में होने वाले चुनाव में विपक्ष के कैंडिडेट इब्राहिम मुहम्मद सोलिह और पूर्व राष्ट्रपति नशीद. (फोटोःरॉयटर्स)

अब चीन के हवाले वतन साथियों

भारत और मालदीव लंबे समय तक अच्छे दोस्त रहे हैं. जब गयूम राष्ट्रपति हुआ करते थे, तब भी भारत उनको सपोर्ट करता था. 1988 में एक बार जब गयूम का तख्तापलट होने की आशंका थी, तब भारत ने गयूम की खातिर अपनी सेना भी भेजी थी. गयूम ने भारत से मदद मांगी थी. उसके 16 घंटे के भीतर भारत की पलटन वहां पहुंच गई. मगर ये बीते दिनों की बात है. नेपाल और श्रीलंका की तरह अब मालदीव में भी चीन का प्रभाव है. मालदीव तो फिर हिंद महासागर में है. उसकी लोकेशन उसको अहम बनाती है. इसीलिए बीते कुछ सालों में चीन की मालदीव में दिलचस्पी बढ़ी. बीते कुछ सालों में इसलिए कि 2012 तक तो मालदीव की राजधानी माले में चीन का दूतावास तक नहीं था. मगर अब चीन वहां खूब पैसा खर्च कर रहा है. खूब निवेश कर रहा है. मालदीव की विपक्षी पार्टियों का कहना है कि चीन के जितने प्रोजेक्ट्स हैं वहां, वो मालदीव के कुल कर्ज़ का 70 फीसद है. उनको डर है कि इतना कर्ज़ देकर आगे चीन यहां मनमानी करेगा. जैसा उसने पाकिस्तान और श्रीलंका में किया. वहां चीन के पास बंदरगाह है. वो मालदीव में भी यही कर रहा है. ऐसा नहीं कि लोगों को राष्ट्रपति यामीन की चीन के साथ अपनाई जा रही गलत नीतियों की भनक नहीं. बल्कि यामीन के विरोध का एक बड़ा आधार उनकी चाइना पॉलिसी भी है. इसीलिए भारत के साथ भी मालदीव के रिश्ते बिगड़े हैं.

दूसरी तरह से देखिए तो भारत हताश है. पड़ोसी देशों में हमको लगातार चीन से मात खानी पड़ रही है. जो दशकों तक भारत के करीबी दोस्त रहे, वो देश चीन के पाले में जा रहे हैं. या कहिए कि जा चुके हैं.


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