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'सबसे ख़ूबसूरत सपने वो होते हैं, जिनके टूटने का आपको पूरा यकीन हो'

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आज आप पुनीत शर्मा की कलम के जादू में गुम होंगे. इंदौर के रहने वाले. हाल मुकाम मुंबई. पढ़ाई की बायोटेक की. मगर नौकरी की इश्तेहार लिखने की. गाने भी लिखते हैं. औरंगजेब और रिवॉल्वर रानी के नगमे रचे. हर वक्त सिनेमा की पिनक में रहते हैं. नशा यूं ही तारी रहे.

“सबसे ख़ूबसूरत सपने वो होते हैं, जिनके टूटने का आपको पूरा यकीन हो.”
कहानी कहाँ से शुरू होती है पता है ? जहाँ से आप उसके ख़त्म होने का इंतज़ार करने लगते हैं और अच्छी कहानियाँ इसी जगह से लेकर आख़िर तक आपको हिलने नहीं देती. मैं किस नशे में हूँ ? “सैराट” ! नाम सुना है ? नहीं सुना तो कोई बात नहीं, आपकी किस्मत (जिस पर मैं यकीन नहीं करता) खराब है. नाम सुना हो और देखने जाने का मन ना हो तो बिलकुल मत जायेगा क्यूँकि आपके अहसान के बलबूते नहीं चलेगी ये फ़िल्म. अगर ये बहाना मन में बना लिया हो कि मुझे मराठी नहीं आती तो कतई मत जाइएगा. आपको जो भाषा आती है उसके साथ आपने कौन सा इंसाफ़ कर लिया. अगर आपको लगता है कि “सैराट” देखने से पहले ये लेख पढ़ने से आपका मज़ा किरकिरा हो जाएगा तो मत पढ़िए लेकिन “सैराट” में तो ऐसा कुछ भी नहीं है जो आपको चौंकाए. चौंकाने वाली कहानियाँ, हमारी कहानियाँ कैसे हो सकती हैं. हमारी कहानियाँ सुनते हुए हमें मालूम होता है कि कहानी कहाँ जा रही है और कहाँ पहुँचेगी लेकिन हम फिर भी उसके साथ रहते हैं. मेरे लिए यही हमारी कहानियों की महानता का मानक है.

सैराट यानि जंगली. इस फ़िल्म के संदर्भ में शब्द का मतलब बताने बैठूँ, तो पूरी कहानी कह डालूँगा. बस इतना कह सकता हूँ कि “आज के ज़माने में ऐसा प्रेम, ऐसा समाज कहाँ होता है” जैसे वाक्य मुंबई में बोरिवली और किसी भी बड़े शहर के चंद किलोमीटर के दायरे से बाहर जाकर अट्टहास मार के हँसते हैं. आज भी इस देश में इंसान को उसके जूते और जाति से आँका जाता है.

ये लेख लिखने के बाद मैं अपने उसी घिसे-पिटे काम की तरफ़ लौट जाऊँगा, जहाँ लोगों की आत्मा में इतना पानी मिला है कि उसका अस्तित्व एक बहुत बड़ा झूठ है. मैं शब्दों की कलाकारी करते हुए शायद भूल जाऊँ कि आज इस समय मुझे कैसा महसूस हुआ था. अभी तो मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं जल्द ही मराठी सीखूँगा और कोशिश करूँगा कि यहाँ से वहाँ भाग जाऊँ. आप मुझे भगोड़ा बोलना चाहते हैं तो बोलिए. ये मेरा सच है और मैं इस वक्त तो यही सोच रहा हूँ. शायद कल कोई हल निकले तो उसपे काम करूँ लेकिन ये आज का सच है और इसे मैं झुठलाना नहीं चाहता. आप हिन्दी सिनेमा के दर्शक हैं. आप इस देश का सबसे बड़ा दर्शक वर्ग हैं. आपकी पवित्रता को आहत करने का जोख़िम कम ही लोग उठाते हैं लेकिन मेरे लिए कोई पवित्र नहीं; आप भी नहीं. क्या आपको याद आता है कि आपने आख़िरी बार किस अर्थपूर्ण सितारा विहीन हिन्दी फ़िल्म को हिट बनाया था ? दरअसल आपको अपनी असलियत से घिन आती है और आप उसे पर्दे पर तब तक नहीं देखना चाहते, जब तक कोई आपके भगवाननुमा व्यक्तित्व वाला मनुष्य उसे घिसे पिटे तरीके से आपके मुँह में चम्मच डाल के पिला ना दे. आपका नायक (स्त्री या पुरुष) सिर्फ़ एक विशालकाय व्यक्तित्व का मनुष्य हो सकता है क्यूंकि आप ख़ुद को कीड़े से ज़्यादा नहीं समझते. आपका बस चले तो आप अपनी काया को झटक के अपने नायक का शरीर धारण कर लें. आप उन नशे के आदी लोगों की तरह हैं; जिनकी वजह से ड्रग ट्रैफिकिंग होती है. नशे का व्यापार हवा में नहीं चलता. उसे समाज फंड करता है. आपको दोष देने के लिए एक नेता चाहिए जिसे गाली देकर आप टीवी की तरफ़ लौट सकें लेकिन आज मैं आपको लौटने नहीं दूँगा. अब या तो आप इस लेख को पढ़ना बंद कर दीजिए या वो सुनिए जो सच है.

आप एक ऐसा जनसमूह हैं जिसे पचा हुआ खाने की आदत हो गई है क्यूंकि वो खाने और पचाने में आसान है बशर्ते उसकी पैकेजिंग अच्छी की जाए. उसमे अच्छे कलर डालें जाएँ. उसमे कृत्रिम स्वाद डाल दिए जाएँ. अब कोई सेठ पागल थोड़े ना है जो कचरा खा के संतुष्ट होने वालों के लिए मेहनत करके स्वादिष्ट और सेहतमंद भोजन बनाए.
(एक गलती हो गई ये लिखते-लिखते कि आप को आप कहता रहा, अब से हम कहूँगा क्यूँकि मैं भी खड़ा था कभी उसी तरफ़.)

कोई पत्थर चेहरों के नायक ढूँढ के लाता हैं और कई फिल्मों में देखने के बाद, हमें उन पत्थरों में चेहरा भी नज़र आने लगता है. उनकी एक पहचान हो जाती है हमसे. हमें पत्थरों पे फ़िदा होने का अच्छा ख़ासा अनुभव है. हमारे “बागी” तक मुख्यधारा से बग़ावत नहीं सके. हम दरअसल दशकों से पोर्न फ़िल्मों के दर्शक रहे हैं. हमें सच भद्दा लगता है इसलिए हम अतिश्योक्ति में अपना सुख ढूँढते हैं. हम अपने जैसे लोगों को देखने में पैसे ख़र्च नहीं कर सकते क्यूँकि हमारा आत्मसम्मान कोई आधे ग्राम की चीज़ हो चली है.

बुकोवस्की की एक कविता पढ़ी थी कई साल पहले “सो यू वांट टू बी राइटर?”. एक लेख़क को कब लिखना चाहिए. तब, जब लिखे बिना साँस ना आए. आज जब मैं लिखने बैठा हूँ तो उसी रफ़्तार से लिख रहा हूँ, जिसमे सोच रहा हूँ. जो भी मेरे अंदर पड़ा है, उंडेल रहा हूँ. शायद ये अनुभव, नमक के गाढ़े घोल की तरह था. जिसे ज़हर का शिकार हुए लोगों को पिलाया जाता है ताकि वे अपने अंदर के सारे विष का वमन कर सकें.

मैंने पिछले कई सालों में “सैराट” जैसी एक भी बढ़िया सितारा विहीन फ़िल्म नहीं देखी. जो अपने हर पहलू में इतनी सच्ची और तनिक भी सस्ती ना हो और उसके बावजूद उसने मुख्यधारा के दर्शकों का इतना प्यार पाया हो. ये नागराज मंजुळे के साथ-साथ मराठी दर्शकों की भी विजय है, जिसे वो सीना ठोक के भी दर्शा सकते हैं. काश मैं ये किसी और भाषा के दर्शकों के बारे में भी बोल सकता. हाँ ये सही है कि बेहतरीन सिनेमा दूसरी भाषाओं में भी बना है लेकिन या तो उसे मुखयधारा के दर्शकों ने अपनाया नहीं या फिर उसका सितारा ही उसे मुख्यधारा तक ले जा सका. ख़ैर छोड़िए, यहाँ भी बात उनके ही इर्द गिर्द ना घूमती रहे. आपको फ़िल्म की कहानी तो नहीं सुनाऊंगा, लेकिन उन किरदारों से तो मिला ही सकता हूँ जिन्होंने पहली दफ़ा कैमरे का सामना किया है और उनमे से कोई भी किसी सितारे की औलाद नहीं है.

जैसे ऊँची जाति की अर्चना उर्फ़ आर्ची के किरदार में रिंकू राजगुरु. उसकी आँखे देखी है आपने ? एक लाल सूरज सा दबा रखा हो जैसे अपने अंदर. “पावर योगा” काया से परे, कुछ मराठी और कुछ मलयाली सा चेहरा, मिट्टी सा सांवलापन लिए. पढ़ाई में पीछे लेकिन ऊँचे परिवार की ठसक यूँ कि भाई की तरह दिखाने की ज़रुरत नहीं समझती. मुस्कराहट ऐसी कि दिल खोल के लेकिन किफ़ायत से ख़र्च की गई हो. ऐसी ताकत और कमज़ोरी जैसी बच्चे में होती है. फिर भी इतना सच्चा किरदार जैसे घर से निकलते ही किसी मोड़ पे मिल भी सकता है.

नीची जाति के प्रशांत उर्फ़ पर्श्या के किरदार में आकाश ठोसर. पर्श्या इतना सादा है जैसे, जैसे जंगली फूल. बिना खाद, बिना देखभाल के उगा फूल. लड़के से फूल की उपमा जोड़ने की हमें आदत नहीं है लेकिन इस फ़िल्म के किरदार हमारी आदतों को ध्यान में रख के नहीं लिखे गए हैं. तो पर्श्या की सादगी भी यूँ ही है और साहस भी ऐसा ही. वो अकेले नहीं लड़ सकता दुनिया से, वो कमज़ोर है लेकिन साथ मिले तो आग में भी कूद सकता है. वो नास्तिक है और कवि है लेकिन लेखक उससे इन बातों का प्रमाण पत्र नहीं माँगता.

सलीम, एक ऐसा मुसलमान किरदार जिसे ना उसके धर्म का अहसास कराया जाता है ना वो करता है. ठीक किसी और किरदार की तरह. वरना हमारी फिल्मों में मुस्लिम किरदार, मुस्लिम किरदार की तरह पेश किया जाता है. उसे कुछ ख़ास करना होता है, बाकी किरदारों से अलग.

सैरात में एक किरदार है “प्रदीप”. जिसे सब उसकी अपंगता के चलते “लंगड़िया” बुलाते हैं और वो असहमति नहीं जताता. मैंने भी अपने बचपन में शुरुआत में ना चाहने पर भी बहुमत के “पीअर प्रेशर” के चलते कुछ दोस्तों के लिए ऐसे विशेषणों का इस्तेमाल किया है. मैं डरपोक था और मुखयधारा से अलग नहीं होना चाहता था. उस पर मुझे ऐसी “आर्ची” भी ना मिली जो मुझे इस बात का अहसास कराती. फ़िल्म के एक दृश्य में प्रदीप किसी वजह से रोने लगता हैा ओर रोते-रोते हँस देता है. पूरा हॉल उस मौके पे हँस रहा था और मेरा दिल धँसे जा रहा था. उस हिस्से में मैंने खुद को प्रदीप के करीब पाया. जैसे मुझे भी किसी से प्रेम हो और समाज की एक बड़ी असलियत जानकार मैंने कहीं यकीन कर लिया है कि मैं उसे पा नहीं सकता, लेकिन अपने हुनर के दम पे किसी को उसका प्रेम दिलाने में मदद तो कर ही सकता हूँ. कहानी में सबका नायक होना ज़रूरी तो नहीं लेकिन सबको पर्श्या मिले ये भी तय नहीं.

अर्चना का भाई, उसकी सहेली, उसका कज़न, प्रशांत की बहन, दो असहाय प्रोफ़ेसर. कितने ही किरदार हैं जो भूले नहीं भूलते. कहानी को सामने आने से बचाने के लिए कितना और क्या-क्या कहने से मैंने खुद को रोका है, मैं ही जानता हूँ. ना तो मैंने उनके रिश्ते के बारे कुछ लिखा और ना उस रिश्ते की यात्रा के बारे में. बस आख़िर में, इस लेख को मैं भारतीय सिनेमा के दो उम्मीद भरे शब्दों पे ख़त्म करूँगा “नागराज मंजुळे”

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