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LGBTQ 7: 'मैं एक भारतीय गे मुसलमान हूं, यही मेरी पहचान है'

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हम कुछ दिनों से LGBTQ सीरीज कर रहे हैं. एक हिजड़े की कहानी लगाई. लोगों ने कहा, ‘WTF’. ये आज के लोग हैं. जो टेक्नोलॉजी और मीडिया में आई क्रांति के बाद भी ह्यूमन राइट्स को नहीं समझते. समलैंगिकता को नॉर्मल मानना तो दूर की बात है, लोग तो ‘गे’ को गाली मानते हैं. तो सोचो आज से 50 साल पहले लखनऊ के एक मुसलमान घर में पैदा हुए 16 साल के लड़के का ये कहना कि ‘मैं गे हूं’ कितनी बड़ी चीज रही होगी. बात कर रहे हैं सलीम किदवई की. जो इंडिया में समलैंगिकता पर बात करने वाले पहले गिने चुने लोगों में से एक थे. सलीम लखनऊ में पले-बढ़े. फिर दिल्ली और कैनेडा में पढ़ाई की. फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में हिस्ट्री के टीचर रहे. आजकल लखनऊ में रहते हैं. बीते दिनों उनसे फोन पर बातचीत हुई. ये रहे उसके अंश.

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1. आपको कब ये पता लगने लगा कि आप अधिकतर लड़कों की तरह नहीं हैं? अपनी सेक्शुएलिटी को लेकर ‘कम आउट’ करने यानी दुनिया को बताने का फैसला कब लिया? क्या दूसरों का सपोर्ट मिला?

right to love

जिस उम्र में किसी भी आम युवा को अपने शरीर और दिमाग में आए बदलावों का अंदाजा लगने लगता है, उसी समय मुझे भी अपनी सेक्शुएलिटी का पता चला. यानी टीनएज में. पर मैं कंफ्यूज्ड था. घबराया हुआ था. पर मेरे बारे में पॉजिटिव बात ये थी कि मैं खूब पढ़ता था. पढ़ते पढ़ते ऐसी चीजें भी मिलती थीं जिनमें लेखक वो कह देता था जिसे मैं फील करता था. किताबों में अपने जैसे लोग मिलते थे. बेहतर लगता था. बात ‘कम आउट’ की. ये एक पल की बात नहीं थी. ये एक पल की बात हो ही नहीं सकती. सबसे पहले तो अपने आप को  बताना पड़ता है कि मैं ‘गे’ हूं. ये कमिंग आउट की पहली स्टेज होती है. जिसमें आप अपनी कामुकता को समझते हैं. ये मेरे साथ 16 साल की उम्र में हुआ. और ये एक बहुत ही पर्सनल मोमेंट था. कोई ऐसा था ही नहीं जिससे ये बात कह सकूं.

फिर धीरे धीरे कुछ दोस्तों को बताना शुरू किया. इन दोस्तों में कुछ फीमेल दोस्त थीं. उम्र में बड़ी. पर मुझे समझती थीं. ये लखनऊ की बात है. और अब बात दुनिया की. दुनिया को बताने में एक उम्र लग गई. बहुत धीरे धीरे हुआ ये. क्योंकि ये इतना आसान नहीं होता. दर लगता है. जो होमोफोबिया यानी समलैंगिक लोगों से डरना और चिढना, समाज में होता है, वो हमारे अंदर भी बस जाता है. लगता है कि हम गे हैं तो हम गलत हैं. आप परत दर परत बाहर आते हैं. तो पहले मेरे दोस्तों को पता चला. पर ये बात कभी मीडिया में नहीं आई. किसी अखबार या मैगजीन में नहीं आई. ये बात दुनिया को तब पता चली जब मैं रिटायर हो चुका था. यानी 1993 के बाद. लेकिन दोस्तों को इस दौरान सब कुछ पता था.


 

2. आप एक मुसलमान हैं. क्या आपका मुसलमान होना आपके गे होने को अलग बनाता है? अपनी पहचान को अगर आपको शब्दों में ढालना हो, तो खुद को क्या बताएंगे आप?

मैं खुद को एक गे भारतीय मुसलमान कहता हूं. ये तीन अलग-अलग शब्द हैं, और इन्हीं को मिलाकर मेरी पहचान बनती है. इसका मतलब ये है कि मैं माइनॉरिटी में भी माइनॉरिटी हूं. और इस बात का एहसास मुझे बार बार हुआ है. जब सेक्शन 377 पर पहले दिल्ली हाई कोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, मीडिया मेरी राय जानने के लिए मेरे पीछे पड़ गया. तब मुझे मालूम पड़ा कि मेरे अलावा कोई ऐसा मुसलमान है ही नहीं जो खुद को पब्लिकली गे मानता हो. मुझे दुःख हुआ. गुस्सा भी आया. पर मैं खुश हूं कि आज मेरे जैसे कई लोग हैं.


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3. आपकी पैदाइश और परवरिश लखनऊ में हुई. आप कैनेडा और दिल्ली में पढ़े हैं. ये तीनों जगहें तीन दुनियां हैं. समलैंगिकता को लेकर इन तीनों जगहों के लोग किस तरह एक-दूसरे से अलग हैं?

तीनों जगहें अलग हैं पर समलैंगिकता को लेकर एक सी थीं. कहीं भी खुले तौर पर गे और लेस्बियन को सपोर्ट नहीं मिलता था. लेकिन समय के साथ साथ तीनों जगहें बदल गयीं हैं. और ये बदलाव मेरी अपेक्षाओं के मुकाबले बहुत बड़े हैं. ये सभी बदलाव पॉजिटिव रहे हैं. मैं खुश हूं.

4. दिल्ली यूनिवर्सिटी एक ऐसी जगह है जहां आज हमें LGBT ग्रुप्स के लिए काफी समर्थन मिलता है. ये समर्थन बड़ा ही मुखर है. लोग सड़कों पर उतर आते हैं. लेकिन आप के समय में DU कैसा था?

कम्पलीट साइलेंस था. इन मुद्दों को लेकर कोई बात नहीं करना चाहता था. पर्सनली कहूं तो लोग मेरे बारे में जानते थे. स्टूडेंट गॉसिप किया करते थे. लेकिन कभी किसी ने मेरे मुंह पर आ कर कुछ नहीं कहा.


5. तो यही चुप्पी थी जिसकी वजह से आपने ‘द हिस्ट्री ऑफ़ सेम-सेक्स लव’ जैसी किताब निकालने का फैसला लिया?

हां. क्योंकि इस चुप्पी को तोड़ना जरूरी था. क्योंकि ये चुप्पी सामाजिक स्तर पर टूटे, उसके पहले जरूरी था कि एकेडेमिक स्तर पर टूटे. कमसकम इसके बारे में बात-चीत होनी शुरू हो. लोगों को बताया जाए कि ये नॉर्मल है. किताब को छपवाना आसान नहीं था. हमें लड़ना पड़ा. वो बहुत कठिन समय था. ये वही समय था जब लेस्बियन प्रेम पर बनी ‘फायर’ फिल्म को लेकर बवाल चल रहा था. थिएटरों में तोड़-फोड़ की जा रही थी. कोई भी प्रकाशक अपने पैसे डुबोना नहीं चाहता. कोई भी प्रकाशक ये नहीं चाहता कि उसे कुछ छापने के लिए पीट दिया जाए. इसलिए कोई हमें छापने को तैयार नहीं था.


 

6. आप देश के सबसे पुराने गे ऐक्टिविस्ट में से एक रहे हैं. आपको किन तकलीफों का सामना करना पड़ा? आज के युवा गे ऐक्टिविस्टों से आप कुछ कहना चाहेंगे?

मैंने अपने आपको कभी एक ऐक्टिविस्ट के तौर पर नहीं देखा. ये मेरा काम था जिसने मुझे ऐक्टिविस्ट बना दिया. या ऐक्टिविस्ट का दर्जा दे दिया. इसलिए आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि अपनी सोच, चॉइस और भरोसे के बल पर आप बहुत बदलाव ला सकते हैं. ऐक्टिविस्ट होना सबसे पहले अपने उसूलों को निभाना और उनपर भरोसा रखना है. सभी युवाओं से कहना चाहता हूं कि अगर आप समलैंगिक हैं, तो घबराइए मत. बल्कि अपनी पर्सनालिटी पर काम करिए. कॉन्फीडेंट दिखिए. एक अच्छा इंसान बनिए. खुद पे भरोसा रखिए. ताकि लोग जब आपको देखें, तो एक इंसान की तरह देखें. एक इंसान जू सिर्फ गे नहीं, और भी बहुत कुछ है.

गे ऐक्टिविस्टों से कहना चाहूंगा कि उन्हें देख कर मुझे खुशी मिलती है. समलैंगिकता को लेकर जो खुलापन आया वो काबिल-ए-तारीफ है. मैं खुश हूं कि गे राइट्स के लिए लड़ने वालों की संख्या बढती जा रही है. ज्यादा से ज्यादा लोग सड़कों पर उतर रहे हैं. पहले प्राइड मार्च होते थे तो लोग मुखौटे लगा कर जाया करते थे. अब मुखौटे नहीं लगाते. वो अब डरते नहीं. ये एक पॉजिटिव चेंज है.


 

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