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LGBTQ 3: जरूरी तो नहीं कि हर इंसान खुद को 'औरत' या 'मर्द' कहलाना चाहे

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alokये आर्टिकल परफॉरमेंस ग्रुप डार्क मैटर ने फेसबुक पर अंग्रेजी में लगाया था. जिसे लल्लनटॉप ने हिंदी में ट्रांसलेट किया है. पोस्ट को लिखने वाले हैं आलोक वेद मेनन. आलोक एक ट्रांस-राइटर हैं और न्यू यॉर्क में रहते हैं. आज कल ये डार्क मैटर ग्रुप के साथ टूर पर हैं और जगह-जगह क्वियर परफॉरमेंस कर लोगों को जेंडर इशूज से रूबरू कराते हैं. इनके आर्टिकल आप returnthegayz.com पर पढ़ सकते हैं.  

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right to love

एक बात बताना चाहता हूं. जब भी मेरा कोई फोटो शूट, इंटरव्यू या परफॉरमेंस होता है, मैं शेव करता हूं. मैं शेव इसलिए करता हूं कि जब अपनी दाढ़ी वाली चेहरे के साथ लिपस्टिक और ड्रेस में खुद की तस्वीरें देखता हूं तो लगता है बड़ा घिनहा दिख रहा हूं. मैं शेव करता हूं क्योंकि मैं जानता हूं कि अगर शेव न करूं तो लोग मेरे ‘ट्रांस’ होने पर यकीन नहीं करेंगे.

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मैं अक्सर सोचता आया हूं कि शरीर पर बालों के साथ एक ट्रांसजेंडर होना कैसा होता है. और पाता हूं कि जिस दिन मैं शेव नहीं करता उस दिन मुझे सबसे ज्यादा हैरेसमेंट झेलना पड़ता है. शेविंग लोगों के ‘तुम कूड़ा लग रहे हो’ से लेकर ‘हे बेबी’ जैसे दो अलग अलग ऐटीट्यूड के बीच का फासला है. मैं सोचता हूं कि जिन पॉपुलर मेल-टू-फीमेल ट्रांसजेंडर को मैंने देखा है, उनमें से किसी के भी शरीर पर बाल नहीं होते. वो शेव कर लेते हैं. जिन कपड़ों को औरतों के कपड़े माना जाता है, जब उन्हें पहनकर फोटो अपलोड करता हूं तो लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या मैं एक ‘असली औरत’ की तरह पहचाना जाना चाहता हूं. वो मुझसे कहते हैं कि कमसकम मुझे दाढ़ी तो बना ही लेनी चाहिए, वरना ‘जंगली’ और ‘राक्षस’ दिखता हूं. मैं खुद की तस्वीरें देखता हूं तो दुनिया की नजरों में खुद को राक्षस जैसा पाता हूं. फिर मैं राक्षसों से के बारे में सोचता हूं. खूब सोचता हूं. कि कैसे हमारे ‘फेमिनिस्टों’, ‘क्वियर’ और ‘ट्रांस’ लोगों का राक्षस ‘ड्रेस में एक मर्द’ होता है.

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लेकिन मैं ड्रेस पहने हुए एक ‘मर्द’ नहीं हूं. क्योंकि मैं मर्द ही नहीं हूं. न ‘औरत’ हूं. मैं अपने आप को मर्द या औरत की तरह नहीं सोच पाता हूं. पर जिस समाज में हम रहते हैं, वो मेरे लिए ‘लड़कियों की ड्रेस में एक मर्द’ के अलावा कोई परिभाषा सोच ही नहीं पाता. और अपने इन अनुभवों से मैं समझ पाया हूं कि हमारे लिए हर किसी को किसी ‘जेंडर’ की केटेगरी में डालना नियम है. और जब ऐसा नहीं होता, लोगों को एक तरह का खतरा फील होता है.

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जब हम ट्रांसजेंडर के बारे में बातें करते हैं तो इस बात को भूल जाते हैं कि मेरे जैसे लोग ‘मर्द’ कहे जाने पर क्यों नाराज होते हैं. वो इस बात को नहीं सोचते कि सुंदर, या सुंदर छोड़ो, सेफ होने के लिए हमें खुद को ‘औरत’ या ‘मर्द’ ही बनकर क्यों जीना पड़ता है? जरूरी तो नहीं कि हर इंसान खुद को ‘औरत’ या ‘मर्द’ कहलाना चाहे. मैं सोचता हूं कि अगर इसी तरह सब हमसे भागते रहेंगे तो कौन होगा जो हमारे लिए किसी से नाराज हो सकेगा, हमारे लिए लड़ेगा, हमसे कौन प्यार करेगा, हमें कौन सुंदर कहेगा? हमें लड़कियों की ड्रेस पहने हुए ‘मर्द’ गंदे क्यों लगते हैं. लोगों को क्यों लगता है कि जो औरत या मर्द नहीं है वो गंदा है, असभ्य है, गलत है? लोग मुझपर क्यों थूकते हैं, क्यों हंसते हैं मेरे ऊपर, क्यों मुझे चीजें फेंक के मारते हैं? या जब इस दाढ़ी के साथ ड्रेस पहन कर निकलता हूं तो क्यों मुझे धकियाते हैं?

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और ये बात सिर्फ ‘लड़कियों’ की तरह दिखने तक सीमित नहीं है. ये दोनों जेंडरों पर लागू होता है. समाज हमें सिखाता है कि ‘लड़कों जैसा’ और ‘लड़कियों जैसा’ दो अपोजिट चीजें हैं. और इन्हें अपोजिट ही रहना चाहिए. ये अगर एक साथ आते हैं तो लोगों में नफरत, गुस्सा और हिंसा भड़काता है. कभी कभी तो मैं समझ नहीं पाता हूं कि ये मेरा ‘लड़कों जैसा’, ‘लड़कियों जैसा’ या दोनों की तरह दिखना, या दोनों की तरह ही न दिखना है जो मेरे खिलाफ लोगों में हिंसा भड़काता है.

मैं सोचता हूं कि काश ऐसा दिन आ सके कि लोग ऐसे दोस्तों बनाएं, ऐसी सोच उनके अनादर जनम ले कि वो मेरे जैसे लोगों को एक्सेप्ट करना सीख सकें. पर कभी कभी लगता है ये आइडिया बड़ा भोला और मासूम है. लेकिन इस साल मैं एक कसम खाता हूं. कि हर बार दाढ़ी बना के बाहर नहीं जाऊंगा. जब मैं अपनी तस्वीरें देखूंगा तो खुद से घिनाऊंगा नहीं. उसमें सुंदरता या गंदगी नहीं देखूंगा. बस खुद को देखूंगा.

ये कितना सीधा-सादा फैसला है. लेकिन कितना मुश्किल काम है.

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