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LGBTQ 10: 'हां साले, लड़के के साथ सोना चाहता हूं. तुझे प्रॉब्लम?'

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पढ़ाई के साथ चवन्नी जोड़ने के चक्कर में नौकरी कर ली थी. दिन में सिर्फ 12 दिन काम किया और नाइट शिफ्ट में डेढ़ साल. नाइट लगवाने के दो महीने बाद हमारे साथ नया लड़का आया. नाम था आरिफ. शक्लो सूरत से बहुत खूबसूरत नहीं था लेकिन इतना बुरा भी नहीं कि मुंह बिचकाया जाए. नाइट में आने के दो तीन दिन तो बाकी साथियों से कुछ कटा कटा रहा. रात में 12 बजते तो सब लड़के टिफिन लेकर एक जगह जमा हो जाते. जितने ज्यादा लोग उतने तरह का खाना. आरिफ सबसे अलग बैठता अपना बड़ा सा पांच खाने वाला टिफिन लेकर. उसे अकेले बैठे देख मुझे बड़ी उलझन होती. एक दिन वो बैठा ठूंस रहा था कि हम पहुंचे उसके पास. उसके खुले हुए डिब्बे बटोर कर लाया अपने गैंग में सजा दिया. तब उसने हम लोगों का साथ स्वीकार किया और ये रहस्य खोला. कि खाना बहुत अच्छा बनाता है. लो लो.. लौकी का कोफ्ता लाया हूं आज. सब लोग खाओ.

right to love

लेकिन फिर पता चला कि उसके अलग बैठने की वजह भी अलग थी. उसका हंसना, बोलना, चलना सब अलग था. फिर एक दिन एक लड़का और आया संदीप नाम का. वह दोनों डे शिफ्ट से पक्के दोस्त थे. एक दूसरे के साथ चिपके रहने वाले. हमारे बॉस थे परवेज सिद्दीकी. उन दोनों को साथ देख कर खीस निपोर देते थे. कभी कभी हद से ज्यादा चुटकी लेते तो दोनों का मुंह लाल हो जाता शर्म से. बॉस को ये गुमान था कि दुनिया देख रखी है. वह आरिफ और संदीप के रिश्ते को जान गए थे. लेकिन बुजुर्गी एक्सपीरिएंस के साथ संवेदना भी लाए ये जरूरी नहीं. दूसरी बात उससे ज्यादा जड़ थी. परवेज मियां हंस भले देते थे लेकिन अंदर भरे बैठे थे.

दोनों लड़कों ने प्लान किया कि नाइट शिफ्ट में चलते हैं. बॉस ने आरिफ को नाइट में भेजा लेकिन संदीप को टरका दिया. उसके काम में ऐसी कमी आई कि बॉस को खलने लगा. बुलाया और समझाया. जाओ बेट्टा नाइट शिफ्ट में लेकिन खयाल रहे. आरिफ से दूर रहना. उसकी मुराद पूरी हुई. याद रहे. उसे पता नहीं था कि वो संदीप से जो जुड़ाव महसूस कर रहा है. वो कुछ अलग किस्म का है. वो उसे किसी और लड़के से नहीं महसूस होता. किसी लड़की से भी नहीं. लड़कियां तो बड़ी जल्दी दोस्त बन जाती हैं उसकी. क्यों, ये भी नहीं पता.

संदीप के नाइट शिफ्ट में आने के बाद आरिफ का कलर बदल गया एकदम से. उसके काम और बातों में उत्साह आ गया. हंसी लिटिल शाई वाली हो गई. कमर लचका कर चलता था. शरमाने की कोशिश करता था. कंप्यूटर से बड़ा सा स्कैनर चिपका रहता था. रात भर. स्कैनर से असिस्टेंट आरिफ और आरिफ से संदीप चिपका रहता था. हम सब साथ काम करने वाले लगभग एक ही उम्र के थे. जस्ट कॉलेज गोइंग. जबरदस्ती की कूलनेस से भरे हुए. एक दो रातों के बाद लौंडों ने उनका मजाक बनाना शुरू कर दिया.

Gay rights activists shout slogans during a protest against the verdict by the Supreme Court in Mumbai December 15, 2013. India's Supreme Court on Wednesday reinstated a ban on gay sex in the world's largest democracy, following a four-year period of decriminalisation that had helped bring homosexuality into the open in the socially conservative country. In 2009 the Delhi High Court ruled unconstitutional a section of the penal code dating back to 1860 that prohibits "carnal intercourse against the order of nature with any man, woman or animal" and lifted the ban for consenting adults. The Supreme Court threw out that decision, saying only parliament could change Section 377 of the penal code, widely interpreted to refer to homosexual sex. Violation of the law can be punished with up to 10 years in jail. REUTERS/Danish Siddiqui (INDIA - Tags: CRIME LAW SOCIETY)
Source: Reuters

छींटाकशी करते, मुंह फाड़ कर हंसते लड़कों को देख कर उन दोनों का मुंह लाल हो जाता था. लेकिन ज्यादा दिन ये चलना नहीं था. आरिफ ने बम फोड़ दिया. वाटर कूलर के पास गया था पानी लेने. वहां लवकेश पहले से टोंटी में बॉटल घुसाए था. इसके पहुंचते ही कहने लगा “क्यों बे, संदीप के साथ सोना चाहता है क्या. उस टाइप से?” आखिरी शब्द जिस तरह हवा में हाथ नचा कर कहे उसने. आरिफ एकदम भन्ना गया. हाथ पकड़ के मरोड़ा तो बच्चा बिलबिला गए. गुस्से में बोला “हां साले. सोना चाहता हूं. सोऊंगा. तुझे प्रॉब्लम? मैं लव करता है उसको.” फिर लवकेश हाथ छुड़ा कर वहां से भागा.

इस लव से लवकेश का भोंपू खुल गया. उसने अपने झगड़े को सनसनाती खबर बना कर फैलाना चाहा. लेकिन उसके गुब्बारे में से हवा लीक हो गई. जब उसे पता चला सबको इस बात का अंदाजा था. उम्मीद थी. बस सब उन दोनों के मुंह से सुनने को उतावले थे. आरिफ के स्वीकार कर लेने भर से मुश्किल आसान हो गई. मुश्किल कुछ नहीं थी. लेकिन न जाने क्यों आरिफ को अपने इमोशंस के लिए लड़ता देख अच्छा लगा. मुझे यकीन था उसे भी अच्छा लगा होगा. जब उसे सब सवालिया नजरें अपने आप झुकती दिखी होंगी. फिर जब वो हमारे साथ आया तो साथियों को धौल जमाते हुए बोला “सालों कामचोरी कल्लो खाली. मेरी तरह एक टाइम पर दो चीजें संभालनी पड़तीं तो पता चलता.” सब जी खोल कर हंसे. उसके बाद हंसी ठिठोली का ऐसा दौर चला जो कभी खत्म नहीं होने वाला था. संदीप थोड़ा नकचढ़ा था. जल्दी भिड़ने वाला. लेकिन आरिफ उसको मनाते रहता था. उस तरह जैसे कोई और नहीं कर पाता.

उसके बाद करीब 14 महीने में वहां रहा. नाइट शिफ्ट में. उन दोनों के साथ. उनके रिश्ते को समझता रहा. अपने ऑफिस में उनकी आसान होती जाती जिंदगी देखता रहा. दोनों साथ छुट्टी लेते थे. साथ रहते थे. साथ खाते-पीते. लोहे की रैक्स थीं बड़े से हॉल में. उनकी लाइन के बीच में घुस जाते. वो क्या करते हैं ये देखने कोई नहीं जाता था. हम सबमें अनकहा समझौता हो गया था कि इनको डिस्टर्ब नहीं करना है. वहां जाते थे बहाने देकर आते थे थकान लेकर. हालत यहां तक आ गई थी कभी कभी आरिफ मुंह छिपाते हुए आता था. निशानों को छिपाते हुए. तब लौंडे संदीप से भिड़ जाते थे. “साले हरामी हवस संभाल के”. सब जानते थे कि उनकी लाइफ यहां जितनी आसान है, बाहर उतनी ही मुश्किल.

नया नया कैमरे वाला फोन लिया था मैंने. जिसमें दूसरी तस्वीर उस जोड़ी की थी. पहली वो थी जो दुकान पर मोबाइल खरीदते वक्त कैमरा चेक करने के लिए खींची थी. वो तस्वीर मेरे पास है अब तक. फिर एक्जाम्स आ गए. मैंने जॉब छोड़ दी.

फोन पर दोनों से बात होती रहती थी. एक महीने बाद पता लगा कि आरिफ सऊदी अरब चला गया. संदीप ने नंबर बदल लिया. मुझे पता नहीं फिर वो कहां गया.

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