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केएल सहगल से कुमार सानू तक को गवाने वाले इकलौते म्यूज़िक डायरेक्टर की कहानी

हिंदी सिनेमा और उसके संगीत के बारे में तमाम बातें होती हैं. मसलन, 70’s के बाद के गानों में वो बात नहीं रही. ब्लैक एंड वाइट टाइम में सब सहगल की तरह क्यों गाते थे. आखिर रहमान के संगीत में ऐसा क्या है! इंडी-पॉप के सितारों के ऐल्बम अब क्यों नहीं आते. ऐसे तमाम सवालों से भरी फिल्म संगीत की LP रिकॉर्ड से हेडफोन तक की, वाया डेक मशीन हुई यात्रा के किस्सों पर हम बात करेंगे.

1944-45 की बात है. लखनऊ के पास एक निकाह पढ़ा जा रहा था. बाराती एक गाने पर नाचे जा रहे थे. दूल्हे के अब्बा और चचाजान इन सभी लौंडो पर दीन से भटक जाने और दोज़ख़ में जाने की तोहमत मल रहे थे. मगर वो दोनो, बाराती और दुल्हन के घरवाले, इनमें से कोई नहीं जानता था कि सेहरा बांधे जो दूल्हा बैठा है, वही इस फिल्म के गानों का कंपोज़र है.

फिल्म का नाम था ‘रतन’, गाना था ‘अंखियां मिला के, जिया भरमा के, चले नहीं जाना’. और संगीतकार थे नौशाद अली. नौशाद के अब्बा के लिए मौसिकी हराम थी और नौशाद के लिए ज़िंदगी का मतलब मौसिकी था. बाप के डर से नौशाद ने घर पर लंबे समय तक यही बताकर रखा कि वो बंबई में दर्ज़ी हैं.


हिंदी सिनेमा में जिन लोगों को गेम चेंजर कहा जाता है, उनमें नौशाद का नाम सबसे ऊपर आएगा. उमादेवी (टुनटुन), सुरैया, मोहम्मद रफी और शमशाद बेगम जैसी आवाज़ों को पहला ब्रेक देने वाले नौशाद एक मात्र संगीतकार हैं, जिन्होंने कुंदन लाल सहगल से लेकर कुमार सानू तक को प्लेबैक का मौका दिया.

नौशाद के सिनेमाई संगीत में यूं तो कई योगदान हैं, मगर कुछ ऐसी चीज़े हैं, जिनके ज़रिए उन्होंने हिंदी सिनेमा और सिनेमाई संगीत को हमेशा के लिए बदल दिया.

नौशाद और लता मंगेशकर (फोटो : BBC)
नौशाद और लता मंगेशकर (फोटो : BBC)

संगत से संगीतकार तक

नौशाद का करियर कायदे से 1940 में शुरू हुआ. फिल्मों ने तब कुछ साल पहले ही बोलना शुरू किया था. उस दौर के ज़्यादातर संगीतकार फिल्मी संगीत के नाम पर ठुमरी, दादरा या ग़ज़ल को तबला-हारमोनियम आदि के साथ या किसी पश्चिमी धुन को पियानो के साथ रिकॉर्ड कर देते थे.

आप आज गाने के बीच-बीच में जो संगीत सुनते हैं, वो बाकी गाने से अलग होता है. इसकी शुरुआत नौशाद ने की थी. इसके साथ ही नौशाद ने फिल्म के बीच में म्यूज़िक देने की शुरुआत भी की. बॉलीवुड में बैकग्राउंड स्कोर का प्रचलन नौशाद साहब ही लाए.

संगीत का बॉलीवुड जॉनर

संगीत में दो ढंग होते हैं. पहला मेलोडी और दूसरा हार्मनी. मेलोडी मतलब एक बार में एक सुर लगाना, जबकि हार्मनी में एक से ज़्यादा सुर एक साथ लगाए जाते हैं. भारतीय संगीत का आधार जहां मेलोडी है, वहीं पश्चिमी संगीत हार्मनी बेस्ड है. उदाहरण के लिए हिंदी में बांसुरी पर किसी गाने का बजना मेलोडी है और पश्चिमी सिंफनी ऑर्केस्ट्रा हार्मनी का एक उदाहरण है.

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मुंबई के शुरुआती दिनों में नौशाद एक रूसी प्रोड्यूसर के यहां पियानो बजाने का काम करते थे. वहां के अनुभव और हिंदुस्तानी संगीत की अपनी जानकारी को मिलाकर नौशाद ने संगीत का एक ऐसा ढंग विकसित किया, जिसने म्यूज़िक के बॉलीवुड जॉनर की नींव रखी. संगीत के इसी ढांचे में इसके बाद शंकर जयकिशन जैसे संगीतकारों ने सुगमता मिलाकर उन धुनों को रचा, जिन्हें हिंदी सिनेमा के सदाबहार नगमे कहा जाता है.

नौशाद ने लोक धुन, पश्चिमी संगीत, सिंफनी और हिंदुस्तानी क्लासिकल को मिलाकर संगीत के नए जॉनर बनाए. वो अपने काम और धुनों के पीछे कितनी रिसर्च और समय देते थे इसका अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि 60 साल के लंबे करियर में नौशाद ने कुल 75 फिल्में (हिंदी में 65) फिल्में की हैं.

मधुबाला और किशोर कुमार के विवाह की इस दुर्लभ फोटो में हिंदी संगीत का पूरा स्वर्णकाल है
मधुबाला और किशोर कुमार के विवाह की इस दुर्लभ फोटो में हिंदी संगीत का पूरा स्वर्णकाल है.

नौशाद की फिल्मों की गिनती ज़रूर कम है, मगर जब भी संगीत की भव्यता की बात होती है तो नौशाद मौजूद रहते हैं. ‘मुगल ए आज़म’ के लिए उन्होंने 100 से ज़्यादा गाने कंपोज़ किए थे. इस खब्त में कि जब एक नाचीज़ लौंडी ज़िल्ले इलाही को जवाब दे, तो संगीत ऐसा हो कि दुनिया याद रखे. दुनिया ने याद रखा और आने वाली पीढ़ियों को एक नई कहावत मिल गई, जब प्यार किया तो डरना क्या.

‘दुनिया के रखवाले’, ‘मधुबन में राधिका नाचे’, ‘मोहे भूल गए सांवरिया’, ‘मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे’ जैसे राग आधारित गाने, ‘नैन लड़ जहिएं’, ‘दुख भरे दिन बीते रे भैया’ जैसे लोकधुनों पर बने गाने नौशाद ने दिए. समय के साथ इंस्टेंट म्यूज़िक का चलन बढ़ा, तो इस संगीतकार ने काम करना कम कर दिया. एक दौर में शाहरुख खान की फिल्म ‘गुड्डू’ के लिए ‘डैडी से पूछ लेना’ जैसा गाना भी बनाया.

फिल्म इंडस्ट्री में सफल करियर के बाद भी परी-कथाओं जैसी विदाई कम ही लोगों को नसीब हो पाती है. नौशाद के संगीत की जो शास्त्रीय भव्यता थी, 80-90 दशक की फिल्में उसको निभाने लायक नहीं थी. कॉम्प्रोमाइज़्ड संगीत देकर नौशाद खुद के साथ न्याय नहीं कर पा रहे थे. ऐसे में संजय खान के टीवी शो ‘सोर्ड ऑफ टीपू सुल्तान’ और अकबर खान की फिल्म ‘ताजमहल’ में संगीत देने की ज़िम्मेदारी वापस नौशाद को मिली.

मगर इन सबके बाद एक बार फिर नौशाद को वो ज़िम्मेदारी मिली, जिसके बारे में खुद उन्होंने भी शायद कभी सोचा हो. ‘मुगल ए आज़म’ को फिर से रिलीज़ करने की बात हुई. फिल्म को रंगीन तो बना दिया गया, मगर पुराने संगीत को नए डॉल्बी डिजिटल साउंड में बदलना भी एक चुनौती थी. युग बदल चुका था. कौशल पर तकनीक हावी हो चुकी थी. अपने शिष्य उत्तम सिंह, गुरमीत सिंह और लड़के राजू नौशाद के साथ 85 की उम्र में नौशाद ने री-रिकॉर्डिंग की ज़िम्मेदारी संभाली. देशभर से गाने बजाने वाले बुलाए गए. हर गाने का संगीत दोबारा रिकॉर्ड हुआ और ऐसा हुआ कि सुनने वाले फर्क न कर पाए.

हम आपको दोनों वर्ज़न सुनवा रहे हैं. कोई फर्क लगे तो कमेंट बॉक्स में बताइएगा.


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