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शिया-सुन्नी की होड़ में फिर जंग को गले लगाने जा रहा है मिडिल ईस्ट!

एक मधुमक्खी होती है. दूसरी भिरनी होती है. पीले रंग की. उन्नीस-बीस का फर्क भूल जाएं, तो मधुमक्खी और उसकी जात एक ही होती है. मगर दोनों के काटे में अंतर होता है. भिरनी तबीयत से काट ले, तो बुखार लग जाता है. तो सोचिए, भिरनी का छत्ता कैसी आफत की चीज होती होगी. एक ढेला फेंको और हजारों भिरनियां गुन-गुन करते हुए लुधक जाएंगी. मिडिल ईस्ट ऐसा ही भिरनी का छत्ता है. कुछ भी होता है और सब गुंथ जाते हैं. कोई बचा नहीं रहता.

लेबनान का राजनैतिक संकट लगातार उलझता जा रहा है. लेबनान में अफवाहें उड़ रही हैं. प्रधानमंत्री तो हैं नहीं, तो लोग उनके टीवी पर आए भाषण को देखकर ही उनके मन की बात समझने की कोशिश कर रहे हैं.
राष्ट्रपति साद हरीरी के लेबनान न लौटने और वहीं से इस्तीफे का ऐलान कर देने के कारण काफी उलझन पैदा हो गई है. दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं.

मिडिल ईस्ट के हालात कभी बेहतर नहीं होंगे? 
यहां चीजें कभी बेहतर नहीं होतीं. लगातार हिंसा और मार-काट के बाद जब लगता है कि अब सब ठीक होने जा रहा है, तब फिर से हालात बिगड़ जाते हैं. दुश्मन तय हैं यहां. दोस्त भी तय हैं. एक कॉमन अजेंडा ही यहां दोस्त और दुश्मन तय करता है. दो देश हैं यहां. जो अपनी दुश्मनी निभाने के लिए सब झोंकने को आतुर रहते हैं. पहला, सऊदी अरब. दूसरा, ईरान. सुन्नी सऊदी. शिया ईरान. इन दोनों की दुश्मनी मिडिल ईस्ट के अलग-अलग देशों को अपना शिकार बनाती है. कभी यहां जंग लड़ते हैं, तो कभी वहां. बीते कुछ सालों से यमन और सीरिया इन दोनों की जंग का अखाड़ा बने हुए हैं. अब नया शिकार हुआ है लेबनान. वैसे, लेबनान नया शिकार नहीं है. बहुत सालों तक वहां जंग चली. फिर सब ठीक हो गया. अब दोबारा हालात बिगड़ गए हैं. मिडिल ईस्ट के सिर पर एक और जंग लहरा रहा है. जंग शुरू हुई, तो इसका असर पूरे मिडिल ईस्ट पर होगा. तेल से जुड़ी अर्थव्यवस्था पर भी होगा. रूस और अमेरिका जैसी ताकतें, जिनका मिडिल ईस्ट में गुंथने का इतिहास रहा है, भी दूर नहीं रहेंगी. रिफ्यूजी संकट के कारण यूरोप के देश भी चपेटे में आएंगे. हम जिस दौर में हैं वहां मानचित्र पर भले लकीर खिंची हो, मगर असर उस लकीर के अंदर सीमित नहीं रहता.

बेरुत में प्रधानमंत्री साद हरीरी के नाम का पोस्टर.
बेरुत में प्रधानमंत्री साद हरीरी के नाम का पोस्टर.

बीते कुछ दिनों की बात: लेबनान के PM ने सऊदी जाकर दिया इस्तीफा
लेबनान के प्रधानमंत्री साद हरीरी सऊदी गए. वहां उन्होंने एक भाषण दिया. इसको टेलीविजन पर भी दिखाया गया. साद ने ईरान को कोसते हुए प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने का ऐलान किया. उन्होंने कहा कि ईरान हेजबुल्लाह के बहाने लेबनान के मामलों में दखल दे रहा है. हेजबुल्लाह लेबनान के शिया मुसलमानों की नुमाइंदगी करता है. वहां की गठबंधन सरकार में भी है. इसकी अपनी सेना है. इस हेजबुल्लाह की पीठ पर ईरान का हाथ है. तो साद हरीरी और सऊदी का इल्जाम ईरान पर है. उनके मुताबिक, बंदूक भले ही हेजबुल्लाहके कंधों पर रखी हो. मगर उसका ट्रिगर ईरान के हाथों में है. हरीरी ने और भी बातें कहीं. बोले कि ईरान पूरे क्षेत्र में अपनी धमक बढ़ा रहा है. हरीरी तो ये भी बोले कि उनको ईरान से जान का खतरा है.

कौन सा प्रधानमंत्री ऐसे देता है इस्तीफा?
ये इस्तीफा बहुत अजीब था. मतलब, आपने कब सुना था कि कोई प्रधानमंत्री दूसरे देश जाकर इस्तीफा दे. वो भी यूं टेलीविजन पर. हरीरी के इस्तीफे के बाद सबका फोकस लेबनान पर शिफ्ट हो गया. ईरान की तरफ के लोग मानते हैं कि हरीरी ने खुद नहीं दिया इस्तीफा. बल्कि, सऊदी ने मजबूर किया. फिलहाल लेबनान में उथल-पुथल की स्थिति है. उधर, हरीरी के इस्तीफे के बाद सऊदी ने भी खूब गर्मागर्म प्रतिक्रिया दी. कहा कि लेबनान युद्ध की चुनौती दे रहा है. माने, हेजबुल्लाह चुनौती दे रहा है. माने, ईरान चुनौती दे रहा है. इसके बाद सऊदी ने लेबनान में रह रहे अपने नागरिकों को लौट आने को कहा. साफ है कि आगे आने वाले दिनों में हालात बिगड़ने जा रहे हैं. सऊदी और ईरान लेबनान को अपनी कुश्ती का अखाड़ा बनाने जा रहे हैं.

साद हरीरी जब सऊदी के दौरे पर गए, तो सबको ये सामान्य लगा था. फिर वहां से उनका संदेश आया. टीवी पर उनके भाषण का प्रसारण हुआ और इसमें उन्होंने इस्तीफा देने का ऐलान किया. ये बहुत अप्रत्याशित कदम था.
साद हरीरी जब सऊदी के दौरे पर गए, तो सबको ये सामान्य लगा था. फिर वहां से उनका संदेश आया. टीवी पर उनके भाषण का प्रसारण हुआ और इसमें उन्होंने इस्तीफा देने का ऐलान किया. इस्तीफा देने का तरीका बहुत अप्रत्याशित था.

हरीरी का सऊदी से बड़ा करीबी रिश्ता है
हरीरी और सऊदी के रिश्ते बहुत दोस्ताना हैं. यहां तक कि हरीरी पैदा भी सऊधी में ही हुए थे. साल था 1970. हरीरी के पिता थे, रफीक हरीरी. वो भी लेबनान के PM रहे. फिर उनकी हत्या कर दी गई थी. साद हरीरी का बचपन और ज्यादातर जवानी सऊदी में ही गुजरी है. हरीरी बहुत अमीर हैं. लेबनान के सबसे रईस लोगों में से एक. उनकी कंपनी है एक. कंस्ट्रक्शन का काम करती है. नाम है, सऊदी ओगर. ये कंपनी भी सऊदी अरब में ही है. उनके न केवल सऊदी के साथ गहरे रिश्ते हैं, बल्कि काम-धंधा भी वहीं है. सुनने में आ रहा है कि सऊदी लंबे वक्त से हरीरी को हेजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई करने को कह रहा था. हरीरी भी ऐसा करना चाहते थे. मगर हो नहीं पा रहा था. वजह ये है कि हेजबुल्लाह कोई दाल-भात का कौर नहीं है. कि थाली में साना और चबा लिया. वो न केवल काफी ताकतवर है, बल्कि लेबनान के शियाओं के बीच बहुत लोकप्रिय भी है. काफी चलती है उसकी. पीठ पर ईरान का हाथ होना, तो सोने पर सुहागा है.

हेजबुल्लाह का आरोप: सऊदी ने हरीरी को बंधक बनाकर रखा है
हसन नसरल्लाह हेजबुल्लाह के बॉस हैं. उनका कहना है कि हरीरी ने सऊदी के दबाव में इस्तीफा दिया है. उसके मुताबिक, सऊदी ने हरीरी को बंधक बनाकर रखा है. ये भी कि सऊदी की ये हरकत न केवल हेजबुल्लाह, बल्कि लेबनान में रहने वाले सुन्नी मुसलमानों की भी बेज्जती है. अब ये बड़ा स्मार्ट बयान दिया हेजबुल्लाह ने. सुन्नियों का जिक्र जोड़ने का मतलब लेबनान के सुन्नियों का आत्मसम्मान जगाना है. कि देखो, सऊदी ने क्या किया तुम्हारे नेता के साथ. खैर. तो हेजबुल्लाह के इस बयान के बाद हरीरी ने सऊदी से ही जवाबी बयान दिया. बोले, हम किसी कैद में नहीं हैं. आजाद हैं. कल लौटना चाहें लेबनान, तो लौट आएंगे. हमें कोई नहीं रोकेगा. हरीरी ने ये भी कहा कि हमेशा के लिए सऊदी में नहीं रुकने वाले हैं. अपने देश को लौटेंगे, जल्द ही. फिर वहां जाकर संवैधानिक तौर-तरीकों से हिसाब से इस्तीफा देंगे.

सीरिया के गृह युद्ध से सबसे ज्यादा फायदा रूस और व्लादीमिर पुतिन को हुआ. ईरान की ताकत और उसके प्रभाव में भी काफी इजाफा हुआ है.
सीरिया के गृह युद्ध से सबसे ज्यादा फायदा रूस और व्लादीमिर पुतिन को हुआ. ईरान की ताकत और उसके प्रभाव में भी काफी इजाफा हुआ है.

सीरिया का युद्ध खत्म होने के बाद मजबूत हो गया है ईरान
सीरिया में दो पार्टियां लड़ रही थीं. एक ही साथ, दो लड़ाइयां चल रही थी यहां. शुरुआत में जाते हैं इसके. मार्च, 2011. सीरिया में बगावत छिड़ गई. राष्ट्रपति बशर अल असद के खिलाफ. देश में दो फाड़ हो गए. एक तरफ लड़ रही थी असद की फौज. दूसरी तरफ था विरोधी गुट. दोनों के बीच इस जंग में कुछ तय नहीं था. बाजी किसी भी ओर मुड़ सकती थी. फिर इसमें घुसा रूस. असद की तरफ से. फिर रूस, तुर्की और ईरान ने मिलकर असद का साथ दिया. अमेरिका में तब राष्ट्रपति थे बराक ओबामा. उन्होंने जंग से दूर रहने का फैसला किया. सीरिया की इस जंग ने दो देशों का सबसे ज्यादा फायदा किया. एक रूस और दूसरा ईरान. अंतरराष्ट्रीय मामलों में रूस की धौंस और पकड़ काफी कमजोर हो चुकी थी. सीरिया में चल रही जंग ने उसे खेल में वापस ला दिया. ईरान का भी ऐसा ही हाल था. सीरिया की जंग ने उसकी भी अहमियत बढ़ा दी. अच्छा, आप जानना चाहेंगे कि ईरान सीरिया की लड़ाई में क्यों कूदा? और सऊदी को इससे क्या नुकसान हुआ? इसका जवाब है शिया-सुन्नी फाड़. सऊदी सुन्नी है. सुन्नी इस्लाम की नुमाइंदगी करता है. वहीं, बशर अल असद शिया हैं. ये ही वजह थी कि शियाओं के ‘नुमाइंदे’ ईरान ने असद का साथ दिया.

सीरिया में दो मोर्चों पर चली जंग
इस जंग के अलावा एक और युद्ध छिड़ा सीरिया में. आतंकवाद के खिलाफ. इस्लामिक स्टेट (ISIS) के खिलाफ चल रही लड़ाई में सबसे आगे था अमेरिका. उसके साथ थी नाटो की फौज. तो सीरिया में एक ही साथ दो मोर्चे खुले हुए थे. रूस और अमेरिका का करार भी हुआ था. कि दोनों में से कोई भी अपनी लकीर पार करने की कोशिश नहीं करेगा. कई बार हालात बिगड़ते दिखे, मगर फिर संभल भी गए.

हेजबुल्लाह समर्थकों की रैली. न केवल लेबनान के शिया समुदाय के बीच. बल्कि बाकी कई जगहों पर भी शियाओं के बीच हेजबुल्लाह की काफी पकड़ है.
हेजबुल्लाह समर्थकों की रैली. न केवल लेबनान के शिया समुदाय के बीच. बल्कि बाकी कई जगहों पर भी शियाओं के बीच हेजबुल्लाह की काफी पकड़ है.

यमन में भी सऊदी और ईरान की ठनी है
यमन में भी गृह युद्ध चल रहा है. वहां हूती विद्रोही लड़ रहे हैं. सत्ता के खिलाफ. राष्ट्रपति हैं अब्द्राबुह मंसूर हादी. हूती विद्रोहियों की मदद कर रहा है ईरान. वहीं, राष्ट्रपति हादी को सऊदी का साथ है. अमेरिका भी यहां सऊदी के साथ मिला हुआ है. दोनों मिलकर यमन के खिलाफ लड़ रहे हैं. लगातार हवाई बमबारी कर रहे हैं. यमन अरब के सबसे गरीब मुल्कों में से है. वहां हद भुखमरी का आलम है. हालत ऐसी है कि जो जंग से जिंदा बच जाते हैं, वो भूख और बीमारी से दम तोड़ देते हैं. 2015 से चल रही ये जंग अब भी खत्म होती नहीं दिख रही. कोई एक पक्ष जीतने की कगार पर हो, ये भी नहीं दिख रहा. अभी जो ईरान और सऊदी के बीच जो ताजी ठनी है, उसकी जड़ में भी ये यमन ही है.

सऊदी-ईरान के मौजूदा टकराव की क्या वजह है?
हालांकि सऊदी और ईरान के बीच चीजें ठीक होने की स्थिति में कभी नहीं थीं. मगर, इस एक घटना ने हालात और बर्बाद कर दिए. अभी 4 नवंबर की बात है. यमन के विद्रोही गुट ने सऊदी पर मिसाइल हमला कर दिया. हूती विद्रोहियों ने इस हमले की जिम्मेदारी भी ली. कहा कि उन्होंने सऊदी पर लंबी-दूरी का एक बलिस्टिक मिसाइल छोड़ा है. मीडिया खबरों के मुताबिक, अमेरिकी सेना के एक जनरल ने कहा कि इस मिसाइल पर ईरान का ठप्पा था. माने, ईरान ने ये मिसाइल हूतियों को दिया. इसके बाद सऊदी और ईरान के बीच तनातनी बहुत ज्यादा बढ़ गई. साफ हो गया कि उनकी आपसी लड़ाई अब यमन से बाहर भी फैलेगी. ये अंदेशा तब सही साबित होता दिखा, जब लेबनान के PM साद हरीरी ने सऊदी जाकर इस्तीफा दिया.

सीरिया के गृह युद्ध में भले ही रूस, तुर्की और ईरान एक पाले में हों, लेकिन वो पारंपरिक तौर पर पक्के दोस्त कतई नहीं हैं. ये तो बस हालात थे, जिसने उन्हें एकसाथ खड़ा कर दिया.
सीरिया के गृह युद्ध में भले ही रूस, तुर्की और ईरान एक पाले में हों, लेकिन वो पारंपरिक तौर पर पक्के दोस्त कतई नहीं हैं. ये तो बस हालात थे, जिसने उन्हें एकसाथ खड़ा कर दिया.

सऊदी और इजरायल दुश्मन हैं, मगर दोनों का दुश्मन एक है
इस पूरे क्षेत्र में एक और खिलाड़ी है. इजरायल. अपने आस-पास के देशों में इजरायल अकेला है. उसका कोई दोस्त नहीं. इजरायल यहां अकेला है, मगर कमजोर कतई नहीं है. सऊदी और इजरायल दुश्मन हैं. एकदम पक्के वाले दुश्मन. इन दोनों में एक बात एक जैसी है मगर. दोनों ही ईरान के दुश्मन हैं. एकदम पक्के वाले. जब से सीरिया की लड़ाई में असद, रूस, ईरान और तुर्की गठबंधन की जीत हुई है, तब से इजरायल भी परेशान है. सऊदी की तरह. उसको भी ईरान के बढ़ते प्रभाव से खतरा है. यानी, सऊदी और इजरायल की चिंताएं फिलहाल एक सी हैं. हाल में कुछ ऐसी खबरें आई हैं, जिनके मुताबिक सऊदी और इजरायल ने ईरान के पंख कतरने के लिए हाथ मिला लिए हैं. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स का ये भी कहना है कि लेबनान में फिलहाल जो स्थितियां बिगड़ी हैं, उसके पीछे भी सऊदी और इजरायल का साझा दिमाग काम कर रहा है. दोनों मिलकर हेजबुल्लाह और ईरान को घेरने की कोशिश कर रहे हैं. खबर तो ये भी है कि सऊदी का एक बड़ा शहजादा पिछले दिनों चुपचाप इजरायल पहुंचा था. बातचीत के लिए.

ईरान की पूरी कोशिश होगी कि इजरायल लेबनान से दूर रहे. उधर इजरायल भी लेबनान से दूर रहकर ही इस बदले घटनाक्रम का फायदा उठा सकता है.
ईरान की पूरी कोशिश होगी कि इजरायल लेबनान से दूर रहे. उधर इजरायल भी लेबनान से दूर रहकर ही इस बदले घटनाक्रम का फायदा उठा सकता है.

इजरायल को लेबनान पर हमला करने के लिए उकसा रहा है सऊदी?
सऊदी ईरान और हेजबुल्लाह पर नकेल कसना चाहता है. इसके लिए उसे लेबनान की जरूरत पड़ेगी. लेबनान में संकट पैदा करने के लिए इजरायल का साथ मिलना जरूरी है. लेबनान को अस्थिर करने के लिए बहुत ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं है. वहां हालात सामान्य हुए नहीं हैं. उसे सामान्य होने की राह पर लाने की कोशिश हो रही है. लेबनान में 17 साल तक गृह युद्ध चला. सांप्रदायिक बंटवारा इसकी सबसे बड़ी वजह थी. यहां की आबादी में तीन अहम फाड़ हैं. एक ईसाई. दूसरा सुन्नी मुसलमान. तीसरे, शिया मुस्लिम. ऐसे में जब गृह युद्ध खत्म हुआ, तब तीनों समुदायों के मुताबिक करार हुआ. तय किया गया कि राष्ट्रपति ईसाई होगा. प्रधानमंत्री सुन्नी मुसलमान होगा. संसद का स्पीकर शिया होगा. अगर लेबनान में अभी कुछ भी ऊंच-नीच शुरू होती है, तो फिर से सांप्रदायिक हिंसा शुरू होने का अंदेशा है. अगर ऐसा हो, तो सऊदी इस मौके का फायदा उठा पाएगा. वो फिर से लेबनान में अपनी खोई जगह और प्रभाव हासिल कर सकेगा. सऊदी और इजराय के बीच सौदा हुआ है या नहीं, ये तो वक्त ही बताएगा. मगर इतना जरूर है कि अगर इजरायल ने लेबनान पर हमला किया, तो ईरान की चुनौतियां बढ़ जाएंगी.

पिछले कुछ समय से प्रिंस सलमान लगातार बहुत मजबूत होते जा रहे हैं. सऊदी ने जिस तरह यमन पर हमला करने का फैसला किया, उससे लगता है कि प्रिंस सलमान ईरान की बढ़त को चुनौती देने के लिए जंग से कदम पीछे नहीं करेंगे.
पिछले कुछ समय से प्रिंस सलमान लगातार बहुत मजबूत होते जा रहे हैं. सऊदी ने जिस तरह यमन पर हमला करने का फैसला किया, उससे लगता है कि प्रिंस सलमान ईरान की बढ़त को चुनौती देने के लिए जंग से कदम पीछे नहीं करेंगे.

बहुत शातिर है प्रिंस सलमान का दिमाग
इस बात में कोई शक नहीं. सऊदी की गद्दी के वारिस प्रिंस सलमान बहुत शातिर तरीके से खेल रहे हैं. जब से उनके पिता किंग सलमान गद्दी पर बैठे हैं, तब से ही प्रिंस की वारे-न्यारे हैं. उनको अहम विभाग मिले. राज-काज बहुत हद तक उनके ही हाथों में चला गया. प्रिंस सलमान ही थे, जिन्होंने यमन पर हमले का फैसला लिया. प्रिंस लगातार ताकतवर होते गए. उनके और गद्दी के बीच एक फासला था. प्रिंस नायफ. किंग सलमान के भतीजे और गद्दी के अगले वारिस. मगर, राजा और बेटे की जोड़ी ने मिलकर प्रिंस नायफ को किनारे कर दिया. घोषणा हो गई कि प्रिंस सलमान अगले सुल्तान बनेंगे. अभी नवंबर की शुरुआत में ही प्रिंस ने कई बड़े शहजादों और राज परिवार के सदस्यों को बंदी बनवा लिया. भ्रष्टाचार के नाम पर. इस कदम ने उनके नजदीकी विरोधियों का पत्ता काट दिया. अब प्रिंस और किंग सलमान, दोनों की सत्ता के सामने फिलहाल कोई चुनौती नहीं है. इन सब चीजों को देखकर यकीन हो जाता है कि प्रिंस सलमान काफी शातिर हैं. अपने दुश्मन ईरान को घुटनों पर लाने के लिए वो जी-जान लगा देंगे, ये भी कोई असंभव सी चीज नहीं लगती.

लेबनान की सेना से कहीं ज्यादा ताकतवर है हेजबुल्लाह. शायद ये एक बड़ी वजह रही कि PM हरीरी चाहकर भी उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सके.
लेबनान की सेना से कहीं ज्यादा ताकतवर है हेजबुल्लाह. शायद ये एक बड़ी वजह रही कि PM हरीरी चाहकर भी उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सके.

लेबनान में हेजबुल्लाह का क्या असर है?
हेजबुल्लाह शियाओं का नुमाइंदा है. लेबनान में उसके पास बहुत ताकत है. कहते हैं कि लेबनान की सेना से कहीं ज्यादा मजबूत है हेजबुल्लाह. इसकी पैदाइश में भी ईरान का हाथ है. ये तब की बात है, जब लेबनान पर इजरायल का नियंत्रण था. 1980 के शुरुआती सालों की. 1985 में इसने अपने होने का आधिकारिक ऐलान किया था. हालांकि इसकी मौजूदगी 60 और 70 के दशक से सिर उठाने लगी थी. ये ही वो दौर था, जब लेबनान ने शियाओं की हालत सुधरने लगी थी. हेजबुल्लाह इजरायली कब्जे के खिलाफ लड़ता था. फिर जब साल 2000 में इजरायल लेबनान से लौट गया, तब हेजबुल्लाह के लिए ये एक बड़ी जीत थी. उस पर हथियार डालने का भी दबान बनने लगा. ये कहकर कि अब जरूरत नहीं है. मगर, हेजबुल्लाह ने एक न मानी. फिर जनता के बीच भी उसकी पैठ बनने लगी. इतना असर बढ़ा कि कैबिनेट में भी शामिल हुआ. कई पश्चिमी देश हेजबुल्लाह को आतंकवादी संगठन मानते हैं. मगर लेबनान के शियाओं को उसमें अपना रक्षक नजर आता है.

मिडिल ईस्ट में दोस्ती और दुश्मनी का एक बड़ा अजेंडा शिया और सुन्नी टकराव है. सऊदी कहता है कि ईरान पूरे क्षेत्र पर हावी होने की कोशिश करता है. उधर, ईरान कहता है कि सऊदी अरब शिया शक्तियों को दबाने की हर-मुमकिन कोशिश करता है.
मिडिल ईस्ट में दोस्ती और दुश्मनी का एक बड़ा अजेंडा शिया और सुन्नी टकराव है. सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद शिया हैं. ईरान और हेजबुल्लाह भी शिया हैं. यहां हर जीत-हार बड़े देशों के दबदबे का समीकरण बदल सकती है.

असद सरकार के पक्ष में भी लड़ा हेजबुल्लाह
हजारों की तादाद में हेजबुल्लाह लड़ाकों ने सीरिया जाकर असद सरकार की ओर से जंग में हिस्सा लिया. असद के धड़े की जीत में हेजबुल्लाह का भी काफी हाथ रहा. खासतौर पर लेबनान के सटे इलाकों में तो उनकी मदद काफी अहम रही. सीरिया के युद्ध में शामिल होकर हेजबुल्लाह की धाक भले बढ़ी हो, मगर उसे काफी नुकसान भी हुआ. लेबनान में सांप्रदायिक हिंसा बढ़ने लगी. सुन्नी चरमपंथियों ने हेजबुल्लाह पर कई हमले किए. 2016 की शुरुआत में सऊदी के साथ कई दूसरे खाड़ी-अरब देशों ने हेजबुल्लाह को आतंकवादी संगठन ठहराने की मांग भी की थी. हेजबुल्लाह जब सीरिया गृह युद्ध में शामिल हुआ, तब लेबनान में काफी हंगामा हुआ. इसकी वजह थी लेबनान की पॉलिसी. कुछ साल हुए, जब लेबनान ने तय किया था कि बाहरी युद्धों से दूर रहेंगे.

मिडिल ईस्ट में एकसाथ बहुत कुछ चल रहा है. ISIS के खिलाफ लड़ाई पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. इसी बीच, इराक और कुर्दिस्तान में टकराव शुरू हो गया. यम पहले से ही जल रहा है. ये पूरा ही क्षेत्र अस्थिर बना हुआ है.
मिडिल ईस्ट में एकसाथ बहुत कुछ चल रहा है. ISIS के खिलाफ लड़ाई पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. इसी बीच, इराक और कुर्दिस्तान में टकराव शुरू हो गया. यम पहले से ही जल रहा है. ये पूरा ही क्षेत्र अस्थिर बना हुआ है.

आगे क्या होगा?
सऊदी और ईरान की आपसी उठा-पटक का अगला शिकार लेबनान बन सकता है. ऐसा होने की आशंका ही ज्यादा है. दोनों देशों का मिजाज देखकर लगता है कि उनके आपसी संघर्ष का अगला अंक लेबनान में ही खेला जाएगा. इजरायल की क्या भूमिका रहेगी, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा. इजरायल के सामने लेबनान संकट को दूर से देखने का विकल्प भी है. अगर वो इस पचड़े में नहीं फंसता, तब भी फायदे में ही रहेगा. हेजबुल्लाह अगर सऊदी के मोर्चे पर व्यस्त रहा, तो इजरायल के लिए सुकून की ही बात है. हेजबुल्लाह के साथ-साथ ईरान भी इस सबमें उलझा रहेगा. इस तरह से देखें, तो इजरायल लेबनान के घटनाक्रम से दूर रहकर भी मुनाफे में ही रहेगा. जहां तक बात रही मिडिल ईस्ट में शांति और स्थिरता की, तो इसपर बात न करना ही बेहतर है. जिन देशों पर इसकी जिम्मेदारी है, वो खुद ही हालात को और ज्यादा बिगाड़ने में दिलचस्पी ले रहे हैं. मिडिल ईस्ट की सबसे बड़ी दिक्कत ये भी है कि यहां कोई बात एक या दो देशों तक सीमित नहीं रहती. आग में सबको झुलसना पड़ता है. कम या ज्यादा, वो अलग बात है. एक जगह पर हिंसा शुरू हो, तो बाकी भी उसकी चपेट में आ ही जाते हैं. वैसे भी, मिडिल ईस्ट में न तो दिक्कतें कम हैं और न ही दिक्कतें पैदा करने वाले कम हैं. बद से बदतर होना यहां का इतिहास है.


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खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

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'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

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कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.