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कंट्री तो ये अच्छा है, इंटॉलरेंट बहुत है

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अब तो अपने राष्ट्रपति भी बोल दिए. रिपब्लिक डे पर कह दिए न कि “हिंसा और असहिष्णुता फैलाने वालों से सावधान रहो”. इसके बाद तो ये टॉलरेंस इंटॉलरेंस का अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो बंद हो जाना चाहिए. लेकिन होगा उल्टा. अब कायदे से बहस शुरू होगी. होनी भी चाहिए. डेमोक्रेसी का मतलब यही है कि बहस हो. बहस खत्म होने के बाद बहस पेलने वाले को कुन्ने में ले जाकर खर्चा पानी मिले. ये ऐसा मुद्दा है जिस पर अब तक देश के इतने नेता और सेलिब्रिटी बोल चुके हैं जितनी देश की कुल जनसंख्या है.

और ऐसा भी नहीं है कि बोलने वाले खाली हाथ रहे. सबको ‘ऊपर से’ कुछ न कुछ मिला है. ऐसा कहने वाले कहते हैं. चौराहे के झूलेलाल पनवाड़ी एक्स्ट्रा भोला बत्तिस डालते हुए चुगलियाते हैं. कि इन हालात में भी टॉलरेंस की तस्बीह डोलाने वालों को अवार्ड मिले हैं. इन्टॉलरेंस वालों को भी काफी माल मिला है. कइयों को पड़ोसी देश जाने की सलाह मिल गई है. तभी तो कंडोम के बाद ये इंटॉलरेंस ही ऐसी चीज है जिस पर हर कोई बिंदास बोल रहा है.

घरों में खलिहर बेरोजगार बैठे लौंडों को आराम है. रिश्तेदार फोन करके उनके मार्क्स और जॉब स्टेटस पर कोच्चन दाग कर शर्मिंदा नहीं करते. वो आपके शहर में टॉलरेंस लेवल पूछते हैं. खोपड़ी से चुचुआता पसीना घुटने पर पोछने वाला ये नहीं कहता कि “उफ कितनी गर्मी है.” उफ कितना इंटॉलरेंस है यार, वो यह कहता है.

अब समस्या ये है कि हम क्या मानें? असहिष्णुता है या नहीं है? घनघोर कन्फ्यूजन है. करन जौहर खुल कर बोलते हैं कि यहां बोलने की आजादी नहीं है. अपन सन्नाटे में आ जाते हैं. अनुपम खेर पद्मभूषण बनने के बाद ट्वीट करते हैं. कि बाजार में बरनौल की बिक्री बहुत बढ़ गई है. इससे लगता है कि हां करन जौहर की बात में दम है. एक भले आदमी को अवार्ड मिलने पर लोग खुश होने के बजाय जल रहे हैं. इससे ज्यादा इंटॉलरेंस और क्या होगी. लेकिन खुद अनुपम इस बात को नहीं मानते. उनके हिसाब से देश इतना ज्यादा टॉलरेंट कभी नहीं था जितना अब है.

इस बीच कुछ कुछ कनफ्यूजन क्लियर भी हो रहा है. लल्लन का ऑब्जर्वेशन जो है इस पर, वो ये है:

बहुतै ज्यादा टॉलरेंस है देश में

क्योंकि यहां आदमी झेलने में बड़ा उस्ताद है. बॉलीवुड के अजीत डोवाल अक्षय कुमार में बड़ी मार्के की बात कही. कि बड़ी सहनशीलता है यहां. सब झेल लेते हैं.  जाम में फंसे हुए आदमी को देखो. जिसे यकीन हो कि जाम एक घंटे नहीं खुलेगा. वह एक सिद्ध पुरुष की तरह अपना गुस्सा पीता जाता है. ऑफिस से फोन आता है. वो उठा कर ये नहीं बता पाता कि सर जाम लगा है. क्योंकि ये तो रोज का काम है. वो थोड़ी थोड़ी देर में हॉर्न बजाता है. आगे की गाड़ियां उस हॉर्न के दबाव से सरकाने के लिए नहीं. खुद को जगाए रखने के लिए. बहुत टॉलरेंट है आदमी दद्दू. सदियों से रॉशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, अलाने फलाने परमिट बनवाते आ रहा है. ‘खिलाने पिलाने’ में कोई संकोच नहीं करता. कायदे से काम होने की प्रथा मर गई. अब यही कायदा है. लेकिन कभी किसी अधिकारी के आगे कोई सीना तान कर खड़ा नहीं हुआ. कि हम बिना कुछ खिलाए कागजात तैयार करा लेंगे. भाईसाब टॉलरेंस की मिसालें देंगे तो सिंदबाद जहाजी के किस्से हो जाएंगे. कभी न खत्म होने वाले.

इंटॉलरेंस इतनी है कि उसे नापने का मीटर फुंक जाए

वो आदमी याद है जो जाम में फंस गया था. और उसकी बेबसी देख कर आपने मान लिया था कि वो बहुत टॉलरेंट है. वो अभी बाजार से निकला. वहां लोगों ने एक नसीब का मारा चोर पकड़ लिया था. कहते थे गल्ले से पैसे उठा कर भागा था किसी का. फिर क्या, फुटबॉल बना रखे थे. इधर से लात पड़ती उधर चला जाता उधर से लात पड़ती इधर आ जाता. विहंगम सीन था. उन अंकल ने भी दो लातें कस कर जमाईं. तब जाकर थोड़ा तसल्ली मिली. अभी कुछ दिन पहले अखबार में पढ़ा होगा कि दिल्ली में एक 24 साल के लड़के को खंभे से बांध कर तब तक पीटा जब तक वो मर नहीं गया. उसकी बेबस बीवी हाथ जोड़ कर जान की भीख मांगती रही. भीड़ का दिल नहीं पसीजा. दिल्ली की ही सब्जी मंडी में सेब चुराकर भागते एक लड़के को भीड़ ने पीट डाला. इतना पीटा कि जान निकल गई बेचारे की. किसको पड़ी है जो पूछे, भूख लगी थी या नहीं.

हर आदमी भरा बैठा है. अंदर ही अंदर बम का गोला बना. बीवी से झगड़ा हुआ. कैंटीन में पराठे नहीं मिले. ऑफिस के लिए 5 मिनट लेट होने पर बॉस ने आधा घंटा क्लास ली. शाम को 2 घंटे देर से घर पहुंचा. वो बच्चों को पीटता है. नौकरों पर गुस्सा निकालता है. फेसबुक ट्विटर लॉगिन करके सारी दुनिया को गालियां देता है. मतलब आदमी अपने से नीचे की पोजीशन पर बैठे हर आदमी के लिए इंटॉलरेंट है. ऊपर से नीचे तक.

इंटॉलरेंस के भी इत्ते रूप और किस्से हैं कि….चलो छोड़ो जाने दो. जरा सी रह गई है रात अफसाने बहुत से हैं. फिर भी आप कहते हो तो मान लेता हूं.

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