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कारगिल वॉर: ऐसे फेल हुआ था पाकिस्तान का कश्मीर को आज़ाद कराने का प्लान

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जून 1984 में हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार से कुछ दिन पहले बीबीसी के पत्रकार सतीश जैकब ने सिख चरमपंथी नेता जरनैल सिंह भिंडरावाले के साथ तीन घंटे लंबा इंटरव्यू किया. इस इंटरव्यू में जब सतीश ने भिंडरावाले से पूछा कि वो भारत की फ़ौज से कैसे लोहा लेंगे? भिंडरावाले का जवाब था,

हमने सारी स्कीम बना ली है. यहां से दस किलोमीटर दूर पकिस्तान से सटा खालड़ा बॉर्डर है. हम खेतों के रास्ते महज 45 मिनट में पकिस्तान पहुंच जाएंगे. उनके साथ हमारी समझदारी ठीक है. वहां पहुंचकर हम गुरिल्ला वार शुरू कर देंगे.”

जिस भिंडरावाले को किसी दौर में संजय गांधी की शह पर कांग्रेस ने अकाली दल के काउंटर नैरेटिव की तरह खड़ा किया गया था, उसने वक़्त के साथ अपनी वफादारी बदल ली. खालिस्तान के आंदोलन को पाक की सरपरस्ती हासिल थी, ये बात भारत की ख़ुफ़िया एजेंसियों से छिपी नहीं थी. इस चीज का बदला लेने के लिए भारत ने पकिस्तान को दुनिया के सबसे ठंडे मोर्चे पर घेर लिया. 13 अप्रैल 1984 को लेफ्टिनेट जनरल प्रेम नाथ हूण के नेतृत्व में कुमाऊं रेजिमेंट की एक पूरी बटालियन सियाचिन पर चढ़ बैठी. इस ऑपरेशन को नाम दिया गया, ‘मेघदूत’.

भिंडरावाले. ये पाकिस्तान जाना चाहते थे, जा नहीं पाए.
भिंडरावाले

टाइम मैगजीन में छपी खबर के अनुसार भारतीय सेना ने पकिस्तान की करीब 2600 वर्ग किलोमीटर जमीन कब्ज़ा ली थी. बेहद ठंडा होने की वजह से आमतौर पर पाकिस्तानी फ़ौज के जवान सर्दियों में चौकियों को बर्फ के हवाले करके बेस कैम्प में लौट जाते थे. भारत ने इस मौके का फायदा उठाया और सर्दियों के आखिरी दिनों में इन चौकियों पर कब्जा कर लिया.

ले. जनरल प्रेमनाथ आहूजा का नाम सबको याद है. इतिहास के साथ यही दिक्कत है कि वो अपने पन्नों पर सिर्फ विजेताओं के नाम दर्ज करता है. पाकिस्तान में उस वक्त जिया-उल-हक़ का दौर हुआ करता था. मोर्चे के उस तरफ एक 41 साल का ब्रिगेडियर जनरल हुआ करता था. हालांकि, दोनों देश सियासी समझौते पर पहुंच गए थे, लेकिन इस फौजी अफसर को ये हार सहन नहीं हो रही थी. करीब 15 साल बाद इस ब्रिगेडियर जनरल ने खुद को जनरल के पद पर पाया. नाम था परवेज़ मुशर्रफ. जनरल मुशर्रफ सियाचिन की हार भूल नहीं पाए थे. ये उन्हें स्कोर बराबर करने का मौका लगा.

सियाचिन में भारत के अतिक्रमण के तुरंत बाद पकिस्तान ने भारत को उसी की भाषा में जवाब देने की योजना बनाई. उस समय के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस मिर्जा असलम बेग ने जनरल जिया के सामने भारत की कुछ चौकियों को कब्जाने की योजना रखी. इसे नाम दिया गया ‘कारगिल प्लान’. जिया भारत के मामले में इतना बड़ा रिस्क लेने के मूड में नहीं थे. वो पहले से अफगानिस्तान के मोर्चे पर घिरे हुए थे. उन्होंने इस प्लान को ठंडे बस्ते में डाल दिया.

मुशर्रफ
मुशर्रफ

आर्मी चीफ जनरल मुशर्रफ, चीफ ऑफ़ जनरल स्टाफ जनरल अजीज, 10वीं डिविजन के कोर कमांडर जनरल महमूद, नॉर्दन इन्फेंट्री फोर्स के इंचार्ज ब्रिगेडियर जावेद हसन. इन चारों की जोड़ी को उस पाकिस्तान आर्मी के भीतर ‘गैंग ऑफ़ फोर’ के नाम से जाना जाता था. इस चौकड़ी ने कारगिल प्लान को झाड़-पोंछकर बाहर निकाला और इस पर अमल करना शुरू किया.

क्या था ये प्लान

कारगिल सीमा से महज 10 किलोमीटर दूर रणनीति की दृष्टि से महत्वपूर्ण इलाका है. इन पहाड़ियों पर कब्ज़ा करने का मतलब था नेशनल हाईवे नंबर-1 को अपने नियंत्रण में लेना. ऐसा करके भारत का कश्मीर और सियाचीन के साथ संपर्क काटा जा सकता है.

ठंड के समय भारतीय सैनिक 17000 फीट की ऊंचाई पर बनी चौकियों को छोड़कर नीचे लौट आते हैं. पाकिस्तान भारत के साथ सियाचिन दोहराना चाहता था. प्लान ये था कि पाकिस्तान सेना के रेगुलर ट्रूप्स को इन चौकियों पर भेजा जाए. पहाड़ी क्षेत्रों में होने वाली लड़ाई में एक बात तय होती है. अगर आप उंचाई पर हैं, तो नीचे से आ रहे दस सैनिकों को एक साथ संभाल सकते हैं. लिहाजा, जब भारत के सैनिक वापस लौटेंगे, तब पाकिस्तानी सैनिक लड़ने के लिए बेहतर पोजीशन पर होंगे.

1984 में जिया ने जब इस प्लान को ख़ारिज किया था, उस समय एक वजह ये भी थी कि इससे भारत-पकिस्तान के बीच जंग शुरू होने का खतरा था. 1998 में पकिस्तान ने 6 परमाणु विस्फोट किए. अब उनके पास इस बात पर भरोसा करने की जायज वजहें थी कि भारत कभी फुल फ्लेज वार में नहीं उतरेगा.

जिया उल हक
जिया उल हक

चिराग से यह जिन्न निकला कैसे

1998 के नवंबर में पकिस्तान की खुफिया एजेंसियों ने रिपोर्ट दी कि कारगिल सेक्टर में भारतीय फ़ौज की असामान्य हलचल देखी जा रही है. सेना के एक ब्रिगेडियर को जिम्मा सौंपा गया कि वो जाकर हालात का जायजा लें. जब ये ब्रिगेडियर साहब कारगिल सेक्टर में रेकी करने पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि भारत की चौकियों पर बर्फ जमी हुई है. वो थोड़ा और आगे गए. मोर्चे पर उनकी एक भी सैनिक से मुठभेड़ नहीं हुई.

वापस आकर उन्होंने आर्मी कमांड को ये रिपोर्ट दी. धूल में दबा कारगिल प्लान बाहर निकाला गया और उसे झाड़-पोंछकर दुरुस्त किया गया. 1984 के मुकाबले इस बार प्लान थोड़ा बदला गया. सैनिकों को इस बार मुजाहिद के भेष में भेजा जाना था, ताकि उनकी आमद से कश्मीर के भीतर भी एक अराजकता पैदा की जा सके. ऐसे में भारत कश्मीर में उलझकर रह जाएगा और दूसरे किसी मोर्चे पर जंग को टाला जा सकेगा.

इधर परमाणु परीक्षण के बाद पैदा हुए तनाव को कम करने की कोशिशें जारी थीं. नवाज़ शरीफ सेना को बिना विश्वास में लिए भारत के साथ रिश्ते सुधारने में लगे हुए थे. सेना को ये बात अखर रही थी. भारत के मामले में पाकिस्तान की विदेश नीति तय करने में वहां की सेना की अहम भूमिका रहती आई थी. जवाब में सेना ने भी इस पूरे ऑपरेशन को अंतिम समय तक नवाज़ शरीफ से छिपाकर रखती रही. फरवरी 1999 जब में अटल बिहारी वाजपेयी अमन की बस लेकर लाहौर पहुंचे, तब तक पाकिस्तानी सेना इस ऑपरेशन के हिज्जे दुरुस्त कर रही थी.

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शुरुआत यहां से हुई

जनवरी 1999 में पकिस्तान के स्कर्दू और गिलगिट में तैनान फ्रंटियर डिविजन के जवानों की छुट्टियां रद्द कर दी गईं. पकिस्तान के ये हिस्से भी उंची पहाड़ियों वाले थे. सर्दियों में ये लोग भी अपनी चौकियां छोड़कर छुट्टियां मनाने घर लौट जाते थे. बड़े खुफिया तरीकों से इन्हें कारगिल के मोर्चे पर बुलाया गया. इन जवानों को उंचाई पर लड़ाई लड़ने का अनुभव हासिल था.

करीब 200 जवानों को सिविल ड्रेस में भारतीय सीमा में भेजा गया. शुरुआत में योजना करीब दस महत्वपूर्ण चौकियों कब्ज़ा करने की थी. जब ये लोग कारगिल पहुंचे, तो पाया कि वहां भारतीय सेना का कोई नुमाइंदा नहीं था. सीमा के उस पार से और ज्यादा लोग बुलाए जाने लगे. अप्रैल आते-आते इन लोगों ने भारत की 140 से ज्यादा चौकियों पर कब्ज़ा कर लिया. इस तरह से सर्दियों के अंत तक 200 से 300 वर्ग किलोमीटर का भारतीय इलाका पाकिस्तानी सेना के कब्जे में चला गया.

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कैसे हुआ भांडाफोड़

भारत को मई तक इस पूरे ऑपरेशन की हवा तक नहीं लगी. इस ऑपरेशन का भांडाफोड़ किया चरवाहों के एक दल ने. जैसे-जैसे सर्दी खत्म होती है, कश्मीर के चरवाहे तराई छोड़कर पहाड़ियों की तरह लौटने लगते हैं. वो लोग सदियों से ऐसा करते आ रहे हैं. जब ये लोग पहाड़ियों के ऊपर पहुंचे, तो देखा कि सादी वर्दी में कुछ हथियारबंद लोग भारतीय सेना की चौकियों पर कब्ज़ा करके बैठे हुए हैं. लगातार ऊपर रहने की वजह से इन चरवाहों का चौकियों पर तैनात भारतीय सैनिकों के साथ दोस्ताना हो गया था. उन्होंने आकर सारा मामला भारतीय सेना को बता दिया.

इस समय तक भारतीय खुफिया एजेंसियों के पास इस बात की ख़ास जानकारी नहीं कि ये लोग पकिस्तान सेना के रेग्युलर ट्रूप्स हैं या फिर कश्मीरी अलगाववादी संगठन के गुरिल्ले. जब इनके रेडियो संदेशों को इंटरसेप्ट करना शुरू किया गया, तो पाया गया कि घुसपैठिए आपस में पश्तो भाषा में बात कर रहे हैं. इससे ये साफ़ हो गया कि ये लोग कश्मीरी नहीं हैं.

कश्मीरी चरवाहे (सांकेतिक तस्वीर)
कश्मीरी चरवाहे (सांकेतिक तस्वीर)

नवाज़ शरीफ को आखरी वक्त तक पता नहीं था

गैंग ऑफ़ फोर ने इस ऑपरेशन को पूरी तरह खुफिया बनाए रखा. मई में जब जंग के हालात बनाने लगे, तो पहले पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों, आईएसआई, वायु सेना और नौसेना के चीफ को इस ऑपरेशन के बारे में पहले पहल बताया गया.

इधर नवाज शरीफ को भी इस पूरे मामले में अंधेरे में रखा गया. या यूं कहें कि उन्हें जीना दर जीना नीचे उतारा गया. उनकी सबसे पहली ब्रीफिंग जनवरी 1999 में गिलगिट के इलाके में पड़ने वाले स्कर्दू में सेना के एक कार्यक्रम में हुई. यहां उन्हें बताया गया कि कश्मीर में मुजाहिद्दीन काफी अच्छा कर रहे हैं. उनके मूवमेंट में तेजी आई है. इसके बाद उनकी दूसरी ब्रीफिंग हुई खेल में. खेल पाकिस्तान के फाटा (Federally Administered Tribal Areas) इलाके में है. यहां भी पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों ने उनके सामने स्कर्दू वाला गाना गाया गया. इस समय तक उनके सामने कारगिल का कोई जिक्र तक नहीं किया गया.

उनकी असली ब्रीफिंग हुई 16-17 मई को. जगह थी रावलपिंडी के पास आईएसआई का ओझड़ी कैंप. यहां नवाज शरीफ को उनके कैबिनेट के प्रमुख मंत्रियों के साथ बुलाया गया. सेना की तरफ से गैंग ऑफ फोर के अलावा डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस तौकीर जिया, डायरेक्टर जनरल मिलिट्री इंटेलिजेंस जनरल अहसान सहित आर्मी के बड़े अधिकारी मौजूद थे.

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यहां नवाज़ शरीफ को जो ब्रीफिंग दी गई, वो बड़ी दिलचस्प थी. ब्रीफिंग के दौरान जो नक्शा पेश किया गया, उसमें एलओसी मिटा दिया गया था. उन्हें बताया गया कि किन-किन चौकियों पर मुजाहिद्दीन पोजीशन लेकर बैठे हुए हैं. साथ ही, भारत की पोजीशन के बारे में भी बताया गया. लेकिन अभी तक नवाज को ये नहीं बताया गया था कि ये मुजाहिद्दीनों के भेष में पाकिस्तानी सैनिक हैं.

चीफ ऑफ़ जनरल स्टाफ जनरल अजीज ने नवाज़ शरीफ को बताया, ‘पाकिस्तानी सेना ने भारत के कारगिल में रिजर्व में पड़े गोला-बारूद के डंप को अपने कब्जे में ले लिया है. जल्द ही हम सियाचिन की सप्लाई-लाइन काट देंगे. इस कार्रवाई के दो संभावित परिणाम होंगे. पहला, भारत की सेना एलओसी पर किसी और मोर्चे पर जंग छेड़ देगी. ऐसे में उन्हें कश्मीर से फ़ोर्स हटानी पड़ेगी. इसका फायदा उठाकर हम कश्मीर पर कब्ज़ा कर लेंगे. दूसरा, वो बातचीत से मामला सुलझाने का प्रयास करेंगे. ऐसे में हम कारगिल छोड़ने के एवज में अपना सियाचिन फिर से हासिल कर लेंगे.’

नवाज़ शरीफ जब इस मीटिंग से निकले, तो उनके दिमाग में दो सपने तैर रहे थे. पहला कश्मीर का मुक्तिदाता बनने का और दूसरा सियाचिन को दोबारा हासिल करने वाला प्रधानमंत्री बनने का. दोनों सूरतों में उनका नाम इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा जाना तय था. पर उन्हें अब भी दो चीजें नहीं पता थीं. पहली, जिस पोजीशन पर उनके लोग बैठे हैं, वो जगह सीमा के उस पार है. दूसरा, जिन्हें पाकिस्तानी सेना मुजाहिद्दीन बता रही है, वो दरअसल उन्हीं की सेना के जवान हैं.

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प्लान की ये कमी हार की वजह बनी

जनरल मुशर्रफ कारगिल जंग शुरू होने से ठीक पहले चीन दौरे पर गए हुए थे. वहां से वो लगातार चीफ ऑफ़ जनरल स्टाफ जनरल अजीज से कारगिल के ऑपरेशन के बारे में अपडेट ले रहे थे. जनरल मुशर्रफ का ये फोन कॉल रिकॉर्ड हो गया. विभिन्न खुफिया चैनलों में घुमने के बाद ये रिकॉर्डिंग भारतीय खुफिया एजेंसियों के हाथ लग गई. यहां से परवेज मुशर्रफ का खेल खत्म हो गया.

कारगिल युद्ध में भारत सिर्फ मैदान पर ही नहीं, बल्कि विदेश नीति के मोर्चे पर भी मजबूती से लड़ा. भारत ने अमेरिका, रूस और यूरोपियन यूनियन सहित तमाम देशों को अपने पक्ष में लामबंद कर लिया. ऐसे में पाकिस्तान के पास कारगिल में लड़ रहे अपने सैनिकों को अपना न मानने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया. नतीजा ये हुआ कि पकिस्तान चाहकर भी मोर्चे पर रसद और गोला-बारूद नहीं भेज सका. भारतीय वायुसेना ने आसमान से और बोफोर्स तोपों ने जमीन से घुसपैठियों पर जिस अंदाज में गोले दागे, उनका किसी को अंदाजा तक नहीं था.

मुजाहिद्दीन की शक्ल में आए पाक सेना के जवान बंद गली में घेर लिए गए थे. इसके बाद जो हुआ, उसकी याद में हम हर साल विजय दिवस मनाते हैं.

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वीडियो देखें : जब कारगिल के पहाड़ों पर पाकिस्तानी सेना की पेबुक और कोड शीट मिली |दी लल्लनटॉप शो| Episode 254

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