Submit your post

Follow Us

पृथ्वी को एस्टेरॉइड से बचाने के लिए NASA का प्लान क्या है?

पृथ्वी पर पहले इंसान करीब तीन लाख साल पहले इवॉल्व हुए. इससे 24 करोड़ साल पहले पृथ्वी पर डायनासोर्स का उदय हुआ. चलने और उड़ने वाले जानवरों की इस फैमिली ने यहां लगभग 17.5 करोड़ साल गुज़ारे. फिर करीब 6.5 करोड़ साल पहले कुछ ऐसा हुआ कि आज सिर्फ उनके अवशेष ही मिलते हैं.

एक थ्योरी कहती है कि धरती से एक एस्टेरॉइड टकराया और सारे डायनासौर लुप्त हो गए. वैज्ञानिकों के बीच फिलहाल ये बहस का मुद्दा है. लेकिन आम लोग इस थ्योरी के चलते एस्टेरॉइड से खौफ खाते हैं. एक डर है – अंतरिक्ष की कोई चट्टान जब इतने विशाल और करोड़ों साल राज करने जीव को मिटा सकती है, तो इतना छोटा और कुछ लाख साल पुराना इंसान इससे कैसे बच जाएगा.

ये डर मनुष्य के सर्वाइवल इंस्टिंक्ट से जुड़ा है. कई लोग इसी डर का फायदा उठाते हैं. और आपको ऐसी हेडलाइन्स दिखती हैं – 29 अप्रैल को धरती के करीब आएगा एस्टेरॉइड, जीवन पर मंडरा रहा है खतरा!

सबसे पहले तो बता दें कि कोई खतरा-वतरा नहीं है. फालतू का हौआ है.

हम एस्टेरॉइड के बारे में बात करेंगे. ये जानेंगे कि इस एस्टेरॉइड के बारे में बात करना क्यों ज़रूरी है. और पृथ्वी को एस्टेरॉइड से बचाने के लिए हमारी क्या स्ट्रैटेजी है?

सबसे पहले इस एस्टेरॉइड का रेज़्यूमे देख लेते हैं.

हंगामा है क्यों बरपा – 1998 OR2

एस्टेरॉइड का नाम है – 1998 OR2. हवाई में स्थित हलियाकला ऑब्ज़र्वेटरी में पहली बार इस एस्टेरॉइड की पहचान हुई. तारीख थी 24 जुलाई, 1998. इसलिए इसके नाम में 1998 आता है.

29 अप्रैल, 2020 को भारतीय समयानुसार दोपहर करीब 3 बजे ये एस्टेरॉइड पृथ्वी के सबसे नज़दीक से गुज़रा. कितने नज़दीक? लगभग 62 लाख किलोमीटर. यानी पृथ्वी से चांद जितना दूर है, ये एस्टेरॉइड उससे 16 गुना दूर से गुज़रा.

इसका डायमीटर यानी व्यास (चौड़ाई) करीब 2 किलोमीटर है. इस हिसाब से ये एस्टेरॉइड चांद से लगभग 1700 गुना छोटा है.

मतलब चांद से 1700 गुना छोटी चीज़ उससे 16 गुना ज्यादा दूर से निकल गई.

लेकिन इसे खतरा क्यों बताया गया? इसके पीछे है एक टर्म का मिसइंटरप्रिटेशन. PHO यानी Potentially Hazardous Object. हज़ार्डस मतलब खतरनाक चीज़. और पोटेंशियली हज़ार्डस ऑब्जेक्ट मतलब खतरे की संभावना वाली चीज़.

किसी भी एस्टेरॉइड को ‘Potentially Hazardous Object’ मानने से पहले दो चीज़ें देखी जाती हैं.

1. पृथ्वी से उसकी दूरी 80 लाख किलोमीटर से कम होनी चाहिए.
2. उसका आकार यानी उसका डायमीटर 140 मीटर से ज़्यादा होना चाहिए.

नासा ने स्पष्ट किया है कि ये एस्टेरॉइड PHO तो है, लेकिन इससे हमें कोई खतरा नहीं है. और न ही पैनिक करने की ज़रूरत है. फिर साइंस के सर्किल में इस एस्टेरॉइड को लेकर इतनी उत्सुकता क्यों हैं? इसके दो कारण हैं.

# पहला है इसका आकार. ऐसा बहुत कम होता है कि दो किलोमीटर चौड़ा कोई एस्टेरॉइड पृथ्वी के इतने करीब से गुज़रे.

# दूसरी, इसका दोबारा लौटकर आना. साल 2079 में यही एस्टेरॉइड पृथ्वी के और करीब से गुज़रेगा. लेकिन ये दोबारा क्यों आएगा? हम ये जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में सारे गृह सूर्य के चक्कर काटते हैं. ठीक ऐसा ही केस इस एस्टेरॉइड के साथ भी है. ये सूरज का एक चक्कर पूरा करने में करीब चार साल का वक्त लेता है. लेकिन हर चार साल में ये पृथ्वी के इतने पास से नहीं गुज़रता. क्योंकि जब ये पृथ्वी की कक्षा के नज़दीक होता है तब पृथ्वी कहीं और जा चुकी होती है. वैज्ञानिक इसकी और पृथ्वी की ट्रैजेक्ट्री का हिसाब लगाए बैठे हैं. और इस हिसाब में 2079 में ये दोबारा पृथ्वी के करीब आएगा. अब से 3.5 गुना ज़्यादा करीब.

वैज्ञानिक इसे क्लोज़ली ऑब्ज़र्व करना चाहते हैं, ताकि भविष्य में इसकी या इसके जैसे दूसरे एस्टेरॉइड्स की स्टडी करने में आसानी हो.

पोर्टो रीको में मौजूद अरेसिबो ऑब्ज़र्वेटरी लगातार इसे देख रही है. अरेसिबो की टीम ने मास्क पहने अपने टीममेट्स की तस्वीरें ट्वीट कीं. साथ में एस्टेरॉइड की तस्वीर भी थी. लिखा,

इस हफ्ते हम पृथ्वी के करीब से गुज़र रहे एस्टेरॉइड 1998 OR2 को ऑब्ज़र्व कर रहे हैं. ऐसा लगता है कि इस एस्टेरॉइड ने भी मास्क पहना हुआ है.

सोशल मीडिया पर लोगों ने इस मज़ाक को आगे बढ़ाते हुए लिखा – ये एस्टेरॉइड तो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन भी कर रहा है. कोविड को देखते हुए ये 60 लाख किलोमीटर दूर से ही गुज़र जाएगा.

मज़ाक छोड़ते हैं. सीरियस बात करते हैं.

आप कहेंगे कि ये एस्टेरॉइड तो बिना नुकसान पहुंचाए गुज़र जाएगा, लेकिन हर एस्टेरॉइड तो ऐसा नहीं होगा? अगर कोई एस्टेरॉइड ज़्यादा करीब आ गया, तब हम क्या करेंगे? इसका एक जवाब अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के पास है.

आतापी-वातापी दो दैत्य भाई

सबसे पहले इससे जुड़े नासा के दो अहम हिस्सों के बारे में जान लेते हैं.

1. CNEOS – Center for Near Earth Object Studies

नाम से क्या समझ में आ रहा है? Near Earth Objects को स्टडी करने वाला सेंटर. 1999 में नासा ने पृथ्वी के आसपास जितनी चीज़ें हैं उन्हें लोकेट करने का प्रोग्राम शुरू किया. जनवरी, 2018 तक ऐसे 18,000 ऑब्जेक्ट लिस्ट किए गए. 2018 में नासा ने एक एनिमेशन विडियो जारी किया, जिसमें 1999 से 2018 तक खोजे गए एस्टेरॉइड्स का एक नक्शा है. ये सारे ऑब्जेक्ट्स पृथ्वी से पांच करोड़ किलोमीटर के दायरे में मौजूद हैं. ध्यान देने वाली बात ये है कि इस रेंज में और भी कई सारे ऑब्जेक्ट्स हैं. नासा सिर्फ एक छोटे से हिस्से को लोकेट कर पाई है. लेकिन इतना भी काफी है. नासा के मुताबिक, जो एस्टेरॉइड्स एक किलोमीटर से ज़्यादा बड़े हैं, उनमें से उन्होंने 95% को मैप कर लिया है. यही वो ऑब्जेक्ट्स हैं, जिन्हें सिविलाइज़ेशन एंडर यानी सभ्यता का नाश करने वाला बताया जाता है. और अच्छी बात ये है कि निकट भविष्य में हमें इनमें से किसी से भी खतरा नहीं है. लेकिन कई ऐस्टेरॉइड्स हैं जिन्हें अब तक ढूंढ़ा नहीं जा सका है. नासा का प्लान है कि 2020 तक वो ऐसे 90% ऑब्जेक्ट ट्रेस कर लेगा जो 140 मीटर से बड़े हैं.

नासा CNEOS कैलिफॉर्निया की जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी में मौजूद है. यहां कई ऑब्ज़रवेटरीज़ और टेलीस्कोप्स का डेटा इकट्ठा होता है. इस सेंटर में सारे डेटा से एस्टेरॉइड्स और कॉमेट्स की ट्रैजेक्ट्री यानी उनके भविष्य के रास्ते का अंदाज़ा लगाया जाता है. ये नतीजे इतने सटीक होते हैं कि आप इनके बताए समय और दूरी से एस्टेरॉइड 1998 OR2 को गुज़रता देखेंगे. लेकिन CNEOS का काम डेटा और नक्शे भर का है. सुरक्षा की ज़िम्मेदारी किसकी है?

2. PDCO – Planetary Defense Coordination Office

प्लानेटरी डिफेंस मतलब पृथ्वी की रक्षा. इसका ख्याल कहां से आया? 2013 में रूस में गिरे एक मीटियोर से. मीटियोर मतलब उल्का पिंड. यूं समझिए कि अगर एस्टेरॉइड एक पहाड़ के आकार का होता है तो मीटियोर एक पत्थर जितना छोटा होता है. जिसे आप टूटता तारा कहते हैं, वो कोई तारा नहीं होता. वो दरअसल एक छोटा सा मीटियोर होता है जो पृथ्वी के वायुमंडल में घुसने के बाद धधक उठता है. ज़्यादातर हवा में ही भस्म हो जाते हैं, लेकिन कुछ धरती की सतह तक भी पहुंचते हैं. जैसे कि 2013 में रूस में अचानक आ गिरा चेल्याबिन्स्क मीटियोर.

15 फरवरी, 2013 की बात है. रूस के चेल्याबिन्स्क इलाके में दोपहर का वक्त था. किसी को कोई खबर नहीं थी. आसमान में सूरज़ से भी तेज़ रोशनी जगमगाई और एक धमाका हुआ. इस धमाके से निकली ऊर्जा हिरोशिमा के न्यूक्लियर बम से करीब 30 गुना ज़्यादा बताई जाती है. ये दरअसल एक मीटियोर था जो पृथ्वी की सतह से 30 किलोमीटर ऊपर भस्म हो गया. लेकिन इससे निकली शॉकवेव, धूल-गैस का गुबार और बाकी का मलबा धरती की सतह तक पहुंचा. छह शहरों की करीब 7200 इमारतें क्षतिग्रस्त हो गईं. और 1500 लोगों को अस्पताल जाना पड़ा. किस्मत की बात ये थी कि 60,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आ रहा 20 मीटर का ये मीटियोर सतह से काफी ऊपर ब्लास्ट हो गया. और चौंकाने वाली बात ये थी कि किसी एजेंसी ने इसकी खबर तक नहीं दी. हल्ला तभी हुआ जब धमाके के विडियो वायरल हुए.

इस घटना के बाद यूएस कांग्रेस ने अपने वैज्ञानिकों को बुलाया. और पूछा कि भैया अपने यहां ऐसा हो गया तब क्या करेंगे? इस सवाल के जवाब में प्लानेटरी डिफेंस का नाम आया. और जनवरी, 2016 में नासा का एक नया ऑफिस बना – Planetary Defense Coordination Office. नासा की वेबसाइट के मुताबिक, इस ऑफिस के चार मुख्य काम हैं.

1. PHOs यानी पोटेंशियली हज़ार्डस ऑब्जेक्ट्स को जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी पहचानना.

2. इन PHOs की डीटेल्स पता करने के बाद इन्हें ट्रैक करना. और इनके संभावित खतरों को लेकर चेतावनी जारी करना.

3. ऐसी स्ट्रैटेजीज़ और टेक्नॉलजीज़ को स्टडी करना जो इन खतरों को पहले ही खत्म कर दें.

4. जब खतरे का जवाब देने की नौबत आए तो अमेरिकी सरकार के कई ऑफिसों के बीच तालमेल बैठाना. इसलिए इसका नाम कोऑर्डिनेशन ऑफिस है. एस्टेरॉइड को मिटाने के लिए कई ऑफिस एक्टिव होंगे. डिफेंस ऑफिस. एनर्जी डिपार्टमेंट. होमलैंड सिक्योरिटी. इन सबको गाइड करने वाला ऑफिस होगा प्लानेटरी डिफेंस कोऑर्डिनेशन ऑफिस. यही नहीं, अगर भविष्य में ऐसा कोई खतरा आता है तो दूसरे देशों की स्पेस एजेंसीज़ भी एक्टिव होंगी. इंडिया की ISRO. रूस की Roscosmos. यूरोप की ESA. जापान की JAXA. हो सकता है स्पेस-एक्स जैसी प्राइवेट एजेंसियां भी एक्टिव हों. इन सबके बीच अमेरिका की ओर से PDCO ही कोऑर्डिनेशन का काम देखेगा.

इसमें से अहम सवाल तीसरे बिंदू को लेकर हैं. आखिर वो ऐसी कौनसी स्ट्रैटेजी और टेक्नॉलजी होगी, जो पृथ्वी को एस्टेरॉइड से बचाने के काम आएगी.

ऑफिसर, वी गॉट अ सिचुएशन!

एस्टेरॉइड के आकार और स्पीड के हिसाब से कई अलग-अलग स्ट्रैटेजीज़ अपनाई जा सकती हैं. हम तीन पॉपुलर तरीकों पर नज़र मार लेते हैं.

1. लेज़र – एक तरीका तो यही है कि जो एस्टेरॉइड हमारी तरफ आ रहा है, उसे बहुत पहले ही तबाह कर दिया जाए. इसके लिए बहुत पावरफुल लेज़र्स का सहारा लिया जा सकता है. स्पेस डेली की एक खबर के मुताबिक, रूस के वैज्ञानिकों ने ऐसे लेज़र्स पर शोध की है और उस शोध के नतीजे Journal of Experimental and Theoretical Physics में छपे हैं. बाकी जगहों पर भी इस तरह की शोध की गई है.

इसके अलावा एस्टेरॉइड को रास्ते से भटकाने के लिए दो तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है.

2. ग्रैविटी – हमें बहुत पहले पता चल जाएगा कि कोई खतरनाक एस्टेरॉइड धरती की तरफ बढ़ा आ रहा है. हम एक भारी सा स्पेसक्राफ्ट लेंगे और उसे एस्टेरॉइड के पास भेज देंगे. वो स्पेसक्राफ्ट धीरे-धीरे अपने गुरुत्वाकर्षण बल से एस्टेरॉइड को रास्ते से भटका देगा.

3. टक्कर – रास्ते से भटकाने के लिए टक्कर वाली स्ट्रैटेजी ज़्यादा भरोसेमंद रहेगी. ऐसा किया जा सकता है कि एक स्पेसक्राफ्ट ऐसी स्पीड और एंगल पर एस्टेरॉइड से टकराए कि उसका रास्ता पृथ्वी से बहुत दूर भटक जाए. इसपर नासा ने काम करना शुरू भी कर दिया है और 2021 में एक स्पेसक्राफ्ट इसी प्लान को टेस्ट करने के लिए रवाना होगा.

प्लानेट डिफेंस का पहला अस्त्र – DART

Double Asteroid Redirection Test यानी डार्ट नासा और जॉन हॉप्किन्स अप्लाइड फिज़िक्स लैबोरेटरी का मिला-जुला प्रोजेक्ट है. इस टेस्ट में ये होगा कि एक स्पेसक्राफ्ट ले जाकर एस्टेरॉइड से टक्कर करा देंगे. फिर देखेंगे कि एस्टेरॉइड का रास्ता बदला जा सकता है या नहीं? प्लान के मुताबिक, ये स्पेसक्राफ्ट 22 जुलाई 2021 को पृथ्वी से लॉन्च होगा. और अक्टूबर, 2022 में डिडिमॉस नाम के एस्टेरॉइड से जा टकराएगा. डिडिमॉस एक ऐसा एस्टेरॉइड है जिससे पृथ्वी को कोई खतरा नहीं है, इसलिए इसे टेस्ट के लिए चुना गया है.

अभी हमें जितना पता है उसके हिसाब से निकट भविष्य में पृथ्वी को एस्टेरॉइड से बहुत कम खतरा है. लेकिन अगर उसके चांस ज़रा से भी हैं, तो वो बड़े विनाश का कारण बन सकता है. इसलिए पहले से तैयारियां दुरुस्त रखने में ही समझदारी है. अपने लिए भी और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी.


विडियो – जानिए सूरज के सबसे करीब पहुंचे NASA के पार्कर सोलर प्रोब से क्या राज़ पता चले

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

गंदी बात

चरमसुख, चरमोत्कर्ष, ऑर्गैज़म: तेजस्वी सूर्या की बात पर हंगामा है क्यों बरपा?

या इलाही ये माजरा क्या है?

राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे शख्स से बच्चे ने पूछा- मैं सबको कैसे बताऊं कि मैं गे हूं?

जवाब दिल जीत लेगा.

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

उस अंधेरे में बेगम जान का लिहाफ ऐसे हिलता था, जैसे उसमें हाथी बंद हो.

PubG वाले हैं क्या?

जबसे वीडियो गेम्स आए हैं, तबसे ही वे पॉपुलर कल्चर का हिस्सा रहे हैं. ये सोचते हुए डर लगता है कि जो पीढ़ी आज बड़ी हो रही है, उसके नास्टैल्जिया का हिस्सा पबजी होगा.

बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

मां-बाप और टीचर बच्चों को पीट-पीट दाहिने हाथ से काम लेने के लिए मजबूर करते हैं. क्यों?

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

और बिना बैकग्राउंड देखे सेल्फी खींचकर लगाने वाली अन्य औरतें.

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

पढ़िए फिल्म 'पिंक' से दर्जन भर धांसू डायलॉग.

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

ऐसा क्या हुआ, कि सरे राह दौड़ा-दौड़ाकर उसकी हत्या की?

हिमा दास, आदि

खचाखच भरे स्टेडियम में भागने वाली लड़कियां जो जीवित हैं और जो मर गईं.

अलग हाव-भाव के चलते हिजड़ा कहते थे लोग, समलैंगिक लड़के ने फेसबुक पोस्ट लिखकर सुसाइड कर लिया

'मैं लड़का हूं. सब जानते हैं ये. बस मेरा चलना और सोचना, भावनाएं, मेरा बोलना, सब लड़कियों जैसा है.'

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.