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भारत में सबसे लंबे समय तक लगातार चुनाव जीतने वाले केएम मणि नहीं रहे

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केरल के पूर्व वित्त मंत्री और वर्तमान विधायक के एम मणि का 9 अप्रैल को निधन हो गया. उन्होंने कोच्चि के लाकेशोर अस्पताल में मंगलवार शाम 4: 57 बजे अंतिम सांस ली. वह 86 वर्ष के थे. उन्हें chronic obstructive airway disease यानी सांस से संबंधित बीमारी थी.

के एम मणि के बारे में उनके विधानसभा क्षेत्र में एक मजाक चलता था. केरला में एक ज़िला है कोट्टयम. यहां एक जगह है पाला नाम की. यहां के बारे में एक मज़ाक चलता था कि यहां पूरा इलाका घूम लो, कोई पूर्व  विधायक नहीं मिलेगा. क्योंकि यहां आज तक एक ही विधायक हुआ है: करिन्कोज़क्कल मणि मणि. इनके नाम में दो बार मणि आता है. लोगों में ये के एम मणि के नाम से जाने जाते हैं. 1965 से हुए हर चुनाव में पाला विधानसभा सीट से के एम मणि ही जीते हैं. पाला में वोट करने वालों की पीढ़ियां बदल गईं लेकिन उनके विधायक नहीं बदले. लेकिन अब ऐसा नहीं होगा क्योंकि केएम मणि-मणि नहीं रहे.

गणित के हिसाब से मणि 54 साल से विधायक थे, लेकिन 1965 में जब वे पहली बार चुनाव जीते थे, तब किसी एक पार्टी के पास सरकार बनाने लायक विधायक नहीं थे. तो विधानसभा में बैठने के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ा था.

के एम मणि
के एम मणि.

मणि का जन्म 30 जनवरी 1933 को मरंगट्टुपिल्ली में हुआ था. एक साधारण परिवार में. बड़े होकर वकील बने. इनकी पत्नी कांग्रेस नेता पीटी चाको की बहन लगती थीं. इनके बेटे होजे के मणि भी राजनीति में हैं. वो दो बार से कोट्टयम से सांसद हुए हैं.

मणि कैसे जीतते रहे?

मणि के इतने पक्के रिकॉर्ड के पीछे उनके तौर-तरीके रहे. वे ज़मीनी राजनीति करते थे. 86 साल की उम्र में भी अपने इलाके के ज़्यादातर लोगों को नाम से जानते थे. मिलने जाओ तो घरवालों का हाल पूछ कर चौंका देते थे. पाला के लोग अपने विधायक को जिस भी कार्यक्रम में न्योता देते थे, वे उसके लिए ज़रूर वक्त निकालते थे. शायद इसीलिए जब भी, और जिन भी परिस्थितियों में चुनाव हुए, वोट हमेशा मणि को ही पड़ा. एक वजह ये भी थी कि उनका नाम कई लोक-लुभावन योजनाओं से जोड़ा जाता रहा, जैसे ‘कारुण्या बेनेवॉलेंट फंड.’ इसके तहत केरल की सरकार एक लॉटरी स्कीम चलाती है ‘कारुण्या लॉटरी’ नाम से. इससे जमा हुए पैसों से गरीब परिवार के लोगों को गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए 2 लाख तक की मदद दी जाती है. 

विकास की अपनी थ्योरी रही

दुनिया में देश आगे बढ़ने के लिए कैपिटलिज़म (पूंजीवाद) और कम्यूनिज़म (साम्यवाद) में से कोई एक रास्ता चुनते हैं. इन विचारधाराओं में टकराव है. लेकिन मणि ने इन दोनों से अलहदा थ्योरी पेश की  – ‘टॉयलिंग क्लास थ्योरी’ नाम से. इसमें वे कहते थे कि अपना छोटा-मोटा काम करके गुज़र-बसर करने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है. सरकारें इनके योगदान को स्वीकार करके ही समाज के सभी वर्गों का भला कर सकती हैं.

इनकी पहली जीत यादगार थी

राजनीति में मणि फर्श से अर्श तक गए थे. वार्ड के स्तर पर राजनीति में आए. वहां से चल कर 1960 में कोट्टयम के कांग्रेस ज़िलाध्यक्ष बने. वह बताते थे कि उनके करियर को इस बात से खूब मदद मिली कि उनकी शादी पीटी चाको की बहन से हुई थी. पीटी चाको तब केरल में बड़े नेता थे. लेकिन मणि सही मायने में आगे तभी बढ़े जब पीटी चाको की छांव से बाहर निकले.

साल 1964 था. पीटी चाको केरल के गृह मंत्री थे. उन पर इल्ज़ाम लगा कि वे अपनी पार्टी की एक कार्यकर्ता के साथ छुट्टियां बिताने निकले थे. हमारे यहां नेताओं की निजी ज़िंदगी में बहुत रुचि ली जाती है. तो इसे एक मुद्दा बना लिया गया और पीटी चाको को इस्तीफा देना पड़ा. कुछ समय बाद चाको का देहांत हो गया. इस पर केरल में कांग्रेस दो फाड़ हो गई. चाको के समर्थकों ने ‘केरला प्रदेश कांग्रेस समुधारणा समिति’ नाम से अलग पार्टी बना ली. इसी का नाम बाद में बदल कर ‘केरला कांग्रेस’ कर दिया गया.

मणि कांग्रेस में ही बने रहे. इसीलिए उन्हें धक्का पहुंचा जब 1965 के चुनावों में उन्हें कांग्रेस से टिकट नहीं मिला. मणि तब तक रुके जब तक उन्हें चुनाव लड़ने के लिए एक फाइनेंसर नहीं मिल गया. उसकी व्यवस्था होते ही वे केरला कांग्रेस में चले गए. पार्टी ने उन्हें पलई से टिकट भी दे दिया. तब पाला को पलई कहते थे. चुनाव हुए और मणि जीत गए.

मणि ने वित्त मंत्री रहते रिकॉर्ड 13 बार केरल का बजट पेश किया है.
मणि ने वित्त मंत्री रहते रिकॉर्ड 13 बार केरल का बजट पेश किया है.

राजनीति के सारे पैंतरे जानते थे.

मणि का इतना लंबा करियर बस अच्छी किस्मत की वजह से ही नहीं रहा. वे राजनीति के सारे पैंतरे अच्छे से जानते थे. किस्सा है कि इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाने के बाद केरला कांग्रेस अध्यक्ष के एम जॉर्ज को दो ऑप्शन दिए थे: मंत्री बन जाओ या जेल चले जाओ. जॉर्ज ने केरल का वित्त मंत्री बनना चुना. लेकिन वो शपथ लेते, उससे पहले मणि ने अड़ंगा लगा दिया. कहा कि जॉर्ज दो पदों पर नहीं रह सकते. अपना दावा पेश कर दिया. इस तरह 1975 में मणि केरल के वित्त मंत्री बने.

पर मुख्यमंत्री बनने से चूक गए

कांग्रेस के इतिहास में कई बंटवारे हुए हैं. इनमें से एक इमरजेंसी के बाद 1978 में हुआ. इंदिरा कांग्रेस एक तरफ रही. दूसरी तरफ देवराज उर्स की कांग्रेस (यू) थी, जिसमें ज़्यादातर दक्षिण के कांग्रेसी नेता थे. इन दोनों धड़ों के सहारे केरल की सी एच मोहम्मद कोया की सरकार चल रही थी. दिसंबर 1979 में कांग्रेस (यू) के ए के एंटनी ने कोया सरकार से समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई. प्लान था कि के एम मणि को मुख्यमंत्री बनाया जाए. लेकिन इससे पहले कि मणि सरकार बनाने का दावा पेश करते, गवर्नर जोथी वेंकटचालम ने विधानसभा भंग कर दी. मणि मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए. वे मुख्यमंत्री बनने के इतने करीब दोबारा कभी नहीं पहुंचे.

फिर भ्रष्टाचार के आरोप के चलते मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा

मणि के राजनैतिक करियर पर सबसे बड़ा दाग अक्टूबर 2014 में लगा. मणि ओमान चांडी सरकार में वित्त मंत्री थे. बीजू रमेश नाम के एक होटल मालिक ने मणि पर भ्रष्टाचार के इल्ज़ाम लगाए. कहा कि केरल में बंद पड़े 418 बार दोबारा खुलवाने के लिए मणि ने 5 करोड़ की घूस मांगी . बीजू का दावा था कि मणि तीन किश्तों में 1 करोड़ ले भी चुके थे. देश भर के मीडिया ने इसे ‘बार स्कैम’ कहा. विपक्ष में बैठी सीपीआई (मार्क्सवादी) ने इसे मुद्दा बना लिया और मणि के इस्तीफे पर अड़ गए. विजिलेंस कोर्ट ने मणि के खिलाफ मामला दर्ज करने को कहा लेकिन इसके खिलाफ मणि केरल हाई कोर्ट चले गए. हाई कोर्ट ने विजिलेंस कोर्ट का आदेश स्टे करने से मना कर दिया और मणि को खूब खरी-खोटी सुना दी. इसके बाद मणि ने नवंबर 2015 में इस्तीफा दे दिया.

बार सकैम पर मीडिया में खूब हल्ला हुआ. (कार्टूनः इंडिया टुडे)
बार सकैम पर मीडिया में खूब हल्ला हुआ. (कार्टूनः इंडिया टुडे)

लेकिन विजिलेंस डिपार्टमेंट ने बमुश्किल दो महीनों की जांच में मणि को क्लीन चिट थमा दी. बाद में इसी मामले में विजिलेंस डिपार्टमेंट के लोगों पर ढिलाई बरतने का इल्ज़ाम लगा. अगस्त 2016 आते-आते स्पेशल विजिलेंस कोर्ट ने फिर से बार स्कैम में मणि के रोल जांच के आदेश दे दिए.

मणि का लगातार विधायक बनना इस मायने में खास रहा कि हिंदुस्तान उन देशों में गिना जाता हैं जहां सिटिंग एमएलए (और सांसद भी) के जीतने के आसार और देशों से कम हैं. मणि एक ऐसे नेता हुए जो लगातार जीते और उनकी पकड़ की वजह अपराध या डर नहीं रहा. राजनीति के साधारण उसूलों का पालन करते हुए जहां तक मणि पहुंचे, विरले ही कोई पहुंच पाता है.


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