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भारतवर्ष का झंडा पुराणः क्या तिरंगे झंडे के अलावा भी अपना कोई झंडा फहरा सकते हैं राज्य?

कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने अपना अलग राज्य ध्वज 'नाद ध्वज' नाम से जारी कर दिया है.

किसी देश का झंडा एक खास पहचान की सबसे प्रत्यक्ष निशानी होती है. भारत में रहने वाले जब सिर्फ एक झंडे के तले आते हैं तो उन सभी की पहचान ‘भारतीय’ शब्द में समाहित हो जाती है. लेकिन जब एक और झंडा आता है, तो ये सवाल खड़ा हो जाता है कौनसी पहचान पहले है, कौनसी बाद में, कौनसी बड़ी है, कौनसी छोटी. और ये ‘छोटी’ पहचान धीरे-धीरे फूलकर ‘बड़ी’ पहचान के लिए चुनौती (अलगाववाद) तो नहीं बन जाएगी?

इन सारे सवालों पर सर धुनने का वक्त आ गया है क्योंकि कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने राज्य के आधिकारिक झंडे के लिए अपनी ओर से कवायद पूरी कर ली है और गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी है. अब दिलचस्प बात ये है कि आज से बहुत-बहुत-बहुत पहले एक नारा लगा था –

देश में दो विधान, दो निशान व दो प्रधान नहीं चलेगा

राजनीति समय के हिसाब से बदलती है. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपना नायक बताने वाली बीजेपी कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन सरकार का हिस्सा है.
राजनीति समय के हिसाब से बदलती है. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपना नायक बताने वाली बीजेपी कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन सरकार का हिस्सा है.

‘दूसरा विधान, दूसरा निशान’
ये कहकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर कूच किया था और उन्हें राज्य में घुसते ही गिरफ्तार कर लिया गया था. इसके बाद कस्टडी में ही उनकी मौत हो गई. तब से दक्षिणपंथ मुखर्जी की इस ‘शहादत’ को भुनाकर कश्मीर के दूसरे विधान (वहां का संविधान और धारा 370) , और दूसरे निशान के पीछे पड़ा है. (दूसरा प्रधान 30 मार्च 1965 में खत्म हो गया था).

कर्नाटक का झंडा: न निगलते बनेगा, न उगलते बनेगा
अब वर्डप्ले के अंदाज़ में आज की स्थिति का बयान ये है कि देश में एक दक्षिणपंथी पार्टी की सरकार है और दक्षिण के ही एक राज्य से अपने निशान (याने की आधिकारिक ध्वज, झंडा) की मांग आ रही है. ये मांग पूरी करना साफ तौर पर क्लासिक दक्षिणपंथ के खिलाफ जाता है. लेकिन इस दिलचस्प बात से ज़्यादा दिलचस्प ये है कि कर्नाटक में साल के अंत में होने वाले हैं विधानसभा चुनाव. तो केंद्र की भाजपा सरकार आसानी से ‘हां-ना’ बोल ही नहीं सकती.

कुछ और झंडे, कुछ और कहानियां
इसीलिए हम आपके लिए भारत की झंडा पुराण लेकर आए हैं. ताकि आप जान सकें कि देश में तिरंगे के अलावा दूसरे किसी झंडे को लेकर क्या कुछ किस्से कहानियां घटे हैं. खास फोकस रहेगा कर्नाटक पर.

ये ऐतिहासिक तस्वीर में. एक तरफ नरेंद्र मोदी हैं. दूसरी तरफ मुफ्ती मुहम्मद सईद. ये बीजेपी और पीडीपी के गठबंधन में आने और सरकार बनाने के समय की तस्वीर है. भारत के झंडे वाला हिस्सा PM मोदी की ओर झुका है. और कश्मीर का झंडा मुफ्ती साहब की ओर. इसी को वक्त के साथ बदलना कहते हैं.
ये ऐतिहासिक तस्वीर में. एक तरफ नरेंद्र मोदी हैं. दूसरी तरफ मुफ्ती मुहम्मद सईद. ये बीजेपी और पीडीपी के गठबंधन में आने और सरकार बनाने के समय की तस्वीर है. भारत के झंडे वाला हिस्सा PM मोदी की ओर झुका है. और कश्मीर का झंडा मुफ्ती साहब की ओर. इसी को वक्त के साथ बदलना कहते हैं.

झंडा नंबर दो
केंद्र सरकार लगातार कहती रही है कि देश में एक ही झंडा है – तिरंगा. (वही झंडा नंबर एक है.) तिरंगा किस कपड़े का बने से लेकर किस ऊंचाई पर फहराया जाए इसके इर्द-गिर्द नियमों की एक लंबी लिस्ट है – जो फ्लैग कोड ऑफ इंडिया (2002) के तहत आते हैं. इन नियमों के अलावा संविधान में किसी राज्य के लिए अलग से झंडे के लिए कोई प्रावधान नहीं है. अब आप याद दिलाएंगे कि जम्मू कश्मीर के पास तो अपना राज्य ध्वज है, वो कहां से आया ?

तो बाबू जम्मू-कश्मीर बड़े जुगाड़ से भारत का हिस्सा बना था. तब वादा किया गया था कि जम्मू कश्मीर को भारत का हिस्सा बनने पर भी कुछ छूट मिलेंगी. शेख अब्दुल्ला भारत के संविधान के तहत जम्मू कश्मीर एक ‘विशेष दर्जा’ प्राप्त राज्य है. इसीलिए उसके पास अपना एक संविधान है और झंडा भी. वहां के झंडे को लेकर लोग बहुत भावुक हैं क्योंकि उसके लाल रंग को 13 जुलाई, 1931 की घटना से जोड़कर देखा जाता है. इस दिन श्रीनगर सेंट्रल जेल के बाहर 22 लोग एक-एक कर के डोगरा फौज की गोली का निशाना बने थे. ये सभी अज़ान देते-देते मरे थे. चूंकि 1931 की घटनाएं कश्मीर के आत्मनिर्णय की मांग का रेफरेंस पॉइंट हैं, इसलिए जम्मू कश्मीर के झंडे को लेकर भारत में कुछ असहजता हमेशा से रही. मुखर्जी का नारा इसी का चरम था. तो इसका इंतज़ाम किया गया कि जम्मू कश्मीर का झंडा भारत के झंडे के लिए चुनौती न लगे.

ऊपर जो मोदी-मुफ्ती वाली तस्वीर दिखाई, उसका एक पहलू ये भी है. पता नहीं इस तस्वीर के लिए जाते समय इन दोनों के दिमाग में क्या चल रहा था. लेकिन देखने वाले को ये ही लगेगा कि दोनों में हिचक थी. साथ बैठने को लेकर. इस तस्वीर को जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी ट्वीट किया था.
ऊपर जो मोदी-मुफ्ती वाली तस्वीर दिखाई, उसका एक पहलू ये भी है. पता नहीं इस तस्वीर के लिए जाते समय इन दोनों के दिमाग में क्या चल रहा था. लेकिन देखने वाले को ये ही लगेगा कि दोनों में हिचक थी. साथ बैठने को लेकर. इस तस्वीर को जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी ट्वीट किया था.

1952 में जम्मू कश्मीर और भारत के बीच संवैधानिक संबंधों को लेकर एक समझौता हुआ जिसे दिल्ली एग्रीमेंट कहा जाता है. इसके तहत ये तय माना गया कि जम्मू कश्मीर का झंडा बना रहेगा लेकिन भारतीय झंडे का दर्जा जम्मू कश्मीर में भी वही होगा जो बाकी देश में होता है. राज्य में दोनों झंडे साथ फहराए जाते हैं.

झंडा नंबर ढाई
हमारा झंडा नंबर ढाई आधा इसलिए है कम कि आधिकारिक का ठप्पा इसपर नहीं लगा है; लेकिन गिनती से बाहर इसलिए नहीं कि इसे खारिज करना संभव नहीं है.

जम्मू कश्मीर के झंडे को शुरुआत से अपवाद माना गया था. लेकिन अपने अलग झंडे का क्रेज़ पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. 60 के दशक के बीच कर्नाटक में राष्ट्रीय ध्वज के अलावा एक और झंडा फेमस होने लगा. ये था एक स्थानीय पार्टी कन्नड पक्ष का. और इसकी कहानी लगभग तभी शुरू हो गई थी जब दिल्ली एग्रीमेंट हो रहा था – 50 के दशक के मध्य में. तब कन्नड आंदोलन चल रहा था. मांग थी कि कन्नड लोगों के लिए एक अलग राज्य हो. इसके एक हीरो थे मा. राममूर्ति. राममूर्ति का मानना था कि जिस तरह गैर कन्नड लोगों की पार्टियों का एक झंडा होता है, कन्नड पार्टियों का भी एक झंडा होना चाहिए.

1956 में कर्नाटक एक अलग राज्य बना. लेकिन तब की सरकारें इसकी सालगिरह नहीं मनाती थीं. राममूर्ति उन नेताओं में से थे, जिन्होंने सरकार पर दबाव बनाया कि वो हर साल एक नवंबर को कर्नाटक राज्योत्सव दिवस मानाए.

राममूर्ति यहीं नहीं रुके. उन्होंने राज्य के लिए एक झंडा बनाने के लिए बहुत मेहनत की. पहले राज्य के सभी कन्नड दलों को एक साथ लाए और ‘अखिल कर्नाटक कन्नाडिगारा ब्रहुत समावेश’ नाम से एक सम्मेलन बुलाया ताकि राज्य के लिए झंडे पर विचार किया जाए. इस सम्मेलन का उद्घाटन किया था वतल नागराज ने और इसके अध्यक्ष थे राममू्र्ति. लेकिन सम्मेलन के बाद इन दोनों ने अपनी-अपनी अलग पार्टियां बना लीं. दोनों ने अपनी-अपनी पार्टियों के लिए झंडे भी बनाए. राममूर्ति वाला झंडा बना साल 1966 में.
1967 में एक एक्सीडेंट में राममूर्ति का देहांत हो गया.

कन्नड पक्ष राममूर्ति के बाद ज़्यादा दिन प्रासंगिक नहीं रहा. लेकिन राममूर्ति ने कन्नड स्वाभिमान को लेकर जितनी मेहनत की थी, उसके नतीजे में वो ‘कन्नाडादा वीर सेनानी’ के तौर पर याद किए गए और उनके बनाए ‘कन्नड ध्वज’ को कर्नाटक राज्य का अघोषित झंडा मान लिया गया. कन्नड ध्वज में दो रंग हैं – ऊपर पीला और नीचे लाल. और इसे कर्नाटक सरकार अपने कार्यक्रमों में फहराती रहती है, खासतौर पर कर्नाटक राज्योत्सव दिवस पर.

कर्नाटक में अलग प्रादेशिक झंडे की माहौल काफी समय से हो रही है. ये आइडिया इतना लोकप्रिय है कि बीजेपी के लिए सीधे से आपत्ति जता पाना आसान नहीं होगा. कहना चाहिए कि मुख्यमंत्री सिद्दारमैया की टाइमिंग अच्छी है.
कर्नाटक में अलग प्रादेशिक झंडे की माहौल काफी समय से हो रही है. ये आइडिया इतना लोकप्रिय है कि बीजेपी के लिए सीधे से आपत्ति जता पाना आसान नहीं होगा. कहना चाहिए कि मुख्यमंत्री सिद्दारमैया की टाइमिंग अच्छी है. हो सकता है कि वो इसे अपना मास्टरस्ट्रोक भी मान रहे हों.

ये झंडा लोकप्रिय है और आम लोग इसे स्कार्फ की तरह गले में भी बांधते रहते हैं. ये आज कर्नाटक में क्षेत्रिय और भाषाई स्वाभिमान का ‘सिंगल पाइंट ऑफ रेफरेंस’ है. कर्नाटक की हालिया सरकार जिस चीज़ को भुनाना चाहती है, वो राममूर्ति के बनाए झंडे की लोकप्रियता ही है.

झंडा नंबर तीन (ढाई के बाद का आधा)
ये आधा नंबर इसलिए कि ये झंडा भी आधिकारिक नहीं है (कम से कम भारत सरकार की नज़र में) लेकिन खारिज इसलिए नहीं किया क्योंकि भारत की ज़मीन पर तिरंगे को असल चुनौती अगर किसी झंडे ने दी है, तो वो यही है. नागा गुट दुनिया की सबसी लंबी सतत इंसरजेंसी लड़ रहे हैं. 1997 में नागा गुटों से बातचीत वहां पहुंची जहां वो जंगलों से निकलकर एक जगह बसने को तैयार हुए. नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (नागालिम) के इसाक मुइवा गुट (NSCN-IM) के उग्रवादी नागालैंड वन विभाग की कुछ पुरानी इमारतों में बसाए गए. इन इमारतों को हेब्रोन पीस कैंप के नाम से जाना जाता है. यहां से NSCN-IM अपनी सरकार चलाता है. किसी भी सरकार की तरह इसमें सभी विभाग हैं – गृह मंत्रालय से लेकर वित्त मंत्रालय तक (जो बाकायदा टैक्स वसूलता है). और इतना सब है, तो झंडा भी है ही.

NSCN-IM ने 2015 में भारत सरकार से समझौता कर लिया जिसे नागा पीस अकॉर्ड कहा जाता है. ये आजतक सार्वजनिक नहीं किया गया है लेकिन एक चीज़ को लेकर कोई संशय नहीं है – वो ये कि नागालैंड के लिए अलग राज्य ध्वज की मांग भी की गई है. केंद्र ने इस मांग को माना है कि नहीं, ये कोई नहीं जानता.

तस्वीर में प्रधानमंत्री मोदी NSCN (IM) के जनरल सेक्रटरी थुइनगालेंग मुइवाह के साथ दिख रहे हैं. ये उस समय की तस्वीर है जब मोदी सरकार ने NSCN के साथ ऐतिहासिक शांति समझौता किया था. तस्वीर में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल भी नजर आ रहे हैं. मुइवाह के दाहिनी ओर.
तस्वीर में प्रधानमंत्री मोदी NSCN (IM) के जनरल सेक्रटरी थुइनगालेंग मुइवाह के साथ दिख रहे हैं. ये उस समय की तस्वीर है जब मोदी सरकार ने NSCN के साथ ऐतिहासिक शांति समझौता किया था. तस्वीर में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल भी नजर आ रहे हैं. मुइवाह के दाहिनी ओर.

तो क्या कोई नया झंडा बन ही नहीं सकता?
केंद्र की सरकारें ऐसा कहती रही हैं. खुद कर्नाटक में जब भाजपा की सरकार थी तो उसने ये कहकर राज्य ध्वज के प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया था कि ये कदम देश की एकता के खिलाफ है. लेकिन असल बात यही है कि संविधान में किसी नए राज्य ध्वज के लिए प्रावधान हो न हो, वो ऐसा कोई ध्वज बनाने के खिलाफ नहीं है. ये बात सुप्रीम कोर्ट ने एसआर बोमई विरुद्ध भारत संघ केस में साफ की थी. 1994 में इस मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा था –

राज्यों के लिए अलग झंडों पर संविधान में रोक नहीं है. लेकिन राज्य ध्वज हों तो उन्हें फहराते वक्त इस बात का हमेशा ध्यान रखा जाना चाहिए कि राष्ट्रीय ध्वज का अपमान न हो. उन्हें राष्ट्रध्वज से नीचे फहराया जाना चाहिए.

सिद्धारमैया कहते रहे हैं कि कर्नाटक में पहले से राज्य गीत (नाद गीत) है, इससे कोई समस्या नहीं हुई. तो राज्य ध्वज से भी नहीं होगी. सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गईं गाइडलाइन का पालन हो जाए तो सिद्धारमैया नए झंडे का प्रस्ताव बनाने में ‘टेकनीकली’ सही हैं. लेकिन ऐसा नहीं है कि वो कोई ‘खेल’ नहीं कर रहे हैं.

केंद्र सरकार का कहना है कि संविधान में राज्यों के लिए अलग झंडे का कोई प्रावधान नहीं है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, संविधान में इसकी कोई मनाही भी नहीं है. इस हिसाब से देखें, तो सिद्दारमैया इस झंडे के लिए मंजूरी हासिल करने में कामयाब हो सकते हैं.
केंद्र सरकार का कहना है कि संविधान में राज्यों के लिए अलग झंडे का कोई प्रावधान नहीं है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, संविधान में इसकी कोई मनाही भी नहीं है. इस हिसाब से देखें, तो सिद्दारमैया इस झंडे के लिए मंजूरी हासिल करने में कामयाब हो सकते हैं.

जिस खेल की हम बात कर रहे हैं वो दो जगह हुआ है. पहला ये कि राममूर्ति के कन्नड ध्वज को तमाम लोकप्रियता के बावजूद किनारे कर दिया गया है. राज्य सरकार ने कन्नड विद्वान हम्पा नागराजैया से एक नया झंडा बनवाया है – ‘नाद ध्वज’. इसमें राममूर्ति के पीले और लाल रंग के बीच में एक सफेद पट्टा दे दिया गया है और बीच में ‘गंडभेरुंद’ बना हुआ है. ये विजयनगर राज्य के समय के सिक्कों पर 14वीं सदी से है. तो सिद्धारमैया ने पास के इतिहास को दरकिनार कर के दूर के इतिहास को साथ लिया है. अब उन्हें झंडे का क्रेडिट राममूर्ति से बांटना नहीं पड़ेगा.

दूसरा खेल उन्होंने केंद्रिय गृह मंत्रालय को प्रस्ताव भेजकर किया है. कर्नाटक में राज्य ध्वज की अपील ज़बरदस्त है. और सिद्धारमैया अपना डिज़ाइन विधानसभा से ऐन पहले लेकर आए हैं. 8 मार्च, 2018 को उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस में मीडिया को बताया कि झंडा राज्य की कैबिनेट से अप्रूव हो चुका है और अब इसके डिज़ाइन को केंद्रिय गृह मंत्रालय भेजा जाएगा जो इस पर अंतिम निर्णय लेगा. अब केंद्र में भाजपा की सरकार है और भाजपा कर्नाटक में भी सरकार बनाना चाहती है. वो नए झंडे को हां कह दे तो फंसेगी क्योंकि वो पहले इस मांग के खिलाफ बोल चुकी है. बुराई लेगी भाजपा और क्रेडिट लेंगे सिद्धारमैया. लेकिन भाजपा ना कहने की स्थिति में भी नहीं है क्योंकि ऐसा करके वो ‘कर्नाटक कैबिनेट से पास हुए राज्य ध्वज’ की राह में कांटा बन जाएगी. और कर्नाटक में चुनाव हैं. इसी साल.

तो ये था भारतवर्ष की झंडा पुराण. इति.


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