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जस्टिन ट्रूडो: वो बॉक्सिंग का मैच न जीतते, तो शायद PM नहीं बन पाते

कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो पूरी दुनिया में सबसे कूल नेता माने जाते हैं.

जस्टिन पियरे जेम्स ट्रूडो. शॉर्ट में, जस्टिन ट्रूडो. कनाडा के 23वें प्रधानमंत्री. दुनिया में इस वक्त जितने भी राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री हैं, उनके बीच कोई मुकाबला हो तो सबसे पॉपुलर नेता का अवॉर्ड ट्रूडो को ही जाएगा. इनके बारे में अक्सर लोग ‘Awwwww’ से बात शुरू करते हैं. मसलन- Awwwww, सो स्वीट. सो क्यूट. सो जेनरस. सो ह्यूमरस. बहुत लोकप्रिय हैं. ट्रूडो भारत आए हैं. सपरिवार. पत्नी और तीन बच्चों के साथ. बतौर प्रधानमंत्री भारत का ये उनका पहला दौरा है. बचपन में भी एक बार यहां आ चुके हैं.

प्रधानमंत्री का बेटा प्रधानमंत्री, मगर हमारे यहां जैसा नहीं
पियरे ट्रूडो. कनाडा के 15वें प्रधानमंत्री. उनकी पत्नी थीं मारग्रेट ट्रूडो. पियरे और मारग्रेट की पहली औलाद हैं जस्टिन ट्रूडो. 1971 में पैदा हुए थे. ठीक क्रिसमस वाले दिन. यानी, 25 दिसंबर को. कनाडा में एक जगह है- ओटावा. वहीं पर. ट्रूडो फैमिली में पियरे पहले इंसान नहीं थे, जो राजनीति में गए. उनके नाना, यानी मारग्रेट के पिता, यानी जिमी सिनक्लेर भी एक कैबिनेट मंत्री रह चुके थे. इस लिहाज से देखें, तो जस्टिन ट्रूडो के खून में राजनीति थी. मगर उनका सिस्टम हमारे यहां जैसा नहीं है. कि खानदानी पार्टी है और खानदान में ही कुर्सी बंटती रहती है.

पियरे ट्रूडो बेहद सख्त अंदाज वाले थे. ये तस्वीर उस समय की है, जब पियरे भारत दौरे पर आए थे. तस्वीर में उनके साथ हैं तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी.
पियरे ट्रूडो बेहद सख्त अंदाज वाले थे. ये तस्वीर उस समय की है, जब पियरे भारत दौरे पर आए थे. तस्वीर में उनके साथ हैं तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी.

छह साल के थे, जब मां-पापा का तलाक हो गया
ट्रूडो बस छह साल के थे, जब उनके मां-पापा का तलाक हो गया. वो और उनके दोनों छोटे भाई- एलेक्जेंडर और मिशेल अपने पापा के साथ रहने लगे. ये वो वक्त था, जब पियरे कनाडा के प्रधानमंत्री थे. 11 की उम्र में पापा के साथ पहली बार भारत आए जस्टिन ट्रूडो. तब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं. पियरे ट्रूडो चार बार कनाडा के PM रहे. कनाडा में ये एक रिकॉर्ड है. 1968 से 1984 तक वो कनाडा के सबसे मजबूत नेता रहे. पियरे कानून के प्रफेसर थे. लेखक भी थे. मगर अक्सर आक्रामक अंदाज में दिखते. जैसे विनम्र जस्टिन हैं, उससे बिल्कुल उलट. कहते हैं कि जस्टिन भले ही अपने पिता के साथ ज्यादा रहे हों, मगर वो अपनी मां जैसे थे. मां पर गए. मतलब, उनका खुलापन. मुस्कुराता चेहरा. ये उनकी मां जैसा है. जब जस्टिन 12 के हुए, तब पियरे ने राजनीति से संन्यास ले लिया. और अपने तीनों बेटों के साथ मॉन्ट्रेल में शिफ्ट हो गए. यहीं पर जस्टिन ने अपनी 12वीं तक की पढ़ाई खत्म की. उसी कॉलेज से, जहां से उनके पापा ने पढ़ाई की थी. फिर आई यूनिवर्सिटी की पढ़ाई. अंग्रेजी लिटरेचर में बीए किया. और ये साल था 1994.

ये जस्टिन ट्रूडो के अमेरिका दौरे के वक्त ली गई एक तस्वीर है. बहुत चर्चा हुई थी इसकी. इवांका ट्रंप जिस अंदाज में उनकी तरफ देख रही हैं, उसे लेकर काफी बातें हुई थीं.
ये जस्टिन ट्रूडो के अमेरिका दौरे के वक्त ली गई एक तस्वीर है. बहुत चर्चा हुई थी इसकी. इवांका ट्रंप जिस अंदाज में उनकी तरफ देख रही हैं, उसे लेकर काफी बातें हुई थीं. वैसे ट्रूडो लग तो प्यारे रहे हैं.

कॉलेज के बाद एक साल तक दुनिया घूमते रहे
इसके बाद पूरे एक साल तक जस्टिन घूमते रहे. दुनिया देखते रहे. विदेशों में ऐसा खूब होता है. वहां लोग मानते हैं कि पढ़ाई खत्म करने के बाद और नौकरी शुरू करने से पहले थोड़ा वक्त अलग-अलग जगहों को देखने, उनकी संस्कृतियों को समझने में खर्च करना चाहिए. घूमना-फिरना करके जस्टिन वापस पहुंचे मैकगिल यूनिवर्सिटी. वहां टीचर बनने की पढ़ाई की. फिर पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी. एक दूसरे शहर विसलर चले गए. वहां नाइटक्लब में बाउंसर बन गए. फिर वहीं यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया से बैचलर ऑफ एजुकेशन डिग्री की पढ़ाई खत्म की.

गणित के मास्टर साहब बन गए जस्टिन ट्रूडो
जस्टिन बन गए टीचर. क्या पढ़ाते थे? फ्रेंच और गणित. पहले प्राइवेट स्कूल में पढ़ाते थे. फिर सरकारी स्कूल में पढ़ाने लगे. ये 1998 का साल था. जस्टिन की जिंदगी ठीकठाक चल रही थी. कि तभी एकाएक उनके छोटे भाई मिशेल की एक हादसे में मौत हो गई. पहाड़ों पर कई बार एकाएक बहुत सारी बर्फ टूटकर नीचे गिरती है. सैकड़ों-हजारों टन बर्फ. इसको ऐवलांचे कहते हैं. इसी के नीचे दबकर मिशेल की मौत हो गई. फिर दो साल बाद, यानी 2000 में उनके पिता की भी मौत हो गई. उन्हें कैंसर था.

कभी कहीं टिक ही नहीं रहे थे
जस्टिन के करियर के शुरुआती सालों में कुछ भी टिककर नहीं रहा. कभी ये, कभी वो. तो टीचर बनने के बाद उन्होंने इंजिनियरिंग करने की सोची. दाखिला भी ले लिया. फिर वो छोड़कर एनवॉयरमेंटल ज्योग्रेफी में एडमिशन ले लिया. फिर उसको भी पूरा नहीं किया. वहां से भी निकल आए.

सोफी और जस्टिन बचपन से ही एक-दूसरे को जानते थे. मगर दोस्ती नहीं थी. सोफी असल में जस्टिन के छोटे भाई मिशेल की दोस्त थीं.
सोफी और जस्टिन बचपन से ही एक-दूसरे को जानते थे. मगर दोस्ती नहीं थी. सोफी असल में जस्टिन के छोटे भाई मिशेल की दोस्त थीं.

छोटे भाई की दोस्त से प्यार हुआ, शादी भी हो गई
साल आ गया था 2003. और इसी साल जस्टिन और सोफी एक-दूसरे को डेट करने लगे. सोफी थीं जस्टिन के छोटे भाई मिशेल की दोस्त. ये लोग बचपन से ही एक-दूसरे को जानते थे. सोफी टीवी और रेडियो में काम करती थीं. फ्रेंच और अंग्रेजी, दोनों बोलती थीं. दो साल की डेटिंग के बाद दोनों ने शादी कर ली. 28 मई, 2005 को. दोनों के तीन बच्चे हैं. जेवियर, ऐला ग्रेस और हेड्रेन.

थोड़ा इधर-उधर, यानी सोशल वर्क किया
हमने वो एनवॉयरमेंटल ज्योग्रफी के बारे में बताया था आपको. जहां जस्टिन ने एडमिशन लिया और फिर पढ़ाई छोड़ दी. इसके बाद वो सामाजिक कार्यकर्ता टाइप बन गए. उनके भाई की मौत ऐवलान्च में हुई थी. तो जस्टिन ने ऐवलान्च के लिए जागरूकता बढ़ाने का काम शुरू किया. एक कनाडियन ऐवलान्च फाउंडेशन बनाया और उसके डायरेक्टर बन गए. फिर उन्होंने कनाडा ऐवलान्च सेंटर बनाने में मदद की. पर्यावरण से जुड़ी चीजों पर भी काम किया. नस्लीय हिंसा के खिलाफ रैली निकालने में मदद की. ऐसे ही कई चीजें की.

लिबरल पार्टी की इतनी खराब हालत कभी नहीं हुई थी
अब साल 2006 आ गया था. कनाडा में चुनाव हुए. लिबरल पार्टी हार गई. इसके बाद जस्टिन ने पार्टी के अंदर बात की. युवाओं से जुड़े मामलों की एक समिति में उन्हें अध्यक्ष बना दिया गया. 2011 के चुनाव में लिबरल पार्टी ने बहुत बुरा प्रदर्शन किया. हाउस ऑफ कॉमन्स में पार्टी खिसककर तीसरे नंबर पर आ गई. पहले नंबर पर थी कंजरवेटिव पार्टी. दूसरे पर थे न्यू डेमोक्रैट्स. ये लिबरल पार्टी के इतिहास में सबसे खराब स्थिति थी. कई जानकार कहने लगे कि अब लिबरल पार्टी खत्म हो जाएगी. इस वक्त पार्टी के नेता थे माइकल इग्नेटियफ. हार की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इस्तीफा दे दिया.

चुनाव से पहले जस्टिन ट्रूडो के विरोधी ये कहकर उन्हें खारिज कर देते कि उनके पास अनुभव नहीं है. मगर शायद अनुभव न होना जस्टिन के पक्ष में गया. एक किस्म की अनौपचारिकता थी उनके अंदर. एक ईमानदारी जो अक्सर पुराने नेताओं में नहीं दिखती.
चुनाव से पहले जस्टिन ट्रूडो के विरोधी ये कहकर उन्हें खारिज कर देते कि उनके पास अनुभव नहीं है. मगर शायद अनुभव न होना जस्टिन के पक्ष में गया. एक किस्म की अनौपचारिकता थी उनके अंदर. एक ईमानदारी जो अक्सर पुराने नेताओं में नहीं दिखती.

और फिर आया वो बॉक्सिंग मैच, जिसने ट्रूडो की जिंदगी बदल दी
इग्नेटियफ के चले जाने के बाद जस्टिन ट्रूडो पर दबाव बनने लगा. कि वो नेतृत्व संभाले. मगर अब भी कई आलोचक उन्हें गंभीरता से नहीं ले रहे थे. उनका कहना था कि जस्टिन के पास अनुभव नहीं है. योग्यता भी नहीं है. ट्रूडो ने अपनी आलोचनाओं को गंभीरता से लिया. और खुलकर सामने आए. कंजरवेटिव पार्टी के सांसद पैट्रिक ब्राजेउ को बॉक्सिंग रिंग में आकर मुकाबला करने की चुनौती दी. पैट्रिक सेना में रह चुके थे. कराटे में ब्लैक बेल्ट थे. लोग कहने लगे कि जस्टिन हार जाएंगे. और जस्टिन ने कहा:

लोग अक्सर मुझे कमतर समझ लेते हैं. उन्हें लगता है कि मैं हल्का हूं. अगर मैं ये लड़ाई जीत जाता हूं, तो शायद लोग मुझे गंभीरता से लेने लगेंगे.

जुआ खेला था, जीत गए
ये एक जुआ था. हारने पर जस्टिन की छवि को बहुत बट्टा लगता. ट्रूडो ने मुकाबले से पहले खूब प्रैक्टिस की. वो मुक्केबाजी करते भी थे. प्रफेशनल नहीं, ऐसे ही. उधर पैट्रिक खूब सिगरेट पीते थे. इसी से जस्टिन ने अंदाजा लगाया. कि पैट्रिक ज्यादा देर तक बॉक्सिंग रिंग में ठहर नहीं पाएंगे. मार्च 2012 में ये मैच हुआ. तीसरे राउंड में जस्टिन ने मैच जीत लिया. और फोकस में आ गए.

ट्रूडो के तीन बच्चे हैं. एक बेटी और दो बेटे. बहुत फैमिली टाइप इंसान हैं वो. परिवार के साथ कहीं जाते हैं, तो बच्चों की जिम्मेदारियां उठाते हैं. उन्हें गोद में लेते हैं. उनके ऊपर ध्यान देते हैं. ऐसा बहुत कम नेता ही करते दिखेंगे. 
ट्रूडो के तीन बच्चे हैं. एक बेटी और दो बेटे. बहुत फैमिली टाइप इंसान हैं वो. परिवार के साथ कहीं जाते हैं, तो बच्चों की जिम्मेदारियां उठाते हैं. उन्हें गोद में लेते हैं. उनके ऊपर ध्यान देते हैं.

और राजनीति में उतर गए जस्टिन ट्रूडो
लिबरल पार्टी का मुखिया कौन बनेगा, इसकी दौड़ शुरू हो चुकी थी. 2 अक्टूबर, 2012 को जस्टिन ने अपना कैंपेन शुरू किया. अपने मुकाबले खड़े लोगों की तुलना में वो ज्यादा लोकप्रिय थे. लोगों की दिलचस्पी पैदा होने लगी उनमें. ट्रूडो की वजह से लिबरल पार्टी के लिए भी समर्थन बढ़ने लगा. 14 अप्रैल, 2013 को नतीजा आया. जस्टिन जीत गए. लिबरल पार्टी के नेता बन गए. 80 फीसद के करीब वोट मिले उनको.

2015 का चुनाव: ट्रूडो को परेशान करने की भरसक कोशिश की
उस समय कंजरवेटिव पार्टी की सरकार थी. स्टीफन हार्पर प्रधानमंत्री थे कनाडा के. वो कहते कि जस्टिन नौसिखिया हैं. हार्पर ने करीब दो महीने पहले ही चुनाव का ऐलान करवा दिया. यानी, चुनाव अभियान के लिए काफी लंबा समय था. पहले ऐसा होता था कि मुकाबले में खड़े उम्मीदवारों के बीच दो बहस होती थीं. एक अंग्रेजी में. एक फ्रेंच में. ये बहस टीवी पर दिखाया जाता. चूंकि जस्टिन ट्रूडो नए थे, सो न्यू डेमोक्रैट्स और कंजरवेटिव पार्टी ने ज्यादा से ज्यादा डिबेट कराने को कहा. उन्हें लगा कि इतने सारे डिबेट के बीच ट्रूडो पस्त हो जाएंगे. गलती कर बैठेंगे. तीनों प्रमुख पार्टियों- कंजरवेटिव, न्यू डेमोक्रैट्स और लिबरल ने रजामंदी से तय किया. कि ऐसी डिबेट करेंगे, जिसमे पांच नेता शरीक होंगे. ट्रूडो ने सबको चौंका दिया. किसी ने नहीं सोचा था कि वो डिबेट में इतना अच्छा करेंगे. लिबरल पार्टी ने अगले पांच सालों के लिए अपना अजेंडा पेश किया. कहा कि गांजा पर लगे बैन को खत्म कर देंगे. सीरिया से आए शरणार्थियों को कनाडा में जगह देंगे.

आपने किसी प्रधानमंत्री को समलैंगिकों की परेड में शामिल होते देखा है? पूरे इंद्रधनुषी कपड़े पहनकर नाचते देखा है? जस्टिन ट्रूडो ऐसा करते हैं. ये तस्वीर कनाडा के संसद की है, जब वो समलैंगिक समुदाय के साथ होने वाले सरकारी भेदभाव के लिए माफी मांगते हुए रोने लगे.
आपने किसी PM को समलैंगिकों की परेड में शामिल होते देखा है? पूरे इंद्रधनुषी कपड़े पहनकर नाचते देखा है? जस्टिन ट्रूडो ऐसा करते हैं. ये तस्वीर कनाडा के संसद की है, जब वो समलैंगिक समुदाय के साथ होने वाले सरकारी भेदभाव के लिए माफी मांगते हुए रोने लगे.

फिर भी जीत गए जस्टिन ट्रूडो
19 अक्टूबर, 2015. कनाडा में चुनाव हुआ. लिबरल पार्टी ने सबको पीछे छोड़ दिया. कहां तो तीसरे नंबर पर थे और कहां पहले नंबर पर आ गए. हाउस ऑफ कॉमन्स में कुल 338 सीटें हैं. इनमें से 184 सीटों पर लिबरल पार्टी जीती. 2011 के मुकाबले पार्टी को 150 सीटों को फायदा हुआ था. इसकी सबसे ज्यादा वाहवाही मिली जस्टिन ट्रूडो को.

पहली बार ऐसी कैबिनेट बनी
लिबरल पार्टी जीत गई. जस्टिन ट्रूडो इसके नेता थे. वो प्रधानमंत्री बने. उन्होंने कैबिनेट बनाई. जितने पुरुष, उतनी ही महिलाएं. कनाडा में पहली बार ऐसी कैबिनेट बनी थी.

जब ट्रंप ने दरवाजे बंद किए, तो ट्रूडो ने खोल दिए
दो साल के अंदर जस्टिन ट्रूडो ने करीब 40,000 सीरियन शरणार्थियों को कनाडा में जगह दी. जब ट्रंप ने रिफ्यूजियों पर बैन लगाने का ऐलान किया, तब जस्टिन ट्रूडो का बयान आया. कि कनाडा जगह देगा शरणार्थियों को.

जस्टिन ट्रूडो का अनौपचारिक अंदाज उन्हें इतना लोकप्रिय बनाता है. जब कोई PM किसी अजनबी का हाथ पकड़कर सड़क पार कराए, एलिवेटर पर चढ़ने में मदद करे तो आप कैसे उससे प्यार नहीं करेंगे.
जस्टिन ट्रूडो का अनौपचारिक अंदाज उन्हें इतना लोकप्रिय बनाता है. जब कोई PM किसी अजनबी का हाथ पकड़कर सड़क पार कराए, एलिवेटर पर चढ़ने में मदद करे तो आप कैसे उससे प्यार नहीं करेंगे.

क्यों इतना प्रगतिशील माना जाता है ट्रूडो को?
कोई एक चीज, कोई एक फैसला जस्टिन ट्रूडो को प्रगतिशील नहीं बनाता. वो पूरा पैकेज हैं. कुछ चीजों का जिक्र खास है यहां पर. जैसे- मिडिल क्लास पर इनकम टैक्स का बोझ कम किया. अमीरों पर टैक्स बढ़ाया. कम कमाने वाले और मध्यम वर्गीय लोगों के बच्चों के लिए खास योजनाएं बनाईं. जस्टिन ट्रूडो बतौर प्रधानमंत्री हर नस्ल, हर समुदाय के साथ शरीक होते देखे गए. पिछले कई दशकों से कनाडा की एक खासियत रही है. इतनी सारी नस्लों के लोग साथ मिलकर रहते हैं वहां. जस्टिन ट्रूडो ने इस परंपरा को और मजबूत करने पर जोर दिया. उनका स्टाइल बिंदास है. लोगों के साथ घुल-मिल जाते हैं. प्रधानमंत्री होने के गुमान में नहीं रहते. कई बार अपने छोटे बेटे को लेकर दफ्तर चले आते हैं. जैसे महिलाएं जरूरी होने पर छोटे बच्चे को लेकर दफ्तर जाती हैं. ऐसे ही. प्रधानमंत्री के पद पर बैठे किसी शख्स से ऐसी इंसानी चीजों की कम ही उम्मीद होती है. इस लिहाज से देखें, तो ट्रूडो अक्सर झिझक तोड़ते हैं. नया करते हैं. कभी किसी अजनबी की तरफ मदद का हाथ बढ़ा देते हैं. कभी किसी को एलिवेटर (स्वाचालित सीढ़ी) से उतरने में मदद करने लगते हैं. ये सारी बातें उनको इतना मशहूर बनाती हैं.

एक बड़े विवाद में भी फंसे
2017 में जस्टिन ट्रूडो अपने परिवार के साथ छुट्टी मनाने बहामास गए. वहां एक प्राइवेट द्वीप है. एक अरबपति हैं- आगा खान. उनका ही द्वीप है. कनाडा में उनकी संस्था PM के लिए लॉबिंग भी करती है. सरकारी फंड भी मिलता है उनको. तो जब ट्रूडो आगा खान के निजी द्वीप पर सपरिवार छुट्टियां मनाने गए, तो बड़ा हंगामा हुआ. प्रधानमंत्री ऐसे किसी का फेवर नहीं ले सकता न.

आलोचनाओं से परे कोई नहीं होता. जस्टिन ट्रूडो में भी कमियां हैं. मगर कई बातें बहुत शानदार हैं उनमें. उन्हें देखकर लगता है कि नेता इतने सामान्य और इंसानी होने लगें, तो आधी से ज्यादा दिक्कतें यूं ही खत्म हो जाएंगी.
आलोचनाओं से परे कोई नहीं होता. जस्टिन ट्रूडो में भी कमियां हैं. मगर कई बातें बहुत शानदार हैं उनमें. उन्हें देखकर लगता है कि नेता इतने सामान्य और इंसानी होने लगें, तो आधी से ज्यादा दिक्कतें यूं ही खत्म हो जाएंगी.

ये तो सच में बट्टा ही है ट्रूडो सरकार पर
जस्टिन ट्रूडो जब राजनीति में घुसे भी नहीं थे, तब वो पर्यावरण से जुड़ी चीजों पर काम कर रहे थे. सोशल वर्क जैसा समझ लीजिए. फिर जब PM बने, तो उन्होंने अल्बर्टा ऑइल सैंड्स में दो नए पाइपलाइन बिछाने का आदेश दे दिया. इसपर खूब हंगामा हो रहा है.
पर्यावरण के जानकार और आदिवासी समुदाय इसका जी-तोड़ विरोध कर रहे हैं. लोगों का कहना है कि इस नई पाइपलाइन के कारण कनाडा पैरिस क्लाइमेट अग्रीमेंट का अपना लक्ष्य पूरा नहीं कर पाएगा. अभी जहां रोजाना 890,000 बैरल तेल निकलता है, वो बढ़कर 3000,000 बैरल हो जाएगा.

कनाडा की राजनीति में पाइपलाइन हमेशा ही अहम रहा है
इससे पहले जब ट्रान्स-कनाडा पाइपलाइन बिछी थी, तो लिबरल पार्टी की सरकार चली गई थी. साल था 1957. कनाडा की राजनीति में उस घटना को ‘पाइपलाइन डिबेट’ कहते हैं. इसके पहले करीब आधी सदी तक लिबरल पार्टी का ही बोलबाला रहा था. इतना मजबूत होने के बाद भी इस एक मुद्दे ने उनकी छुट्टी कर दी. इसके बाद कनाडा में राजनैतिक अस्थिरता का दौर आया. 10 साल के भीतर करीब छह चुनाव हुए. फिर 1968 में जब जस्टिन के पिता पियरे ट्रूडो को बहुमत मिला, तब जाकर लगा कि उस मुद्दे का असर खत्म हुआ. ट्रूडो सरकार पर इसका क्या असर होगा, ये तो वक्त तय करेगा. हां, ये जरूर है कि कनाडा में एक बड़ा धड़ा इस पाइपलाइन का विरोध कर रहे हैं.

हमने बस तस्वीर दिखाई है. याद करने का काम आपका है. कि आपने कब किसी नेता को इतने हल्के-फुल्के अंदाज में आम इंसानों जैसी मस्ती करते देखा था. और ऐसा भी नहीं कि इस तरह बर्ताव करने वाला इंसान अपनी जिम्मेदारियों के लिए गंभीर न हो.
हमने बस तस्वीर दिखाई है. याद करने का काम आपका है. कि आपने कब किसी नेता को इतने हल्के-फुल्के अंदाज में आम इंसानों जैसी मस्ती करते देखा था. और ऐसा भी नहीं कि इस तरह बर्ताव करने वाला इंसान अपनी जिम्मेदारियों के लिए गंभीर न हो.

वो तीन मौके, जब ट्रूडो ने सबका दिल जीत लिया
इतिहास में किसने गलतियां नहीं की? वो देश जो आज सभ्यता और मानवाधिकार का चैंपियन कहते हैं खुद को, उन्होंने इतिहास में एक से एक बर्बरताएं की हैं. मगर क्या उनके लिए माफी मांगी? मुश्किल ही ऐसी कोई मिसाल याद आएगी. मगर जस्टिन ट्रूडो ने कनाडा की गलतियों के लिए माफी मांगी. एक वाकया वो था, जब 1914 में कोमागाटा मारु जहाज पर बैठे एशियाई मूल (और भारतीयों) को कनाडा में नहीं घुसने दिया गया था. दूसरा वाकया वो, जब न्यूफाउंडलैंड में हॉस्टल के अंदर रहने वाले स्कूली छात्रों से भेदभाव किया गया. और तीसरा वो वाकया, जब सरकार ने अपने समलैंगिक अधिकारियों के साथ भेदभाव किया. ये तीनों ही मामले कनाडा के अतीत के हैं. मगर बतौर प्रधानमंत्री ट्रूडो ने इनकी जिम्मेदारी ली और माफी मांगी. तो क्या किसी दिन ब्रिटेन इतनी शर्म दिखाएगा? कि उसने हिंदुस्तान को गुलाम बनाकर उसके ऊपर जो-जो जुल्म किए, उनकी माफी मांगे?


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