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पाकिस्तान की एक सांसद साड़ी पहनती है, तो दूसरे सांसद को दर्द क्यों होता है?

‘पाकिस्तान’ सुनकर सबसे पहले आपके ज़ेहन में क्या आता है? दुश्मन मुल्क, आतंकवाद, बेवकूफ भाई, सिंधी बिरयानी, क्रिकेट, लाहौर… यही सब न! और ‘साड़ी’ सुनकर आप सबसे पहले क्या सोचते हैं? मां, औरतें, खूबसूरती, झंझटी पहनावा, कढ़ाई, खरीदारी का हुनर. करीब-करीब यही सब. पर जब आप ‘पाकिस्तान’ और ‘साड़ी’ साथ में सुनते हैं, तो आंखें सूरज देखकर खुले कमल की तरह फैल जाती हैं. चेहरे पर ऐसे भाव आ जाते हैं, जैसे किसी शावक ने पहली बार दरियाई घोड़ा देख लिया हो. ऐसी प्रतिक्रियाएं एक हद तक तर्कसंगत भी हैं, क्योंकि आज, 2018 में भी, पाकिस्तान की संसद में मुफ्ती अब्दुल सत्तार जैसे लोग बैठे हैं.

क्या हुआ, कब हुआ, कहां हुआ

मुफ्ती अब्दुल सत्तार
मुफ्ती अब्दुल सत्तार

सत्तार पाकिस्तान की सुन्नी देवबंदी पार्टी ‘जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फज़्ल)’ से ताल्लुक रखते हैं और बलूचिस्तान से सांसद हैं. शुक्रवार यानी 9 फरवरी को पाक में मानवाधिकारों पर संसद की बनाई कार्यकारी कमेटी की बैठक हो रही थी. इस मीटिंग की अध्यक्ष मुताहिदा कौमी मूवमेंट (MQM) पार्टी की सांसद नसरीन जलील थीं और सत्तार इस मानवाधिकार कमेटी के सदस्य हैं. जलील इस मीटिंग में साड़ी पहनकर आई थीं और सत्तार को उनका पहनावा अखर गया. उन्होंने अपनी ज़बान को तकलीफ़ दी और कहा,

‘आपके जैसी काबिल और बुद्धिमान महिला को मुसलमानों की तरह दिखना चाहिए. इस्लाम में महिलाओं को चेहरे, हाथ और पैर के अलावा सब कुछ ढकने को कहा गया है. खुदा ने आपको इस दर्जे तक पहुंचाया है. आपको दूसरी महिलाओं के लिए नज़ीर होना चाहिए. अगर इस मीटिंग की फुटेज टीवी पर चल गई, तो लोगों के बीच क्या संदेश जाएगा?’

ये सुनकर जलील ने सत्तार को याद दिलाया कि वो 74 साल की खातून हैं, जो हाल ही में मौत को मात देकर आई हैं. इस बेसिर-पैर की बात पर जलील ने सत्तार से ही पूछ लिया, ‘आप ही बता दें कि महिलाओं को कैसे कपड़े पहनने चाहिए?’

नसरीन जलील, जो अक्सर साड़ी पहने नज़र आती हैं.
नसरीन जलील, जो अक्सर साड़ी पहने नज़र आती हैं.

ये पाक के दो सांसदों के बीच हुई बातें या किसी मीटिंग में घटा महज़ एक किस्सा नहीं है. ये पाकिस्तान की सूरत का एक हिस्सा है. ये बताता है कि हमारे पड़ोस में बड़े कैनवस पर औरतों को कैसे उकेरा जाता है. ये बताता है कि कैसे एक पहनावा लोगों की आंखों में छिपी खास किस्म की चिढ़ को उधेड़ देता है.

क्या पाकिस्तान की संसद में ऐसा ही होता है?

साड़ी पर हमारी-आपकी बात होगी, पर उससे पहले पाकिस्तानी संसद में घटे ये दो छोटे किस्से सुनिए. अप्रैल 2017 विपक्ष के नेता खुर्शीद शाह कुछ बोल रहे थे और साथ में महिला सांसदों की आवाज़ें आ रही थीं. स्पीकर अयाज सादिक ने महिला सांसदों से कहा कि या तो वो शांत बैठ जाएं या बात करने के लिए बाहर चली जाएं. इस पर खुर्शीद शाह बोले, ‘इन महिलाओं को बात करने से मत रोकिए. अगर ये लगातार बात नहीं करेंगी, तो बीमार पड़ जाएंगी.’ 2016 में तब के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी की चीफ-व्हिप शिरीन मज़ारी की ‘ट्रैक्टर ट्रॉली’ से तुलना की थी.

संसद में बोलते खुर्शीद शाह
संसद में बोलते खुर्शीद शाह

तो क्या पाकिस्तान हमेशा से साड़ी से नफरत करता रहा है?

मोहम्मद अली जिन्ना के साथ साड़ी पहने फातिमा जिन्ना
मोहम्मद अली जिन्ना के साथ साड़ी पहने फातिमा जिन्ना

नहीं. कैसे करता और क्यों करता! 70 साल पहले तक तो सब एक ही था. पेशावर से लेकर कन्याकुमारी तक हिंदू-मुस्लिम साथ रहते थे. साड़ी किसी मज़हब की बपौती नहीं थी. सब पहनते थे. 1947 में बंटवारा हुआ, तब भी साड़ी साझे में ही रही. पाकिस्तान के कायद-ए-आजम मुहम्मद अली जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना ने पूरी ज़िंदगी साड़ी पहनी, जो अपने भाई का बड़ा सहारा थीं.

बेगम राना लियाकत अली खान (बीच में)
बेगम राना लियाकत अली खान (बीच में)

पाक के पहले वज़ीर-ए-आज़म लियाकत अली खान की पत्नी बेगम राना लियाकत अली खान साड़ी पहनती थीं. वो हिंदू परिवार में पैदा हुई थीं और पाकिस्तानी मूवमेंट का बड़ा चेहरा थीं. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे ज़ुल्फिकार अली भुट्टो की पत्नी नुसरत भुट्टो भी साड़ी पहनती थीं. उन्हें पाकिस्तान में मादरे-जम्हूरियत का दर्जा हासिल है.

पति ज़ुल्फिकार के साथ साड़ी पहने नुसरत भुट्टो
पति ज़ुल्फिकार के साथ साड़ी पहने नुसरत भुट्टो

दिक्कत शुरू हुई 1977 के तख्तापलट के बाद. प्रधानमंत्री ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने 1 अप्रैल 1976 को पांच सीनियर जनरल को दरकिनार करते हुए मोहम्मद जिया उल हक को आर्मी चीफ बनाया. भुट्टो ने सोचा था कि शिमला-दिल्ली में पढ़े जिया उल हक नमाज़ पढ़ने और गोल्फ खेलने वाले अफसर हैं, जो उनके लिए खतरा नहीं होंगे. लेकिन अपनी नियुक्ति के ठीक 462वें दिन 5 जुलाई 1977 को जिया ने तख्तापलट कर दिया और भुट्टो जेल भेज दिए गए. इस ऑपरेशन का नाम था, ‘फेयर प्ले’. जिया पाकिस्तान को करीब-करीब शरिया के मुताबिक चलाना चाहते थे और उनकी इस सनक ने पाकिस्तान की हवा बिगाड़ दी.

zia

अपनी सोच को लोगों पर थोपने के लिए ज़िया ने 1977 से ही नए कानून बनाने शुरू किए. इनमें पाकिस्तानी मुस्लिमों से लेकर दूसरे धर्मों और बाहर से आए लोगों के लिए नियम-कायदे तय किए गए. ‘हुदूद ऑर्डिनेंस’ के तहत आने वाले ये कानून रूढ़िवादी और असहनीय थे. फिर 1985 में एक नियम आया कि सरकारी नौकरी करने वाली महिलाएं साड़ी नहीं पहन सकतीं. जिया के शासन में कट्टरपंथी साड़ी को हिकारत की नज़र से देखते थे, क्योंकि उन्हें ये भारत के ज़्यादा करीब दिखाई देती थी. यहीं से साड़ी के लिए नफरत शुरू हुई. उस समय वेस्टर्न स्टाइल के कपड़ों को भी ‘अवामी कपड़ों’ से बदल दिया गया था. ये वही कपड़े थे, जिन्हें भुट्टो महिलाओं और पुरुषों के लिए एक समान अधिकार और उपाय के तौर पर देखते थे.

भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ जिया उल हक (दाएं)
भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ जिया उल हक (दाएं)

‘पाकिस्तान’ और ‘साड़ी’ के साथ ‘इकबाल बानो’ जोड़ दीजिए, कमाल हो जाएगा

जिया उल हक के नियम-कायदों में साड़ी न पहनने के साथ-साथ फैज़ अहमद फैज़ को न गाना-सुनना भी शामिल था. ऐसे बेवकूफाने फैसलों का विरोध करने आगे आईं इकबाल बानो. रोहतक में पैदा हुईं, दिल्ली में पली-बढ़ीं इकबाल बानो बड़ी गज़ल गायिका हैं. उनकी सेमी-क्लासिकल उर्दू गज़ल और क्लासिकल ठुमली के अनगिनत मुरीद हैं. साल 1974 में पाकिस्तानी हुकूमत ने उन्हें ‘तमगा-ए-इम्तियाज़’ से नवाज़ा था. उन्होंने लाहौर स्टेडियम का रुख किया. उनकी महफिल के लिए खास इंतजाम किए गए थे और करीब पचास हज़ार से ज़्यादा लोग उन्हें सुनने आए थे.

फैज़ (बीच में) और इकबाल बानो (बाएं)
फैज़ (बीच में) और इकबाल बानो (बाएं)

इकबाल बानो काली साड़ी पहनकर मंच पर आईं और कहा, ‘आदाब… देखिए हम तो फैज़ का कलाम गाएंगे और अगर हमें गिरफ्तार किया जाए, तो मय साजिंदों के किया जाए, जिससे हम जेल में भी फैज़ को गाकर हुक्मरानों को सुना सकें.’ नज़्म शुरू हुई, पूरे स्टेडियम में फैल गई, उन सभी पचार हज़ारों को डुबा ले गई और जब इकबाल बानो ने गाया कि ‘सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख्त गिराए जाएंगे’, तो इतनी देर तक तालियां बजीं कि कोई उनके शोर के नीचे ही दब जाए. इकबाल बानो ने अपने हिस्से की मुखालफत जमकर की.

सुनिए इकबाल बानो की आवाज़ में फैज़ की ये नज़्म:

साड़ी पाकिस्तान के लिए क्या है?

पाकिस्तान की आज की पीढ़ी से पूछा जाए, तो उसके लिए साड़ी एक ललचाने वाली चीज़ है, जिसे वो दो वजहों से नहीं पहन पातीं. पहला, घर-समाज में मना कर दिया जाता है. दूसरा, पहनना मुश्किल होता है. पर साड़ी को लेकर पाकिस्तानी लड़कियों का लालच छिपता नहीं है. फिर चाहे quora पर गला खोलकर बताना हो कि वो साड़ी पहनती हैं या अब्दुल सत्तार जैसों को उनकी सीमा बतानी हो.

quora
‘क्या पाकिस्तान में लड़कियां साड़ी पहनती और बिंदी लगाती हैं?’ के सवाल पर एक पाकिस्तानी लड़की का जवाब.
shama-tweet
साड़ी पर सत्तार के बयान के बाद एक ट्वीट
साड़ी पर सत्तार के बयान के बाद एक ट्वीट
साड़ी पर सत्तार के बयान के बाद एक ट्वीट

ये वीडियो देखिए. ताली पीट देने का मन करेगा:

 


साड़ी पाकिस्तान की सॉफ्ट इमेज का हिस्सा है

28 जून 1972 को भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके पाकिस्तान समकक्ष जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच शिमला समझौता हुआ था. उस दौरे पर भुट्टो की बेटी बेनज़ीर भुट्टो भी आई थीं. तब वो लंदन में रहती थीं और किसी नेता नहीं, बल्कि नेता की बेटी की हैसियत से भारत आई थीं. बेनज़ीर जब पहली बार इंदिरा से मिलीं, तो उन्होंने अपनी बहन सनम का सलवार-सूट पहन रखा था.

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ सलवार-सूट में बेनज़ीर
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ सलवार-सूट में बेनज़ीर

30 जून को जब इंदिरा गांधी ने पाकिस्तानी डेलिगेशन को डिनर कराया, तो उसमें बेनज़ीर ने अपनी मां से ली हुई सिल्क की साड़ी पहनी. बेनज़ीर पूरे डिनर के दौरान नर्वस थीं, क्योंकि वो साड़ी कैरी नहीं कर पा रही थीं. बेनज़ीर उस डिनर में या उस दौरे पर कुछ भी पहन सकती थीं. वो कपड़े भी, जिन्हें वो लंदन में पहनती थीं. पर अपने मेजबान के साथ गर्मजोशी दिखाने का ये एक अच्छा तरीका है.

पिता जुल्फिकार और तब की पीएम इंदिरा गांधी के साथ साड़ी में बेनज़ीर
पिता जुल्फिकार और तब की पीएम इंदिरा गांधी के साथ साड़ी में बेनज़ीर

अभी की सियासत में ज़्यादा रुचि रखने वाले इसे यूं समझ सकते हैं कि अपने शपथ-ग्रहण में आए पाकिस्तानी पीएम नवाज शरीफ को विदा करते हुए पीएम मोदी ने उनकी मां के लिए शॉल भिजवाई थी और शरीफ ने जून 2014 में मोदी का शुक्रिया अदा करते हुए उनकी मां के लिए साड़ी भिजवाई थी. ये दोनों ही मुल्कों के कल्चर में हमेशा से रही है, जो एक जिया उल हक या एक सत्तार की बद्-मिजाजी से लोगों से दूर नहीं हो जाएगी.

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की भेजी साड़ी के साथ पीएम मोदी की मां और साथ में पीएम मोदी का शुक्रिया कहने वाला ट्वीट.
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की भेजी साड़ी के साथ पीएम मोदी की मां और साथ में पीएम मोदी का शुक्रिया कहने वाला ट्वीट.

पर पाकिस्तान में साड़ी का चार्म बना कैसे रहा?

बॉलीवुड है न. और रही-सही कसर डेली सोप्स ने पूरी कर दी. कई बार ताज्जुब होता है कि वहां के लोग हमारे यहां के टीवी शोज़ झेल कैसे लेते हैं. जो भी हो, इससे साड़ी को उनकी निगाहों के सामने बनी रहती है. हां, पहनने के लिहाज़ से स्थिति हर जगह एक जैसी नहीं है. जैसे नॉर्थ पाकिस्तान के मुकाबले साउथ पाकिस्तान में साड़ी ज़्यादा पहनी जाती है.

कराची में कई समुदायों के लोग रहते हैं, इसलिए यहां आपको साड़ियों की ढेर सारी वैरायटी मिलेंगी. नॉर्थ पाकिस्तान में साड़ी अधिकतर दुल्हन के लिबास के तौर पर देखी जाती है. नॉर्थ वेस्टर्न फ्रंटियर में चीज़ें बहुत अलग हैं. वहां साड़ी काफी हद तक गायब हो चुकी है और जो है भी, वो बुरके के पीछे छिपी हुई है.

एक फैशन शो में साड़ी पहने मॉडल
एक फैशन शो में साड़ी पहने मॉडल

इंदिरा गांधी का साड़ी वाला किस्सा

साड़ी पर हमारी बातचीत आज इस किस्से के साथ खत्म होगी. ‘इंदिरा: इंडियाज़ मोस्ट पॉवरफुल प्राइम मिनिस्टर’ किताब लिखने वाली पत्रकार सागरिका घोष एक किस्सा बतलाती हैं कि एक बार इंदिरा पश्चिम बंगाल के दौरे पर सर्किट हाउस में ठहरी थीं. इस मर्तबा जब वो खुली जीप में लोगों के सामने हाथ हिला रही थीं, तभी उनकी नज़र साड़ी पहने एक महिला पर पड़ी. इंदिरा इंटेलिजेंस चीफ गोपाल दत्त की ओर मुड़ीं और पूछा, ‘इस लड़की ने कौन सी साड़ी पहन रखी है?’

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी

दत्त ने अंदाजा लगाने वाले अंदाज़ में जवाब दिया, ‘शायद सिल्क की कोई साड़ी है.’ इंदिरा ने जवाब दिया, ‘वो सिल्क की साड़ी नहीं है. वो कोयंबटूर की हैंडलूम साड़ी है. आप किस तरह की जानकारी इकट्ठा कर रहे हैं.’ बाद में गोपाल ने उस लड़की से पूछा भी कि क्या वो वाकई कोयंबटूर हैंडलूम की साड़ी पहने है, तो लड़की का जवाब था, ‘जी हां’.


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