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जयपुर में खज़ाना खुदवाने का असली खलनायक यह शख्स था

स्कूल की तरफ से जयपुर के आमेर किले घुमाने ले जाया गया था. उस दौर में सेल्फी नहीं थी. लोग तसल्ली से चीज़ें देखा करते थे. उस घटना की एक-एक चीज़ यादाश्त में बैठी हुई है. जैसे ही हम किले के दरवाज़े से अंदर दाखिल हुए, एक आदमी दिखा जो बड़े ऊंचे स्वर में वहां मौजूद लोगों को कुछ समझा रहा था. उसने बोलना शुरू किया,

“ये सूरज पोल है. किले का मुख्य दरवाज़ा. यहां से आगे जो चौक आएगा इसे जलेबी चौक कहते हैं. इस जगह राजा और किले के सैनिकों के घोड़े खड़े किए जाते थे. राजा के सैनिक भी यहीं रहते थे.”

बस फिर क्या था. मैं और मेरी क्लास के कुछ और लड़के लाइन तोड़ कर गाइड के पीछे हो गए. वैसे भी हम सबसे पीछे चल रहे थे. स्कूल की लाइन और टीचर के खौफ से बेखबर हम लोगों ने पूरा किला गाइड के पीछे-पीछे घूमा. बीच में एक-दो दफा उसने हमें हिकारत से देखा भी. हम भी पूरी ढिठाई से उसके पीछे लगे रहे. हालांकि तब तक हमने अपने मौलिक अधिकारों के बारे में कायदे से नहीं पढ़ा था लेकिन हम जानते थे कि यह गाइड हमें अपने पीछे आने से नहीं रोक सकता था.

किले को देखने के बाद जब गाइड सूरज पोल से बाहर निकला तो उसने एक चौंका देने वाली कहानी सुनाई. कहानी कुछ इस तरह थी-

“आपातकाल के समय इंदिरा गांधी ने राजमाता गायत्री देवी को जेल में डाल दिया था. इसके बाद जयपुर में सेना भेज दी. किले की खुदाई की गई. खुदाई में यहां बहुत सारा सोना और हीरे-जवाहरात मिले. सोने को ट्रक में लाद कर दिल्ली ले जाया गया. इस दौरान तीन दिन तक दिल्ली-जयपुर हाईवे पर सेना के ट्रक के अलावा कोई गाड़ी नहीं चली. आज भी वो सोना भारत सरकार के खजाने में जमा है.”

बावजूद इसके कि हम आपातकाल का मतलब नहीं जानते थे, यह जानकारी सनसनीखेज़ थी. घर लौटकर जब मैंने अपने पिता से इस बाबत पूछा तो उन्होंने गाइड की बात की ही तसदीक की. लंबे समय तक खज़ाने के इस सनसनीखेज़ ब्योरे को मैं सच मानता रहा. क्या सचमुच जयपुर राजघराने का खज़ाना इंदिरा गांधी ने ज़ब्त कर लिया था? यह बात आज भी रहस्य बनी हुई है. लेकिन एक बात एकदम दुरुस्त है कि इंदिरा गांधी के शासनकाल में जयपुर शाही परिवार के कई स्थानों पर आयकर विभाग का छापा पड़ा था और राजमाता गायत्री देवी और उनके सौतेले बेटे कर्नल भवानी सिंह को आपातकाल के दौरान जेल में डाल दिया गया था.

आमेर का किला
आमेर का किला

क्योंकि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री कार्यकाल में गायत्री देवी को जेल भेजा गया था इसलिए आम धारणा में उन्हें ही इसके लिए ज़िम्मेदार माना गया. लेकिन इस सियासी ड्रामे का असल सूत्रधार बाद में देश का 14वां राष्ट्रपति बना. माने कि प्रणब मुखर्जी.

इस गिरफ्तारी के कारण पार्टी के साथियों ने साथ छोड़ दिया 

1977 में चुनाव हारने के बाद कांग्रेस में अंदरूनी घमासान मच गया. देवकांत बरुआ, वाई.बी. चव्हाण, सिद्धार्थ शंकर रे, चंद्रजीत यादव, प्रियरंजन दासमुंशी जैसे कई नेताओं ने पार्टी के भीतर इंदिरा विरोध के नाम पर गोलबंदी शुरू की. प्रणब उस कठिन दौर में इंदिरा के साथ खड़े थे. आम चुनाव के बाद 12 से 15 अप्रैल 1977 के बीच कांग्रेस की केन्द्रीय कार्यकारणी की बैठक हुई. इस बैठक में संजय गांधी की ‘गैंग ऑफ़ फोर’ (जिसमें संजय के अलावा वीसी शुक्ला, ओम मेहता और बंसीलाल थे) इंदिरा विरोधी धड़े का मुख्य निशाना थी. इधर बंगाल का धड़ा प्रणब मुखर्जी को घेरे हुए थे. इस तीन दिन की मीटिंग में प्रियरंजन दासमुंशी ने कई बार राजमाता गायत्री देवी और उनके सौतेले बेटे भवानी सिंह की गिरफ्तारी का आरोप प्रणब मुखर्जी पर लगाया. उन पर सत्ता के दुरुपयोग के इल्ज़ाम भी लगे.

इन आरोपों ने प्रणब मुखर्जी का लंबे समय तक पीछा नहीं छोड़ा. 1977 के बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद वो फिर से अपने ही पार्टी के नेताओं के निशाने पर आ गए. प्रणब मुखर्जी अपनी आत्मकथा The Dramatic Decade में लिखते हैं-

“नौ राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम भी बहुत अच्छे नहीं थे. हालांकि सभी राज्यों में लोकसभा चुनाव के मुकाबले प्रदर्शन थोड़ा सुधरा था, सिवाय पश्चिम बंगाल के.

विधानसभा चुनाव के बाद 23-24 जून को हुई केन्द्रीय कार्यकारणी की बैठक में मुझे बुलाया गया. यहां मेरे और डॉ रामसुभाग सिंह के बीच राजमाता गायत्री देवी की गिरफ्तारी को लेकर बहस हो गई. मैंने उनके सामने गायत्री देवी को गिरफ्तार करने का कारण बताया, लेकिन वो कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं थे. इसके अलावा कार्यकारणी के कुछ और सदस्य भी इस मामले में मेरे खिलाफ थे.”

इंदिरा गांधी और प्रणब मुखर्जी
इंदिरा गांधी और प्रणब मुखर्जी

जब प्रणब मुखर्जी ने शाह कमीशन को गच्चा देने की कोशिश की 

सियासी इल्ज़ामबाज़ी अपनी जगह, लेकिन क्या प्रणब मुखर्जी सच में गायत्री देवी की गलत तरह से गिरफ्तारी के लिए जिम्मेदार थे? इस बारे में निश्चित तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता. आपातकाल में हुई अनियमितताओं की जांच के लिए मोरारजी सरकार ने ‘शाह आयोग’ का गठन था. इस आयोग ने गायत्री देवी की गैरकानूनी गिरफ्तारी के लिए प्रणब मुखर्जी को ज़िम्मेदार पाया था.

प्रणब मुखर्जी दो मर्तबा कमीशन के सामने पेश हुए. अपनी पेशी के दौरान जो हुआ उसे प्रणब दा अपनी आत्मकथा The Dramatic Decade में इस तरह से दर्ज करते हैं-

“19 नवंबर 1977 को मुझे फिर से शाह कमीशन के सामने पेश होने के लिए कहा गया. इस बार की पेशी गायत्री देवी की COFEPOSA एक्ट के तहत हुई गिरफ्तारी के सिलसिले में थी. मैंने जस्टिस शाह के सामने सवाल उठाया कि हमें किसी किस्म की कानूनी सलाह लेने से क्यों रोका जा रहा है?

जस्टिस शाह ने जवाब दिया, “जांच के इस पड़ाव में मैं अपराधों में आपकी भागीदारी की पड़ताल कर रहा हूं. फिलहाल आप किसी भी मामले में प्रथमदृष्टया दोषी नहीं पाए गए हैं. जब आपको जांच कमीशन दोषी करार दे देगा, तब आपके पास कानूनी सुरक्षा हासिल करने का पूरा हक़ होगा. फिलवक्त आपसे उम्मीद है कि आप जांच में मेरा सहयोग करें.’

तब मैंने पूछा कि आप जिस सहयोग की उम्मीद कर रहे हैं वो स्वैच्छिक है या कानूनी तौर पर मैं ऐसा करने के लिए बाध्य हूं? जस्टिस शाह ने जवाब दिया कि आपका सहयोग आपकी मर्ज़ी पर निर्भर करता है. इसके बाद मैंने ‘सहयोग ना करने’ का निर्णय लिया. “

शाह कमीशन की रिपोर्ट
शाह कमीशन की रिपोर्ट

1980 में सरकार में लौटने के साथ ही इंदिरा गांधी ने इस कमीशन की रिपोर्ट की सभी उपलब्ध कॉपी खत्म करवा दी थीं. हालांकि कुछ प्रतियां फिर भी सलामत रह गई थीं. ऐसी ही एक प्रति सुप्रीम कोर्ट की बार लाइब्रेरी में थी. 2011 में तत्कालीन लोकसभा सांसद इरा सेजियां ने इस रिपोर्ट को फिर से प्रकाशित करवाया था. इस रिपोर्ट के मुताबिक प्रमब मुखर्जी ने ना सिर्फ गायत्री देवी और उनके बेटे कर्नल भवानी सिंह की गिरफ्तारी के आदेश दिए बल्कि उनकी गिरफ्तारी से जुड़ी फ़ाइल संख्या 686/100/75-CUS VIII/75 के साथ भी छेड़-छाड़ की. शाह कमीशन ने प्रणब मुखर्जी के असहयोगपूर्ण रवैये का भी ज़िक्र अपनी रिपोर्ट में किया.

शाह कमीशन की रिपोर्ट को लागू करवाने के लिए एलपी सिंह कमिटी का गठन हुआ. शाह कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर इस कमिटी ने गायत्री देवी की गिरफ्तारी के मामले में प्रणब मुखर्जी को पद के दुरुपयोग का दोषी पाया. इस कमिटी के आदेश पर प्रणब मुखर्जी पर “आपराधिक जालसाज़ी” का मुकदमा कायम हुआ. इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी के साथ ही यह मुकदमा भी उठा लिया गया.

कैसे पड़ा था छापा?

जयपुर से खज़ाना लाने की घटना अब किवदंती का रूप ले चुकी है. सामान्य तौर पर इस घटना को आपातकाल के दौरान का बताया जाता है, लेकिन जयपुर किले में छापे की घटना फरवरी 1975 की थी. आपातकाल लगाने में अभी चार महीने का वक़्त बाकी था. गायत्री देवी उस समय स्वतंत्र पार्टी से लोकसभा की सांसद थी. वो इंदिरा गांधी के खिलाफ मुखर थीं, चुनांचे जयपुर राजघराने पर आयकर के छापे के पीछे राजनीतिक कारण भी थे. राजमाता गायत्री देवी ने एक इंटरव्यू में इस पूरी घटना को इस तरह से याद किया था-

“फरवरी राजस्थान में एक ब्यूटीफुल महीना होता है. आसमान नीला होता है, फूल खिलना शुरू होते हैं, पंछी गाते हैं और दिन ठंडे व एकदम साफ होते हैं. इस खास दिन मैं बहुत खुश महसूस कर रही थी जितना जय (महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय) को खोने के बाद मैंने पहले नहीं किया था. दिन व्यस्तताओं भरा होने वाला था और मैं प्लानिंग कर रही थी. टैरेस पर योग करने के बाद मैं ब्रेकफास्ट करने गई. नाश्ता कर रही थी कि मेड ने आकर बताया कुछ अजनबी मुझसे मिलना चाहते हैं. मैंने उनको अंदर बुलाने के लिए कहा. वे आए और बोले, ‘हम इनकम टैक्स ऑफिसर हैं. हम आपके प्रांगण की छानबीन करने आए है.’ मैंने कहा, ‘करो फिर. लेकिन मेरे अपॉयंटमेंट्स हैं और मुझे अभी निकलना है.’ तो उन्होंने कहा कि कोई भी यहां से बाहर नहीं जा सकता.”

क्या सच में कोई खज़ाना मिला?

गायत्री देवी
गायत्री देवी

अब सवाल यह है कि छापेमारी और राजपरिवार के विभिन्न किलों में हफ़्तों चली खुदाई में आखिर हासिल क्या हुआ. गायत्री देवी ने एक इंटरव्यू में इसका ब्यौरा देते हुए कहा-

“छापेमारी दल का जो इंचार्ज अधिकारी था, वो उत्साह से भर गया जब उसे विशाल मात्रा में सोने के सिक्के मिले. इन सिक्कों को जय (मान सिंह द्वितीय) ही नाहरगढ़ के किले से मोती डूंगरी लाए थे जो भारतीय संघ में जयपुर रियासत के मिलने से पहले नाहरगढ़ किले के खज़ाने में रखे हुए थे. सौभाग्य की बात थी कि इस सोने का ज़िक्र जयपुर रियासत के आखिरी बजट में किया हुआ था तो एक-एक सिक्के का हिसाब था. लेकिन इसके बाद भी ये उत्पीड़न जारी रहा.”

ज़ाहिर है ये सिक्के ट्रकों में भरकर कहीं नहीं ले जाए गए थे और पूर्व-रियासत के पास इनका हिसाब था. गायत्री देवी की गिरफ्तारी इसके चार महीने बाद आपातकाल की घोषणा के बाद हुई. इस दोनों घटनाओं के पीछे का असल सूत्रधार प्रणब मुखर्जी को बताया जाता है.


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