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जैन हवाला केस क्या है, जिसके आरोपों के छींटे बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ के ऊपर पड़ रहे हैं

यह 1996 की 16 जनवरी थी. उस समय के नेता प्रतिपक्ष लालकृष्ण आडवाणी दिल्ली में पंडारा रोड के अपने बंगले में बड़ी सोच में डूबे हुए थे. लंबे सोच-विचार के बाद उन्होंने निर्णय लिया कि वो संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे देंगे. उनके राजनीतिक करियर में ये पहला मौका था, जब उन्होंने अपने सबसे विश्वसनीय साथी अटल बिहारी वाजपेयी की सलाह को सिरे से नकार दिया था. इस्तीफा देते हुए उन्होंने ऐलान किया कि जब तक वो जैन हवाला केस से बरी नहीं हो जाते, तब तक सदन में कदम भी नहीं रखेंगे. 1996 के संसद चुनावों के ठीक पहले की घटना है. उन्होंने अपना वादा निभाया भी. आनंद बाजार पत्रिका को दिए इंटरव्यू में उन्होंने अपने इस निर्णय के लिए कुछ इस तरह सफाई पेश की.

“ये काफी हद तक सिर्फ मेरा ही निर्णय था. मैं समझता हूं कि राजनीतिक विश्वसनीयता बुनियादी चीज है. लोग हमें वोट देते हैं और हमें उनका विश्वास कायम रखना पड़ता है. अपनी जिंदगी में मैंने सिर्फ अपनी चेतना की आवाज सुनी है. लेकिन मुझे पता है कि मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है, इसलिए मुझे किसी भी चीज से डरने की जरूरत नहीं है.”

क्या था जैन हवाला कांड, जिसमें फंसे थे आडवाणी

25 मार्च 1991. कश्मीर उस समय अशांति का शिकार था. दिल्ली पुलिस को हफ़्तों की भाग-दौड़ के बाद एक बड़ी लीड मिली थी. जमायत-ए-इस्लामी के दिल्ली हेडक्वॉटर से एक कश्मीरी नौजवान को गिरफ्तार किया गया. नाम था अशफाक हुसैन लोन. अशफाक की निशानदेही पर शहाबुद्दीन गोरी नाम के एक और युवक को जामा मस्जिद इलाके से उठाया गया. गोरी उस समय JNU का छात्र हुआ करता था. पूछताछ में पता लगा कि दोनों युवक हवाला के जरिए पैसा हासिल कर उसे आतंकवादी संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट तक पहुंचाते थे. ये पैसा लंदन से कोई डॉ. अयूब ठाकुर और दुबई से तारिक भाई नाम के दो शख्स भेजा करते थे. यहां से यह मामला CBI को सौंप दिया गया.

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3 मई, 1991 को CBI ने विभिन्न हवाला कारोबारियों के 20 ठिकानों पर छापा मारा. इसमें भिलाई इंजीनिरिंग कॉर्पोरेशन के प्रबंध निदेशक सुरेंद्र कुमार जैन के महरौली स्थित फार्म हाउस पर छापे की कार्रवाई शामिल थी. उनके भाई जे.के. जैन के दफ्तर पर भी छापा पड़ा. इसमें 58 लाख रुपए से ज्यादा नकद, 10.5 लाख के इंदिरा विकास पत्र और चार किलो सोना बरामद किया गया. इसके अलावा 593 अमेरिकी डॉलर, 300 पाउंड, डेनमार्क की मुद्रा 27 हजार, हॉन्ग कॉन्ग की 50 हजार मुद्रा, 300 फ्रैंक सहित 50 अलग-अलग देशों की मुद्रा भी बरामद की गईं. इसके अलावा दो संदेहास्पद डायरी भी मिलीं.

इस छापे के महीने भर बाद 16 जून, 1991 को CBI के DIG ओ.पी. शर्मा को सस्पेंड कर दिया गया. उन पर आरोप था कि टाडा के अधीन मुकदमा न बनाने के एवज में उन्होंने जैन बंधुओं से 10 लाख रुपए बतौर घूस लिए. उस समय ये कयास लगाए जाने लगे कि शर्मा को सिर्फ इसलिए सस्पेंड किया गया है, ताकि इस मामले में जांच को आगे न बढ़ाया जा सके. हालांकि, 2013 में ओपी शर्मा अदालत में इस मामले में दोषी करार दिए गए.

भूरे लिफाफे में बंद काले चिट्ठे

ये अगस्त 1993 के शुरुआती हफ्ते की बात है. एक उमस भरी दोपहर में जनसत्ता के उस समय के ब्यूरो चीफ रामबहादुर राय ने क्राइम रिपोर्टर राजेश जोशी की मेज पर भूरा लिफाफा लाकर पटक दिया. इसमें 1991 के CBI छापे में एसके जैन के घर से बरामद की गईं दो डायरियों की कॉपी थी. राय को ये कॉपी उनके किसी सूत्र से मिली थीं. राजेश जोशी को डायरी की कॉपी पढ़ने को दी गईं, ताकि इसके आधार पर स्टोरी बनाई जा सके.

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दरअसल खबर का आखिरी सिरा एक महीने पुराना था. 1993 की जून की 22वीं तारीख थी. उस गर्म दोपहर डॉ. सुब्रमण्यन स्वामी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी. तब वो नरसिम्हा राव सरकार में हुआ करते थे. उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया था कि उनके पास पर्याप्त सबूत हैं, जिससे ये साबित हो सके कि लालकृष्ण आडवाणी ने हवाला कारोबारी एस.के. जैन से दो करोड़ रुपए लिए थे. इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में जनसत्ता के पत्रकार दिनकर शुक्ल गए हुए थे. उन्होंने दफ्तर आकर इस पर दो कॉलम की एक स्टोरी की, लेकिन अपने अनुभव से राय को अंदाजा मिल गया कि यह खबर इससे कहीं बड़ी है. वो अगले दिन ही डॉ. स्वामी से मिलने उनके घर 8 सफदरजंग रोड पहुंच गए. राय याद करते हैं-

“जब मैंने दो कॉलम की ये खबर देखी, तो समझ में आ गया कि ये इससे कहीं बड़ी खबर है. अगले दिन दोपहर मैं सीधा डॉ. स्वामी के बंगले पर पहुंच गया. वहां पर उन्होंने मुझे कोई ठोस जानकारी नहीं दी. केवल इतना कहा कि आप पता लगाएं. आपके दोस्त को इस मामले की पूरी जानकारी है.”

राजेश जोशी डायरी में दर्ज नामों की पुष्टि के लिए CBI दफ्तर के चक्कर लगाते रहे. अंत में उन्हें नए नियुक्त हुए CBI महानिदेशक के. विजय रामाराव का इंटरव्यू करने का मौका मिला. जोशी घटना को याद करते हैं –

“कई प्रयासों के बाद मुझे इंटरव्यू की इजाजत मिली. मैंने उनसे पहला ही सवाल किया, ‘क्या एस.के. जैन की डायरी पर कोई कार्रवाई होगी, जिसे CBI पिछले दो साल से दबाकर बैठी है?’ उन्होंने मुझसे पूछा कि मुझे ये जानकारी कहां से मिली. मैंने ये बताने से इनकार कर दिया. इसके बाद उन्होंने लंबी सांस भरते हुए कहा, ‘हां, जल्द ही इस मामले में जांच शुरू की जाएगी.’ मुझे अपनी खबर के लिए जरूरी पुष्टि मिल चुकी थी.”

लंबी पड़ताल के बाद ये स्टोरी 17 अगस्त, 1993 को पहली मर्तबा छपी, लेकिन इस खबर में किसी का नाम नहीं था. नाम छापने को लेकर जनसत्ता की संपादकीय टीम में एक राय नहीं बन पा रही थी. अंत में ये तय हुआ कि नाम छापे जाएंगे. 23 अगस्त को जनसत्ता ने पहले पन्ने पर ये खबर नेताओं के नाम के साथ छापी. इसने राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया.

सकते में लोकतंत्र

जनसत्ता की खबर के बाद 12 नवंबर, 1994 को निखिल चक्रवर्ती के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ‘मेन स्ट्रीम’ में समाजवादी नेता मधु लिमये के हवाले से एस.के. जैन की डायरी में कथित तौर पर दर्ज नाम छापे गए. इसमें तीन कैबिनेट मंत्री सहित सरकार के सात मंत्रियों, कांग्रेस के कई बड़े नेताओं, दो राज्यपालों और नेता प्रतिपक्ष लालकृष्ण आडवाणी का नाम भी लिखे गए. इस लिस्ट में 55 नेता, 15 बड़े ओहदे वाले सरकारी अफसर और एस.के. जैन के 22 सहयोगियों को मिलाकर कुल 92 नामों की पहचान की गई थी. शेष 23 नामों को पहचाना नहीं जा सका.

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इस कथित खुलासे में लालकृष्ण आडवाणी पर 60 लाख रुपए, बलराम जाखड़ पर 83 लाख, विद्याचरण शुक्ल पर 80 लाख, कमलनाथ पर 22 लाख, माधवराव सिंधिया पर 1 करोड़, राजीव गांधी पर 2 करोड़, शरद यादव पर 5 लाख, प्रणव मुखर्जी पर 10 लाख, एआर अंतुले पर 10 लाख, चिमन भाई पटेल पर 2 करोड़, एनडी तिवारी पर 25 लाख, राजेश पायलट पर 10 लाख और मदन लाल खुराना पर 3 लाख रुपए लेने के आरोप लगे. मार्च 1989 से लेकर 1991 तक कुल 64 करोड़ रुपए बांटे जाने का ब्योरा दर्ज था. ये अनुमान लगाया गया कि इस दौरान देश में दो लोकसभा चुनाव हुए थे. बहुत संभव है कि ये पैसा लोकसभा चुनाव के दौरान चुनावी प्रचार के दौरान इस्तेमाल किया गया हो.

एस.के. जैन का कबूलनामा

इस मामले में अखबारों और पत्रिकाओं में लगातार खुलासे होने से CBI पर दबाव पड़ रहा था. आखिरकार CBI ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए मार्च 1995 में एस.के. जैन को गिरफ्तार कर लिया. जैन ने इस मामले में अदालत के सामने जो लिखित बयान दिया, उसके खुलासे और अधिक चौंकाने वाले थे.

एस.के. जैन ने बताया कि 1991 में मार्च से मई के बीच राजीव गांधी को चार करोड़ रुपए पहुंचाए गए. उन्होंने इस घटना का जिक्र अपने बयान में कुछ इस तरह किया:

“राजीव गांधी की तरफ से मुझे कहा गया था कि मुझे चार करोड़ रुपए का भुगतान करना होगा. इसमें से दो करोड़ रुपए जॉर्ज, जो राजीव गांधी का निजी सेक्रेटरी था, मेरे घर से लेकर गया था. ये रकम अदा करने के लिए मैंने जे.के. जैन से पैसे लिए थे. उसे इस बात का पता था कि पैसे राजीव गांधी के पास जा रहे हैं. इसलिए मार्च 1991 की तारीख डाल कर उसने ‘RG’ नाम से एंट्री डाल दी. इसके अलावा दो करोड़ रुपए सीताराम केसरी को भी दिए गए, जो उस समय कांग्रेस के खजांची हुआ करते थे. उस समय तक डायरी CBI जब्त कर चुकी थी, इसलिए इस बाबत कोई एंट्री नहीं है.”

इसी तरह जैन ने नरसिम्हा राव और चंद्रास्वामी को भी साढ़े तीन करोड़ रुपए देने का दावा किया. इसमें कांग्रेस नेता सतीश शर्मा को बिचौलिए की भूमिका में बताया. जैन का आरोप था कि उन्होंने नरसिम्हा राव को 50 लाख, सतीश शर्मा को 50 लाख और चंद्रास्वामी को ढाई करोड़ रुपए दिए. इसके अलावा ये भी बताया कि क्वात्रोची के जरिए वो किस तरह हवाला कारोबारी आमिर भाई के संपर्क में आया. तमाम सरकारी टेंडर पास करवाने का कमीशन किस तरह उसके पास हवाला के जरिए आता रहा.

CBI ने उस समय ये कहकर बयान को तवज्जो देने से इनकार कर दिया कि जैन द्वारा किए गए सभी दावे अपुष्ट हैं, और इन्हें सबूत के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता. पूछताछ के दौरान जैन ने भी बहुत शातिर तरीके से केवल उन लेन-देन का जिक्र किया, जो डायरी में मौजूद नहीं थे. डायरी में दर्ज नामों में सिर्फ राजीव गांधी के बारे विस्तार से जिक्र हुआ, जो उस समय दुनिया में नहीं थे. गिरफ्तारी के 20 दिन बाद 23 मार्च को जैन को जमानत पर रिहा कर दिया गया.

बेदाग छूटे लोग कितने बेदाग हैं?

इस मामले में CBI जांच पर शुरुआत से ही संदेह जताया जाता रहा. 3 मई 1991 के छापे अशफाक और शहाबुद्दीन गोरी की निशानदेही पर डाले गए थे, लेकिन चार्जशीट में इसका कोई जिक्र नहीं किया गया. एसके जैन की डायरी पर CBI ने दो साल तक कुछ बड़ा नहीं किया. मामले के सामने आने के लगभग चार साल बाद पहली बार एसके जैन की गिरफ्तारी की गई और पूछताछ हुई. सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश जेएस वर्मा ने CBI को खूब फटकार लगाई, लेकिन नतीजा सिफर रहा. अंत में उन्हें कहना पड़ा कि वो घोड़े को तालाब तक ले जा सकते हैं, उसे पानी पीने के लिए मजबूर नहीं कर सकते.

जस्टिस वर्मा
जस्टिस जेएस वर्मा

जैसे-तैसे करके 16 जनवरी, 1996 को इस मामले में चार्जशीट दायर होती है. सबसे पहले दो नेताओं का नाम इस चार्जशीट में आता है. पहले एल.के. आडवाणी और दूसरे विद्याचरण शुक्ला. इसके बाद 25 नेता जांच के दायरे में आ जाते हैं. जांच शुरू होती है. 8 अप्रैल, 1997 को हाईकोर्ट के जज मोहम्मद शमीम अपने फैसले में लालकृष्ण आडवाणी और वीसी शुक्ला को बाइज्जत बरी कर देते हैं.

तो क्या ये साबित हो गया कि लालकृष्ण आडवाणी या दूसरे किसी नेता ने पैसा नहीं लिया था? दरअसल ऐसा नहीं था. कोर्ट ने डायरी को बुक ऑफ़ अकाउंट मानने से ही इनकार कर दिया था. सरल शब्दों में कहा जाए, तो कोर्ट ने इसे सबूत ही नहीं माना. जस्टिस शमीम का कहना था कि ये दस्तावेजों का ऐसा पुलिंदा है, जिसमें कोई भी चीज आसानी से जोड़ी या हटाई जा सकती है. इस लिहाज से इसे सबूत की तरह नहीं लिया जा सकता. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का निर्णय बरकरार रखते हुए कहा कि CBI डायरी में दर्ज नामों के अलावा कोई और सबूत नहीं पेश कर पाई.

ख़ास बात ये है कि ये सब तब हुआ, जब इस मामले में आरोपी शरद यादव ने एक टीवी इंटरव्यू में खुद स्वीकार किया था कि उन्हें किसी जैन ने पांच लाख रुपए बतौर चंदे के दिए थे. 14 जुलाई, 1997 को मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस जेएस वर्मा ने इस मामले में टिप्पणी करते हुए कहा कि इस केस के चलते उन पर लगातार दबाव पड़ रहा है.

(लल्लनटॉप पर ये स्टोरी 22 मई 2017 को प्रकाशित हुई थी)


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