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हमें शर्म आनी चाहिए, कि बाहुबली जैसी औसत फिल्म को हमने महान बना दिया है

बाहुबली-2 ने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकोर्ड तोड़ दिए हैं. इस फिल्म को रिलीज़ हुए एक हफ्ता हो चुका है और अब भी देश भर के सिनेमा घरों में इस फिल्म के लिए भीड़ कम नहीं हो रही है. भव्यता और विश्व स्तरीय सिनेमेटोग्राफी के साथ फ्रैंचाइजी का ये बड़ा प्रयोग बहुत सफल रहा.

लेकिन इस फिल्म का लोगों को पसंद आने का कारण, महज़ फिल्म के अच्छे बनने की तारीफ से ज़्यादा बड़ा है. इसने बाहुबली को उस आइकन के कुर्सी तक पहुंचा दिया है. जिसने दिल चुरा लिए हैं. फिल्म जिसने अपने शूरवीर चित्रण में कोई कसर नहीं छोड़ी. दर्शक इस फिल्म की बहुत ज़्यादा तारीफ कर रहे हैं.

जिस फिल्म के हीरो में साहस, नम्रता, दया और दिमाग जैसी चीज़े होंगी, ऐसी फिल्म के लिए किसके दिल में सॉफ्ट कॉर्नर नहीं होगा? इसके साथ ही एक तेलुगु फिल्म को देश भर में इतना पसंद किया जा रहा है.

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जिस तरीके से इस फिल्म में जातिवाद, राजतंत्र, हिंसा और कुछ हद तक पुरुष-प्रधान सोच को दिखाया गया है, मुझे समझ नहीं आ रहा लोगों को इससे दिक्कत कैसे नहीं हो रही?

फिल्म में कई बार उन लोगों के लिए बड़ा पॉज़िटिव दिखाया जो ‘क्षत्रिय धर्म’ फॉलो करते हैं. बाहुबली दर्शकों को अपने हीरो के क्षत्रिय गौरव का रोब दिखाती है. इसके अलावा, कटप्पा की गुलामी और उसकी अंधभक्ति, जातिवाद है.

अपने धर्म के प्रति वफादारी दिखाने के लिए जब कटप्पा का गलत काम करना बहुत डिस्टर्बिंग था.

जिस तरीके से दर्शक ऐसे एक्ट और ‘नैतिकता’ पर तालियां बजा रहे हैं, उससे पता चलता है कि हम असल में कैसी सोच रखते हैं. बस उसे सबके सामने ज़ाहिर नहीं करते. हमारे मन को ज़रा सा कुरेदने पर ही हमारी जातिवाद मानसिकता बाहर आ जाएगी.

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जब बाहुबली उस सेना प्रमुख का सिर धड़ से अलग कर देता है, जिसने उसकी पत्नी को छेड़ा होता है, तब हमें उसका एक्शन बिलकुल सही लगता है. तो समझना चाहिए कि क्यों हमारे समाज में गौरक्षक, बदले के लिए दुश्मन आर्मी के जवानों के सिर काटने की दलील देने वाले, या संदिग्धों की एनकाउंटर हत्या की मांग करने वाले, तनाव महसूस करते हैं.

पुराने तरीके, जो अमानवीय और अपमानजनक होते थे, जिसमें सिर कलम कर देने जैसा दंड शामिल था, हमें वही सही लगते हैं. अब चाहें वो किसी फिल्म में बाहुबली के हाथों हो या असल जिंदगी में राज्याधिकारियों के हाथों किया गया हो.

आज की न्याय प्रणाली आदमी के दिमाग को समझते हुए बनाई गई है. जिसमें समझा गया है कि हम में से कोई भी बहुत बुरा नहीं है. इसलिए वो अच्छाई जो हम में से हर किसी में है, उसे दूसरा मौका मिलना चाहिए.

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फिर भी, हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा, सरल और खतरनाक दोनों चीज़ो को सफेद या काला ही देखता है. जैसा कि फिल्म में हुआ है, जिसमें बाहुबली को बहुत शरीफ और उसके दुश्मन भल्लाल देव को बहुत शातिर दिखाया है.

फिल्म में बाहुबली को अपने बेटे की तरह ही अद्भुत ताकतों वाला दिखाया गया है. राजशाही व्यवस्था ने इस विश्वास को आगे बढ़ाया है कि शाही खून लोगों को असाधारण कौशल देता है. जैसा इस फिल्म में बाहुबली, उसकी पत्नी और उनके बेटे को दिखाया गया है. असल ज़िंदगी में इस बात का कोई भी वैज्ञानिक तर्क नहीं है.

ऐसे में इस बात से कोई आश्चर्य नहीं होता कि क्यों हमारे चुने गए नेता अभी तक राज कर रहे हैं, जैसे वो कोई अलग शक्तियां लेकर पैदा हुए हों.

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बाहुबली में मज़बूत महिला कैरेक्टर्स को भी दिखाया गया है, जो अंत में आदमियों के खेलने की वस्तु बन जाती हैं.

हमें फिल्म में दिखाए जा रहे जातिवाद और राजशाही पर खुश होने की बजाय, पास्ट के उन लोगों की निंदा करनी चाहिए जो ऐसी मानसिकता फैला गए. चाहें वो उस समय के नायक ही क्यों न हों.

ये आर्टिकल ‘डेली ओ’ के लिए अपूर्व पाठक ने लिखा है. इसका ट्रांसलेशन ‘दी लल्लनटॉप’ के साथ इंटर्नशिप कर रही रुचिका ने किया है.


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