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ये सच है कोई कहानी नहीं, खून खून होता है पानी नहीं

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आज कार्ल लैंडस्टीनर का बर्थडे है. सुबह-सुबह गूगल ने बता ही दिया. नया वाला डूडल लगा के. मुझे मेरी नौवीं क्लास की बायोलॉजी की किताब याद आ गयी. जब पहली बार ये नाम पढ़ा था. बायोलॉजी वाली मैम साउथ इंडियन थीं. हर सवाल के जवाब पर पूछती थीं, ‘आर यू सुअर?’ जब ब्लड वाला चैप्टर पढ़ा रही थीं. तब इन महानुभाव का नाम आया था. कार्ल लैंडस्टीनर. बड़ा साइंटिस्ट.

लैंडस्टीनर ने बताया था कि सबका खून अलग-अलग ग्रुप का होता है. A, B, AB और O. फिर उसमें भी पॉजिटिव और नेगेटिव. तब लगा था, भाई वाह. क्या गज़ब आदमी रहा होगा. लेकिन फिर समझ आ गया. इन ब्लडग्रुप्स के चक्कर में कार्ल साहब ने बहुत बुद्धू बनाया हम लोगों को.

हमारे नाना पाटेकर चीख-चीख कर समझाते रह गए. हम सबका खून एक जैसा है. चाहे हिन्दू हो या मुसलमान.

फिर ये एक कार्ल लैंडस्टीनर नौवीं क्लास में आकर कह देते हैं कि हम सबका खून भी वर्ण व्यवस्था का शिकार है. A ब्लडग्रुप वाले B ब्लडग्रुप वालों को खून नहीं दे सकते. हर कोई अपने-अपने वाले से ही लेन-देन कर सकते हैं. कुछ O ब्लडग्रुप वालों जैसे ज्यादा ही दानी लोग होते हैं. वो सबको खून बांट सकते हैं. और जिन लोगों की अंटी से एक्को पइसा नहीं निकलता, AB ब्लड ग्रुप वाले. वो लोग बस सबसे ब्लड लेते रहते हैं.

कार्ल साहब कहते हैं, कि अगर किसी को खून चढ़ाना होता है तो उससे पहले ब्लड कम्पैटिबिलिटी भी चेक करनी पड़ती है. खून देने वाले और खून लेने वाले के बीच. नहीं तो जिसको गलत खून चढ़ा दिया, उसके खून के थक्के बन जाते हैं. रगों में बहना बंद हो जाता है. कुल मिला कर उसका बोरिया बिस्तर बंध जाता है. अब मैम ने पढ़ाया था. वो भी साउथ इंडियन इंग्लिश में. हर बात सच लगती थी. लेकिन फिर एक संडे ‘अमर अकबर एन्थोनी’ देख ली. कसम से. साइंस पर से पूरा विश्वास उठ गया.

ये फिल्म देख कर समझ आया. मनमोहन देसाई साहब कार्ल लैंडस्टीनर से बड़के वाले साइंटिस्ट थे. एक एपिक सीन. मां को खून देते हुए तीन बेटे. अमर, अकबर और एंथोनी. डॉक्टर ने किसी का भी ब्लड ग्रुप चेक नहीं किया. मोटे-मोटे ट्यूब से तीनों का खून निकाला जा रहा है. तीनों का खून एक बोतल में जाता है. बोतल उन तीनों के लेवल से ऊपर लटक रही है. और बिना किसी पंप के खून ऊपर चढ़ रहा है. ग्रैविटी के अपोज़िट. मतलब 10 सेकंड में मेडिकल साइंस और फिजिक्स के नियमों को रद्द कर दिया गया. फिर ये खून एक दूसरी बोतल में जाता है. जहां से एक पाइप से इसको मां के शरीर में भेजा जाता है. कार्ल लैंडस्टीनर यहां भी फुद्दू साबित हो गए. वो तो कहते थे कि किसी के शरीर से खून निकाल कर सीधे पेशेंट को नहीं चढ़ाया जा सकता. उसमे कुछ केमिकल मिलाने पड़ते हैं. तो क्या हमारे मनमोहन देसाई जी झूठ बोलेंगे?

इस सीन में इत्ते लोग रोए हैं. मां बेटों का रिश्ता इतनी ख़ूबसूरती से दिखाया गया है. क्या कार्ल लैंडस्टीनर की रिसर्च पर कभी कोई इमोशनल हुआ होगा?

फिर साइंटिस्ट लोग तो ये भी कहते हैं. कोई अंग ट्रांसप्लांट करना हो तो उसके लिए भी खून चेक करना पड़ता है. वहां पर भी ये A, B, AB और O का चक्कर आ जाता है. लेकिन हमारी फिल्मों के पास इसका भी जवाब है. हार्ट उठाओ, खींच के फेंको. सीधे जाकर पेशेंट के सीने में लग जाए. हार्ट में बत्तियां जलने लग जाएं. मतलब बिना खून निकले दिल बॉडी में फिट हो गया. डॉक्टर भी खुश हो गया. कोई बड़ी बात नहीं हैं. ऐसे तो यहां दिल, फेफड़े, गुर्दे उड़ते ही रहते है. आ गया होगा कहीं से. मोटा सा सूजा लेकर सिल भी देता है. ऊन जैसी रस्सी से. बस पेशेंट एकदम टनाटन. तो कार्ल लैंडस्टीनर साहब, आप अपना साइंस रखिए अपने पास. हमारे सिनेमा के पास हर बात का जवाब है. क्योंकि यही तो कला है. बाकि सब तो विज्ञान है.

वैसे देर से ही सही, हैप्पी वाला बड्डे कार्ल लैंडस्टीनर. 

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Its Karl Landsteiner’s 148th birthday who invented the idea of blood groups

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