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इस्मत लिखना शुरू करेगी तो उसका दिमाग़ आगे निकल जाएगा और अल्फ़ाज़ पीछे हांफते रह जाएंगे

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इस्मत आपा वाला हफ्ता चल रहा है.  आज हम आपको जो पढ़ा रहे हैं वास्तव में वो सआदत हसन मंटो द्वारा लिखा हुआ संस्मरण है.जो इस्मत चुगताई के कहानी संग्रह ‘चिड़ी की दुक्की’ की भूमिका के रूप में प्रकाशित हुआ था. वाणी प्रकाशन के सौजन्य से हम आप तक ये पहुंचा पाए हैं.  

इस किताब का ब्योरा ये रहा.

चिड़ी की दुक्की (कहानी संग्रह)
संस्करण : 2014
पृष्ठ संख्या : 92
मूल्य : 95 (पेपरबैक)


आज से तक़रीबन डेढ़ बरस (इस्मत के दिफ़ा में लिखा गया यह दोस्त-नवाज़ मज़मून 1947 के आसपास की तहरीर है.) पहले जब मैं बम्बई में था, हैदराबाद से एक साहब (यह ‘एक साहब’ मोहम्मद असदउल्लाह हैं, जो इन दिनों बर्लिन में मुलाज़िम हैं. असदउल्लाह ने, 1955 में, मण्टो के आख़िरी दिनों के बारे में एक किताब लिखी थी) का पोस्ट कार्ड मौसूल1 हुआ. मज़मून कुछ इस किस्म का था.

‘‘यह क्या बात है कि इस्मत चुग़ताई ने आपसे शादी न की? मण्टो और इस्मत, अगर यह दो हस्तियां मिल जातीं तो कितना अच्छा होता. मगर अफ़सोस कि इस्मत ने शाहिद से शादी कर ली और मण्टो…’’
उन्हीं दिनों हैदराबाद में वक़ीपसंद मुसन्निफ़ों2 की एक कॉन्फ्रेंस हुई. मैं उसमें शरीक नहीं था.
मैंने हैदराबाद के एक पर्चे में उसकी रूदाद3 देखी, जिसमें यह लिखा था कि वहां बहुत-सी लड़कियों ने इस्मत को घेरकर यह सवाल किया: ‘‘आपने मण्टो से शादी क्यों नहीं की?’’

मुझे मालूम नहीं कि यह बात दुरुस्त है या ग़लत, लेकिन जब इस्मत बम्बई वापस आयी तो उसने मेरी बीवी से कहा कि हैदराबाद में जब एक लड़की ने उससे सवाल किया, क्या मण्टो कुंवारा है, तो उसने ज़रा तंज़ के साथ जवाब दिया, जी नहीं, इस पर वह मोहतरमा इस्मत के बयान के मुताबिक़ कुछ खिसियानी-सी होकर ख़ामोश हो गयीं.

वाक़िआत कुछ भी हों, लेकिन यह बात गै़र-मामूली तौर पर दिलचस्प है कि सारे हिन्दुस्तान में एक सिर्फ़ हैदराबाद ही ऐसी जगह है, जहां मर्द और औरतें मेरी और इस्मत की शादी के मुताल्लिक़ फ़िक्रमन्द रहे हैं.

उस वक़्त तो मैंने ग़ौर नहीं किया था, लेकिन अब सोचता हूं. अगर मैं और इस्मत वाक़ई मियां-बीवी बन जाते तो क्या होता? यह ‘अगर’ भी कुछ उसी क़िस्म की अगर है, यानी अगर कहा जाए कि अगर क्लियोपैट्रा की नाक एक इंच का अट्ठारहवां हिस्सा बड़ी होती तो उसका असर वादी-ए-नील की तारीख़ पर क्या पड़ता लेकिन यहां न इस्मत क्लियोपैट्रा है और न मण्टो, एंटनी. इतना ज़रूर है कि अगर मण्टो और इस्मत की शादी हो जाती तो इस हादिसे का असर अहदे-हाज़िर के अफ़सानवी अदब की तारीख़ पर एटमी हैसियत रखता. अफ़साने, अफ़साने बन जाते, कहानियां मुड़-तुड़ कर पहेलियां हो जातीं. इंशा की छातियों में सारा दूध ख़ुश्क होकर या तो एक नादिर सुफ़ूफ़ की शक्ल इख़्तियार कर लेता या भस्म होकर राख बन जाता और यह भी मुमकिन है कि निकाह-नामे पर उनके दस्तख़त उनके क़लम की आख़िरी तहरीर होते. लेकिन सीने पर हाथ रखकर यह भी कौन कह सकता है कि निकाह-नामा होता. ज़्यादा क़रीने-क़यास तो यही मालूम होता है कि निकाह-नामे पर दोनों अफ़साने लिखते और काज़ी साहब की पेशानी पर दस्तख़त कर देते ताकि सनद रहे.
निकाह के दौरान में कुछ ऐसी बातें भी हो सकती थीं

‘‘इस्मत, काज़ी साहब की पेशानी, ऐसा लगता है, तख़्ती है.’’
‘‘क्या कहा?’’
‘‘तुम्हारे कानों को क्या हो गया है.’’
‘‘मेरे कानों को तो कुछ नहीं हुआ…तुम्हारी अपनी आवाज़ हलक़ से बाहर नहीं निकलती.’’
‘‘हद हो गयी…लो अब सुनो. मैं यह कह रहा था, काज़ी साहब की पेशानी बिल्कुल तख़्ती से मिलती-जुलती है.’’
‘‘तख़्ती तो बिल्कुल सपाट होती है.’’
‘‘यह पेशानी सपाट नहीं?’’
‘‘तुम सपाट का मतलब भी समझते हो?’’
‘‘जी नहीं.’’
‘‘सपाट माथा तुम्हारा है….काज़ी जी का माथा तो…’’
‘‘बड़ा ख़ूबसूरत है.’’
‘‘ख़ूबसूरत तो है.’’
‘‘तुम महज़ चिढ़ा रही हो मुझे.’’
‘‘चिढ़ा तो तुम रहे हो मुझे.’’
‘‘मैं कहता हूं, तुम चिढ़ा रही हो मुझे.’’
‘‘मैं कहती हूं, तुम चिढ़ा रहे हो मुझे.’’
‘‘अजी वाह, तुम तो अभी से शौहर बन बैठे.’’
‘‘काज़ी साहब, मैं इस औरत से शादी नहीं करूंगा…अगर आपकी बेटी का माथा आपके माथे की तरह है तो मेरा निकाह उससे पढ़वा दीजिए.’’
‘‘काज़ी साहब मैं इस मर्दुए से शादी नहीं करूंगी…अगर आपकी चार बीवियां नहीं हैं तो मुझसे शादी कर लीजिए. मुझे आपका माथा बहुत पसन्द है.’’

अगर हम दोनों की शादी का ख़याल आता तो दूसरों को हैरतो-इज़ितराब में गुम करने के बजाय हम ख़ुद उसमें गर्क़ हो जाते, और जब एकदम चौंकते तो यह हैरत और इज़ितराब जहां तक मैं समझता हूं, मसर्रत के बजाय एक बहुत ही बड़े फ़काहिए में तब्दील हो जाता. इस्मत और मण्टो, निकाह और शादी. कितनी मज़्हका-खे़ज़5 चीज़ है.

इस्मत लिखती है-“एक ज़रा-सी मुहब्बत की दुनिया में कितने शौकत, कितने महमूद, अब्बास, असकरी, यूनुस और न जाने कौन-कौन ताश की गड्डी की तरह फेंट कर बिखेर दिये गये हैं. कोई बताओ, उनमें से चार पत्ता कौन-सा है? शौकत की भूखी-भूखी कहानियों से लबरेज़ आंखें, महमूद के सांपों की तरह रेंगते हुए आज़ा, असकरी के बेरहम हाथ, यूनुस के निचले होंठ का स्याह तिल, अब्बास की खोई-खोई मुस्कराहटें और हज़ारों चौड़े-चकले सीने, कुशादा पेशानियां, घने-घने बाल, सुडौल पिंडलियां, मज़बूत बाज़ू , सब एक साथ मिलकर पक्के सूत के डोरों की तरह उलझ कर रह गये हैं. परेशान हो होकर उस ढेर को देखती हूं, मगर समझ में नहीं आता कि कौन-सा सिरा पकड़कर खींचूं कि खिंचता ही चला आये और मैं उसके सहारे दूर उफ़ुक़ से भी ऊपर एक पतंग की तरह तन जाऊं.

मण्टो लिखता है-मैं सिर्फ़ इतना समझता हूं कि औरत से इश्क़ करना और ज़मीनें ख़रीदना तुम्हारे लिए एक ही बात है. सो तुम मुहब्बत करने के बजाय एक-दो बीघे ज़मीन ख़रीद लो और उस पर सारी उम्र क़ाबिज़ रहो…ज़िन्दगी में सिर्फ़ एक औरत…और यह दुनिया इस क़द्र भरी हुई क्यों है? क्यों इसमें इतने तमाशे जमा हैं? सिर्फ़ गन्दुम पैदा करके ही अल्लाह मियां ने अपना हाथ क्यों न रोक लिया? मेरी सुनो और इस ज़िन्दगी को जो कि तुम्हें दी गयी है, अच्छी तरह इस्तेमाल करो…तुम ऐसे ग्राहक हो जो औरत हासिल करने के लिए सारी उम्र सरमाया जमा करते रहोगे, मगर उसे नाकाफ़ी समझोगे. मैं ऐसा ख़रीदार हूं, जो ज़िन्दगी में कई औरतों से सौदे करेगा…तुम ऐसा इश्क़ करना चाहते हो कि उसकी नाकामी पर कोई अदना दर्जे का मुसन्निफ़ एक किताब लिखे, जिसे नारायण दत्त सहगल पीले काग़ज़ों पर छापे और डब्बी बाज़ार में उसे रददी के भाव बेचे…मैं अपनी किताबे-हयात9 के तमाम औराक़ दीमक बनकर चाट जाना चाहता हूं, ताकि उसका कोई निशान बाक़ी न रहे. तुम मुहब्बत में ज़िन्दगी चाहते हो, मैं ज़िन्दगी में मुहब्बत चाहता हूं.
इस्मत को अगर उलझे हुए सूत के ढेर में ऐसा सिरा मिल जाता, खींचने पर जो खिंचता ही चला आता और वह उसके सहारे दूर उफ़ुक़10 से ऊपर एक पतंग की तरह तन जाती और मण्टो अगर अपनी किताबे-हयात के आधे औराक़ भी दीमक़ बनकर चाटने में कामयाब हो जाता तो आज अदब की लोह पर उनके फ़न के नुक़ू इतने गहरे भी न होते. वह दूर उफुक़ से भी ऊपर हवा में तनी रहती और मण्टो के पेट में उसकी किताबे-हयात के बाक़ी औराक़ भुस भरके उसके हमदर्द उसे शीशे की अलमारी में बन्द कर देते.

‘चोटें’ की भूमिका में कृष्ण चन्दर लिखते हैं: इस्मत का नाम आते ही मर्द अफ़साना-निगारों को दौरे पड़ने लगते हैं. शर्मिन्दा हो रहे हैं. आप ही आप ख़फ़ीफ़ हुए जा रहे हैं. यह भूमिका भी उसी ख़िफ़्फ़त को मिटाने का एक नतीजा है.
इस्मत के मुताल्लिक़ जो कुछ मैं लिख रहा हूं, किसी भी क़िस्म की खिफ़्फ़त को मिटाने का नतीजा नहीं. एक कर्ज़ था, जो सूद की बहुत ही हल्की शरह के साथ अदा कर रहा हूं.

सबसे पहले मैंने इस्मत का कौन-सा अफ़साना पढ़ा था, मुझे बिल्कुल याद नहीं. यह सुतूर लिखने से पहले मैंने हाफ़िज़े को बहुत खुर्चा, लेकिन उसने मेरी रहबरी नहीं की. ऐसा महसूस होता है कि मैं इस्मत के अफ़साने काग़ज़ पर मुंतक़िल12 होने से पहले ही पढ़ चुका था. यही वजह है कि मुझ पर कोई दौरा नहीं पड़ा, लेकिन जब मैंने उसको पहली बार देखा तो मुझे सख़्त नाउम्मीदी हुई.

एडलफी चैंबर्स, क्लीयर रोड बम्बई के, सत्रह नम्बर फ्लैट में, जहां ‘मुसव्विर’ हफ़्तावार का दफ़्तर था, शाहिद लतीफ़ अपनी बीवी के साथ दाख़िल हुआ. यही अगस्त 1942 ई. की बात है. तमाम कांग्रेसी लीडर, महात्मा गांधी समेत गिरफ़्तार हो चुके थे और शहर में काफ़ी गड़बड़ थी. फ़ज़ा सियासियात में बसी हुई थी. इसलिए कुछ देर गुफ़्तगू का मौजू तहरीके-आज़ादी रहा. उसके बाद रुख़ बदला और अफ़सानों की बातें शुरू हुईं.

एक महीना पहले जबकि मैं ऑल इंडिया रेडियो, देहली में मुलाज़िम था, ‘अदबे-लतीफ़’ में इस्मत का ‘लिहाफ़’ शाया हुआ था. उसे पढ़कर, मुझे याद है, मैंने कृष्ण चन्दर से कहा था: ‘‘अफ़साना बहुत अच्छा है, लेकिन आख़िरी जुमला बहुत गै़र-सनायाआ है.“ अहमद नदीम क़ासमी की जगह अगर मैं एडिटर होता तो उसे यक़ीनन हज़फ़ कर देता. इसीलिए जब अफ़सानों पर बातें शुरू हुईं तो मैंने इस्मत से कहा: ‘‘आपका अफ़साना ‘लिहाफ़’ मुझे बहुत पसन्द आया. बयान में अल्फाज़ को बकद्रे-किफ़ायत इस्तेमाल करना आपकी नुमायां ख़ुसूसियत14 रही है, लेकिन मुझे ताज्जुब है कि उस अफ़साने के आख़िरी में आपने बेकार-सा जुमला लिख दिया” इस्मत ने कहा ‘‘क्या एब है इस जुमले में?’’

मैं जवाब में कुछ कहने ही वाला था कि मुझे इस्मत के चेहरे पर वही सिमटा हुआ हिजाब नज़र आया जो आम घरेलू लड़कियों के चेहरे पर नागुफ़तनी शै का नाम सुनकर नुमूदार15 हुआ करता है. मुझे सख़्त नाउम्मीदी हुई, इसलिए कि मैं ‘लिहाफ़’ के तमाम जुज़ियात के मुताल्लिक़ उससे बातें करना चाहता था. जब इस्मत चली गयी तो मैंने दिल में कहा: ‘‘यह तो कमबख़्त बिल्कुल औरत निकली.’’

मुझे याद है, इस मुलाक़ात के दूसरे ही रोज़ मैंने अपनी बीवी को देहली ख़त लिखा, ‘‘इस्मत से मिला. तुम्हें यह सुनकर हैरत होगी कि वह बिल्कुल ऐसी ही औरत है, जैसी मैंने जब उससे एक इंच उठे हुए ‘लिहाफ़ का ज़िक्र किया तो नालाइक़ उसका तसव्वुर करते ही झेंप गयी.’’

एक अर्से के बाद मैंने अपने इस पहले रददे-अमल पर संजीदगी से ग़ौर किया और मुझे इस अम्र का शदीद अहसास हुआ कि अपने फ़न की बक़ा के लिए इनसान को अपनी फ़ितरत की हुदूद17 में रहना अज़बस लाज़िम है. डॉक्टर रशीद जहां का फ़न आज कहां है? कुछ तो गेसुओं के साथ कटकर अलाहिदा हो गया और कुछ पतलून की जेबों में ठुस होकर रह गया. फ्रांस में जार्ज सां ने निस्वानियत का हसीन मलबूस उतार कर तसन्नो की ज़िन्दगी इख़्तियार की. पोलिस्तानी मौसीक़ार शोपेन से लहू थुकवा-थुकवा कर उसने लालो-गौहर ज़रूर पैदा कराये, लेकिन उसका अपना जौहर उसके वतन में दम घुट के मर गया.

मैंने सोचा, औरत जंग के मैदानों में मर्दों के दोश-बदोश लड़े, पहाड़ काटे, अफ़साना-निगारी करते-करते इस्मत चुग़ताई बन जाये, लेकिन इसके हाथों में कभी-कभी मेहंदी रचनी ही चाहिए. उसकी बांहों से चूड़ी की खनक आनी ही चाहिए. मुझे अफ़सोस है, जो मैंने उस वक़्त अपने दिल में कहा: ‘‘यह तो कमबख़्त बिल्कुल औरत निकली.’’

इस्मत अगर बिल्कुल औरत न होती तो उसके मज्मूओं में ‘भूल-भुलैया’, ‘तिल’, लिहाफ़’ और ‘गेंदा’ जैसे नाज़ुक और मुलायम अफ़साने कभी नज़र न आते. यह अफ़साने औरत की मुख़्तलिफ़ अदाएं हैं, साफ़, शफ़ाक़ , हर क़िस्म के तसन्नो से पाक. ये अदाएं वह गश्वे वह ग़मजे नहीं जिनके तीर बनाकर मर्दों के दिल और कलेजे छलनी किये जाते हैं. जिस्म की भोंडी हरकतों से इन अदाओं का कोई ताल्लुक़ नहीं. इन रूहानी इशारों की मंज़िले-मक़सूद इनसान का ज़मीर है, जिसके साथ वह औरत ही की अनजानी, अनबूझी मगर मख़मली फ़ितरत लिए बग़लगीर हो जाता है.

‘साक़ी’ में ‘दोज़ख़ी’ छपा. मेरी बहन ने पढ़ा और मुझसे कहा: ‘‘सआदत, यह इस्मत कितनी बेहूदा है. अपने मूए भाई को भी नहीं छोड़ा कमबख़्त ने. कैसी-कैसी फ़िज़ूल बातें लिखी हैं.’’
मैंने कहा: “इक़बाल, अगर मेरी मौत पर तुम ऐसा ही मज़मून लिखने का वादा करो तो ख़ुदा की क़सम, मैं आज मरने के लिए तैयार हूं.’’
शाहजहां ने अपनी महबूबा की याद क़ायम रखने के लिए ताजमहल बनवाया. इस्मत ने अपने महबूब भाई की याद में ‘दोज़ख़ी’ लिखा. शाहजहां ने दूसरों से पत्थर उठवाये. उन्हें तरशवाया और अपनी महबूबा की लाश पर अज़ीमुश्शान इमारत तामीर कराई. इस्मत ने ख़ुद अपने हाथों से अपने ख़ाहराना ज़ज्बात चुन-चुनकर एक ऊंचा मचान तैयार किया और उस पर नर्म-नर्म हाथों से अपने भाई की लाश रख दी ताज शाहजहां की मुहब्बत का बरहना18
मरमरीं इश्तिहार मालूम होता है. लेकिन ‘दोज़ख़ी’ इस्मत की मुहब्बत का निहायत ही लतीफ़ और हसीन इशारा है, वह जन्नत जो उस मज़मून में आबाद है, उन्वान का उसका इश्तिहार नहीं देता.

मेरी बीवी ने यह मज़मून पढ़ा तो इस्मत से कहा: ‘‘यह तुमने क्या खुराफ़ात लिखी है?’’
‘‘बको नहीं, लाओ, वह बर्फ़ कहां है?’’
इस्मत को बर्फ़ खाने का बहुत शौक़ है. बिल्कुल बच्चों की तरह डली हाथ में लिए दांतों से कटाकट काटती रहती है. उसने अपने बाज़ अफ़साने भी बर्फ़ खा-खाकर लिखे हैं. चारपाई पर कोहनियों के बल औंधी लेटी है. सामने तकिए पर कापी खुली है. एक हाथ में उसका क़लम और मुंह दोनों खटाखट चल रहे हैं.

इस्मत पर लिखने के दौरे पड़ते हैं. न लिखे तो महीनों गुज़र जाते हैं, पर जब दौरा पड़े तो सैकड़ों सफ़े उसके क़लम के नीचे से निकल जाते हैं. खाने-पीने, नहाने-धोने का कोई होश नहीं रहता. बस हर वक़्त चारपाई पर कोहनियों के बल औंधी लेटी अपने टेढे़-मेढ़े आराब और इमला से बेनियाज़ ख़त में काग़ज़ों पर अपने ख़यालात मुंतकिल करती रहती है.

‘टेढ़ी लकीर’ जैसा तूल-तवील नाविल, मेरा ख़याल है, इस्मत ने सात-आठ निशस्तों में ख़त्म किया था. कृष्ण चन्दर, इस्मत के बयान की रफ़्तार के मुताल्लिक़ लिखता है: अफ़सानों के मुताले19 से एक और बात जो ज़हन में आती है, वह है घुड़दौड़. यानी रफ़्तार, हरकत, सुबुक ख़रामी (मेरा ख़याल है, इससे कृष्ण चन्दर की मुराद बर्फ़ की रफ़्तारी थी) और तेज़ गामी. न सिर्फ़ अफ़साना दौड़ता हुआ मालूम होता है, बल्किफ़क्रे, किनाए और इशारे की आवाज़ें और किरदार और जज़्बात और अहसासात, एक तूफ़ान की सी बलाखे़ज़ी के साथ चलते और आगे बढ़ते नज़र आते हैं.

इस्मत का क़लम और उसकी ज़बान, दोनों बहुत तेज़ हैं. लिखना शुरू करेगी तो कई मर्तबा उसका दिमाग़ आगे निकल जाएगा और अल्फ़ाज़ बहुत पीछे हांफते रह जाएंगे. बातें करेगी तो लफ़्ज़ एक-दूसरे पर चढ़ते जाएंगे. शेख़ी बघारने की ख़ातिर अगर कभी बावर्चीख़ाने में चली जाएगी तो मामला बिल्कुल चौपट हो जाएगा. तबीयत में चूंकि बहुत ही उजलत20 है, इसलिए आटे का पेड़ा बनाते ही सिंकी सिंकाई रोटी की शक्ल देखना शुरू कर देती है. आलू अभी छीले नहीं गये लेकिन उनका सालन उसके दिमाग़ में पहले ही तैयार हो जाता है. और मेरा ख़याल है, बाज़ औक़ात21 वह बावर्चीख़ाने में क़दम रखकर ख़याल-ख़याल में शिकम-सैर होकर लौट आती होगी. लेकिन इस हद से बढ़ी हुई उजलत के मुक़ाबले में उसको मैंने बड़े ठंडे इत्मीनान और सुकून के साथ अपनी बच्ची के फ़्राक सीते देखा है. उसका क़लम लिखते वक़्त इमला की ग़लतियां कर जाता है, लेकिन नन्ही के फ़्राक सीते वक़्त उसकी सुई से हल्की-सी लग्ज़िश भी नहीं होती. नपे-तुले टांके होते हैं और मजाल है जो कहीं झोल हो.

‘उफ़ रे बच्चे’ में इस्मत लिखती है “घर क्या है, मुहल्ले का मुहल्ला है. मर्ज़ फैले, बला आये, दुनिया के बच्चे पटापट मरें, मगर क्या मजाल जो यहां भी टस से मस हो जाए. हर साल माशाल्लाह घर अस्पताल बन जाता है. सुनते हैं दुनिया में बच्चे भी मरा करते हैं. मरते होंगे. क्या खबर?”
और पिछले दिनों बम्बई में, जब उसकी बच्ची सीमा को काली खांसी हुई तो वह रातें जागती थी. हर वक़्त खोई-खोई रहती थी. ममता, मां बनने के साथ ही कोख से बाहर निकलती है.

इस्मत परले दर्जे की हठ-धर्म है. तबीयत में ज़िद है, बिल्कुल बच्चों की सी. ज़िन्दगी के किसी नज़रिए को, फ़ितरत के किसी क़ानून को पहले ही साबिक़े में कभी कुबूल नहीं करेगी. पहले शादी से इनकार करती रही. जब आमादा हुई तो बीवी बनने से इनकार कर दिया. बीवी बनने पर जूं-तूं रज़ामन्द हुई तो मां बनने से मुन्किर हो गयी. तकलीफ़ें उठाएगी, सुउबतें बर्दाश्त करेगी मगर ज़िद से कभी बाज़ नहीं आएगी. मैं समझता हूं, यह भी उसका एक तरीका है जिसके ज़रिए से वह ज़िन्दगी के हक़ाइक़22 से दो-चार होकर, बल्कि टकराकर उनको समझने की कोशिश करती है. उसकी हर बात निराली है.

इस्मत के ज़नाना और मर्दाना किरदारों में भी यह अजीबो-ग़रीब ज़िद या इन्कार आम पाया जाता है. मुहब्बत में बुरी तरह मुब्तला है, लेकिन नफ़रत का इज़हार किये चले जा रहे हैं. जी गाल चूमने को चाहता है, लेकिन उसमें सुई खूबो देंगे. हौले से थपकना होगा तो ऐसी धोल जमाएंगे कि दूसरा बिलबिला उठे. यह जरेहायाना क़िस्म की मनफ़ी मुहब्बत, जो महज़ एक खेल की सूरत में शुरू होती है, आमतौर पर इस्मत के अफ़सानों में एक निहायत रहम अंगेज़ सूरत में अंजाम23 पज़ीर होती है.

इस्मत का अपना अंजाम भी अगर कुछ इसी तौर पर हुआ और मैं उसे देखने के लिए ज़िन्दा रहा तो मुझे कोई ताज्जुब न होगा.
इस्मत से मिलते-जुलते मुझे पांच-छह बरस हो गये हैं. दोनों की आतिशगीर और भक से उड़ जाने वाली तबीयत के पेशे-नज़र एहतिमाल तो इसी बात का था कि सैकड़ों लड़ाइयां होतीं, मगर ताज्जुब है कि इस दौरान में सिर्फ़ एक बार चख़ हुई, और वह भी हल्की-सी.

शाहिद और इस्मत के मदऊ करने पर मैं और मेरी बीवी सफ़िया दोनों (बम्बई मुज़ाफ़ात में एक के जगह जहां शाहिद बॉम्बे टॉकीज की मुलाज़मत के दौरान में मुक़ीम था) गये हुए थे. रात का खाना खाने के बाद बातों-बातों में शाहिद ने कहा, ‘‘मण्टो, तुमसे अब भी ज़बान की गलतियां हो जाती हैं.’’

डेढ़ बजे तक मैंने तस्लीम न किया कि मेरी तहरी में ज़बान की ग़लतियां होती हैं. शाहिद थक गया. दो बजे तक इस्मत ने अपने शौहर की पैरवी की. मैं फिर भी न माना. अचानक कोई बात कहते हुए इस्मत ने लफ़्ज़ ‘दस्त-दराज़ी’ इस्तेमाल किया. मैंने झट से कहा: ‘‘सही लफ़्ज़ दराज़-दस्ती है’’ तीन बज गये. इस्मत ने अपनी ग़लती तस्लीम न की. मेरी बीवी सो गयी. शाहिद क़िस्सा ख़त्म करने के लिए दूसरे कमरे में लुग़त उठा लाया, ‘द’ की दख़्ती में लफ़्ज़ ‘दस्त दराज़ी’ मौजूद ही नहीं था. अलबत्ता दराज़ दस्ती और उसके मानी दर्ज थे. शाहिद ने कहा: ‘‘इस्मत, अब तुम्हें मानना पड़ेगा’’

अब मियां-बीवी में चख़ शुरू हो गयी. मुर्ग़ अज़ानें देने लगा. इस्मत ने लुग़त उठाकर एक तरफ़ फेंकी और कहा: ‘‘जब मैं लुगत़ बनाऊंगी तो उसमें सही लुगत दस्त दराज़ी होगा. यह क्या हुआ दराज़ दस्ती…दराज़ दस्ती.’’

कज बहसी का यह सिलसिला-ए-दराज़ बहरहाल ख़त्म हुआ. इसके बाद हम एक-दूसरे से कभी नहीं लड़े, बल्कि यूं कहिए कि हमने इसका कभी मौक़ा ही नहीं आने दिया. गुफ़्तगू करते-करते जब भी कोई ख़तरनाक मोड़ आया, या तो इस्मत ने रुख़ बदल लिया या मैं रास्ता काट के एक तरफ़ हो गया.
इस्मत को मैं पसन्द करता हूं, वह मुझे पसन्द करती है, लेकिन अगर कोई अचानक पूछ बैठे: ‘‘तुम दोनों एक-दूसरे की क्या चीज़ पसन्द करते हो.’’ तो मेरा ख़याल है कि मैं और इस्मत, दोनों कुछ अर्से के लिए बिल्कुल ख़ाली-स्फ़्फ़ाद हो जाएंगे.

इस्मत की शक्लो-सूरत दिलफ़रेब नहीं, दिल नशीन ज़रूर है. उससे पहली मुलाक़ात के नक़्श अब भी मेरे दिलो-दिमाग़ में महफूज़ हैं. बहुत ही सादा लिबास में थी. छोटी कन्नी की सफ़ेद धोती, सफ़ेद ज़मीन का काली खड़ी लकीरों वाला चुस्त ब्लाउज़, हाथ में छोटा पर्स, पांव में बगै़र एड़ी का ब्राउन चप्पल, छोटी-छोटी मगर तेज़ और मुत्ज्सु आंखों पर मोटे-मोटे शीशों वाली ऐनक, छोटे मगर घुंघराले बाल, टेढ़ी मांग. ज़रा-सा मुस्कराने पर भी गालों में गड्ढे पड़-पड़ जाते थे.

मैं इस्मत पर आशिक़ न हुआ लेकिन मेरी बीवी उसकी मुहब्बत में गिरफ़्तार हो गयी. इस्मत से अगर सफ़िया उस मुहब्बत का ज़िक्र करे तो वह ज़रूर कुछ यूं कहेगी: ‘‘बड़ी आयी हो मेरी मुहब्बत में गिरफ़्तार होने वाली…तुम्हारी उम्र की लड़कियों के बाप तक क़ैद होते रहे हैं मेरी मुहब्बत में.’’
एक बुजुर्गवार अहले-क़लम को तो मैं भी जानता हूं, जो बहुत देर तक इस्मत के प्रेम पुजारी रहे. ख़तो-किताबत के ज़रिए से आपने इश्क़ फ़रमाना शुरू किया. इस्मत शह देती रही, लेकिन आख़िरी में ऐसा अड़ंगा दिया कि सुरैया ही दिखा दी ग़रीब को. यह सच्ची कहानी, मेरा ख़याल है, वह कभी क़लम-बन्द नहीं करेंगे.

बाहम मुतसादिम24 हो जाने के ख़ौफ़ से मेरे और इस्मत के दरमियान बहुत ही कम बातें होती थीं. मेरा अफ़साना कभी शाया हो तो पढ़कर दे दिया करती थी. ‘नीलम’ की इशाअत पर उसने गैर-मामूली25 जोश-ख़रोश से अपनी पसंदीदगी का इज़हार किया, “वाक़ई ये बहन बनाना क्या है…आपने बिल्कुल ठीक कहा है. किसी औरत को बहन कहना उसकी तौहीन है.’’

और मैं सोचता रह गया वह मुझे मण्टो भाई कहती है और मैं उसे इस्मत बहन कहता हूं दोनों को ख़ुदा समझे.
हमारी पांच-छह बरस की दोस्ती के ज़माने में ऐसा कोई वाक़िया नहीं जो क़ाबिले-ज़िक्र हो. फ़हाशी के इल्ज़ाम में एक बार हम दोनों गिरफ़्तार हुए. मुझे तो पहले दो दफ़ा तज़ुर्बा हो चुका था, लेकिन इस्मत का पहला मौक़ा था. इसलिए बहुत भन्नाई. इत्तिफ़ाक़ से गिरफ़्तारी ग़ैर-क़ानूनी निकली. क्योंकि पंजाब पुलिस ने हमें बग़ैर वारंट पकड़ लिया था. इस्मत बहुत खुश हुई, लेकिन बकरे की मां कब तक खै़र मनाती. आखि़र उसे लाहौर की अदालत में हाज़िर होना ही पड़ा.

बम्बई से लाहौर तक काफ़ी लम्बा सफ़र है, लेकिन शाहिद और मेरी बीवी साथ थे. सारा वक़्त ख़ूब हंगामा रहा. सफ़िया और शाहिद एक तरफ़ हो गये और चिढ़ाने की ख़ातिर हम दोनों की फ़ुहश-निगारी पर हमले करते रहे. क़ैद की सऊबतों26 का नक़्शा खींचा. जेल की ज़िन्दगी की झलकियां दिखाईं. इस्मत ने आखि़र झल्लाकर कहा: ‘‘सूली पर भी चढ़ा दें, लेकिन यहां हलक़ से अनहलक़ ही निकलेगा.’’
उस मुक़दमे के सिलसिले में हम दो दफ़ा लाहौर गये. दोनों मर्तबा कालिजों के तमाशाई तालिबे-इल्म मुझे और इस्मत को देखने के लिए टोलियां बांध-बांध कर अदालत में आते रहे. इस्मत ने मुझे कहा: ‘‘मण्टो भाई, चौधरी नजीर (लाहौर का एक मशहूर प्रकाशक) से कहिए कि टिकट लगा दे कि यहां आने-जाने का किराया तो निकल आये.’’

हम दो दफ़ा लाहौर गये और दो ही दफ़ा हम दोनों ने कर्नाल शॉप से अलग डिज़ाइनों के दस-दस बारह-बारह जोड़े सैंडिलों और जूतियों के ख़रीदे.
बम्बई में किसी ने इस्मत से पूछा: ‘‘लाहौर आप क्या मुक़दमे के सिलसिले में गये थे?’’ इस्मत ने जवाब दिया: ‘‘जी नहीं, जूते खरीदने गये थे.’’
गालिबन तीन बरस पहले की बात है. होली का त्योहार था. मलाड में शाहिद और मैं बालकनी में बैठे पी रहे थे. इस्मत मेरी बीवी को उकसा रही थी: ‘‘सफ़िया, यह लोग इतना रुपया उड़ाएं…हम क्यों न इस ऐश में शरीक हों.’’ दोनों एक घंटे तक दिल कड़ा करती रहीं. इतने में एकदम हुल्लड़-सा मचा और फ़िल्मिस्तान से प्रोड्यूसर मुखर्जी, उनकी भारी भरकम बीवी और दूसरे लोग हम पर हमलावर हो गये. चन्द मिनटों ही में हम सबका हुलिया पहचानने लायक नहीं था. इस्मत की तवज्जो व्हिस्की से हटी और रंग पर मर्क़ूज़ हो गयी: ‘‘आओ सफ़िया, हम भी उन पर रंग लगाएं.’’

हम सब बाज़ार में निकल आये. इसीलिए घोड़बन्दर रोड पर बाक़ायदा होली शुरू हो गयी. नीले-पीले सब्ज़ और काले रंगों का छिड़काव-सा शुरू हो गया. इस्मत पेश-पेश थी. एक मोटी बंगालन के चेहरे पर तो उसने तारकोल का लेप कर दिया. उस वक़्त मुझे उसके भाई अज़ीम बेग़ चुग़ताई का ख़याल आया. एकदम इस्मत ने जनरलों के से अन्दाज़ में कहा, “रंगों से परीचेहरा के घर पर धावा बोलें .’’

उन दिनों नसीम बानो हमारी फ़िल्म ‘चल-चल रे नौजवान’ में काम कर रही थी. उसका बंगला पास ही घोड़ बन्दर रोड पर था. इस्मत की तजवीज़ सबको पसन्द आयी. इसीलिए चन्द मिनटों में हम सब बंगले के अन्दर थे. नसीम हस्बे-आदत पूरे मेकअप में थी और निहायत नफ़ीस रेशमी जार्जेट की साड़ी में मलबूस थी. वह और उसका ख़ाविंद अहसान हमारा शोर सुनकर बाहर निकले. इस्मत ने, जो रंगों में लिथड़ी हुई भूतनी-सी लगती थी, मेरी बीवी से जिस पर रंग लगाने से मेरा ख़्याल है कोई फ़र्क़ न पड़ता, नसीम की तारीफ़ करते हुए कहा: ‘‘सफ़िया, नसीम वाक़ई हसीन औरत है.’’
मैंने नसीम की तरफ़ देखा और कहा: ‘‘हुस्न है लेकिन बहुत ठंडा.’’

ऐनक के रंग-आलूद शीशों के पीछे इस्मत की छोटी-छोटी आंखें घूमीं और उसने आहिस्ता से कहा: ‘‘सफ़रावी तबीयतों के लिए ठंडी चीज़ें मुफ़ीद होती हैं.’’ यह कहकर वह आगे बढ़ी और एक सेकेंड के बाद ही परीचेहरा नसीम सर्कस का मसख़रा बन गयी थी.
इस्मत और मैं बाज़ औक़ात अजीब-अजीब बातें सोचा करते: ‘‘मण्टो भाई, जी चाहता है, अब मुर्ग और मुर्गियों के रोमांस के मुताल्लिक़ कुछ लिखूं.’’ या फिर कहती: ‘‘मैं तो फ़ौज में भर्ती हो जाऊंगी और हवाई जहाज़ उड़ाना सीखूंगी.’’
इस्मत की अफ़साना-निगारी पर काफ़ी मज़मून लिखे गये हैं. हक़ में कम, खिलाफ़त में ज़्यादा. कुछ तो बिल्कुल ममज़़्जूब की बड़ हैं. चंद ऐसे हैं जिनमें ज़मीन-आसमान के कुलाबे मिलाये गये हैं.

पितरस साहब ने भी, जिनको लाहौर के अदबी ठेकेदारों ने डिबिया में बन्द कर रखा था, अपना हाथ बाहर निकाला और क़लम पकड़कर इस्मत पर एक मज़मून लिख दिया. आदमी ज़हीन है, तबीयत में शोख़ी और मिज़ाह है, इसलिए मज़मून काफ़ी दिलचस्प और सुलझा हुआ है. आप औरत के लेबिल का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं:

एक मुक़तदिर व पुख़्ताकार दीबाचा-नवीस ने भी, मालूम होता है, इंशापरदाज़ों की रेवड़ में, नर और मादा अलग-अलग कर रखे हैं. इस्मत के मुताल्लिक़ फ़रमाते हैं कि जिन्स के एतिबार से उर्दू में कमो-बेश उन्हें भी वही रुत्बा हासिल है जो एक ज़माने में अंग्रेज़ी अदब में जार्ज इलियट को नसीब हुआ. गोया अदब कोई टेनिस टूर्नामेंट है जिसमें औरतों और मर्दों के मैच अलाही होते हैं.

पितरस साहब का यह कहना कि ‘‘गोया अदब कोई टेनिस टूर्नामेंट है जिसमें औरतों और मर्दों के मैच अलाही होते हैं’’ ठेठ पितरसी फ़िक्रे -बाज़ी है. टेनिस टूर्नामेंट, अदब नहीं. लेकिन औरतों और मर्दों के मैच अलाही होना बेअदबी भी नहीं. पितरस साहब क्लास में लेक्चर देते हैं तो तलब और तालिबात से उनका ख़िताब जुदागाना नहीं होता, लेकिन जब उन्हें किसी लड़के या शागिर्द लड़की से दिमाग़ी नशो-नुमा पर ग़ौर करना पड़ेगा तो माहिरे-तालीम होने की हैसियत में वह उनकी जिन्स से ग़ाफिल नहीं हो जाएंगे.

औरत अगर जार्ज इलियट या इस्मत चुग़ताई बन जाए तो इसका यह मतलब नहीं कि उसके अदब पर उसके औरत होने के असर की तरफ़ ग़ौर न किया जाए. हिजड़े के अदब के मुताल्लिक़ भी क्या पितरस साहब यही इस्तिफ़सार फ़रमाएंगे कि क्या कोई माबिल-इम्तियाज़ ऐसा है, जो इंशापदराज़ हिजड़ों के अदब को इंशापरदाज़ मर्दों और औरतों के अदब से सुमैयज़ करता है.

मैं औरत पर औरत और मर्द पर मर्द के नाम का लेबल लगाना भोंड़ेपन की दलील समझता हूं. इस्मत के औरत होने का असर उसके अदब के हर-एक नुक़्ते में मौजूद है, जो उसको समझने में हर-एक क़दम पर हमारी रहबरी करता है. उसके अदब की खूबियों और कमियों से, जिनको पितरस साहब ने अपने मज़मून में गै़र-जानिबदारी से बयान किया है, हम मुसन्निफ़ की जिन्स से अलाही नहीं कर सकते और न ऐसा करने के लिए कोई तनक़ीदी, अदबी या कीमयाई तरीक़ा ही मौजूद है.

इस्मत की सब हिस्से वक़्त पड़ने पर अपनी-अपनी जगह काम करती हैं और ठीक तौर से करती हैं. अज़ीज़ अहमद साहब का यह कहना कि जिन्स एक मर्ज़ की तरह इस्मत के आसाब पर छाई हुई है, मुमकिन है, उनकी तशखीस के मुताबिक़ दुरुस्त हो, मगर वो इस मर्ज़ के लिए नुस्खे़ तज्वीज़ न फ़रमाएं . यूं तो लिखना भी एक मर्ज़ है. कामिल तौर पर सेहतमन्द आदमी, जिसका दर्जा-ए-हरारत हमेशा साढ़े अट्ठानवे ही रहे, सारी उम्र अपनी ज़िन्दगी की ठंडी स्लेट हाथ में लिए बैठा रहेगा.

अज़ीज़ अहमद साहब लिखते हैं: “इस्मत की हीरोइन की सबसे बड़ी ट्रेजिड़ी यह है कि दिल से न उसे किसी मर्द ने चाहा और न उसने किसी मर्द को. इश्क़ एक ऐसी चीज़ है, जिसका जिस्म से वही ताल्लुक़ है जो बिजली का तार से है. खटका दबा दो तो यही इश्क़ हज़ारों कन्दीलों के बराबर रौशनी करता है. दोपहर की झुलसती लू में पंखा झलता है. हज़ारों देवों की ताक़त से ज़िन्दगी की अज़ीमुश्शान मशीनों के पहिये घुमाता है और कभी-कभी ज़ूल्फों को संवारता और कपड़ों पर इस्त्री करता है ऐेसे इश्क़ से इस्मत चुग़ताई बहैसियते लेखिका वाक़िफ़ नहीं.

ज़ाहिर है कि अज़ीज़ अहमद साहब को इसका अफ़सोस है- मगर यह इश्क़, जिससे अज़ीज़ अहमद साहब वाकिफ़ मालूम होते हैं, ऐसा लगता है कि उन्होंने पंचवर्षीय योजनाओं के मातहत तैयार किया है और अब वह उसे हर इनसान पर लागू कर देना चाहते हैं. अज़ीज़ अहमद साहब को ख़ुश करने के लिए मैं फर्ज़ कर लेता हूं कि इस्मत की ट्रेजिडी कैसे वक़ू-पज़ीर27 घटित होती है कि दिल से न उसे किसी मर्द ने चाहा और न उसने किसी मर्द को.

इस्मत वाक़ई अज़ीज़ अहमद साहब के तसनीफ़-कर्दा इश्क़ से नावाकिफ़ है और उसकी यह नवाकफियत ही उसके अदब का बाइस28 है. अगर आज उसकी ज़िन्दगी के तारों के साथ उस इश्क़ की बिजली जोड़ दी जाए और खटका दबा दिया जाए तो बहुत मुमकिन है, एक और अज़ीज़ अहमद पैदा हो जाए, लेकिन ‘तिल’, ‘गेंदा’, ‘भूल-भुलैया’ और ‘जाल’ तसनीफ़ करने वाली इस्मत यक़ीनन मर जाएगी.

इस्मत के ड्रामे कमज़ोर हैं. जगह-जगह उनमें झोल है. इस्मत प्लाट को मनाज़िर29 में तक़सीम करती है तो नापकर कैंची से नहीं करती, यूं ही दांतों से चीर-फाड़कर चीथड़े बना डालती है… पार्टियों की दुनिया इस्मत की दुनिया नहीं. उनमें वह बिल्कुल अजनबी रहती है… जिन्स, इस्मत के आसाब पर एक मर्ज़ की तरह सवार है… इस्मत का बचपन बड़ा ग़ैर-सेहत बख़्श रहा है… पर्दे के उस पार की तफ़सीलात बयान करने में इस्मत को यदे-तूला हासिल है. इस्मत को समाज से नहीं, शख़्सीयतों से शग़फ़ है…इस्मत के पास जिस्म के एहतिसाब का एक ही ज़रिया है और वह है मसास…इस्मत के अफ़सानों की कोई सम्त ही नहीं…इस्मत की गै़र-मामूली कुव्वते-मुशाहिदा हैरत में गर्क़ कर देती है…इस्मत फ़ुहश-निगार है…हलका-हलका तंज़ और मिज़ाह इस्मत के स्टाइल की मुमताज़ ख़ूबियां हैं…इस्मत तलवार की धार पर चलती है. इस्मत पर बहुत कुछ कहा गया है और कहा जाता रहेगा. कोई उसे पसन्द करेगा, कोई नापसन्द. लेकिन लोगों की पसन्दीदगी और नापसन्दीदगी से ज़्यादा अहम चीज़ इस्मत की तख़्लीकी कुव्वत30 है. बुरी, भली, उरियां, मस्तूर, जैसी भी है, क़ायम रहनी चाहिए. अदब का कोई जुग़राफ़िया नहीं. उसे नक़्शों और ख़ाकों की क़ैद से, जहां तक मुमकिन हो, बचाना चाहिए.

अरसा हुआ, देहली के एक शरीफ़ दरवेश ने अजीबो-ग़रीब हरकत की. आपने ‘उर्दू की कहानी, सुन मेरी ज़बानी’ : ‘इसे पढ़ने से बहुतों का भला होगा,’’ जैसे उन्वान से शाया की. उसमें मेरा, इस्मत, मुफ़्ती, प्रेमचन्द, ख़्वाजा मोहम्मद शफ़ी और अज़ीम बेग़ चुग़ताई का एक-एक अफ़साना शामिल था. भूमिका में तरक़्क़ी-पसन्द अदब पर एक तनक़ीदी चोट, ‘मारूं घुटना फूटे आंख’ के बमिस्दाक़, फ़रमाई गयी थी, और उस कारनामे को अपने दो नन्हे-नन्हे बच्चों के नाम से मानून किया गया था. उसकी एक कापी आपने इस्मत को और मुझे रवाना की. इस्मत को दरवेश की यह नाशाइस्ता और भौंडी हरकत सख़्त नापसन्द आयी. इसीलिए बहुत भन्ना कर मुझे एक ख़त लिखा “मण्टो भाई, आपने वह किताब, जो दरवेश ने छापी है, देखी? ज़रा उसे फटकारिए और एक नोटिस दीजिए निजी तौर पर कि हर मज़मून का जुर्माना दो सौ रुपये दो, वर्ना दावा ठोंक देंगे. कुछ होना चाहिए. आप बताइए, क्या किया जाए. यह ख़ूब है कि जिसका दिल चाहे उठाकर हमें कीचड़ में लथेड़ देता है और हम कुछ नहीं कहते. ज़रा मज़ा रहेगा. इस शख़्स को ख़ूब रगड़िए. डांटिए कि उलटा अलम-बरदार क्यों बन रहा है . हमारे अफ़साने उसने सिर्फ़ किताब बेचने के लिए छापे हैं. हमारी तहक है कि हमें हर ऐरे गै़रे नत्थू ख़ैरे, कमअक़्लों की डांटें सुनना पड़ें. जो कुछ मैंने लिखा है, उसको सामने रखकर एक मज़मून लिखिए. आप कहेंगे, मैं क्यों नहीं लिखती तो जवाब है कि आप पहले हैं.”
जब इस्मत से मुलाक़ात हुई तो उस ख़त का जवाब देते हुए मैंने कहा, ‘‘सबसे पहले लाहौर के चौधरी मोहम्मद हुसैन (प्रैस ब्रांच, हुकूमते-पंजाब का इंचार्ज) साहब हैं. उनसे हम दरख्वास्त करें तो वह ज़रूर मिस्टर दरवेश पर मुक़दमा चलवा देंगे.
इस्मत मुस्कराई : ‘‘तज़वीज़ तो ठीक है, लेकिन मुसीबत यह है कि हम भी साथ ही धर लिए जाएंगे.’’
मैंने कहा, “क्या हुआ अदालत ख़ुश्क जगह सही लेकिन करनाल शॉप तो काफ़ी दिलचस्प जगह है…मिस्टर दरवेश को वहां ले जाएंगे,” और..”
इस्मत के गालों के गड्ढे गहरे हो गये.

कठिन शब्दों के मतलब

1. प्राप्त, 2. लेखकों, 3. विश्लेषण, 4. रोमांच, 5. ख़ुशी, 6. ख़ूबी, 7. प्रतिद्वन्द्वी, 8. हास्यास्पद, 9. जीवनरूपी पुस्तक, 10. क्षितिज, 11. शिला, 12. स्थानान्तरित, 13. आवश्यकतानुसार, 14. विशेषता, 15. प्रकट, 16. तत्त्वों,
17. सीमाओं, 18. नग्न, 19. अध्ययन, 20. जल्दबाज़ी, 21. अक़सर, 22. वास्तविकताएं, 23. फलीभूत, 24. परस्पर टकराव, 25. प्रकाशन, 26. यातनाओं, 27. घटित, 28. कारण, 29. दृश्यों, 30. रचना-शीलता.


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