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कुरान की वो दो आयतें, जो शाहबानो के तलाक केस में सुप्रीम कोर्ट में सुनाई गईं

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मध्य प्रदेश में इंदौर की रहने वाली एक मुस्लिम औरत. नाम शाहबानो. उम्र 62 साल. पांच बच्चों की मां. उसका शौहर मोहम्मद खान उसे 1978 में तलाक दे देता है. शाहबानो अपने शौहर से गुजारा भत्ता पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ती हैं.. मामला निचली अदालत से होते हुए सुप्रीम कोर्ट में पहुंचता है. फैसला सुनाया जाता है. शाहबानो केस जीत जाती हैं. इस केस को जीतने में मदद कुरान की दो आयतों ने की. लेकिन ये जीत बनी न रह सकी. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड उस फैसले का विरोध करने लगा. उस वक़्त राजीव गांधी की सरकार एक विधेयक ले आई और फैसला पलट गया.


तो सबसे पहले वो दो आयतें कौन सी थीं. जिन्होंने एक तलाकशुदा औरत की केस जीतने में मदद की. आज हो हल्ला है. तलाक तलाक तलाक. लेकिन इस तलाक पर नकेल कसने के लिए इन दो आयतों के तर्जुमे थे. जो अपने हिसाब से लोगों ने पेश किए. जब इन दो आयतों के बारे में मुझे पता चला तो मैंने उन दो आयतों को क़ुरान में तलाशा. वो दो आयतें हैं 241 और 242.

रंगीन लाइन में आयत 241 और 242 हैं, ये क़ुरान की फोटो है.
रंगीन लाइन में आयत 241 और 242 हैं, ये क़ुरान की फोटो है. उसमें तर्जुमा भी है.

आयत नंबर 241: वालिल मुतल्लाक़ाते मताउम बिल मारूफ़े हक्क़न आलल मुत्ताक़ीन.

तर्जुमा: और जिन औरतों को तलाक़ दे दी जाए. उनके साथ (जोड़े, रुपये वगैरहा से) सलूक़ करना लाज़िम है. ये भी परहेज़गारों पर एक हक़ है.

आयत नंबर 242: कज़ालेका योबय्ये नल्लाहो लाकुम आयातेही ला अल्लाकुम ताक़ेलून.

तर्जुमा: इस तरह ख़ुदा तुम लोगों (की हिदायत) के वास्ते अपने अहक़ाम साफ़ साफ़ बयान फरमाता है.

आयत 241 और 242 हैं, जिनका अंग्रेजी में तर्जुमा है. ये क़ुरान की फोटो है.
आयत 241 और 242 हैं, जिनका अंग्रेजी में तर्जुमा है. ये क़ुरान की फोटो है.

ये वो दो आयतें थीं जिनको शाहबानो के वकील डैनियल लतीफ़ ने सुप्रीम कोर्ट में सुनाया. और सीआरपीसी की धारा 125 के तहत ये साबित कर दिया कि शाहबानो के पति मोहम्मद खान गुज़ारा भत्ता देने के हक़दार हैं. और ये बात क़ुरान से भी साबित की. जिसमें औरत को तलाक देने के बाद उसकी सहायता करना हक़ बताया गया है.

धारा 125 के तहत बेसहारा, त्यागी गईं या तलाकशुदा औरतों को अपने पति से सहायता प्राप्त करने का अधिकार है, बशर्ते वो (पति) खुद मोहताज न हो.

सुप्रीम कोर्ट ने इन दो आयतों और धारा 125 के तहत शाहबानो के हक़ में फैसला सुना दिया. ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ऐसे ही दो मामलों में फैसला सुना चुका था. एक फैसला साल 1979 में बाई ताहिरा बनाम अली हुसैन फिसाली के मामले में दिया गया, दूसरा साल 1980 में फुजलुम्बी बनाम के खादर अली के मामले में. ये दोनों फैसले चीफ जस्टिस कृष्ण अय्यर ने दिए थे. तब उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में न्यायिक सुधार किए जाने की ज़रूरत पर भी जोर दिया था. लेकिन तब कोई हंगामा नहीं हुआ था. इन फैसलों का ज़िक्र राधा कुमार ने अपनी किताब ‘स्त्री संघर्ष का इतिहास’ में किया है.

फिर शाहबानो के मामले में विरोध क्यों हुआ?

जब शाहबानो को उसके शौहर मोहम्मद अहमद खान ने घर से निकाल दिया था तो वो कोर्ट पहुंचीं. अभी याचिका लंबित ही थी कि उसके पति ने ट्रिपल तलाक वाले हथियार का इस्तेमाल किया और शाहबानो को बेसहारा कर दिया. मोहम्मद अहमद खान ने कोर्ट में 3000 रुपये जमा कराए और कहा कि ये रकम मेहर के वक़्त तय की गई थी, जो वो दे रहा है. इसपर शाहबानो ने कहा ये रकम तो ‘सम्मानस्वरूप’ दी जाने वाली रकम है. इसके बाद डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने धारा 125 के तहत 25 रुपये महीना गुज़ारा भत्ता तय कर दिया. इतनी रकम में भला गुज़ारा कैसे होता. शाहबानो हाईकोर्ट पहुंच गईं. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने रकम बढ़ाकर 179.20 रुपये महीना कर दी.

इस बार मोहम्मद अहमद खान सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए. ‘स्त्री संघर्ष का इतिहास’ में तहरीर किया गया है कि मोहम्मद अहमद खान ने अपनी अपील में कहा कि हाईकोर्ट ने फैसला देने में अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है. शरीयत के कानून का उल्लंघन किया गया है. और वो मुस्लिम है, जो पर्सनल लॉ मानने को मजबूर है. इसके अलावा उन्होंने कई दलीलें शरीयत से दीं, एक दलील में कहा कि शरीयत के तहत कोई भी शौहर अपनी बीवी को तलाक देने के तीन महीने बाद (इद्दत की मुद्दत) गुज़ारा भत्ता देने को बाध्य नहीं है. मेहर की रकम लौटाने के बाद उसपर कोई फ़र्ज़ नहीं रह जाता कि औरत कैसे गुज़ारा करेगी.

इन्हीं दलीलों को शाहबानों के वकील ने कुरान की दो आयतों से काट दिया, जिनमें औरत की मदद करने की बात कही गई है. जस्टिस चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने अपना फैसला शाहबानो के हक़ में सुनाया. यहां तक तो ठीक था. इसके साथ ही कोर्ट ने धर्म के नाम पर औरतों के साथ किए जाने वाले अत्याचारों पर कठोर टिप्पणी करते हुए सरकार को समान नागरिक संहिता बनाने का सुझाव दे डाला. कहा गया कि इससे राष्ट्रीय एकता के उद्देश्य को पूरा करने में सहायता मिलेगी. कहा गया कि अगर संविधान का कोई मतलब है तो पहल करनी ही होगी.

किताब में लिखा गया कि उस वक़्त कोर्ट की तल्ख़ टिप्पणी से ये निष्कर्ष निकाले गए कि ‘जज ये कह रहे थे कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बुरा है. ‘मुस्लिम समुदाय’ अनुचित कानूनों को महत्व देता है, इसलिए कोई (इस मामले में राज्य) उस पर औचित्य थोपे. इसी तरह ये भी नतीजा निकालना आसान था कि ये दबाव न्याय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता के लिए भी डाला जाना चाहिए. इससे ये भी निष्कर्ष निकलता था कि राष्ट्रीय एकता के लिए मुसलमान इस्लाम और इस्लामी कानूनों (पर्सनल लॉ) के प्रति अपनी वफ़ादारी कम करें.’

बस ये ही निष्कर्ष बहुत गलत साबित हुए, जो भावनाओं को भड़काने का काम कर रहे थे. ये फैसला अपराधिक कानून का न रहकर धर्म पर प्रहार की तरह लगने लगा. इस वजह से इस फैसले की बड़े स्तर पर आलोचना होने लगी. लिबरल और सेकुलर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की आलोचना ये कहकर करने लगे कि कोर्ट ने धर्म और व्यक्तिगत कानून का मुद्दा खड़ा कर दिया है, जबकि ये धर्मनिरपेक्ष आपराधिक कानून का मामला था. फेमिनिज्म की बात करने वालों ने कहा कि पर्सनल मुद्दे किस तरह महिला अधिकारों को प्रभावित करते हैं. फैसला इसपर न रहकर मुस्लिम पर्सनल लॉ पर केंद्रित कर दिया गया.

शाहबानो
शाहबानो

साल 1986 में जनवरी फ़रवरी के अंक में ‘मानुषी’ में मधु किश्वर का एक लेख छपा जिसमें उन्होंने एक टिप्पणी की,

‘न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने इस प्रकार मुस्लिम पुरुष और इस्लाम को अलग थलग करने की क़वायद में बुनियादी तौर पर महिला महिला अधिकारों के मुद्दे को अनावश्यक रूप से मुस्लिम समुदाय पर हमला करने के अवसर में बदल दिया.’

मुस्लिम उलेमाओं को लगा सुप्रीम कोर्ट का फैसला उनके धर्म पर हमला है. फतवा जारी कर कह दिया कि ये इस्लामिक शिक्षाओं के खिलाफ है. और ये फतवा इतना प्रचारित किया गया कि लोगों को लगा ‘इस्लाम खतरे में है’ और इस विरोध ने सांप्रदायिक संघर्ष का रूप धर लिया. जगह जगह प्रदर्शन हुए. फैसले को बदलने के लिए मांग होने लगी. हिंदू संप्रदाय के लोगों ने इस फैसले पर ख़ुशी का इज़हार किया. प्रदर्शन करने पर मुस्लिमों को रुढ़िवादी और राष्ट्रविरोधी कहा जाने लगा. क्योंकि प्रदर्शन कोर्ट के फैसले पर था.

विरोध होता रहा और हिन्दू मुस्लिम में इसपर दूरियां बढ़ती गईं. काफी कुछ ऐसा हुआ कि मुस्लिमों को ये फैसला अपने ऊपर हमले जैसा लगने लगा.

विरोध प्रदर्शन का नतीजा क्या हुआ?

अगस्त 1985 में मुस्लिम औरतों को धारा 125 के दायरे से बाहर निकालने की नीयत से मुस्लिम लीग के सांसद जी एम बनातवाला संसद में एक विधेयक ले आये. राजीव गांधी सरकार ने अपने मुस्लिम मंत्री आरिफ मोहम्मद खान से बनातवाला के विधेयक का विरोध करने को कहा. आरिफ खान ने उस आदेश से अलग मानवीय आधार पर शरीयत की व्याख्या करने की ज़ोरदार तकरीर की. उलेमाओं ने उन्हें नासमझ कहकर उनके तर्कों को नकार दिया. विरोध बढ़ता जा रहा था. 25 फ़रवरी 1986 को मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) विधेयक प्रस्तुत कर दिया गया. विधेयक के तहत तलाकशुदा औरतों को धारा 125 से बाहर कर दिया गया. दलील दी गई कि इद्दत की तीन महीने की मुद्दत के बाद उनके शौहर की गुज़ारा भत्ता देने की ज़िम्मेदारी खत्म हो जाती है. इसके बाद उन औरतों की ज़िम्मेदारी उनके माता पिता या फैमिली पर होगी, इनके विफल होने पर स्थानीय वक्फ़ बोर्ड पर. ये विधेयक 6 मई 1986 को पारित भी कर दिया गया. ये विधेयक क्यों पारित हुआ? कैसे पारित हुआ, इसके बहुत से राजनीतिक मायने और लाभ रहे.

लेकिन एक फैसले के तल्ख़ तेवर शाहबानो पर इस कद्र भारी पड़े कि वो शरीयत के मुताबिक जीतने के बाद भी हार गईं. दो आयतों ने जीतने में मदद की तो मुसलमानों की के ज़हन में बसी उस शरीयत ने हरा दिया जो उस वक़्त ये सोच रही थी ये फैसला मुस्लिमों पर हमला है. इस सोच ने उस रास्ते की रुकावट को हटा दिया, जो तलाक़ देने वालों पर भारी पड़ती. यानी जिंदगी भर गुज़ारा भत्ता देने के डर से लोग तलाक देने से कतराते.

मौजूदा दौर में तलाक तलाक तलाक चिल्लाया जा रहा है. ये आवाजें मुस्लिमों में से कम और दूसरी कम्युनिटी से ज्यादा उठ रही हैं. जहां मुस्लिम औरतों की स्थिति सुधारने को इसलिए नकारा जा रहा है कि ट्रिपल तलाक़ पर बैन शरीयत में दखलअंदाजी है. और इस तर्क को हवा काल और परिस्थिति भी दे रहे हैं. बीफ पर हंगामा हो या फिर अयोध्या का शोर. हैं सब अलग अलग लेकिन एक ही समय में होने की वजह से मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव का सुझाव भी इस्लाम पर खतरा लगता है. एक वक़्त में एक साथ हो रहे हल्ले गुल्ले में मुस्लिम समुदाय सुधार की तरफ ध्यान ही नहीं दे रहा है. जबकि इन सबसे उठकर ट्रिपल तलाक़ जैसे मुद्दे को खुद ही हल कर देना चाहिए, ताकि बात एजुकेशन की हो सके, आर्थिक सुधार की हो सके.


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कुरआन की ही मानकर क्यों न उसकी कुछ बातों को बेहतरी के लिए बदल दें?

 

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