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बेगमों की लड़ाई और बांग्लादेश के कसाई

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ऐसा क्यों है कि लोग बांग्लादेश को साउथ-ईस्ट एशिया का ‘इराक’ बताने में लगे हैं? ऐसा कैसे हो गया कि देशी-विदेशी राजनीतिज्ञों से भरे गुलशन एरिया में आयतें पूछ-पूछ के क़त्ल किया जा रहा है? क्या ये बांग्लादेश की ‘तीन बेगमों की लड़ाई’ का नतीजा है? या ‘मीरपुर के कसाई’ की फांसी के बाद उसके समर्थकों का कारनामा है? या फिर ‘बांग्लादेश के राष्ट्रपिता’ मुजीब ने ही इसकी नींव रख दी थी? ऐसा क्यों हो रहा है कि ‘सेक्युलर’ माने जानेवाले बांग्लादेश की तरफ देखकर ISIS मुस्कुरा रहा है?

रेस्टोरेंट में हमला ऐसी पहली घटना नहीं है. पिछले कुछ दिनों में बांग्लादेश में कुछ और हत्याएं हुई हैं:
1. पिछले एक साल में हर महीने किसी न किसी ब्लॉगर को रोड पर चापड़ से काट दिया गया. इनका दोष था कि ये ‘सेकुलरिज्म’ के पक्ष में और हिंसक ‘इस्लाम’ के विपक्ष में लिखते थे.
2. लगभग दस महीनों से चुन-चुन के वहां की ‘माइनॉरिटी’ हिन्दू कम्युनिटी के पुजारियों को मारा जा रहा है.

इसके समानांतर ही 2008 से सत्ता में काबिज शेख हसीना की सरकार ने 1971 नरसंहार के आरोपी ‘जमात-ए-इस्लामी’ के नेताओं को फांसी देना शुरू किया है. जमात के चीफ मोती-उर-रहमान निजामी को मई 2016 में फांसी हो गई. प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा कि 1971 में एक ऐतिहासिक गलती हुई थी. अब समय आ गया है उसको ठीक करने का. हम ठीक कर रहे हैं अब. 2015 में अब्दुल कादर मुल्ला को फांसी हुई. उसको ‘मीरपुर का कसाई’ कहा जाता था. क्योंकि 1971 में वो हज़ारों लोगों की मौत का गुनहगार था.

अब्दुल कादर मुल्ला: 'मीरपुर का कसाई'- ibtimes
अब्दुल कादर मुल्ला: ‘मीरपुर का कसाई’- ibtimes

तो क्या ये मान लिया जाए कि शेख हसीना की सरकार और जमात के उग्रवादी समर्थकों के बीच ही सारा खेल हो रहा है? इसके लिए हमको बांग्लादेश की जन्मपत्री खंगालनी होगी.

लेकिन पहले एक नज़र बांग्लादेश की वर्तमान स्थिति पर:

1.अभी बांग्लादेश में टारगेट कर के लोगों को मारा जा रहा है. विदेशी अख़बार कह रहे हैं कि मारनेवाले इराक के ISIS की आइडियोलॉजी से प्रभावित हैं. पर बांग्लादेश की सरकार इस बात से इनकार कर रही है. सरकार कह रही है कि मारनेवालों का ISIS से कोई वास्ता नहीं. ये लोकल लोग हैं जो 1998 में बने Jamaat-ul-Mujahideen JMB यानी Assembly of Jihadists(जिहादियों का संगठन) से जुड़े हुए हैं. पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI इन लोगों को बढ़ावा दे रही है.

2.वहीं बांग्लादेश की अपनी राजनीति में घमासान मचा हुआ है. इसे बेगमों की लड़ाई भी कहा जा रहा है. बांग्लादेश में तीन बड़ी पार्टियां हैं. पहली, अवामी लीग की नेता प्रधानमंत्री शेख हसीना पार्टी और बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीब की बेटी हैं. दूसरी, पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया मुजीब के क़त्ल के बाद सत्ता में आये आर्मी जनरल जिया-उर-रहमान की बीवी हैं. तीसरी, विपक्ष की नेता रौशन इरशाद जिया-उर-रहमान के क़त्ल के बाद सत्ता में आये एक और जनरल इरशाद की बीवी हैं.

3.प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 2014 में जो चुनाव जीता था उसमें पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की पार्टी BNP ने चुनाव का बहिष्कार किया था. Jamaat-ul-Mujahideen (JMB) खालिदा जिया के पक्ष में थी. चुनाव बहिष्कार करना आसान नहीं रहा. हिंसा हुई. कई लोग मरे भी. इसके साथ एक और बात भी है. JMB को कई देशों ने ‘आतंकी ग्रुप’ घोषित कर रखा है. उसके कई नेताओं को बांग्लादेश सरकार कई तरह के अपराधों में फांसी भी दे चुकी है. अभी पार्लियामेंट में सिर्फ दो बड़ी पार्टियां हैं. शेख हसीना की अवामी लीग और विपक्ष में रौशन इरशाद की जातीय पार्टी. खालिदा जिया की BNP ने चुनाव का बहिष्कार कर दिया था. वो पार्लियामेंट से बाहर हैं.

अब शुरू से:

भारत के दो टुकड़े, पर पाकिस्तान शुरू से ही दो टुकड़ों में था

1947 के पहले बांग्लादेश बंगाल का हिस्सा था. ‘नार्थ-ईस्ट इंडिया’ का पूरा एरिया बंगाल स्टेट के अंडर आता था. बंगाल से ब्रिटिश राज को बड़ा फायदा था. प्लासी की लड़ाई के बाद ब्रिटिश सरकार का वहां पूरा अधिकार हो गया था. ये सब चलता रहा. बंगाल से बहुत सारे लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था. इन बातों से चिढ़कर ब्रिटिश सरकार ने 1905 में बंगाल का दो भाग में पार्टीशन कर दिया. बड़ा बवाल हुआ. फिर दोनों को मिला दिया गया. पर एक तरीके से थोड़ा अलगाववाद आ गया बंगाल के दोनों हिस्सों में. फिर आगे चल के देश का भी बंटवारा हो गया 1947 में.

उस समय ईस्ट बंगाल, जो कि मुस्लिम बहुल क्षेत्र था, पाकिस्तान के साथ चला गया. 1955 में ईस्ट बंगाल का नाम बदलकर ईस्ट पाकिस्तान कर दिया गया.

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पर एक दिक्कत आ गई. पाकिस्तान दो हिस्सों में था. पश्चिम पाकिस्तान यानी पाकिस्तान जो अभी है और दूसरा पूर्वी पाकिस्तान जो अभी बांग्लादेश है. दोनों के बीच 1400 किमी की दूरी थी जो कि इंडिया को पार कर के तय की जानी थी.

फिर पाकिस्तान ‘इस्लाम’ के नाम पर बना था. पर ईस्ट पाकिस्तान में बंगाली कल्चर का प्रभुत्व था. वहां लम्बे समय से कई धर्मों के लोग रहते थे. इस्लाम वहां सबसे ऊपर नहीं था. तो पश्चिमी पाकिस्तान से इन मामलों में भी पूर्वी पाकिस्तान अलग था. यहां ‘सेक्युलर करैक्टर’ था.

पाकिस्तान के दो टुकड़ों में पहला संघर्ष

इसके अलावा पश्चिमी पाकिस्तान में उर्दू ऑफिशियल भाषा थी. पर पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली मुख्य भाषा थी. 1952 में पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली भाषा को लेकर बड़ा आन्दोलन हुआ. ये पश्चिमी पाकिस्तान के साथ संघर्ष की पहली घटना थी. पार्टी ‘अवामी लीग’ इस संघर्ष से बंगाली बोलने वालों की पार्टी बन के उभरी. 1956 के पाकिस्तान चुनावों में अवामी लीग के नेता सुहरावर्दी चुनाव जीत गए और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने. पर पश्चिम पाकिस्तान के शासकों ने उनको काम नहीं करने दिया और एक साल में ही वो सत्ता से बाहर कर दिए गए.

फिर उसी साल पूर्वी पाकिस्तान की राज्य सरकार भी डिसमिस कर दी गई. 1957 में मौलाना भाशनी ने पश्चिम पाकिस्तान को चेतावनी दी: यही हाल रहा तो पाकिस्तान का पूर्वी हिस्सा पाकिस्तान को गुडबाय बोल देगा.

पाकिस्तान में मिलिट्री रूल: सबके लिए समस्या

1962 में पाकिस्तान में जनरल अयूब खान ने मिलिट्री रूल लगा दिया. उसके बाद ड्रामा शुरू हो गया. पूर्वी पाकिस्तान पूरे पाकिस्तान का 70% एक्सपोर्ट करता था. जूट और चीनी के दम पे. पर पाकिस्तान की सरकार अपना पैसा खर्च करती थी पश्चिमी पाकिस्तान पे. ईस्ट पाकिस्तान में पढ़े-लिखे लोग बहुत ज्यादा थे. अंग्रेजों के ज़माने के. उन्होंने तुरंत इसके खिलाफ आवाज उठाई. अवामी लीग ने भी इसमें हाथ बंटाया. छः पॉइंट का एक फार्मूला भी दिया गया: ऑटोनोमी, फ्री ट्रेड, इकॉनमिक स्वतंत्रता इत्यादि-इत्यादि. जवाब में पाकिस्तानी सरकार ने अवामी लीग के नेता मुजीबुर्रहमान को गिरफ्तार कर लिया. फिर 1969 में पाकिस्तान में अपने स्टाइल में फिर विद्रोह हुआ और अयूब खान को हटाया गया. तब मुजीब को छोड़ा गया.

अयूब खान और जैकलिन केनेडी
अयूब खान और जैकलिन केनेडी

पूर्वी पाकिस्तान में पश्चिमी पाकिस्तान की दादागिरी

स्थिति ये थी कि पाकिस्तान की सरकारी नौकरियों में मात्र 10% लोग पूर्वी पाकिस्तान के थे. बिजनेस भी वहां नहीं खोले जा रहे थे. फिर सरकार बंगाली कल्चर, लिटरेचर, म्यूजिक पर प्रतिबंध लगा रही थी. तब तक 1970 में पूर्वी पाकिस्तान वाले एरिया में बंगाल की खाड़ी से भयानक तूफ़ान उठा और बड़ी तबाही हुई. पाकिस्तानी सरकार ने फिर कोई तत्परता नहीं दिखाई. दिसम्बर 1970 में पाकिस्तान में चुनाव होनेवाले थे. तब तक पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तान से अलग होने के नारे लगने लगे.

1970 में शेख मुजीब की अवामी पार्टी ने चुनाव जीत लिए. पर पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं ने उनको सरकार नहीं बनाने दिया. पूर्वी पाकिस्तान में बवाल कट गया. पाकिस्तान से अलग होने की मांग होने लगी. 7 मार्च 1971 को शेख मुजीब ने सभा की और ऐलान कर दिया कि हमें पाकिस्तान से अलग होना है.

पाकिस्तानी आर्मी का भयानक क़त्ल-ए-आम और इंदिरा गांधी का फैसला

26 मार्च 1971 जो पाकिस्तान के जनरल याह्या खान ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ लांच कर दिया. और मुजीब को गिरफ्तार कर लिया गया. पूर्वी पाकिस्तान के कट्टरपंथी लोगों ने पार्टी ‘जमात-ए-इस्लामी’ नाम से पार्टी बना ली. फिर पाकिस्तानी आर्मी के साथ मिलकर राजनेताओं, अफसरों, अध्यापकों, छात्रों को जान से मारना शुरू कर दिया. जिसने भी कभी कुछ पाकिस्तान के खिलाफ बोला था उसको मारा जाने लगा. एक अंदाजे के अनुसार लगभग 30 लाख लोगों को मारा गया. लगभग 4 लाख औरतों का बलात्कार हुआ. 3 करोड़ लोग बेघर हो गए.

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ये मामला इंटरनेशनल लेवल पर उठा. अमेरिका, रूस और यूरोप के देशों में रोज चर्चाएं होने लगीं. बांग्लादेश छोड़ के इंडिया जा रहे लोगों की वजह से ‘रिफ्यूजी क्राइसिस’ हो गया. रिफ्यूजियों की मदद करने के लिए बीटल्स के स्टार जॉर्ज हैरिसन और बंगाली मूल के सितारवादक रविशंकर ने  अमेरिका के ‘मैडिसन स्क्वायर’ पर कॉन्सर्ट किया.   ये दुनिया का पहला इतना बड़ा कॉन्सर्ट था ऐसे मुद्दों पर.

एक साथ लाखों लोगों के पश्चिम बंगाल आने से इंडिया में डिस्टर्बेंस होने लगा. उसी समय पूर्वी पाकिस्तान के राष्ट्रवादियों ने ‘मुक्तिवाहिनी’ नाम से सेना बना ली और पाकिस्तानी आर्मी से लड़ने लगे. स्थिति बहुत ज्यादा गंभीर हो गई. बांग्लादेश यानी पूर्वी बंगाल के लोगों के साथ पश्चिमी बंगाल के लोगों की भावनाएं जुड़ी थीं. भारत सरकार के लिए कुछ भी करना आसान नहीं था. इस मुद्दे पर दुनिया से सपोर्ट लेने के लिए भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 12 देशों की यात्रायें कीं. पर दुनिया इस मुद्दे पर दोफाड़ थी. अमेरिका पाकिस्तान के पक्ष में. और रूस भारत के. सबकुछ देखकर इंदिरा गांधी ने हमले का आदेश दे दिया.

जनरल मानेकशॉ  ने इंदिरा से कहा: ‘Sweety, I am always ready.’

मानेकशॉ और इंदिरा गांधी
मानेकशॉ और इंदिरा गांधी

अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अपने मिलिट्री जनरल वेस्टमोरलैंड को इंडिया भेजा माहौल देखने के लिए. लौटने पर वेस्टमोरलैंड से निक्सन ने पूछा: इंडिया को लड़ाई ख़त्म करने में कितने दिन लगेंगे? वेस्टमोरलैंड ने कहा: 45 से 60 दिन. पर 13 दिनों के अन्दर 16 दिसम्बर 1971 को पाकिस्तान की 90000 की सेना ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.

पाकिस्तान का आत्मसमर्पण
पाकिस्तान का आत्मसमर्पण

बाद में वेस्टमोरलैंड ने इंडिया के जनरल मानेकशॉ से पूछा: ये कैसे हुआ? मानेकशॉ ने कहा: ‘I have seen several angry women, including my wife. But never one like Mrs Gandhi’. लड़ाई से पहले जब इंदिरा गांधी ने मानेकशॉ से पूछा: Are you ready? मानेकशॉ ने कहा: ‘Sweety, I am always ready.’ सबके दबाव में पाकिस्तान को मानना पड़ा कि ‘बांग्लादेश’ अब एक स्वतंत्र देश है.

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एक अफवाह भी उड़ी थी कि अमेरिका ने पाकिस्तान के सपोर्ट में अपना ‘न्यूक्लियर हथियार’ वाला जहाजी बेड़ा ‘बंगाल की खाड़ी’ में रवाना कर दिया था. अगर पाकिस्तान दो दिन और लड़ाई कर लेता तो अमेरिका कलकत्ता पर एटम बम गिरा देता. पर पाकिस्तान ने सरेंडर कर दिया. हालांकि थ्योरी ये भी है कि रूस ने भी भारत के सपोर्ट में अपना बेड़ा भेज दिया था इसलिए अमेरिका ने हाथ पीछे खींच लिए.

मुजीब की दिक्कत: सरकार चलाना आसान नहीं होता

स्वतंत्रता के बाद बांग्लादेश ‘सेक्युलर जनतंत्र’ बन गया. जनवरी 1972 में 1970 के चुनाव के आधार पर जीते मुजीब को बांग्लादेश का टेम्पररी प्रधानमंत्री बनाया गया. 1973 में बांग्लादेश में पहली बार चुनाव हुए और मुजीब चुनाव जीतकर फिर प्रधानमंत्री बने. दिसम्बर 1972 में बांग्लादेश का संविधान भी आ गया जिसके चार बेसिक सिद्धांत थे: नेशनलिज्म, सेकुलरिज्म, सोशलिज्म और डेमोक्रेसी. इसके साथ ही 1971 नरसंहार में शामिल ‘जमात’ पर बैन लगा दिया गया. यहीं से बांग्लादेश में सेक्युलर पॉलिटिक्स और इस्लामी पॉलिटिक्स की शुरुआत हो गई. क्योंकि जमात बैन हुआ था. ख़त्म नहीं.

मुजीब
मुजीब

अब एक दिक्कत हो गई. मुजीब और उनके मंत्रियों को सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं था. उनको अफसरों पर भरोसा करना पड़ा. मंत्री और अफसर तरह-तरह के करप्शन में शामिल होने लगे. नित नए नए मामले आते रहे. लोगों को खुश करने के लिए सरकार ने मुआवजा देना शुरू किया. पर अर्थव्यवस्था इससे तो चलती नहीं. काम गड़बड़ा गया जब अकाल भी पड़ गया. बांग्लादेश को ‘बॉटमलेस बास्केट’ कहा जाने लगा.

Second Revolution या मुजीब की हताशा?

इन बातों से मुजीब एकदम परेशान हो गए. दिसम्बर 1974 में उन्होंने देश में इमरजेंसी लगा दी. फिर एक संविधान संशोधन किया: 1. पार्लियामेंट और जुडीशियरी के अधिकार कम कर दिए गए. 2. पार्लियामेंट्री सिस्टम से ‘प्रेसिडेंट’ वाला सिस्टम लाया गया. 3. फिर सिर्फ ‘एक पार्टी’ का सिस्टम लाया गया जिसमें सारी पॉलिटिकल पार्टीज को मिलाकर एक पार्टी ‘बांग्लादेश कृषक श्रमिक अवामी लीग’ (BAKSAL) बनायी जानी थी. इसको मुजीब ने ‘Second Revolution’ कहा.

ये सब हो गया. पर अब जनता इससे सुधारों की उम्मीद कर रही थी. पर सुधार कहां थे? नहीं हो रहे थे. स्थिति पहले से अधिक चौपट हो गई थी. नौकरी नहीं थी. खाना नहीं था. अपराध बढ़ गए थे.

देश के मुखिया का क़त्ल और मेजर जनरल की एंट्री

अगस्त 1975 में पाकिस्तान के तरीके अपनाते हुए बांग्लादेश की आर्मी के अफसरों ने मुजीब और उनके परिवार को क़त्ल कर दिया. उनकी बेटी शेख हसीना देश से बाहर थीं. बच गईं.

मुजीब के ही कैबिनेट मंत्री मुश्ताक अहमद को प्रधानमंत्री बनाया गया. पर तीन महीने में ये एक्सपेरिमेंट फेल हो गया. मिलिट्री ने प्रधानमंत्री को हटाकर सत्ता अपने हाथ में ले ली.

मेजर जनरल जिया-उर-रहमान ने रेडियो से देश को सन्देश दिया और वादा किया कि सब कुछ ठीक हो जायेगा. बांग्लादेश के संविधान के मुताबिक दिक्कत होने पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस भी प्रेसिडेंट बन सकते हैं. तो रहमान ने प्रेसिडेंट चीफ जस्टिस सयाम की ‘कामचलाऊ सरकार’ को पूरा सपोर्ट दिया. फिर रहमान के कहने पर सयाम ने पार्लियामेंट भंग कर दिया और इमरजेंसी लगा दी.

ज़िया-उर-रहमान
ज़िया-उर-रहमान

मुजीब के तरीकों को बदला गया. सबको पार्टी बनाने की छूट दी गई. प्रेस को भी पूरी छूट दी गई. रहमान ने जोर-शोर से काम करना शुरू कर दिया. फैमिली प्लानिंग से लेकर ब्रिज-प्लानिंग सब कुछ किया जाने लगा. नवम्बर 1976 में रहमान ‘चीफ मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर’ बन गए और सयाम के रिटायर होने पर प्रेसिडेंट बन गए.

अपने वादे पूरे करते हुए रहमान ने 1978 में चुनाव करवाए और जीत के आये. चुनाव में मुजीब की पार्टी अवामी लीग और रहमान की पार्टी BNP बड़ी पार्टियां बन के आईं. रहमान ने जनता में आत्म-सम्मान और आत्म-विश्वास भरना शुरू किया. विदेश नीति से लेकर राज्य नीति सब कुछ कायदे से करने की कोशिश की. मकसद एक ही था: बांग्लादेश को आत्मनिर्भर बनाना.

मेजर जनरल रहमान का क़त्ल और एक और जनरल की एंट्री

मई 1981 में आर्मी के अफसरों ने रहमान का क़त्ल कर दिया. पर मिलिट्री ने ‘टेकओवर’ नहीं किया. कोई पकड़ा भी नहीं गया. रहमान की पार्टी के नेता अब्दुस सत्तार जो कि वाईस-प्रेसिडेंट थे अब प्रेसिडेंट एबीएन गए और रहमान के सारे कामों को आगे बढ़ाने लगे.

पर आर्मी को चैन कहां! पाकिस्तान में इतना कुछ हो रहा था तो ये लोग कैसे चुप बैठते?

24 मार्च 1982 को लेफ्टिनेंट जनरल मुहम्मद इरशाद ने प्रेसिडेंट को हटा दिया, संविधान को निरस्त कर दिया और आर्मी रूल लगा दिया. बचाव में कहा कि सरकार निकम्मी थी. कुछ काम नहीं हो रहा था. सिर्फ करप्शन था.

1983 में इरशाद बांग्लादेश के आर्मी चीफ, चीफ मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर और प्रेसिडेंट तीनों थे!

इरशाद
इरशाद

पॉलिटिक्स पर थोड़ी रहम दिखाते हुए उन्होंने लोकल यानी पंचायत टाइप के चुनाव करवाने की कोशिश की पर किसी पार्टी ने इंटरेस्ट नहीं दिखाया. फिर उन्होंने अवामी लीग को ललचाना शुरू किया. पैसे और थोड़ा-बहुत पॉवर देकर. अवामी लीग के सपोर्ट से थोड़ी राहत मिल गई इनको. फिर इन्होंने जमात पर से बैन हटा लिया. जमात अपने शरियत वाले समर्थक इकठ्ठा करने लगा.

1985 में इरशाद ने लोकल चुनाव करवा लिए. फिर से प्रेसिडेंट भी बन गए. और जमात-ए-इस्लामी का भी समर्थन ले लिया. फिर अपनी पार्टी बना ली: जातीय पार्टी.

1986 में चुनाव करवाए गए. BNP की अध्यक्ष रहमान की बेगम खालिदा जिया ने चुनाव का बहिष्कार कर दिया. पर चुनाव हुए और इरशाद की जातीय पार्टी जीत गई. शेख हसीना की अवामी लीग ने चुनाव में भाग लिया था. इस बार इरशाद ने अपने सारे पदों से रिजाइन कर सिर्फ प्रेसिडेंट पद के लिए चुनाव लड़ा.

पर आर्मी ने एक बार फिर नौटंकी की. इस बार वो लोकल स्तर के पदों पर अपने लोग चाहते थे. इसके लिए इरशाद बिल लेकर आये. इस बात पर अवामी लीग, BNP और जमात-ए-इस्लामी सब एक होकर विरोध करने लगे. इरशाद ने पार्लियामेंट भंग कर दिया, इमरजेंसी लगा दी और मार्च 1988 में चुनाव का प्रस्ताव रख दिया.

बाकी पार्टियों ने चुनाव का बहिष्कार किया. पर चुनाव हुए और जातीय पार्टी 300 में से 251 सीटें जीतकर आई. जून 1988 में संविधान संशोधन कर के इस्लाम को बांग्लादेश का रिलिजन बना दिया गया. उसके पहले बांग्लादेश इस्लामी देशों में ऐसा देश था जो सेक्युलर था!

पर धीरे-धीरे इरशाद के खिलाफ जनता चरस बोने लगी. लोग आंय-बांय करते रहते थे इरशाद के नाम पर. हड़ताल होने लगे. भाषणबाज़ी होने लगी. 6 दिसम्बर 1990 को इरशाद ने रिजाइन कर दिया.

खालिदा जिया: पहली बेगम आईं प्रधानमंत्री बनकर

27 फ़रवरी 1991 को केयर टेकर सरकार ने चुनाव करवाए. ये चुनाव बहुत ही साफ़-सुथरा था. शायद बांग्लादेश के इतिहास में सबसे साफ़-सुथरा. कोई गड़बड़ नहीं हुई.

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खालिदा जिया

BNP ने जमात-ए-इस्लामी के साथ मिलकर सरकार बना ली. खालिदा जिया प्राइम मिनिस्टर बन गईं. अवामी लीग की शेख हसीना विपक्ष में आ गईं. इरशाद को जेल में डाल दिया गया. उनके डिप्टी रहमान चौधरी जातीय पार्टी चलाने लगे.

फिर 1972 के ओरिजिनल संविधान के हिसाब से प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की पोस्ट रखी गई. जैसा कि अपने इंडिया में है. अब्दुर रहमान विश्वास राष्ट्रपति बने.

दूसरी बेगम शेख हसीना से झंझट: शुरुआत बेगमों की लड़ाई की

पर लोग चैन से बैठें तब तो! मार्च 1994 में एक बाई-इलेक्शन को लेकर विपक्ष और सरकार में झंझट हो गया. विपक्ष ने कहा कि सरकार इसे जीतने के लिए करप्शन कर रही है. इस बात को लेकर विपक्ष ने पार्लियामेंट का बॉयकाट कर दिया और खालिदा जिया से इस्तीफ़ा मांगा जाने लगा. फिर विपक्ष ने पार्लियामेंट से रिजाइन कर दिया. सरकार के खिलाफ पूरे देश में धरना-प्रदर्शन चलने लगा.

अवामी लीग की शेख हसीना ने ऐलान किया कि 1996 के चुनावों का बहिष्कार किया जायेगा. फ़रवरी 1996 में चुनाव हुए और BNP फिर जीत गई. खालिदा जिया फिर प्रधानमंत्री बन गयीं. पर विपक्ष का अपना वही राग था. फिर जून 1996 में संविधान में संशोधन किया गया. चुनाव करने के लिए एक न्यूट्रल ‘केयरटेकर सरकार’ का प्रोविजन लाया गया. ये शेख हसीना की बड़ी जीत थी. फिर से चुनाव हुए. एक गरीब देश में बार-बार चुनाव ही होते रहे क्योंकि राजनीतिक लोग आपस में बात नहीं कर पा रहे थे. कमाल है!

अब दूसरी बेगम शेख हसीना की बारी

इस बार अवामी लीग को जीत हासिल हुई. शेख हसीना प्रधानमंत्री बनीं.

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शेख हसीना

अब BNP ने शुरू किया कि अवामी लीग ने भ्रष्टाचार कर के जीत हासिल की है. कुछ दिन ये करने के बाद फिर पार्लियामेंट में आने लगे. कुछ दिन बैठे. फिर शुरू हो गए कि सरकार अपने विपक्षी नेताओं का मर्डर करवा रही है. इस बात पर पार्लियामेंट छोड़ दिया. 7 महीने बाद मार्च 1998 में फिर पार्लियामेंट में वापस बैठने लगे.

जून 1999 में फिर पार्लियामेंट छोड़ा. देश में हड़ताल होने लगा. एक बार 6 दिन की तो एक बार 27 दिन की हड़ताल हुई. सारे बाई-इलेक्शन और म्युनिसिपल कारपोरेशन के चुनावों का बहिष्कार कर दिया गया. विपक्ष ने शर्त रखी कि अगर सरकार अपने में सुधार करेगी तो हम लोग चुनाव लड़ेंगे. पर सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया.

शह-मात: खालिदा जिया की जीत और 500 ब्लास्ट

2001 में खालिदा जिया ने बाकी पार्टियों के साथ मिलकर 200 से ऊपर सीटें जीतीं. शेख हसीना की पार्टी को मात्र 62 सीटें मिलीं. हिंसा होने का अंदेशा था क्योंकि शेख हसीना की पार्टी खालिदा जिया पर चुनाव में धांधली का आरोप लगा रही थी. पर अमेरिका के पूर्व प्रेसिडेंट जिमी कार्टर के विजिट ने दोनों के बीच सुलह करा दी. शेख हसीना से साथ देने का वादा भी लिया. पर 2002 में अपने वादे से पलटते हुए हसीना की पार्टी ने पार्लियामेंट में हंगामा करना शुरू किया. ऐसे ही चलता रहा. 2005 में हसीना की पार्टी ने पूरे बजट सेशन का ही बॉयकाट कर दिया.

अगस्त 2005 में एक भयानक घटना हुई. जमात-उल-मुजाहिद्दीन नाम के कट्टरवादी संगठन ने पूरे देश में 300 जगहों पर 500 छोटे-छोटे ब्लास्ट किए! एकदम आतंक फैल गया. जमात-उल-मुजाहिद्दीन के कई नेताओं को अरेस्ट कर लिया गया. पर इसके बाद देश में कई जगह कोर्ट, वकील और जजों पर हमले हुए. 28 लोग मारे गए. सरकार ने जमात-उल-मुजाहिद्दीन के 6 नेताओं को जजों की हत्या के जुर्म में फांसी दे दी. तब तक चुनाव आ गए.

बांग्लादेश में ‘केयर टेकर’ क्राइसिस

2007 में चुनाव होने थे. पर हो नहीं पाए. क्योंकि केयरटेकर सरकार पर पक्षपात करने का आरोप लगा. शेख हसीना और उनके साथियों ने केयरटेकर सरकार की कोई बात मानने से इनकार कर दिया. सारी पार्टियां मिलकर भी केयरटेकर सरकार के चीफ एडवाइजर(मतलब प्रधानमंत्री) के लिए एक कैंडिडेट नहीं ढूंढ पा रहे थे. थक-हारकर प्रेसिडेंट इआजुद्दीन अहमद को चीफ एडवाइजर बनाया गया. वो भी थक गए. कुछ समय के बाद मिलिट्री के प्रेशर में उन्होंने रिजाइन कर दिया. वर्ल्ड बैंक में इकोनॉमिस्ट रह चुके फखरुद्दीन अहमद को मिलिट्री ने चीफ एडवाइजर बना दिया. फखरुद्दीन मिलिट्री के दम पर देश से करप्शन उखाड़ फेंकने के लिए चल पड़े. छः महीने में 2 लाख लोगों को अरेस्ट कर लिया गया. फिर तय हुआ कि 2008 में चुनाव होंगे.

फखरुद्दीन अहमद
फखरुद्दीन अहमद

उससे पहले फखरुद्दीन ने राजनीति से भ्रष्ट लोगों को हटाने का जिम्मा लिया. शेख हसीना और खालिदा जिया को देश छोड़ने का आदेश दे दिया गया. दोनों पर धांधली का भी आरोप लगा. पर उनके समर्थकों ने बवाल काट दिया. इस मुद्दे पर दोनों एक हो गयीं थीं. फिर आदेश को वापस ले लिया गया.

हसीना वापस सत्ता में, पर इस बार इरादे कुछ और थे

दिसम्बर 2008 में चुनाव हुए और शेख हसीना प्रधानमंत्री बन गईं. 2 साल तक सब कुछ शांति से चलता रहा. उसके बाद सरकारी लोगों को फिर खुराफात सूझी. खालिदा जिया 40 साल से एक सरकारी बंगले में रह रही थीं. आदेश हुआ कि मकान खाली कर दीजिये. उनको छोड़ना पड़ा. पर उनके समर्थकों को ये बात नागवार गुजरी. घर से निकाल दिया? ये बात पच नहीं रही थी. घर वाली बात थोड़ी इमोशनल हो जाती है.

खालिदा-हसीना का व्यक्तिगत झंझट यहीं तक नहीं था. खालिदा जिया 15 अगस्त को अपना बर्थडे मनाती हैं. आरोप है कि ये उनका असली बर्थडे नहीं है. दिक्कत इससे नहीं है. दिक्कत ये है कि शेख हसीना के पूरे परिवार को 15 अगस्त के ही दिन क़त्ल किया गया था. वो दिन बांग्लादेश में ‘राष्ट्रीय शोक’ के रूप में मनाया जाता है. तो फिर जब खालिदा जिया का जन्मदिन किसी और दिन है तो वो 15 अगस्त को ही क्यों मनाएंगी?

‘बंगाली नेशनलिज्म’ और ‘इस्लामी नेशनलिज्म’

शेख हसीना की सरकार ने दो और काम किए:

1. 2006-08 में केयरटेकर सरकार ने सब कुछ अपने हाथ में ले लिया था. इसी बात का हवाला देते हुए 2011 में संविधान में संशोधन कर शेख हसीना ने ‘केयरटेकर सरकार’ के प्रोविजन को ही ख़त्म कर दिया. बोलीं कि इससे प्रजातंत्र को खतरा है. पर 1995 में खुद ‘केयरटेकर सरकार’ होने के लिए लड़ रहीं थीं. बाकी पार्टियां ये भूली थोड़ी थीं.

2. इसके अलावा एक कड़ा कदम उठाया गया. जमात-ए-इस्लामी के बहुत सारे नेता 1971 की लड़ाई में बंगाली लोगों को मारने के आरोपी थे. इन लोगों पर केस चलाकर अब फांसी होने लगी. हसीना ने कहा कि एक ऐतिहासिक गलती हुई थी. अब समय आ गया है उसको ठीक करने का. जमात-ए-इस्लामी के बड़े-बड़े नेताओं पर भी अब तलवार लटक रही थी. BNP और साथी पार्टियों ने खूब ड्रामा फैलाया. 2011-12 में पूरे देश में हाय तौबा मची. दंगे, मार-काट सब हुआ. ‘बंगाली नेशनलिज्म’ और ‘इस्लामी नेशनलिज्म’ का कम्पटीशन शुरू हो गया.

अब्दुल कादर मुल्ला और जमात के चीफ मोती-उर-रहमान निजामी को फांसी हो गई. निजामी तो खालिदा जिया का कैबिनेट मिनिस्टर रह चुका था. उसके बाद बहुत बवाल हुआ. कट्टरपंथी उसके सपोर्ट में आ गए थे. अब तो वो लोग एकदम सनक गए हैं. राजनीति के पुरोधा कहते हैं कि लेखकों और ब्लॉगर्स पर हमला उसी बौखलाहट का नतीजा है. ये भी आरोप है कि फांसी देने के पहले कोर्ट बहुत ही हड़बड़ी में फैसला सुना देती है. ट्रायल पर लोगों को बहुत ज्यादा भरोसा नहीं है.ये कहा जाता है कि मंत्री फैसले लेने के काबिल नहीं. और इस केस में अफसर अपने को ‘सबसे ज्यादा काबिल’ समझते हैं. पर ‘अफसरशाही के बाप’ मैक्स वेबर ने शुरू में ही कहा था: ‘अफसरों को कंट्रोल करने के लिए काबिल नेता होने ही चाहिए. नहीं तो भ्रष्टाचार बढ़ेगा’. वही हो रहा है बांग्लादेश में.

हसीना को खालिदा का गिफ्ट

5 जनवरी 2014 को चुनाव होनेवाला था. पर BNP ने इसका बॉयकाट कर दिया. शेख हसीना फिर प्रधानमंत्री बनीं. जातीय पार्टी के इरशाद की पत्नी रौशन इरशाद विपक्ष की नेता बनीं. हंगामे होते रहे.

irshad
इरशाद दंपत्ति

2016 में यूनियन परिषद के इलेक्शन में 100 लोग मरे. 10000 लोग गिरफ्तार हुए. ये हंगामा अभी तक चल रहा है. इसके अलावा शेख हसीना ने ‘ग्राउंड रियलिटी’ को ध्यान में रखते हुए ‘इस्लाम’ को देश का धर्म घोषित करने लिए संसद में बिल पेश किया. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इसको नकार दिया. फिर भी इस्लाम को देश का धर्म बना ही दिया गया. ये कहा जा रहा है कि बांग्लादेश नेचर से सेक्युलर है. ये तो ऐसे ही लोगों को खुश करने के लिया गया है.

 यहीं पर शेख हसीना की सरकार दबाव में आ गई. सेक्युलर और इस्लामी लोगों के बीच जो झंझट दबे-दबे चल रहा था वो सामने आ गया. ऐसा माना जाने लगा कि शेख हसीना एक ‘सेक्युलर तानाशाही’ चला रही हैं. 

वहीं BNP तो पहले ही बहुत ही बुरी स्थिति में है. खालिदा जिया बहुत दिन से सत्ता से बाहर हैं. फिर 2014 के चुनाव में गलत-सलत डिसीजन लेकर इन लोगों ने शेख हसीना को वाक ओवर दे दिया. खालिदा का बेटा तारिक रहमान देश से बाहर है और उस पर करप्शन के चार्ज हैं. लौटा तो जेल जाना पड़ेगा. फिर BNP पर इंडिया को भरोसा नहीं है. इसलिए वो इंडिया का सपोर्ट नहीं ले पाते. जमात के BNP के साथ रहने से बांग्लादेश के सेक्युलर करैक्टर के गड़बड़ाने का खतरा है. अभी पार्लियामेंट में BNP का एक भी कैंडिडेट नहीं है. जमात को तो 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने बैन कर दिया था. क्योंकि जमात ‘अल्लाह’ को डेमोक्रेसी से ऊपर मानता है. और उन लोगों को डेमोक्रेसी में भरोसा नहीं. मार्च 2015 में खालिदा को उनके घर में बंद कर दिया गया था. फोन कनेक्शन, इन्टरनेट सब काट दिया गया. यहां तक कि फ़ूड सप्लाई भी रोक दी गई थी कुछ दिनों के लिए.

खालिदा जिया के समर्थकों ने हलकान किया शेख हसीना का जिया

2011-12 में खालिदा जिया के समर्थकों ने खूब बवाल काटा था. एक तरफ जमात के नेता जेल जा रहे थे दूसरी तरफ BNP समर्थक तोड़-फोड़ कर रहे थे. शेख हसीना इस चीज को रोक नहीं पाईं. ऐसे में ही एक अतिवादी ग्रुप जमात-उल-मुजाहिद्दीन के लोगों ने शरियत को ना माननेवाले लोगों के खिलाफ जंग छेड़ दी. तभी सेक्युलर ब्लॉगर्स को मारा जाने लगा. पुजारियों को मारा जाने लगा. नए विचारों के प्रोफेसर और ‘गे-लेस्बियन समर्थक’ लोगों को मारा जाने लगा.

शेख हसीना की सरकार का रिस्पांस अच्छा नहीं रहा है. 2013 में एक ब्लॉगर अहमद राजिब हैदर की हत्या के बाद शेख हसीना उसके घर गयीं. हत्यारों के समर्थकों ने खोब्ब बवाल किया कि नास्तिकों से इस्लाम को खतरा है. फिर जब ‘अन्सरुल्ला बंगला टीम’ जो कि बहुत ही वाहियात किस्म की खूंरेजी धार्मिक पॉलिटिक्स करता है, ने सेक्युलर लेखकों की हत्या की तो हसीना इस बार कहीं नहीं गईं. लोग कहते हैं कि एक छोटी सी चुप्पी ने अतिवादियों को बढ़ावा दे दिया. उनको लगा कि सरकार अब कुछ नहीं कर सकती.

जमात-उल-मुजाहिद्दीन: ISIS का बंगलादेशी अवतार

1998 में एक नई पार्टी बनी: जमात-उल-मुजाहिद्दीन. इनका अलग उद्देश्य है. ये किसी संविधान-सरकार को नहीं मानते. ये लोग देश को शरीयत के आधार पर चलाना चाहते हैं. 2005 में इन लोगों ने पूरे देश में 300 जगहों पर 500 छोटे-छोटे ब्लास्ट किए थे. तब इस संगठन को बैन कर दिया गया. ये लोग बैंक, NGO सबको उड़ा देने की धमकी देते रहते हैं. इनका कहना है कि ऐसे सारे संगठन औरतों को बिगाड़ते हैं इसलिए इनको हटाना बहुत जरूरी है. पर इनकी उपस्थिति देश से ख़त्म नहीं हुई है. धीरे-धीरे इनके समर्थक बढ़ते ही रहे हैं.

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सबसे खतरनाक बात ये है कि जमात-उल-मुजाहिद्दीन और ISIS दोनों ही इस्लाम के ‘सलाफी’ सिस्टम को मानते हैं. इस सिस्टम में दुनिया में इनके अपने ‘इस्लाम’ के अलावा कुछ नहीं रहना है. ऐसे में दोनों के बीच ‘प्रेम’ या ‘शादी’ हो जाना बड़ी बात नहीं है.

बांग्लादेश में अगला चुनाव 2019 में है. अगर अभी बांग्लादेश की सरकार ने स्थिति पर काबू नहीं पाया तो ISIS के लिए बहुत आसान हो जाएगा. ‘सेक्युलर इस्लाम’ और ‘सलाफी इस्लाम’ की लड़ाई में बांग्लादेश साउथ-ईस्ट एशिया का ‘मिडिल ईस्ट’ बन सकता है.

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