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तेज़ी से बढ़ रहा IIPM कैसे ख़त्म हुआ, जिसमें अब शाहरुख खान भी फंस गए हैं

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AIB ने शाहरुख खान के साथ दो पार्ट का एक विडियो किया था. पहली किस्त, आधे घंटे का विडियो. करीब आधी बातचीत के बाद शाहरुख अपने किए विज्ञापन की बात कर रहे हैं. हाहा हीही खींखीं. फिर किसी बिस्किट के विज्ञापन की बात में कहते हैं-

(कंपनी वालों ने कहा) ये बिस्किट बच्चों के लिए है. बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा सर. नाकामियों की बात भूल जाइए. शाहरुख खान माने कामयाबी. शाहरुख खान स्टैंड्स फॉर सक्सेस. देखो, हमारा क्या है. हमारा बिस्किट बिकना चाहिए. 

आपको शाहरुख खान का ये विडियो देखना चाहिए. विज्ञापनों में बड़े कन्विक्शन से गोरेपन की क्रीम बेचने वाले शाहरुख बिना लोड लिए इस विडियो में बताते हैं. कि वो जिन प्रॉडक्ट्स के लिए विज्ञापन करते हैं, लोगों को पैसा ख़र्च करके उनका इस्तेमाल करने को कहकर कुछ सेकेंड के विज्ञापन से ख़ुद करोड़ों कमाते हैं, उनके बारे में कितनी हल्की राय रखते हैं. SRK अक़्सर ब्रैग करते हैं. कि उनका ‘ब्रैंड शाहरुख’ बहुत आलीशान है. यही ब्रैंड शाहरुख अपने कुछ पुराने विज्ञापनों को लेकर अदालत ले जाया गया है.

कलकत्ता हाई कोर्ट में एक याचिका दायर हुई. एक संस्थान के दो पुराने स्टूडेंट्स ने डाली. उनके मां-बाप का कहना है, उन्होंने शाहरुख को एक कॉलेज का ऐड करते देखा. शाहरुख की ब्रैंड वैल्यू पर भरोसा किया और मोटा पैसा देकर अपने बच्चे का दाखिला करवा दिया वहां. वो कॉलेज फ्रॉड निकला. अदालत ने इसपर शाहरुख से हलफ़नामा मांगा है. कहा है, जिसके लिए ऐड किया उससे लिंक बताएं. शाहरुख के वकील ने कहा है, लिंक कुछ नहीं. बस कुछ विज्ञापन किए थे. संयोग देखिए, जिसके लिए विज्ञापन किया था उसका सारा खेल ही विज्ञापनों पर खड़ा था.

शाहरुख खान
शाहरुख खान ब्रैंड की हैसियत से ही IIPM के लिए विज्ञापन कर रहे थे. स्टार्स के पास मेकअप से लेकर मार्केंटिंग और PR की लंबी-चौड़ी टीम होती है. क्या किसी प्रॉडक्ट का विज्ञापन करने से पहले उसके बारे में थोड़ी तफ़्तीश करना बहुत मुश्किल काम है?

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ प्लानिंग ऐंड मैनेजमेंट. शॉर्ट में, IIPM. इसके प्रमोटर अरिंदम चौधरी. इनका नाम गूगल कीजिएगा, तो विकिपीडिया लिंक के नीचे ‘पीपल ऑल्सो आस्क’ में बिल्कुल ऊपर ही तीन सवाल दिखेंगे. वॉट हैपेन्ड टू अरिंदम चौधरी? वाई इज़ IIPM क्लोज़ड? इज़ IIPM बेल्ज़ियम रिकग्नाइज़्ड यूनिवर्सिटी? अरिंदम और उनके IIPM की कहानी लिखने की परफ़ेक्ट इंक है ये.

पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा…
एक हुए मलयेंद्र किशोर चौधरी. दिल्ली में रहते थे. 1973 में यहीं उन्होंने एक मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट खोला- IIPM. इनका बेटा अरिंदम. पढ़ने के लिए अमेरिका जाना चाहता था. पापा ने कहा, जब अपना इंस्टिट्यूट है हमारे पास तो वहां क्यों जाना. तो अरिंदम ने पापा के इंस्टिट्यूट से पहले ग्रेजुएशन, फिर पोस्ट ग्रेजुएशन किया. विकीपिडिया बताता है, ये 1992 का साल था. मनमोहन सिंह वाले आर्थिक उदारीकरण को एक साल हो चुका था. कंपनियां खुल रही थीं. करियर के नए-नए विकल्प खुल रहे थे.

बेटा हमारा बड़ा काम करेगा…
अरिंदम ने ग्रेजुएशन के बाद अपना फर्म शुरू किया. जो कंपनियों के लिए लोगों की हायरिंग करता था. ये वो टाइम था, जब इंजिनियरिंग, डॉक्टरी, सिविल सर्विसेज़ और टीचर जैसी पारंपरिक नौकरियों से इतर BBA और MBA जैसे कोर्सेज़ में भी भरपूर मौके थे. अच्छा और कमाऊ विकल्प था ये. ऐसे ही माहौल में IIPM भी बड़ा होता गया. इसका पर्यायवाची थे अरिंदम चौधरी. मैनेज़मेंट गुरु, लेखक, मोटिवेशनल स्पीकर. वो एज़ुकेशन में थे. पब्लिशिंग में थे. मैगज़िन छापते थे. कन्सलटिंग फर्म था. फिर फैलते-फैलते आगे चलकर फिल्म बिज़नस में भी चले गए.

अरिंदम
अरिंदम चौधरी IIPM के डीन हैं. उनके पिता मलयेंद्र डायरेक्टर हैं. 

मगर ये तो कोई न जाने…
अरिंदम, ख़ास तरह की पर्सनेलिटी. ख़ास तरह का ड्रेस कोड. चमकदार, भड़कीला. वो पांवों में सांप के खाल वाले जूते भी पूरे आत्मविश्वास से कैरी कर लेते थे. कंधे तक बाल. जिसे ऊपर की तरफ बड़े जतन से कंघी करके पीछे चोटी में बांध दिया गया होता था. उनका चेहरा घर-घर में पहचाना जा रहा था. बड़ी-बड़ी बातें. जीवन संवार देने के वादे. तुम सपना देखो, उसे पूरा करने की चाभी मेरे पास है टाइप स्लोगन्स. चांद-तारे तोड़ लाने वाले स्तर के दिल लुभाने वाले प्रॉमिस. एक मार्केटिंग कंपनी अपना प्रॉडक्ट बेचने के लिए क्या करती है? वही अरिंदम भी करते थे. इस स्टाइल में कि टॉइलेट क्लीनर जैसा उत्पाद भी हसीं लगने लगे. ये लिखते-लिखते मुझे वरुण ग्रोवर का वो चुटकुला याद आया. बस में जूसर बेचने वाला सेल्समैन.

कि मेरी मंज़िल हैं कहां…
आएदिन अख़बारों में पन्ने-पन्ने भर के विज्ञापन छपते. सारे बड़े अख़बारों में. इनमें IIPM कैंपस की ऐसी तस्वीरें होतीं कि लगता फाइव स्टार होटेल है. क्लब, स्विमिंग पूल, स्नूकर टेबल. और वादे ऐसे कि 100 पर्सेंट प्लेसमेंट. हर स्टूडेंट को लैपटॉप. यूरोप ट्रिप. विदेशी यूनिवर्सिटीज़ से टाई-अप. जुलाई 2011 में छपी ‘कारवां’ की एक ख़बर में किशोरेंदु गुप्ता नाम के कमीशन्ड एजेंट का ज़िक्र है. जिसकी स्टूडेंट्स लाने के लिए IIPM के साथ सौदेबाज़ी थी. दाखिले करवाने का प्रति छात्र के हिसाब से कमीशन. 1 से 24 स्टूडेंट्स लाने वाले एजेंट को प्रति छात्र 75 हज़ार रुपये. 25 से ऊपर स्टूडेंट्स लाने पर 90 हज़ार प्रति छात्र के हिसाब से कमीशन. 50 से ऊपर स्टूडेंट लाने पर प्रति छात्र सवा लाख रुपये. किशोरेंदु जैसे कई एजेंट थे IIPM के पास.

IIPM
IIPM में स्टूडेंट लाने पर के लिए एजेंट्स के साथ करार होता है. प्रति छात्र के हिसाब से कमीशन मिलता था एजेंट्स को. 

बैठे हैं मिलके सब यार अपने…
अरिंदम के शो होते, जहां एक टिकट का दाम हज़ारों में होता. कहते हैं, किसी प्रोग्राम में बोलने के लिए अरिंदम लाखों रुपये लेते थे. मार्च 2013 की इकॉनमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, IIPM उस समय विज्ञापनों में रियल एस्टेट के अगुवा DLF से ज़्यादा पैसा ख़र्च कर रहा था. इस रिपोर्ट में 2008-09 का ब्योरा है. उस साल IIPM ने 202 करोड़ रुपये का रेवेन्यू कमाया. इसमें से 120.5 करोड़ विज्ञापनों पर ख़र्च किया. कुल कमाई का 60 फीसद से भी ज़्यादा. इसी में शाहरुख खान जैसी हस्तियों की भूमिका भी थी.

सबके दिलों में अरमां ये है…
एज़ुकेशन सेक्टर काफी बड़ा था. किसे चुनें, कहां दाखिला करवाएं. इसके लिए बच्चों और उनके मां-बाप को सर्वे चाहिए होता था. गाइडिंग लाइट टाइप. मीडिया को ऐसे सर्वे में विज्ञापन ख़ूब मिलते थे. प्रिंट मीडिया के विज्ञापनों का सबसे बड़ा हिस्सा तब एज़ुकेशन वाले सेक्शन से ही आ रहा था. 1998 में बिज़नस टुडे बिज़नस स्कूलों का पहला भारतीय सर्वे लेकर आया. हाथोहाथ लिया गया ये. फिर बाकी पब्लिकेशन्स में भी होड़ शुरू हुई.

बिज़नस में कोई अपना नाम करेगा…
बिज़नस स्कूलों के लिए भी ये सर्वे बड़े अहम होते थे. उनको पता था, इन सर्वे के आधार पर दाखिला लेने वाले बच्चे संस्थान चुनेंगे. आउटलुक मैगज़ीन भी रिसर्च ऑर्गनाइज़ेशन ‘सी फोर’ के साथ मिलकर अपना बिज़नस स्कूल सर्वे लाया. 2003 के अपने सर्वे में आउटलुक ने इंडस्ट्री इंटरफेस के मामले में IIPM को चौथे नंबर पर रखा. इस सर्वे पर बड़ी शिकायतें आईं आउटलुक के पास. लोग जो कह रहे थे, उसके मुताबिक सौ फीसद प्लेसमेंट देने का IIPM का दावा ग़लत था. उस समय आउटलुक ग्रुप के पब्लिशर थे महेश्वर पेरी. पेरी का किरदार IIPM की इस कहानी का बहुत अहम हिस्सा है. लाइव मिंट को दिए एक पुराने इंटरव्यू में पेरी ने आउटलुक वाले सर्वे का क़िस्सा यूं बताया हुआ है-

IIPM ने अपने आंकड़ों में हेराफेरी की थी. उन्होंने हमें डेटा दिया और जब हमने उनका ऑडिट किया, तो उन्होंने हमें ग़लत कागज़ात दिखाए. हमने जब वो डेटा अपनी वेबसाइट पर डाला, तो काफी शिकायतें आईं. IIPM कहता था, 100 फीसद प्लेसमेंट. जबकि बस 50 पर्सेंट ही प्लेसमेंट था उनका. IIPM के एक स्टूडेंट के अभिभावक मेरे पास आए. उन्होंने कहा, इतनी मोटी फीस देने के बाद भी उनके बेटे की नौकरी नहीं लगी. उनकी कही बात मेरे दिल पर लगी. मैंने सी फोर को इस बात पर IIPM से उनका पक्ष पूछने को कहा. मैंने IIPM से कहा कि अगर आपका 100 पर्सेंट प्लेसमेंट रेकॉर्ड है, तो हमें ब्योरा दिखाइए. वो बोले, हम ये जानकारी किसी के साथ साझा नहीं करते.

अरिंदम
अरिंदम चौधरी की लाइफ़स्टाइल बहुत आलीशान थी. कई महंगी गाड़ियां थीं उनके पास. वो दावा करते थे कि वो अपनी आय के लिए IIPM पर निर्भर नहीं हैं.

उसके आगे मगर थे अजाब सिलसिले…
2005 में आउटलुक ने नोटिस छापा. कि अब वो अपने सर्वे में IIPM को जगह नहीं देंगे. पेरी ने आगे भी अपने कुछ आर्टिकल्स में IIPM का ज़िक्र किया. फिर उन्होंने फैसला किया, फुल-टाइम एज़ुकेशन कन्सल्टेशन पर ही काम करने का. अपनी कंपनी बनाई उन्होंने- पाथफाइंडर पब्लिशिंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड. इसी में एक मैगज़ीन शुरू की- करियर्स 360. इसके पहले अडिशन, अप्रैल 2009, की थीम थी- शैक्षणिक संस्थानों की गड़बड़ियां. कई संस्थानों को क्वेश्चनायर भेजे गए. इनमें IIPM भी था. करियर्स360 के आर्टिकल पर स्टे लगवाने IIPM कोर्ट पहुंच गया. यहां से कानूनी लड़ाई शुरू हुई. महेश्वर पेरी ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की. अदालत ने कहा, पब्लिक इंट्रेस्ट में है तो लिखिए. लेकिन आधा पन्ना IIPM को भी दीजिए. आरोपों पर अपना पक्ष रखने के लिए. जून 2009 में आर्टिकल छपा. टाइटल था- IIPM, बेस्ट ओनली इन क्लेम्स? करियर्स 360 IIPM द्वारा किए जा रहे दावों की जांच कर रहा था. इसमें सबसे बड़ा मसला डिग्री से जुड़ा था.

IIPM का बेल्ज़ियम कनेक्शन
संस्थान अपने विज्ञापनों में दावा करता. कि वो IIM बेल्ज़ियम की डिग्री देता है. करियर्स360 ने इसपर स्टोरी की. जून 2009 की उनकी रिपोर्ट के तुरंत बाद IIPM का एक नया सेट आया विज्ञापन का. इसमें उसने IIM बेल्ज़ियन की जगह यूनिवर्सिटी ऑफ बकिंघम की डिग्री का ज़िक्र किया था. जब करियर्स360 ने वहां पता किया, तो यूनिवर्सिटी ऑफ बकिंघम ने IIPM के साथ अपने किसी असोसिएशन से इनकार किया. फिर करियर्स360 ने दूसरा आर्टिकल लिखा. इसके बाद IIPM ने अपने विज्ञापनों से यूनिवर्सिटी ऑफ बकिंघम का भी नाम हटा दिया. फिर से वो बेल्ज़ियम IMI का नाम लेने लगे. इसके बाद करियर्स360 ने बेल्ज़ियम में उच्च शिक्षा से जुड़ी अथॉरिटी NVAO (वहां का UGC समझिए) के डायरेक्टर से संपर्क किया. वहां से जवाब आया-

IMI बेल्ज़ियम उच्च शैक्षणिक शिक्षा का मान्यताप्राप्त संस्थान नहीं है. ऐसे में वो मान्यताप्राप्त डिग्रियां भी नहीं दे सकता. यहां से पास लोग अगर बैचलर या मास्टर की डिग्री का इस्तेमाल करें, तो उनके ऊपर कानूनी कार्रवाई हो सकती है. बिना मान्यताप्राप्त डिग्री के इन टाइटल्स का इस्तेमाल गैरकानूनी है. हमारे संविधान के मुताबिक, कोई भी इंसान संस्थान खोल सकता है. एज़ुकेशन ऑफर कर सकता है. मगर उच्च शिक्षा से जुड़े शैक्षणिक संस्थानों को और डिग्री देने वालों को मान्यता लेनी ही होगी.

NVAO के मुताबिक, IMI बेल्ज़ियम द्वारा दी जा रही डिग्रियां उच्च शिक्षा और नौकरी, दोनों के लिए बेकार हैं. ये फॉर्मल डिग्री है ही नहीं. साफ था. IIPM की बेल्ज़ियम वाली डिग्री भी फर्ज़ी थी.

सैंपल फ्रॉम देहरादून
मार्च 2009 में देहरादून के IIPM कैंपस में बच्चे प्रोटेस्ट करने लगे. ये प्रोटेस्ट इसलिए था कि स्टूडेंट्स को IIPM के मान्यताप्राप्त न होने की बात मालूम चली थी. शिकायतें आने लगीं, तो राज्य सरकार ने उत्तराखंड टेक्निकल यूनिवर्सिटी से इस मामले की जांच करने को कहा. यूनिवर्सिटी ने अपनी जांच में कहा कि उसने IIPM से कई बार ज़रूरी दस्तावेज़ मुहैया कराने को कहा. मगर ऐसा करने की जगह IIPM ने दो हिंदी अख़बारों में विज्ञापन छपवाकर दाखिले के लिए आवेदन मंगवाए. इसमें उसने दावा किया था कि उसके यहां से कोर्स करने वाले छात्रों को IMA बेल्ज़ियम बिज़नस स्कूस की BBA/MBA की डिग्री मिलेगी.

इस विज्ञापन पर प्रतिक्रिया करते हुए यूनिवर्सिटी ने IIPM को निर्देश दिया कि वो सरकार का फैसला आ जाने तक दाखिले से जुड़ा कोई ऐक्शन न ले. काउंसलिंग वगैरह न करे. फिर यूनिवर्सिटी ने सरकार को ख़बर भेजी कि कई बार मांगने के बाद भी IIPM ने उन्हें ज़रूरी कागज़ात नहीं दिए. ऐसे में सरकार जल्द अपनी तरफ से निर्णय ले. यूनिवर्सिटी ने सरकार को बताया. कि IIPM के पास न तो सरकार की मंज़ूरी है. न ही उसने यूनिवर्सिटी की ही मान्यता ली हुई है. ऐसे में उसके द्वारा दी जा रही MBA की डिग्रियां वैध नहीं हैं. बिना मान्यता, बिना मंज़ूरी के चल रहे संस्थान से पढ़ रहे बच्चों का भविष्य जोखिम में था.

बाकी दावों का हाल-चाल
इसके अलावा 100 पर्सेंट के IIPM के दावे भी डांवाडोल थे. वो दावा करता था कि अपने सभी स्टूडेंट्स को दुनिया की एक बड़ी यूनिवर्सिटी से मैनेज़मेंट में ग्लोबल सर्टिफिकेशन देता है. वो अपने कुछ विज्ञापनों में इस बाबत यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया के डारडेन स्कूल ऑफ बिज़नस, बर्कले हास, कैम्ब्रिज़ जज बिज़नस स्कूल के लोगो भी इस्तेमाल करता था. ये दिखाने को कि ये सब IIPM के पार्टनर संस्थान हैं. करियर्स360 ने जब पड़ताल की, तो डारडेन और कैम्ब्रिज़ जज ने किसी तरह की पार्टनरशिप से इनकार किया. बर्कले हास का कहना था कि IIPM ने उससे संपर्क किया था. कि वो चाहते है कि हास की फैकल्टी IIPM प्रोग्राम में आकर पढ़ाएं.

अदालत: इस अंजुमन में आपको खींचेंगे बार-बार
पेरी और उनके Careers360 पर केस लाद दिए गए. कभी देहरादून से. कभी गुवाहाटी से. कभी पटियाला. एकदम दूर जाकर. ये अरिंदम चौधरी का स्टाइल था. कोई आलोचना करे, सवाल उठाए, तो मानहानि का भारी-भरकम केस डाल दो. केस लड़ने वाला पैसे बहाए. बार-बार कोर्ट के चक्कर में लगाए. यहां से वहां दौड़ता रहे. इतना परेशान कर दो उसे कि वो क्या, बाकी लोग भी IIPM पर कोई सवाल उठाने से डरें.

ऑल रोड्स लीड टू…
‘कारवां’ मैगज़ीन के साथ भी यही हुआ. सिद्धार्थ देब की एक किताब आने वाली थी. इसमें अरिंदम चौधरी पर एक चैप्टर था. फरवरी 2011 में ‘कारवां’ मैगज़ीन ने ये चैप्टर छापा. IIPM ने अपने एक कमीशन्ड एजेंट के रास्ते असम के सिलचर जाकर 50 करोड़ की मानहानि का दावा ठोक दिया. केस में पेंग्विंन का भी नाम था. ये सिद्धार्थ की किताब के पब्लिशर थे. केस में गूगल का भी नाम था. इस आरोप में कि वो IIPM और अरिंदम चौधरी के नामे लिखी गई दुष्प्रचार करने वाली चीजों को अपने यहां जगह देता है.

बड़े नाम तो क्या, ब्लॉगर्स पर भी केस ठोक देते थे अरिंदम. जैसे- रश्मि बंसल. वो ब्लॉग लिखती थीं. ‘जस्ट अनदर मैगज़ीन’ नाम का एक पब्लिकेशन चलाती थीं. इन्होंने एक बार लेख छापा. इसमें IIPM द्वारा अपने विज्ञापनों में किए जाने वाले दावों पर सवाल उठाया गया था. बंसल ने ये भी लिखा था कि IIPM को UGC जैसी किसी भी शिक्षा से जुड़ी भारतीय एजेंसी की मान्यता नहीं मिली हुई है, जो कि सच्ची बात थी. मगर पब्लिक डोमेन में मौज़ूद फैक्ट छापने वालों को भी IIPM सीधे कोर्ट ले जाता था. इसकी कुछ ख़ास वजहें मुमकिन लगती हैं-

– सार्वजनिक स्तर पर ख़ुद पर उठ रहे सवालों को दबाया जा सके
– स्टूडेंट्स और उनके मां-बाप पूछें, तो कहा जा सके कि मामला अदालत में है. आरोप झूठे हैं.
– नए स्टूडेंट्स का आना न रुके

धमकी: चुप रहो…
लोग कहते हैं. केस करना, मानहानि का दावा ठोकना, ये सब अरिंदम चौधरी के सर्वाइव करने का एक स्टाइल था. इसी की मिसाल का एक क़िस्सा है. 2013 में CNN IBN पर एक पैनल डिस्कशन था. ‘फेस द नेशन’ प्रोग्राम के लिए. इसमें पेरी थे. अरिंदम के मुकाबले. आरोप-प्रत्यारोप, आरोपों पर जवाब का कॉन्सेप्ट था. बाकी कुछ गेस्ट भी थे पैनल में. एक की बड़ी तीखी बहस हुई अरिंदम से. चिल्ला-चिल्ली हुई. पेरी की भी बहस हुई. एक पॉइंट आया, जब अरिंदम ने पेरी को धमकाया- बी वेरी केयरफुल अबाउट वॉट यू से. सालों से ढेर सारे केस लड़ने में उलझे पेरी ने चिढ़कर जवाब दिया- अरिंदम, एक और केस फाइल कर दो. मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता. जाओ, एक और केस फाइल कर दो.

फरवरी 2013 में डिपार्टमेंट ऑफ टेलिकम्यूनिकेशन्स (DoT) ने बड़ी सेंसरशिप की. IIPM की आलोचना में लिखे गए कई आर्टिकल्स पर कैंची चला दी. इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स को निर्देश देकर करीब 73 URL ब्लॉक कर दिए. सेंसरशिप का ये आदेश ग्वालियर ज़िला अदालत की तरफ से आया था. साफ था, IIPM कानून का ग़लत इस्तेमाल कर रहा था. कानून की आड़ में प्रेस की आज़ादी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल रहा था.

अरिंदम
जुलाई 2015 में छपी बिज़नस स्टैंडर्ड की एक ख़बर में IIPM के कुछ स्टूडेंट्स से बात की गई थी. 2013 में संस्थान के अंदर दाखिला लेने वाले एक छात्र ने बताया कि इस पॉइंट पर आकर IIPM अपने छात्रों से मेघालय के महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी की डिग्री दिलावाने का वायदा कर रहा था. 

बोरिया-बिस्तरा बांधो अपना…
IIPM के स्टूडेंट्स की तरफ से आने वाली शिकायतें भी बढ़ती गईं. कई स्टूडेंट अदालत जाने लगे. कंज्यूमर कोर्ट में अपीलें बढ़ती गईं. अरिंदम और उनके IIPM का फर्ज़ीवाड़ा खुलने लगा. मई 2014 में UGC ने सर्कुलर निकाला. छात्रों और उनके अभिभावकों को चेताते हुए UGC कहा, हमने IIPM को मान्यता नहीं दी हुई है. उसकी डिग्रियों की कोई वैधता नहीं. सितंबर 2014 में दिल्ली हाई कोर्ट ने IIPM को फटकार लगाई. कहा, वो छात्रों को गुमराह करता है. अदालत ने कहा, IIPM अब MBA, BBA, मैनेज़मेंट कोर्स, मैनेज़मेंट स्कूल, बिज़नस स्कूल, बी स्कूल जैसे शब्द इस्तेमाल नहीं कर सकेगा अपने कोर्सेज़ के बारे में. कि उसे अपनी वेबसाइट पर साफ लिखना होगा कि वो किसी वैधानिक संस्था या अथॉरिटी से मान्यता प्राप्त नहीं है. शॉर्ट में अदालत ने कहा था- बोरिया बिस्तर बांधो अपना.

अदालत के आदेश के बाद IIPM के लिए कुछ बचा नहीं रह गया था. इन्होंने ऐलान किया, अपने सारे कैंपस बंद कर रहे हैं. जनवरी 2016 में IIPM ने सुप्रीम कोर्ट से कहा. कि वो पेरी पर डाले गए सारे केस वापस ले रहे हैं. कारवां वाले केस में भी फरवरी 2018 में आकर दिल्ली हाई कोर्ट ने IIPM के विरुद्ध फैसला सुनाया. 

IIPM पर अदालती मामले ख़त्म नहीं हुए हैं. सैकड़ों स्टूडेंट्स का जीवन बर्बाद हुआ है. कई छात्र केस लड़ रहे हैं. मगर सवाल है, वो कितना लंबा लड़ पाएंगे? कलकत्ता हाई कोर्ट के हालिया शाहरुख खान वाले एपिसोड पर 6 सितंबर को महेश्वर पेरी ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा-

शाहरुख खान से मुझे कोई निजी दिक्कत नहीं है. मगर मैं ये ज़रूर मानता हूं कि वो जानते रहे होंगे कि उनका प्रभाव स्टूडेंट्स को एक ग़लत संस्थान की तरफ आकर्षित करेगा. मैं चाहूंगा कि किसी दिन एक सिलेब्रिटी को तीन दिन की जेल हो. ताकि बाकी सिलेब्रिटीज़ ज़्यादा सावधान रहें. किसी ब्रैंड के साथ जुड़ने से पहले उसके बारे में अच्छे से पता कर लें. और मुमकिन है, शाहरुख खान ऐसी सज़ा पाने वाले पहले सिलेब्रिटी हों. 

अभी क्या स्टेटस है IIPM का?
ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एज़ुकेशन (AICTE)और मैनेज़मेंट कॉलेजों के बीच केस चल रहा था. 2013 में इसपर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा. कि MBA टेक्निकल कोर्स नहीं है. इसीलिए AICTE के अधिकारक्षेत्र से बाहर है. ऐसे में MBA कोर्स चलाने के लिए AICTE के अप्रूवल की ज़रूरत नहीं. AICTE ने इसपर रिव्यू मांगा. फिर 24 जुलाई, 2019 को सुप्रीम कोर्ट का एक और फैसला आया. इसके मुताबिक, कोई भी टेक्निकल संस्थान जिसे किसी यूनिवर्सिटी से मान्यता मिली हुई हो, बिना AICTE का अप्रूवल लिए टेक्निकल कोर्स शुरू कर सकता है. मीडिया में कुछ जगह ख़बरें चलीं. इनमें अरिंदम के हवाले से कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश IIPM की जीत है. मगर IIPM का ये दावा ग़लत है. कोर्ट के आदेश में यूनिवर्सिटी मान्यता की शर्त है. जो कि IIPM के पास नहीं है. उसके ऊपर स्टूडेंट्स को गुमराह करने, ग़लत दावे करने, झूठ बोलने और स्टूडेंट्स के साथ धोखाधड़ी करने के आरोप हैं.

IIMP
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि मैनेज़मेंट कोर्सेज़ के लिए AICTE से मान्यता लेने की ज़रूरत नहीं. यूनिवर्सिटी से अफिलिएशन होना चाहिए बस. कुछ जगहों पर ख़बर हुई कि ये निर्णय IIPM के पक्ष में है. ये दावा सही नहीं है. अदालत के निर्णय में यूनिवर्सिटी मान्यता की शर्त है. 2018 में भी  UGC ने अरिंदम और उनके पिता पर FIR लिखवाई थी. मुद्दा वही, डिग्री की मान्यता. 

ये कहानी सुनाना लाज़िम है
बटुआ मारे जाने पर हम पुलिस में शिकायत लिखवाने जाते हैं. पुलिस सबसे पहले डराती है. कहां FIR लिखवाने के झंझट में पड़ रहे हैं, नाहक अदालत के चक्कर लगाने पड़ेंगे. हम इतने में ही डर जाते हैं. ऐसे में हमारे सामने महेश्वर पेरी की कहानी है. जो सात साल तक एक ताकतवर, रिसोर्सफुल संस्थान से लड़ते रहे. एक लोकतांत्रिक मुल्क में ऐसी कहानियां मेनस्ट्रीम होनी चाहिए.

उनसे बात हुई हमारी. अदालती प्रक्रिया पर मैंने सवाल पूछा. मुझे लगा, उन्हें शिकायत होगी. क्योंकि मैं उनकी जगह होती, तो ज़रूर झुंझला जाती. सिस्टम को कोसती. मगर उन्होंने कहा, क़ानून कलेक्टिव होते हैं. अगर सच ही में कोई निर्दोष हो और उसकी छवि ख़राब करने के लिए कैंपेन चलाया जाए, तो क़ानून का ही सहारा बचेगा उसके लिए. इसीलिए क़ानून में ख़राबी नहीं.

हां लेकिन, सात साल तक पेरी के ऊपर ख़ुद को बेगुनाह साबित करने की शर्त थी. साबित करना था कि वो किसी निजी फ़ायदे के लिए या किसी को बेवज़ह बदनाम करने के लिए काम नहीं कर रहे. ये स्थिति नहीं होनी चाहिए थी. आरोप साबित करने का बोझ IIPM पर होना चाहिए था. पेरी इस बेहद लंबी खिंचने वाली अदालती प्रक्रिया में ज़रूर सुधार की बातें करते हैं. जो कि वाज़िब है, आदर्श स्थिति है. वो कहते हैं, एक आम आदमी भी अगर बिना डरे डटा रहे, तो अंतर आ सकता है. वो बताते हैं, अगर मैं लड़ने को तैयार नहीं था तो मुझे लिखना ही नहीं चाहिए था. अगर लिखा, तो फिर डरकर पांव खींचने का मतलब नहीं था. यूं लोकतंत्र की महानता पर टेक्स्टबुक लेख पढ़ना अलग बात है. वो बोर करता है. मगर पेरी जैसे किसी इंसान से इतने लंबे और थका देने वाले संंघर्ष के बाद क़ानून में आस्था दिखाते हुए सुनना, ये ख़ूबसूरत है.

अरिंदम

वी शेल ओवरकम…
‘लाइव मिंट’ की एक ख़बर में पेरी का बचपन पढ़कर लगा, शायद IIPM के पीछे लगने की एक वजह उस बचपन से आई हो. आंध्र प्रदेश के लोअर मिडिल क्लास परिवार का लड़का. सरकारी स्कूल में पढ़ाई. 17 की उम्र में पिता की मौत. पढ़ाई छूटने की नौबत. फिर मां का अपने गहने गिरवी रखकर बेटे को पढ़ाना. 21 की उम्र में चार्टर्ड अकाउंटेंट. इन्वेस्टमेंट बैंकर. नौकरी के वेतन से मां के गिरवी गहने छुड़ाना. फिर आउटलुक की जॉब. मीडिया में होने की जिम्मेदारी. छोटे शहरों के बच्चे, उनके मां-बाप कैसे सपने देखते हैं, इसका फर्स्ट-हैंड अनुभव था पेरी को. वो जानते थे कि मां-बाप कैसे बच्चे की पढ़ाई के पैसे जुटाते हैं. IIPM ने झूठे दावों और स्लोगनबाज़ी से इन्हीं पैसों पर अपना किला खड़ा किया. इसके लिए सबसे ज़्यादा जिम्मेदार हमारा सिस्टम ही था. मगर अकेला नहीं. मीडिया का एक धड़ा भी दोषी था. करोड़ों रुपयों के विज्ञापनों के लालच में लंबे समय तक IIPM की गड़बड़ियां बड़े स्तर पर रिपोर्ट नहीं की गईं. गड़बड़ियां सामने आने के बाद भी विज्ञापन छापे जाते रहे. ‘पंच परमेश्वर’ में जुम्मन की खाला अलगू से कहती हैं- बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहोगे!

न्याय हुआ है, मगर देर से. वो भी अधूरा. स्टूडेंट्स के साथ जस्टिस होना बाकी है. उन्हें कम-से-कम मुआवज़ा तो मिलना ही चाहिए. ऐसी मिसाल तय होनी चाहिए कि फिर से कोई संस्थान बच्चों के भविष्य से झुनझुना न बजाए. बाकी यूट्यूब पर जाइएगा. IIPM के चैनल पर उनके कई नए-पुराने विडियो मिलेंगे. जिनपर कमेंट करने का विकल्प नहीं है. ये शायद उन स्टूडेंट्स के डर से बंद किया गया होगा, जिनको IIPM ने ठगा है.


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