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किसी को जीवनभर की जेल हो जाए, ये बालतोड़ न हो

लालू प्रसाद यादव, नेता थे. अभी चारा घोटाले के हाथों हलाकान हैं. हलाकान होने की अन्य वजहें भी हैं. इन दिनों पैर में बालतोड़ हो रखा है.  जिस कारण सूजन है, चलने में काफी तकलीफ हो रही है.

लालू यादव को शुगर भी है, ऐसे में घाव बड़ा रूप ले सकता है. इम्युनिटी कम हो जाती है ना. विटामिन-डी की कमी भी है, डॉक्टर उन्हें धूप लेने, कैल्शियम वाला खाना खाने और एंटीबायोटिक रिकमंड कर रहे हैं. हम चर्चा कर रहे हैं, बालतोड़ की. क्यों ये इतना खतरनाक है, क्यों किसी को बालतोड़ नहीं होना चाहिए.

आदमी की लाइफ में एक टाइम ऐसा आता है जब उसे लगता है “सब कंट्रोल में है.” लाइफ सेट हो गई है. नौकरी मिल गई है. “लड़का क्या कर रहा है?” पूछने वाले रिश्तेदार अंतर्ध्यान हो गए हैं. गर्मी का मौसम चला गया है. दूध फटना बंद हो गया है. जिस चेहरे को देखकर खुद को रिजेक्ट कर लिया था, उसने हंसकर बात करनी शुरू कर दी है. यहां तक कि पीजी की मेस में अच्छा खाना मिलने लगा है. मतलब आपको देव- मानव का डर खत्म हो चुका होता है. और आपको लगता है कि जिंदगी ने मुझे जितना सताया था, उसका डबल रिटर्न खुशियों के रूप में वापस कर दिया है.

तभी आपको औकात में लाने के लिए एक चमत्कार हो जाता है. एक छोटा सा दाना निकलता है. दोनों गोलियों और ‘अपशिष्ट निकासी द्वार’ के बीचोंबीच. उस जगह को विज्ञान की भाषा में जैम या जोड़ कहते हैं. आदमी का पूरा शरीर उसी जगह से बंटा होता है. आधा उसके ऊपर आधा नीचे. बीच में वो दाना. आपको लगता है कि कुछ नहीं है, साला दाना ही तो है. फिर वो सफेद होने लगता है. तब आप याद करना शुरू करते हैं कि ये साला निकला कैसे? शुरुआती तकलीफ किसी से बताते नहीं, सह जाते हैं. सोचते हैं “खुजला उजला दिया होगा.”

फिर वो दाना बनता है फुंसी, फिर फोड़ा और उसके आगे बढ़ने की वो स्पीड पकड़ता है जैसे किसी योगगुरू की किराना वाली दुकान. उसके अंदर ढेर सारा पस होता है और बाहर ढेर सारा दर्द. जगह ऐसी है कि किसी को बता नहीं सकते. लेकिन दुनिया कितनी जालिम है ये तभी पता चलता है. जब आप दोनों पैर दूर दूर फेंक कर मुंह बनाए हुए चलते हैं तो लोगों को शक हो जाता है. कि “कुछ तो गड़बड़ है दया.” वो पूछते हैं “भाई सब ठीक तो है न?”

अब उनसे क्या कहके पीछा छुड़ाओ. बताना पड़ता है कि “भैया बालतोड़ हो गया है.” फिर वो निर्लज्ज पैरों की बदली हुई दशा दिशा देखने के बाद भी पूछने लगते हैं “कहां हुआ है?” उनको इशारे में बताओ पाकिस्तान में हुआ है तो सालों को समझ नहीं आता. बातों बातों में सब खोलकर रख देना पड़ता है. फिर उसके बाद की कार्रवाई दो स्टेप में होती है.

डराना:

मेरे दूर के मौसेरे भाई को ऐसे ही बालतोड़ हो गया था. उसके बतासे सड़कर गिर गए थे.

बहुत गंदी बीमारी है भैया, महीनों सेल्हता(झेलता) रहिता है आदमी.

ऐसे ही मेरे एक दोस्त को हुआ था. 2 महीनें तक दवा दारू सब कराई. ओझा बाबा तक दौड़े. आखिर कुछ काम न आया और वो दोस्त मर गया.

भगवान किसी को एड्स दे दे मगर बालतोड़ न दे.

सलाह:

अइसा  करो आप चिरैया के दूध की कुल्फी जमाकर आधी रात को सूरज निकलने से पहले पहले खाओ.

अपने घर की छत पर एक पीपल रोप दो.

सराय हइबतगंज के पास एक बड़े पहुंचे बैद रहते हैं. वहां दिखा लो. बहुत कड़वी दवाई देते हैं. लेकिन बस तीन खुराक का काम है. चौथी खानी पड़े तो मुझे सारी रात धूम में खड़ा रखना.

इतना सब सुनने के बाद आपको अपनी जिंदगी से नफरत हो जाती है. मांबाप को धिक्कारते हैं जिन्होंने पैदा किया. भगवान को पहले तो गरियाते हैं कि “ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है.” फिर अगले ही पल ठीक कर दो भगवान की गुहार लगा पड़ते हैं. उसी दम याद आता है कि अपने पास तो दो खुदा हैं. नीचे वाले को बॉस कहते हैं. उसके पास छुट्टी मांगने जाते हैं. बॉस कंप्यूटर पर कुछ बहुत सीरियस पढ़ने का नाटक करते हुए आंखें गड़ाए है. लेकिन आपका दर्द सब्र पर भारी पड़ता है. आप कराहते हुए अपनी अपील उठा देते हैं.

“सर छुट्टी चाहिए”

“अच्छा”

“सर तबियत बहुत खराब है. बैठा नहीं जा रहा. खून और पस बंद नहीं हो रहा. एक साथ दो पेन किलर खाईं लेकिन आराम नहीं मिला. डॉक्टर ने बेडरेस्ट को बोला है.”

(कंप्यूटर से आंखें हटाने का नाटक करते हुए)”हां बताओ दीनानाथ, कुछ कह रहे थे तुम.”

(मन ही मन स्क्रिप्ट दोहराते हुए)”सर पिछवाड़े में बालतोड़ हो गया है.”

“तो”

“छुट्टी चाहिए सर…. दर्द ज्यादा है.”

“पिछले महीने भी तुमको ऐसा ही कुछ हुआ था.”

“मुझे नहीं हुआ था सर. मैंने पिछले 6 महीने से छुट्टी नहीं ली. आप गए थे गर्मी से परेशान फैमिली को पहाड़ घुमाने.”

“अच्छा.. मेरी छुट्टियों का बड़ा हिसाब रखते हो”

“नहीं सर. डॉक्टर ने बेडरेस्ट को बोला है.”

“अच्छा तुम्हारी जगह डॉक्टर आएगा काम करने”

“नहीं सर मैं खुद आ जाऊंगा. बस थोड़ा सही हो जाए”

“ठीक है. एक दिन की छुट्टी मिलेगी. लेकिन संडे को आना पड़ेगा. अगर मुझे कुछ काम कराना होगा तो फोन कर दूंगा. घर से कर देना.”

“थैंक्यू सो मच सर.”

इत्ते एफर्ट के बाद जो आपको छुट्टी की नेमत मिलती है. उसे आप दो तकियों के बीच में पिछवाड़ा रखकर बैठे हुए बिता देते हैं. क्योंकि चलने से पैर दांए बांए होते हैं. तो सौ लोग पूछने आ जाते हैं. बैठ सकते नहीं. पेंदे से लिक्विड लीक करने लगता है. ऑपरेशन कराने से डर लगता है. सुई देखते ही आंखों में यमराज तैर जाते हैं. अपने हाथ से ब्लेड मारकर पस निकाल देने की औकात नहीं है. फिर ऐसी जगह है कि ब्लेड कहीं और मारो कटके हाथ में “कुछ और” आ जाए तो मर्दानगी से भी हाथ धोय लेओ.

लेकिन आपको पता है, छु्ट्टी एक दिन की है. शाम ढलते ढलते फैसला करना पड़ता है कि आर या पार. आखिर अपने कंधों पर अपना जनाज़ा लेकर पहुंचते हैं डॉक्टर के पास. वह तो बैठा ही इसी इंतजार में होता है कि कोई आ जाए और उनको निकियाने(खाल निकालने) का मौका मिले. डॉक्टर के पास जाकर अपना तन और धन सौंप दो. वो धन का बंडल बनाके जेब में रखेगा और आपके तन से जी भरकर खेलेगा. आपके बालतोड़ का पोस्टमार्टम करने के बाद मटमैली सी एक गांठ निकाल कर दिखाएगा और कहेगा “ये कील है, बिना इसको निकाले ठीक नहीं होता.”

आप सारे जहां का दर्द समेटे घर आते हैं और चार-आठ गोली खाकर सो जाते हैं. कल से अपनी जिंदगी फिर खूबसूरत बनाने के सपने के साथ.


 

 

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